चार साल मीडिया में काम कर थोड़ा बहुत मीडिया को समझने भी लगी हूँ

आपको भी घरवालों ने कभी बचपन में किसी रिश्तेदार या पड़ोसी से मिलाकर कहा होगा … ” देखा … कितना होशियार है / हैं , इनकी तरह बनो…समझे । हर घर की बड़ी ही सामान्य सी बात है ये … चाहे आप बड़े शहर में रहते हों , छोटे कस्बे में रहते हों या फिर गाँव में।बचपन से ही बच्चों के आगे एक रोल मॉडल रख दिया जाता है और उन्हें हर बार नसीहत में कहा जाता है …” उनको देखा है कितना नाम है उनका , कितना कमाते हैं / कमाती हैं , कितनी अच्छी जॉब है ! ….फलाना ढिमका..

…खास बात ये होती है कि ये रोल मॉडल अधिकतर परिवार का ही सदस्य होता है।या कभी – कभी आपका पड़ोसी भी हो सकता है।जिसे देखते हुए माँ – बाप अक्सर बच्चों को समझाते हैं कि उनके जैसे बनो।

मेरे साथ भी यही था … मेरे लिए घर और घर के बाहर कई रोल मॉडल बना दिए गए थे …परिवार बड़ा था और इस पीढ़ी की मैं बड़ी बेटी … हर कोई अपनी – अपनी इच्छाओं को बताता कि मुझे किसकी तरह बनना चाहिये था।हालाँकि पापा ने कभी नहीं कहा … कि मुझे क्या बनना चाहिए।और किसके जैसा बनना है और मैंने भी कभी दृढ़ता से नहीं सोचा कि क्या बनना है …हाँ मैं भी हर लड़की की तरह तमाम सपनों को संजोती थी।कुछ अटपटे थे तो कुछ बेहद संजीदा। उन्हीं में एक था मीडिया की पढ़ाई करना ।जो इच्छा ईश्वर ने जल्द ही पूरी करा दी।दयालबाग में मॉस कॉम कोर्स प्रारम्भ हो गया था और मुझे दाखिला भी मिल गया था , मैं पढाई कर ही रही थी कि एक दिन चचेरे भाई की शादी के दौरान किसी रिश्तेदार ने एक औरत से मिलाया , मैं उनको पहले कभी नहीं जानती थी।ना कभी देखा था बस उनके बारे में सुना था बहुत कुछ , बिल्कुल रोल मॉडल की तरह ।

हालाँकि वो मेरी चचेरी बुआ जी ही थीं। मुझे बताया गया था कि वे मीडिया के बच्चों को दिल्ली में पढ़ाती हैं ,उन्होंने कई किताबें भी लिखी हैं और दिल्ली मीडिया में उनका काफी नाम है।

जाहिर है …उनके सामने मेरा नर्वस होना लाज़मी था , खैर पास गयी … बात शुरू की। 

मुझे याद है … उन्होंने मुझे बेहद अजीब से देखा था … मुस्कुराई …और बोली … अरे यार , बहुत मेहनत करनी पड़ती है , पत्रकार ऐसे ही नहीं बनते … बहुत सीखना पड़ता है। मैं तुम जैसे बच्चों को पढ़ाती हूँ।कभी जरुरत पड़े तो बताना।

बस इतनी बात हुयी … ना हालचाल पूछा ना कोई और बात की।मैं भी बस सर हिलाती रही।

मुझे बुरा लगा … बेहद…उनकी इतनी बातों में मुझे एक रिश्तेदार की तरह प्रेम तो कहीं भी दिखाई नहीं दिया … उल्टा मुझे लगा वो घमंडी हैं और बेहद सख्त भी।

उन दिनों मैं ये नहीं सुनना चाहती थी जो उन्होंने कहा … मैं सुनना चाहती थी कि वे बोले 

” अरे वाह पूजा तुम तो बड़ी होशियार हो , तुम तो बहुत नाम करोगी मीडिया में … और ना जाने क्या क्या …

जाहिर है … हर व्यक्ति यही सुनना चाहता है।सहानभूति भरे शब्द किसे नहीं भाते !! पर मन इसलिए दुखा था कि उन्होंने सहानभूति नहीं दिखाई थी।

पूजा व्रत गुप्ता के फेसबुक वॉल से

भड़ास की खबरें व्हाट्सअप पर पाएंhttps://chat.whatsapp.com/BPpU9Pzs0K4EBxhfdIOldr
  • भड़ास तक कोई भी खबर पहुंचाने के लिए इस मेल का इस्तेमाल करें- bhadas4media@gmail.com

Comments on “चार साल मीडिया में काम कर थोड़ा बहुत मीडिया को समझने भी लगी हूँ

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *