मीडिया की मंडी में हमारे लिए अब जयपुर के वे दिन सपने जैसे

ये मार्च या अप्रैल 1990 था,जब मैं जयपुर दूरदर्शन समाचार विभाग से नियमित जुड़ा था।एक कैजुअल सब एडिटर कम ट्रांसलेटर के रूप में……हर महीने दस दिन की बुकिंग मिलती थी….उससे एक मुश्त कमरे का किराया और भोजन सहित छोटा-मोटा खर्च निकल जाता था,ये बहुत बड़ा सहारा था।साथ ही यह उम्मीद भी, कि कभी मौका लगा तो दूरदर्शन में स्थायी हो जाएंगें।तब किसी ने मार्गदर्शन नहीं दिया था,कि समाचार विभाग में सरकार कभी एडिटर या सब एडिटर की पोस्ट नहीं निकालेगी।खैर ये तो लंबे समय तक धक्के खा कर खुद ही समझना पड़ा।समाचार संपादक एम आर सिंघवी ने मुझमें विश्वास जताया और न्यूज रूम में हर तरह के असाइनमेंट करने का मौका दिया।

इससे नए तरह का काम भी सीखा और आत्मविश्वास भी बढ़ा। साथ ही जीवन की गति वापस आर्थिक पटरी पर आ गई।न्यूज रूम में उन दिनों अजय चतुर्वेदी और हरीश करमचंदानी भी थे,बाद में अजंता देव,प्रेम भारती,रतन सिंह,प्रज्ञा पालीवाल गौड,ओ पी मीणा,भरतलाल मीणा और धर्मेश भारती के साथ भी काम किया…पर सबसे ज्यादा सीखा अजयजी और प्रज्ञाजी से।न्यूज रूम से जुड़े होने के कारण तकनीक और समाचारों में होने वाले परिवर्तनों को और उनको लेकर चलने वाली पॉलटिक्स को भी समझा।

जब मैं जयपुर दूरदर्शन से नियमित जुड़ा था… तब वह दूरदर्शन का स्वर्णयुग था….मोनोपॉली ब्रॉडकास्टर होने के बावजूद कार्यक्रमों में विविधता और गुणवत्ता के कारण दूरदर्शन का वह काल आज भी दर्शक याद करते हैं।जयपुर में उस समय अनुभवी प्रोड्यूसरों और उत्साही सहयोगियों की मिश्रित टीम थी।

वरिष्ठ फिल्म समीक्षक नेत्रसिंह रावत ने यहां कई अच्छी डॉक्यूमेंट्रियां बनाईं।रामेंद्र सरीन ने चर्चित सीरियल दायरे बनाया।इसके अलावा भी गुलशन सचदेव,अशोक गुप्ता,रूप स्पार्क जैसे प्रतिभाशाली प्रोड्यूसर भी यहां रहे।तो बाद में नंद भारद्वाज,राजेन्द्र बोहरा,कृष्ण कल्पित,आनंद स्याल,राधेश्याम तिवारी और चंद्रकांत वर्ठे जैसे साहित्यप्रेमी प्रोड्यूसर भी।युवाओं की टीम भी कोई कमजोर नहीं रही…..एबीपी के विजय विद्रोही और न्यूज नेशन के संजय कुलश्रेष्ठ ने भी अपना कैरियर यहीं से शुरु किया था….कुल मिलाकर वो जयपुर दूरदर्शन का शैशवकाल था पर यहां युवा टीम थी ….उत्साह और रचनात्मकता का माहौल था…जो अब सिर्फ स्वप्न लगता है।

जयपुर दूरदर्शन से जुड़ने के बाद भी फ्रीलांसिंग जारी थी…….’माया’ में नियमित लेखन भी। फरवरी 1992 में माया का नियमित संवाददाता बन गया……पत्रकार ओम सैनी ब्यूरो चीफ थे, श्रीपाल शक्तावत साथ में संवाददाता थे और प्रताप सिंह बतौर फोटोग्राफर टीम का हिस्सा थे। माया के ब्यूरो में पूरा पारिवारिक माहौल था। माया ज्वाइन करते समय ही मैंने ओमजी को स्पष्ट कर दिया था कि दूरदर्शन की बुकिंग नहीं छोड़ूगा। वैसे भी मैगजीन का ब्यूरो अखबार जैसा नहीं रहता। कोई दबाव नहीं ….बस हर पखवाड़े एक स्टोरी करनी होती थी, जिसे हम आपस में मिल कर तय करके बांट लेते थे….ओमजी की रूचि राजनैतिक ज्यादा थी, इसलिए पॉलिटिकल स्टोरी उनके हिस्से और इंसिडेंटल या इन्वेस्टिगेटिव स्टोरियां मेरे और श्रीपालजी के हिस्से।

फार्मल इंट्रेक्शन के लिए सुबह- शाम निर्धारित समय पर ऑफिस में इकट्ठे होते….अखबार पढ़ते…चर्चाएं करते…चाय पीते और आवारागर्दी (आप खबरें ढ़ूढ़ना कहना चाहें तो कहें) करने निकल जाते…कोई तनाव नहीं, कोई दबाव नहीं। माया तब सबसे ज्यादा बिकने वाली पॉलिटिकल मैगजीन थी….उसमें छपी हर स्टोरी पर राजनैतिक गलियारों में तीव्र प्रतिक्रिया होती थी….तो निश्चय ही हमारी टीम उन प्रतिक्रियाओं का आनंद भी उठाती थी….और उत्साहित भी होती थी। राजस्थान सरकार के नियमों के अनुसार मैगजीन के लिए एक जने का ही एक्रिडेशन किया जाता था….सो ओमजी का एक्रिडेशन हो गया…….बाद में ओमजी ने गली निकाल कर फोटोग्राफर के रूप में प्रतापसिंह का भी एक्रिडेशन करवा दिया..लेकिन हमारा एक्रिडेशन नहीं हो रहा था। इस पर एक दिन ओमजी ने प्रस्ताव रखा कि चूंकि मैगजीन के नाम पर एक जने का ही एक्रिडेशन हो सकता है, इसलिए हम मनोरमा और मनोहर कहानियां (दोनों माया के प्रकाशकों की ही लोकप्रिय पत्रिकाएं थीं) के संवाददाता के रूप में अपना एक्रिडेशन करवा लें….परंतु मैंने और श्रीपालजी ने यह प्रस्ताव खारिज कर दिया कि काम माया के लिए करें और एक्रिडेशन दूसरी पत्रिकाओं से करवाएं। क्योंकि एक्रिडेशन के बाद राज्य में बस की यात्रा फ्री हो जाती थी और पीडब्ल्यूडी के डाक बंगले में सस्ती दर पर ठहरने का प्रबंध हो जाता था। लेकिन इससे हमें क्या लाभ….इसमें तो मूलतः मैनेजमेंट का लाभ है….उसके पैसे बचेंगे..तो हम क्यों कष्ट पाएं और अपनी साख के साथ बईमानी करें।

धीरज कुलश्रेष्ठ के एफबी वॉल से

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