विमल दीक्षित-
अखबार के मालिकों की प्राथमिकताएं ही अखबार की दिशा तय करती हैं। समाचार संपादक से लेकर पत्रकार उनकी बात मानने के लिए बाध्य होते हैं। वर्तमान में, अधिकांश अखबारों के मालिक सरकार के प्रति नतमस्तक दिखाई देते हैं। पहले पन्ने पर सरकार की प्रशंसा अनिवार्य हो गई है, क्योंकि इसके बिना सरकारी विज्ञापनों और समर्थन से हाथ धोना पड़ सकता है।
हिंदी पट्टी के अखबारों की स्थिति सबसे ज्यादा दयनीय है, जो सरकार के खिलाफ खबर प्रकाशित करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं। कुछ चुनिंदा अखबार जैसे इंडियन एक्सप्रेस और हिंदू ने अपनी स्वतंत्रता और गरिमा बनाए रखी है, जबकि अधिकांश मीडिया घराने पत्रकारिता के नाम पर जनता को गुमराह करने में लगे हैं। चरण वंदना का काम कई दशक से चल रहा है लेकिन अब उफान पर है।
गोदी मीडिया जैसे संबोधन किया जा रहे हैं मगर बेशर्म मालिकों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उन्हें तो सिर्फ माल बटोरना है और जनता को बेवकूफ बनाना है। खोजी पत्रकारिता लुप्त हो गई है। आपको याद होगा कि इंडियन एक्सप्रेस, हिंदू, टाइम्स ऑफ इंडिया, टेलीग्राफ और जनसत्ता में जब सरकार के खिलाफ कुछ छपता था तो संसद और विधानसभा में हंगामा हो जाता था। जनता को जवाब देना पड़ता था, लेकिन अब अखबार के मालिक क्या कर रहे हैं, यह जनता जान चुकी है। इसलिए प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जनता दूर होती जा रही है और अब समाचारों के लिए सोशल मीडिया का सहारा ले रही है। अखबार का मालिक अगर स्ट्रांग है और खुद्दारी है तो वह सरकार से टकराने में गुरेज नहीं करता।
यहाँ एक घटना का जिक्र करता हूँ जो उत्तराखंड के एनडी तिवारी के मुख्यमंत्रित्व काल की है। उस समय सीधे-साधे तिवारी जी के खिलाफ लगातार षड्यंत्र हो रहे थे। नंबर दो की हैसियत रखने वाले एक मंत्री चाहते थे कि तिवारी जी को हटा दिया जाए और उनको मुख्यमंत्री बना दिया जाए। इसके लिए लगातार वे कांग्रेस हाई कमान के कान फूंक रहे थे।
हमने दिल्ली में एक बहुत बड़े नेता के पीए से जब बात की तो उन्होंने बताया कि अमुक मंत्री जोरदारी से तिवारी जी को हटाने के लिए लगा हुआ है। कुछ माल भत्ता भी दिया गया है। खबर की पुष्टि होने पर हमने यह रिपोर्ट लगातार दो-तीन दिन अखबार के प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित की। रिपोर्ट हमारे नाम से प्रकाशित होती थी। इस खबर को लेकर सत्ता गलियारों में हड़कंप कट गया।
सूचना विभाग सक्रिय हुआ जो मंत्री के अंडर आता था। हमसे संपर्क किया और खबर नहीं छापने के लिए कहा। हमने मना कर दिया। उस अफसर ने चेतावनी दी कि तुम्हारे खिलाफ यह हो सकता है वह हो सकता है परेशानी में पड़ सकते हो। हमने अपने अंदाज में जवाब दिया जो उखाड़ना हो उखाड़ लो। खबर आगे भी छपेगी। सूचना विभाग के अफसर ने यह बात मंत्री को पहुंचा दी। मंत्री आग बबुला हो गया। उसने आव ना देखा ताव… अखबार के दफ्तर में फोन लगाया और हमारा नाम लेते हुए बोला बात कराओ।
उस समय हम सचिवालय में थे। हमारे सहयोगी जो सहायक संपादक थे, ने उनसे बात की। मंत्री जी फट पड़े। फोन पर ही मांकी धीकी करने लगे। यह कर दूंगा वह कर दूंगा, जेल भिजवा दूंगा। जो भड़ास निकाल सकते थे वह निकाली और फोन रख दिया। शाम को जब हम ऑफिस पहुंचे तो सहायक संपादक महोदय का मूड उखड़ा था। हमारे बिना पूछे उन्होंने पूरा किस्सा सुना दिया। अब हमारे मूड उखड़ने की बारी थी। हम भी आर पार के मूड में आ गए। तुरंत ही हमने अखबार के मालिक को फोन लगाया।
यहां आपको बता दें कि जिस अखबार में हम काम करते थे वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सफल उद्यमी शाहनवाज राणा का अखबार था। अखबार दिल्ली मुजफ्फरनगर मुरादाबाद सहारनपुर बरेली और लखनऊ से प्रकाशित होता था। यह वही समाचार पत्र था जिसमें प्रख्यात कथाकार और पत्रकार कमलेश्वर संपादक थे और श्याम अनजान जैसे लोग उसमें अपना योगदान दे रहे थे। शाहनवाज जी को पूरा घटनाक्रम बताया और पूछा कि क्या करना है नतमस्तक होना है या उनको समाचार पत्र की औकात बतानी है।
उनका जवाब था की जो जो गालियां मंत्री ने बकी है वह लिख डालो। पहले पन्ने में खबर जानी चाहिए कई दिन तक यह चलाओ। मंत्री अगर ज्यादा अंग्रेजी पढ़ेगा तो हमारा नाम भी शाहनवाज राणा है। उसकी सारी नेतागिरी भुला दूंगा। उनका जवाब सुनकर हमें मालूम हो गया कि आगे क्या करना है। अगले दिन हमने समाचार प्रकाशित किया। उसमें मंत्री ने जो जो गालियां दी थी मैंने डॉट डॉट करके सब प्रकाशित की। वह भी सुर्खियों में। लीड लगाई थी।
इस समाचार से उत्तराखंड में भूचाल आ गया। तमाम वरिष्ठ पत्रकारों के फोन आए। सूचना विभाग के अफसर भी दफ्तर आए। कहने लगे बस करो यार। बहुत हो गया। तिवारी जी का भी फोन आ गया। बोले महाराज जी क्या हो रहा है। क्या छप रहा है क्या आफत कर दी तुमने।
हमने तिवारी जी से पूछा गलत छप रहा है क्या। उनका कहना था कि बिल्कुल ठीक छप रहा है। हमने तो फोन तुम्हें शाबाशी देने के लिए किया है। बिल्कुल सही खबर प्रकाशित की है आपने। उत्तर प्रदेश में जब हम मुख्यमंत्री थे तो ऐसे ही षड्यंत्र होते रहते थे। हमने कभी परवाह नहीं की। जिसको मुख्यमंत्री बनाए रखना है रखें। नहीं तो नमस्ते। आप इसी तरह से लिखते रहिए। हमारी शुभकामनाएं हैं।
इस घटना का जिक्र सिर्फ इसलिए किया कि प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का मालिक अगर स्ट्रांग है तो वह किसी भी धमकी के आगे नहीं झुकेगा और वह अपने कर्तव्यों का पालन करेगा जिसका कि आज के दौर में सर्वथा अभाव है। बहुत जल्दी प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का दौर समाप्त होने वाला है। लोग बाग खबरों के लिए केवल सोशल मीडिया का सहारा लेंगे।



