नई दिल्ली। न्यूज़लॉन्ड्री की पत्रकार मनीषा पांडे से जुड़ी रिपोर्टिंग को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा है कि अदालत मीडिया की आवाज दबाने या उसे नियंत्रित करने का कोई इरादा नहीं रखती, लेकिन रिपोर्टिंग करते समय उसके संभावित सामाजिक परिणामों को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति सी. हरिशंकर ने कहा कि अदालत यह नहीं कह रही कि मीडिया कोर्ट की कार्यवाही या टिप्पणियों की रिपोर्टिंग न करे। लेकिन रिपोर्टिंग इस तरह होनी चाहिए, जिससे किसी व्यक्ति के खिलाफ नफरत या हिंसक प्रतिक्रिया को बढ़ावा न मिले।
जस्टिस हरिशंकर ने कहा, “हम मीडिया को गला घोंटने या सेंसर करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। हम यह भी नहीं कह रहे कि आप कोर्ट की टिप्पणियों की रिपोर्टिंग न करें। लेकिन रिपोर्टिंग करते समय उसके परिणामों को ध्यान में रखें।”
कोर्ट ने विशेष तौर पर इस बात पर नाराज़गी जताई कि पिछली सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणियों के एक पैराग्राफ को संदर्भ से अलग कर सोशल मीडिया पर अलग पोस्ट के रूप में प्रसारित किया गया, जिसके बाद हजारों की संख्या में नफरत भरे संदेश सामने आए।
न्यायमूर्ति हरिशंकर ने कहा, “कल की सुनवाई में कही गई एक बात को अलग कर पोस्ट बना दिया गया, जो सोशल मीडिया पर हर जगह फैल गया। उसके बाद हजारों नफरत भरे मैसेज आए। हममें से कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं बनना चाहता, जिसकी वजह से किसी के खिलाफ नफरत फैले।”
उन्होंने यह भी कहा कि संभव है कि रिपोर्ट करने वाले प्लेटफॉर्म का ऐसा कोई इरादा न रहा हो, लेकिन सोशल मीडिया पर चीजें जिस तरह उठाई जाती हैं, उसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं। “अगर यही नतीजा निकलता है, तो जज बातचीत करना ही बंद कर देंगे,” उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर न्यायाधीश चुप रहते हैं तो बार (वकीलों) से प्रतिक्रिया नहीं मिलती, लेकिन बोलने की कीमत यह नहीं होनी चाहिए कि किसी पत्रकार को निशाना बनाया जाए।
अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा कि मनीषा पांडे के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई करने का उसका कोई इरादा नहीं है। “हम स्पष्ट करते हैं कि हम उस पत्रकार के खिलाफ कुछ भी करने नहीं जा रहे हैं। वह एक अच्छी पत्रकार हो सकती हैं। आप संबंधित पत्रकार को बता दीजिए कि उन्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है,” जस्टिस हरिशंकर ने कहा।
यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें टीवी टुडे नेटवर्क ने न्यूज़लॉन्ड्री के खिलाफ कॉपीराइट उल्लंघन और मानहानि का आरोप लगाते हुए याचिका दायर (2021) की है।
हाईकोर्ट की इन टिप्पणियों को मीडिया रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी, संदर्भ और उसके सामाजिक प्रभावों पर एक अहम संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।
कुछ प्रतिक्रियाएं-
मीडिया में पेड-न्यूज़ का अपूर्व उदाहरण साबित होंगे पतंजलि (ऐंकर पतंजलि को ‘पातंजलि’ न बोलें) के विज्ञापन। इस हाथ ले, उस हाथ दे। बाबा रामदेव को वाहवाही का समांतर कवरेज इश्तहारी धन बटोरने वालों ने दिया। अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दवा के धंधे से अलग दिखाने की कोशिश होने लगी! -ओम थानवी, वरिष्ठ पत्रकार
आशीष गोयल-
बेंच से पत्रकारों को डराया-धमकाया जाए और फिर जब सवाल उठें तो अगली सुबह एक औपचारिक-सी “नॉन-अपोलॉजी” जारी कर दी जाए—यह न्याय व्यवस्था के लिए कितनी बड़ी विडंबना है।
जो जज संविधान की शपथ लेकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रेस की आज़ादी की रक्षा के लिए बैठे हैं, वही अगर पत्रकारिता की स्वतंत्रता के प्रति इतना उपेक्षापूर्ण रवैया दिखाएँ, तो यह गहरी चिंता का विषय है। अदालत की टिप्पणियाँ जब संदर्भ से काटकर नफरत का हथियार बनें, तो जिम्मेदारी सिर्फ मीडिया की नहीं, उस शक्ति की भी होती है जो शब्दों से माहौल बनाती है।
यह सवाल अब केवल एक पत्रकार या एक रिपोर्टिंग तक सीमित नहीं है। सवाल इससे कहीं बड़ा है—अगर जज ही अभिव्यक्ति की आज़ादी को हल्के में लेने लगें, तो संविधान की रक्षा कौन करेगा?
न्यायपालिका का सम्मान उसकी ताकत से नहीं, बल्कि उसके संयम, संवेदनशीलता और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता से होता है। प्रेस को “परिणाम” की चेतावनी देना और फिर खुद को जिम्मेदारी से अलग कर लेना, लोकतंत्र की आत्मा के लिए खतरनाक संकेत है।
संविधान किसी व्यक्ति या पद से बड़ा है। और जब संविधान की रक्षा करने वाले ही उससे विमुख दिखें, तो सवाल उठाना न केवल पत्रकारों का अधिकार है, बल्कि लोकतंत्र की ज़रूरत भी।
सौरव दास-
मनीषा पांडे या किसी भी विश्वसनीय पत्रकार द्वारा रिपोर्टिंग के दौरान इस्तेमाल की गई भाषा पर निगरानी रखने वाले ये जज आखिर होते कौन हैं? “हम ऐसा आदेश पारित कर सकते हैं जिससे उसका पूरा करियर अस्त-व्यस्त हो जाएगा”—यह टिप्पणी एक जज की ओर से की गई। क्या यही तरीका है किसी संवैधानिक अदालत का, जो महज “shit” शब्द के इस्तेमाल पर एक पत्रकार को धमकाए?
जो कोई भी मीडिया की मौजूदा हालत से वाकिफ है, वह उसे बयान करने के लिए इससे कहीं ज्यादा सख्त, कठोर और बदसूरत शब्दों का इस्तेमाल करेगा। जब कुछ टीवी चैनलों द्वारा उन्मादी सांप्रदायिक अभियान चलाए जाते हैं, तब क्या जस्टिस सी. हरि शंकर और ओम प्रकाश शुक्ला स्वतः संज्ञान लेते हैं और उन्हें शुरुआती स्तर पर ही रोकते हैं? यह तो लोकतंत्र के लिए कहीं ज्यादा गंभीर और दूरगामी खतरा है, उस एक शब्द से कहीं अधिक, जिसने मानो उनकी अंतरात्मा को झकझोर दिया।
इस तरह की डराने-धमकाने वाली भाषा सड़कों पर गुंडों के मुंह से शोभा देती है, न कि किसी संवैधानिक अदालत से, जो अपनी शक्ति संवैधानिक संयम और नैतिक गरिमा से हासिल करती है। जजों को अपनी सीमाओं का भान होना चाहिए और अपनी टिप्पणियों में अत्यंत सतर्कता बरतनी चाहिए। अन्यथा नुकसान किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि उसी संस्था का होगा, जिसकी प्रतिष्ठा जनता की नजरों में घटेगी—एक ऐसी संस्था, जो केवल और केवल सम्मान की हकदार है।
मेघनाद-
स्टेप 1: सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणियां करके एक पत्रकार का करियर तबाह करने की धमकी देना — मनीषा पांडे
स्टेप 2: उन कड़ी टिप्पणियों के लिए सार्वजनिक तौर पर सवालों के घेरे में आ जाना
स्टेप 3: इस बात पर निराशा जताना कि उन्हें ही कटघरे में खड़ा किया जा रहा है
यही है हमारे माननीय जजों की रोज़मर्रा की “सामान्य” दिनचर्या।



