विश्व दीपक –
छत्तीसगढ़ में 210 माओवादियों ने आत्मसमर्पण कर दिया. इसे माओवादी आंदोलन के इतिहास का सबसे बड़ा आत्मसमर्पण कहा जा रहा है. महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ की घटनाओं को मिलाकर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि भारत के माओवादी आंदोलन का अंत हो चुका है. बहरहाल, मैं आपका ध्यान इन तस्वीरों की और आकर्षित करना चाहता हूं. ध्यान से देखिए. ये तस्वीरें भारत के माओवादी आंदोलन का इतिहास और वर्तमान दोनों बताती हैं.


पहली तस्वीर में आत्म समर्पण करते हुए माओवादी नेता वेणुगोपाल राव हैं. उनके चेहरे पर मुस्कान है. दूसरी तस्वीर में माओवादी क्रांति के पैदल सिपाही जिनमें से कई की उम्र 18 साल से भी कम लग रही है. उनके चेहरे बुझे हुए हैं. उनसे एक गहन उदासी और बेचारगी झलक रही है.
दूसरी तस्वीर ज्यादा अहम है क्योंकि इससे पता चलता है कि माओवादी बच्चों का युद्ध में इस्तेमाल करते थे. माओवादी आंदोलन में महिलाएं बंदूक चलाती हैं ये पता था लेकिन बच्चियों का भी युद्ध में इस्तेमाल किया जाता है – यह नहीं पता था.
यह युद्ध अपराध है.
हाथ में 12 बोर की बंदूक लेकर, पैर में प्लास्टिक की चप्पल पहने हुए जब इन कमजोर, कुपोषित लोगों को मैंने समर्पण करते देखा तो उन लोगों के नाम पर उबकाई आने लगी जिन्हें माओवाद के पक्ष में लिखते,बोलते या कार्यक्रम करते देखा है.
जेएनयू, जामिया से लेकर डीयू तक और दिल्ली से लेकर मुंबई, कोलकाता,हैदराबाद तक फैले अनौतिक लोग इन्हीं लोगों के नाम पर क्रांति की दुकान चलाते थे.
नीचे संलग्न वीडियो देखिए. लगता है कि इन लोगों को महीनों से दो जून भरपेट खाना नहीं मिला है. होंठ सूखे हैं. हरी वर्दी के अंदर जैसे जिस्म है ही नहीं. गाल की उभरी हुई हड्डियों ने आंखों को पीछे धकेल दिया है.
छत्तीसगढ़ आत्मसमर्पण की तस्वीरें तो और भी विदारक हैं. यहां भी समर्पण करने वाले माओवादियों में कई ऐसे हैं जिनकी उम्र 18 साल से भी कम लग रही है. जो वयस्क या मध्यवय के हैं वो इतने कमजोर और कुपोषित हैं कि उनसे ठीक से खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा.
इन सबकी आंखों में मुझे बंधक होने का भाव नज़र आता है. अपनी नियति और परिस्थितियों के बंधक. उस विचार के बंधक हिंसा, डर, कायरता जिसे दूसरे शब्दों में छापामार युद्ध की रणनीति कहा जाता है और लगातार भागना लिखा है. यह सब देखकर मुझे बार-बार कानू सान्याल की याद आती है.
उन्होंने क्या कहा था यह तो नहीं कहूंगा लेकिन यह ज़रूर कहूंगा कि इन तस्वीरों के सामने आने से महानगरों में रहने वाले वो माओवादी आइडियोलॉग बुरी तरह एक्सपोज हो गये हैं जो दूसरे के बच्चों को दंडकारण्य में क्रांति का प्रशिक्षण लेने भेजते थे और अपने बच्चों को हॉवर्ड,येल,ऑक्सफोर्ड,कैंब्रिज में पढ़ाई के लिये भेजते थे.
माओवादी नेता वेणुगोपाल राव उर्फ भूपति ने सरेंडर कर दिया. उनके सिर पर 6 करोड़ का इनाम था.अच्छी बात है.
माओवादियों को समझ आ रहा है कि भारत में सत्ता ईवीएम का बटन दबाने बदलती है, न कि बंदूक का ट्रिगर दबाने से. उनके साथ 60 और माओवादियों ने सरेंडर किया है. यह और भी अच्छी बात है.
नेपाल के माओवादियों को यह बात 20 साल पहले ही समझ में आ गई थी.उधार के विचार यानि चीन के राष्ट्रवादी नेता माओत्से तुंग की नकल कर भारत में क्रांति करने के चक्कर में जितने लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी है उनमें से 60-70 फीसदी निम्न मध्यवर्गीय, गरीब, किसान,मजदूर,आदिवासियों के बच्चे थे.कितने प्रतिभाशाली लोग,जो शायद जिंदा होते तो देश-समाज के ज्यादा काम आते,मारे गये.
कितने युवकों ने इस दिवा स्वप्न के चक्कर में अपना करियर,जीवन बर्बाद कर लिया. पैसे वाले, सत्ताधारी बड़े आइडियोलॉग तो फिर भी बच गये. अफसोस होता है.
हालांकि बहुत सारे फ्रॉड अभी भी हैं जो दबी-छिपी जुबान में माओवाद की महत्ता समझाते हैं. इस विचारधारा के नाम पर शहरों में अपनी दुकान चला रहे हैं. कहीं एनजीओ के नाम पर, कहीं अकादमिक जगत में रिसर्च के नाम पर, कहीं यूनिवर्सिटी में पर ऐसे लोगों से सावधान रहना है.
याद रखिए, लोकतंत्र में एक लाख खामियां हो सकती हैं लेकिन गिरी हालत में भी यह माओवाद से एक हज़ार गुना बेहतर होगा.यह भी याद रखिए कि भारत में सत्ता बंदूक का ट्रिगर दबाने से नहीं, ईवीएम का बटन दबाने से बदलती है.
आपके माओवादियों के बंदूकवाद का विरोध करना सही है। लेकिन चुनाव द्वारा सत्ता बदलेगा बोलना एकदम गलत है। बटन दबाकर सिर्फ सरकार बदलते थे। लेकिन आगे सरकार को बदलना भी मुश्किल होते जाएंगे।
बैलट वाद और बुलेट वाद एक ही बीमारी की दो पहलुओं हैं।आम जनता पर तीव्र हो रहे विदेशी देशी कॉरपोरेट लूट और उसकी सेवा में मजबूत हो रही फासीवाद से चुनाव द्वारा मुक्ति नहीं मिलेगा मित्र। मुक्ति केलिए, देशव्यापी जन आंदोलन लगेगा। आंदोलन द्वारा ही हम नव भारत बनाकर प्रमुख समस्याओं को सुलझा पाएंगे।
-सी शेखर
अम्बिका- सत्ता आज भी बंदुक के बल पर ही चलाई जा रही है।
स्वरुप थोड़ा बदला हुआ जैसा आभासित होता है। बल-प्रयोग द्वारा ही आज तानाशाह की सरकार चल रही है, लोकतंत्र का चोला पहनाकर। लेफ्ट का कोई भी विंग कारपोरेट की दलाली नहीं करता। बल्कि आमजनता दबे कुचले लोगों के जर जोरू जमीन जंगल पानी पहाड़ की रक्षा के लिए तानाशाहों और लालची कारपोरेट के विरुद्ध खड़ा होता है। जंगल पहाड़ छीनने वाले कारपोरेट और उसकी दलाल सरकार का विरोध जब कोई व्यक्ति या संगठन करता है तो उसे नक्सली माओवादी कह कर हत्या कर दिया जाता है।
आप जर्नलिज्म करिए विश्वदीपक जी , आप पत्रकारिता अच्छी कर लेते है काहे राजनीति के चक्कर में पड़ गए हो वैसे लोकतंत्र का दूसरा पहलू तानाशाही ही होता है वर्ग विभाजित समाज में लोकतंत्र किसके लिए होता है और किसके लिए तानाशाही यह बात करते तो ज्यादा बेहतर होता!
-जेपी नरेला
अरे, बहुत दिनों बाद आप आए. स्वागत और तारीफ के लिए शुक्रिया! वैसे मैं राजनीतिक पत्रकारिता ही करता आया हूं. लोकतंत्र और तानाशाही पर किसी दूसरे दिन विचार किया जाएगा. मेरा फोकस फिलहाल माओवादियों के आत्मसमर्पण पर है जो कि अच्छी बात है. बहुत लोगों की जान बचेगी. जिनकी बच गई है उनकी जान में थोड़ी जान आने की संभावना है. -विश्व दीपक
विवेक कुमार- लड़ाई तो पूंजीवाद, साम्राज्यवाद बनाम समाजवाद व साम्यवाद के मध्य बताई गई है और आप लोकतंत्र को अजेय घोषित कर रहे हो । लोकतंत्र के विरुद्ध कम्युनिस्टों की लड़ाई थी कब बल्कि कम्युनिस्ट तो लोकतंत्र के लिए सबसे अगली पंक्ति में खड़े है चाहे फिर वह यूरोप, एशिया, चीन, लेटिन अमेरिका या उतरी अमेरिका ही क्यों ना हो। संघर्ष व संवाद कभी लोकतंत्र के विकल्प का छिड़ा ही नही था बस ले देकर बुर्जआ जनतंत्र व जनवादी जनतंत्र की लड़ाई रही है।



