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महाराष्ट्र

भारतीय टीवी मीडिया ने सैफ़ पर हुए वीभत्स हमले को पीपली लाइव फ़िल्म में बदल दिया!

नदीम अख्तर-

अपने टीवी स्क्रीन की ये तस्वीर आज शाम मैंने खींची। स्क्रीन में ऊपर दाईं ओर चाकू का एक टुकड़ा दिखाया जा रहा है, जो बॉलीवुड एक्टर सैफ़ अली खान की रीढ़ की हड्डी के बेहद पास से ऑपरेशन करके निकाला गया है। कल से मेरी नज़र इस ख़बर पर है पर कुछ लिखा नहीं।

सैफ़ के बदन में गड़े चाकू को देखकर आज रहा नहीं गया। डॉक्टर बता रहे हैं कि खून से लथपथ सैफ़ अपने छोटे से बेटे तैमूर का हाथ पकड़कर किसी शेर की तरह चलते हुए अस्पताल आए। वह फ़िल्मी नहीं, असल ज़िंदगी के हीरो हैं। दरअसल मैं कल से ही ये सोच रहा हूँ और मीडिया के अपने कुछ मित्रों से भी चर्चा की के अगर सैफ़ की रीढ़ की हड्डी से महज़ कुछ मिलीमीटर की दूरी पे चाकू या धारदार हथियार का टुकड़ा फँसा हो, तो आदमी चलना तो दूर, ठीक से हिलडुल भी नहीं सकता। फिर ये ख़बर कैसे आ रही है कि सैफ़ को ऑटो से अस्पताल ले जाया गया ? आज जब डॉक्टर ने इस बात की पुष्टि की तब जाकर मुझे विश्वास हुआ कि सच में ऐसा हुआ है। यानी सैफ़ ने जो किया है, वह किसी करिश्मे से कम नहीं।

आप में से बहुत से लोग माँ-बाप बन चुके होंगे। तो फ़र्ज़ कीजिए कि भगवान ना करे कभी ऐसी स्थिति आपके साथ आ जाए, तो आप क्या करेंगे? अगर बीच रात कोई अनजान शख़्स हथियार लेकर आपके छोटे-छोटे बच्चों के क़रीब पहुँच जाए, तो आपकी क्या हालत होगी? आप बिना कुछ सोचे अपनी औलाद को बचाने दौड़ पड़ेंगे ना! सैफ़ ने भी यही किया। घुसपैठिया उनके सबसे छोटे बच्चे के कमरे में समझो घुस ही गया था और वह कुछ भी कर सकता था। उस वक़्त और बुरी तरह घायल होने के बाद सैफ़ ने जो किया, उसके बाद तो मैं उनका मुरीद हो गया। ऐसी हालत में खून से लथपथ कोई अपने छोटे बच्चे का हाथ पकड़कर अस्पताल जाए, तो उस पीड़ा में बाप की हिम्मत और छोटे से मासूम बच्चे की मानसिक दशा का अंदाज़ा अगर आप लगा पा रहे हैं, तो समझ पा रहे होंगे कि क्या नजारा होगा?

डॉक्टर ने ऐसे ही नहीं कह दिया कि वह किसी शेर की तरह अस्पताल चलकर आए, रीढ़ की हड्डी के पास इतना गहरा ज़ख़्म होने के बावजूद। मुझे सोनिया गांधी की वह कहानी याद आ गई, जब इंदिरा गांधी को गोली लगी थी और वह खून से सनी अपनी सास को कार में लेकर अस्पताल जा रही थीं।तब बहुत छोटे रहे राहुल गांधी की आँखों के सामने ये सब हुआ। उसका उनके दिलोदिमाग़ पर क्या असर हुआ होगा और सोनिया की मानसिक दशा क्या रही होगी, इसका अंदाज़ा इस देश में कम लोगों को है।

लेकिन भारतीय मीडिया, ख़ासकर टीवी मीडिया ने सैफ़ पर हुए वीभत्स हमले को जिस तरह पीपली लाइव फ़िल्म में बदल दिया, उसे देखकर मुझे यक़ीन हो गया कि इस देश का मीडिया पाताल लोक की गर्त में समा चुका है। मतलब पुलिस के हर बयान और उसकी हर थ्योरी को मीडिया के बड़े-बड़े क्राइम एडिटर भक्ति भाव से किसी मंत्र की तरह जाप रहे हैं। कल से ही। जबकि पत्रकारिता में यह सिखाया जाता है कि किसी भी हाल में पुलिस और अन्य जाँच एजेंसियों की बात पर यक़ीन नहीं करना है। अपने आँख, कान और नाक खुले रखने हैं।

मुझे अनायास ही आरुषि हत्याकांड की याद आ गई, जब पूरे मीडिया ने नौकर को ही विलेन और हत्यारा बना दिया था, जबकि अगले दिन पुलिस को नौकरी की भी लाश छत पर मिली। इस केस का हश्र क्या हुआ, ये सब जानते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे मोनिंदर सिंह पंढेर (निठारी हत्याकांड ), सुशांत सिंह राजपूत की मौत और शाहरुख़ खान के बेटे आर्यन की गिरफ़्तारी का हुआ। आर्यन मामले में तो हीरो बना जाँच अधिकारी समीर वानखेड़े ही विलेन निकला।उस पर शाहरुख़ खान से पैसे उगाही का आरोप लगा। ठीक वैसे ही जैसे सुशांत मामले में रिपब्लिक टीवी के मालिक अर्नब गोस्वामी पागल हो गए थे और ऑन एयर चिल्ला रहे कि -मुझे ड्रग दो, मुझे ड्रग दो। ठीक ‘मुझे रंग दे, मुझे रंग दे’ गाने की तर्ज़ पर।

तो सैफ़ हमले के मामले में मुंबई पुलिस की जो थ्योरी सामने आ रही है, उस पर मीडिया सवाल ही नहीं उठा रहा। बस, उसे माथे से लगाकर चैनल पर ब्रेकिंग ठोक रहा है। मेरे कुछ सवाल हैं, जिसके जवाब पुलिस और जाँच एजेंसियों से पूछे जाने चाहिए। कल ही मित्रों से इसके बारे में कहा। मसलन

अगर हमलावर पेशेवर चोर है और पैसा वसूलने या चोरी करने की नीयत से घर में घुसा था, तब तो उसे मुकेश अंबानी के घर जाना चाहिए था। वहाँ ज़्यादा पैसे मिलते। कौन हीरो बॉलीवुड में सबसे ज़्यादा टैक्स देता है? नाम गूगल करिए। उसके घर चोर क्यों नहीं गया? सैफ़ का घर ही क्यों चुना गया?

पुलिस कह रही है कि चोर सैफ से एक करोड़ रुपया मांग रहा था। ये कैसा मूर्ख चोर था भाई, जिसे अंदाजा था कि सैफ के घर में एक करोड़ रुपये नकद रखे होंगे! आज के युग में कौन सेलिब्रिटी अपने घर में नकद और सोना चांदी हीरा मोती रखता है? सब बैंक लॉकर में रखते हैं। बड़ा अनाड़ी चोर था इस मामले में। लेकिन हथियार से हमला करने में अनाड़ी नहीं था। यही बात सोचने लायक है।

चोर का कॉन्फिडेंस भी अलौकिक था। सीसीटीवी में दिख रहे उस सिंगल चेसिस चोर का कॉन्फिडेंस भी अद्भुत और अकल्पनीय था। उसे मालूम था कि वह एक सेलिब्रिटी के घर में रात में घुस रहा है। घर में नौकर-चाकर, गार्ड और मालिक सब लोग होंगे। सैफ सेलिब्रिटी है, तो उसके पास लाइसेंसी रिवॉल्वर भी होगा और दूसरे गन भी। वह सिंगल चेसिस एक चाकू और डंडा से सैफ के घर में घुसकर पूरी फैमिली और नौकर-चाकर-गार्ड को धमकाकर एक करोड़ रुपया मांगने के मुंगेरी लाल के बाप वाले सपने देख रहा था। मुंबई पुलिस को इसमें कुछ भी अजब नहीं लगता और मीडिया के संपादक इसे टीवी पर चला-चलाकर गजब ढाए हुए हैं। कमाल की पत्रकारिता और पुलिसिंग है।

अब सबसे अहम बात। सैफ अली खान का घर, दिल्ली का पालिका या करोलबाग मार्केट तो है नहीं कि टहलते हुए गए, पैसा लिया और निकल लिया। घर में घुसने के लिए सिक्योरिटी के लेयर होंगे। पुलिस कह रही है कि उस सोसायटी में सिक्योरिटी रिंग नहीं थी। चलो मान लिया। लेकिन रात को सैफ के घर का दरवाजा तो खुला होगा नहीं! वह कैसे खुला? अगर नौकर चाकर पुलिस के शक की परिधि से बाहर जा चुके हैं, तो चोर घुसा कैसे? रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुलिस कह रही है कि चोर के पास कोई magic key यानी जादुई चाबी थी। ऐसे चोरों के पास ये होती है। यानी सैफ के घर में 50 रुपये वाला कोई सस्ता ताला दरवाजा पर लगा था।

आज जब फिंगर प्रिंट और डिजिटल लॉक ताले बाजार में हैं, तो कौन सेलिब्रिटी अपनी सुरक्षा को लेकर इतना लापरवाह होगा, ये समझ से परे है। दूसरी बात। चूंकि चोर जिस दरवाजे से घुसा था, वह आपातकालीन स्थिति में आग लगने पे घर से बाहर निकलने का पीछे से इमरजेंसी दरवाजा था। मतलब कि वह हमेशा बंद रहता होगा, डेली यूज में नहीं होगा। तब तो अंदर से कुंडी भी लगी होगी। अगर चोर ने जादुई चाबी से दरवाजा खोल भी लिया होगा, तो अंदर से लगी कुंडी कैसे खोल ली ?

अब नई थ्योरी सामने आ रही है कि चोर एसी वेंट के रास्ते घुसा। मतलब कुछ भी। मीडिया ने इस मामले में एक बार फिर इतनी गैर-जिम्मेदाराना रिपोर्टिंग की है कि हर बार मुझे एक नई तरह की हैरानी होती है। कल को ये लोग यह भी कह देंगे कि चोर दूसरे ग्रह से टेलिपोर्ट होकर सीधे घर में अवतरित हुआ था। सबने जनता को मूर्ख समझ रखा है, तो इसकी कोई तो वजह होगी। फेक न्यूज की गिरफ्त में वाट्सअप यूनिवर्सिटी पर तैरती जनता को कुछ भी कह दो, वह तुरंत मान जाती है। ऐसी भोली जनता को मीडिया taken for granted अगर ले रहा है, तो आश्चर्य क्या ?

अब कुछ सवाल समाज से। पता चला कि सैफ के घर में उस वक्त ड्राइवर नहीं था, बड़े बेटे इब्राहीम को कार चलानी नहीं आती थी, तो एक ऑटो से सैफ को अस्पताल जाना पड़ा। जिसकी रीढ़ की हड्डी में चाकू का टुकड़ा गहरा घुसा हो, वह आदमी आटो मैं कैसे बैठ गया, ये सोचकर ही सिहरन होती है। तो सैफ के पड़ोसी कहां थे? सुना है नामी रईस रहते हैं सैफ के अगल-बगल। तो क्या पड़ोसियों का भी नाता नहीं है आपसे में? और अगर नहीं भी है, तो जीवन-मरण की ऐसी दशा में तो अनजान आदमी मदद कर देता है। क्या सैफ के बड़े बेटे या फिर स्टाफ ने किसी पड़ोसी को जगाकर ये नहीं कहा कि इनको अस्पताल ले जाना है, अपनी गाड़ी निकाल लीजिए ! सैफ ऑटो से अस्पताल जा रहे हैं तो ये पूरे समाज के लिए शर्मनाक है। ये समाज तो नहीं ही है फिर। किसका झुंड कहें? भेड़ियों का, मेमनों का या लोमड़ियों का! अगर सैफ अली खान जैसे सितारे की ये दुर्दशा है, ये उसका अकेलापन है तो आम आदमी की क्या हैसियत है इस समाज में? कौन, किसके सुख-दुख का साथी है?

आखिर में आखिरी सवाल। क्या ये वाकई में सिर्फ एक चोरी का मामला है? बाबा सिद्दीकी मर्डर तो नहीं भूले होंगे आप ना? वहीं मुबई वाले। उस हत्याकांड में जोर-शोर से गुजरात की जेल में बंद गैंगस्टर विश्नोई का नाम आया था। सिद्दीकी का बेटा अब अजीत पवार की पार्टी में है। अजीत पवार महाराष्ट्र में आज पावर में हैं। लेकिन क्या आज तक मुंबई पुलिस गुजरात जाकर विश्नोई से पूछताछ भी कर पाई है? या उसे रिमांड पर लेकर मुंबई लाने का साहस जुटा पाई है? आज ही कोई पत्रकार मित्र कह रहा था कि मुंबई पुलिस देश की सबसे efficient police है। मैंने कह दिया कि बिल्कुल तुम्हारी तरह, एकदम efficient journalist. नाराज होकर उसने फोट काट दिया। पर मुद्दे की बात ये है कि क्या विश्नोई से पूछताछ भी कर पाई है मुंबई पुलिस इतने महीनों के बाद? क्या कहा? नहीं कर पाई है। फिर तो ये सूरज चाचा की गलती है। जरूर एक दिन वह पश्चिम से निकल गया होगा। अब चंदा मामा करें भी तो क्या करें? वैसे कांग्रेस से एनसीपी में जाने वाले बाबा सिद्दीकी के बेटे का कोई बयान आपने देखा-पढ़ा है हाल-फिलहाल में? अपने स्वर्गीय पिता के हत्यारों को पकड़वाने में उसकी कितनी जद्दोजहद है? एक कहावत है ना- पूत कपूत तो क्या धनसंचय और पूत सपूत तो क्या धनसंचय ?

बस पूरी कहानी में एक ही हीरो है- सैफ अली खान। फिल्मी नहीं, असल जिंदगी का हीरो। वो अंग्रेजी में क्या कहते हैं- The child is father of the Man. तो नन्हे तैमूर ने दिखा दिया कि उसकी उम्र और अक्ल भले ही अभी बहुत कम है, लेकिन हौसले में वह हिमालय से भी ऊंचा है। दाद तो सैफ को भी देनी पड़ेगी कि जिंदगी-मौत से जूझने के दौरान भी उसने बेटे का हाथ थामे रखा।

एक और बात. आखिर ‘चोर’ के सैफ के घर में घुसने का मकसद क्या था? क्या वह सैफ के दोनों बच्चों को निशाना बनाना चाहता था? अगर नहीं, तो वह बच्चों के कमरे की तरफ क्यों बढ़ा? बिना किसी घातक हथियार के अकेले एक सेलिब्रिटी के घर में घुसने का जोखिम क्यों लिया? क्या उसे पकड़े जाने का डर नहीं था? और अगर पैसा ही चाहिए था तो फिर सैफ पर चाकू से छह बार जानलेवा हमला क्यों किया? जैसा मैंने ऊपर लिखा है, और भी कई सवाल हैं और इनके ठोस जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं।

हो सकता है मेरी इस पोस्ट के बाद मीडिया के कुछ कोनों से आपको इसकी प्रतिध्वनि सुनाई दे, लेकिन अब देर हो चुकी। टीआरपी कमाना अलग चीज है और इज्जत कमाना अलग।
धन्यवाद.

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