दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ, जिसमें जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस अमित शर्मा शामिल थे, ने एक आपराधिक अवमानना मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि न्यायालय द्वारा विचार किए जाने से पहले दस्तावेज़ों और दलीलों को मीडिया में लीक करना स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने कहा कि ऐसा करने से पक्षों के बीच पूर्वाग्रह पैदा होता है और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होती है।
ये पूरा प्रकरण क्या है?
यह मामला रूप दर्शन पांडे (मेसर्स ब्रेन्स लॉजिस्टिक्स प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक) और मीडिया प्लेटफॉर्म “द न्यू इंडियन” के पत्रकार अतुल कृष्णा के खिलाफ आपराधिक अवमानना से जुड़ा था। विवादित लेख में दिल्ली हाईकोर्ट और उसकी रजिस्ट्री के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए गए थे।
हीरो मोटोकॉर्प लिमिटेड ने आरोप लगाया कि बिना तारीख वाले कानूनी नोटिस में न्यायपालिका और रजिस्ट्री पर दुर्भावनापूर्ण आरोप लगाए गए। पत्रकार द्वारा लिखे लेख का शीर्षक था, “हीरो मोटोकॉर्प अब कथित अदालती हेरफेर के मामले में जांच के घेरे में है”।
पत्रकार को मिली माफी
अदालत ने पाया कि कानूनी नोटिस में वकील का नाम, बार काउंसिल पंजीकरण संख्या, और अन्य महत्वपूर्ण विवरण अनुपस्थित थे।
पत्रकार ने बिना शर्त माफी मांगी, जिसे स्वीकार करते हुए न्यायालय ने उनके खिलाफ अवमानना नोटिस खारिज कर दिया।
दोषियों पर कार्रवाई-
- रूप दर्शन पांडे को 2,000 रुपये जुर्माने और दो सप्ताह के साधारण कारावास की सजा सुनाई गई।
- पांडे के वकीलों को गैर-पेशेवर आचरण के लिए बार काउंसिल ऑफ दिल्ली को रिपोर्ट किया गया।
अदालत की टिप्पणी
कोर्ट के मामलों को कवर करने वाली वेबसाइट लाइव लॉ में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने कहा कि वकीलों और वादियों का यह कर्तव्य है कि वे न्यायिक प्रणाली में जनता का विश्वास बनाए रखें। साथ ही भविष्य में किसी भी गैर-जिम्मेदाराना कार्य से बचने की हिदायत दी।
निष्कर्ष: हाईकोर्ट ने इस मामले को न्यायपालिका की गरिमा और निष्पक्षता को बनाए रखने का अवसर बताया और जिम्मेदार पत्रकारिता पर जोर दिया।



