राकेश कायस्थ-
अपने प्रधानमंत्री विकास प्रेमी ज्यादा है या भाषा और साहित्य प्रेमी? सही निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए जनता की राय ली जानी चाहिए। केंद्र और राज्य सरकारों के सूचना व जनसंपर्क विभाग को इस विषय पर निबंध प्रतियोगिता करवानी चाहिए। वैसे मेरा मानना ये है कि प्रधानमंत्री जी दोनो हैं।
मोतिहारी को मुंबई बनाने के बाद मोदीजी की अगली घोषणा पटना को पुणे बनाने की है। सुना खबर आते ही मोतिहारी में रातो-रात जमीन के भाव कई गुना बढ़ गये हैं क्योंकि भविष्य में बिहार की राजधानी मुंबई की तरह मोतिहारी होगी और पुणे के तर्ज पर पटना को ट्विन सिटी बनना होगा।
दुनिया में विकास के कई मॉडल हैं लेकिन ये वाला सबसे अनोखा है। `ताल से ताल मिलाना’ के तर्ज पर जो तुकबंदी बैठेगी विकास उसी रास्ते पर जाएगा। गयाजी में गुरुग्राम बनाने की घोषणा बकायदा हो चुकी है। शिकारपुर वाले खुश हैं कि उनके यहां अब शिकागो बनेगा। लखनऊ वाले बूढ़े उदास हैं और नौजवान चहक रहे हैं क्योंकि जब ल से ल मिलेगा तो लखनऊ का लास बेगास हो जाएगा।
बुजुर्ग उदास इसलिए हैं क्योंकि जीते-जी लखनऊ लास बेगास नहीं देख पाएंगे। विकास के काम में थोड़ा वक्त तो लगता है। बैंगलोर वाले थोड़ा डर रहे हैं कि ऐसा ना हो कि मोदीजी ठीक चुनाव के वक्त एंट्री मारें और ब से ब की ध्वनि मिलाते हुए उनके शहर को बगदाद बना दें।
मोदीजी का पूरा जीवन विकास के लिए है लेकिन भाषा और साहित्य के प्रति उनका अनुराग कई बार दूसरी तमाम चीज़ों पर भारी पड़ जाता है। पिछले 11 साल में मोदीजी ने विरोधियों पर जितने हमले किये हैं, वो सब तुकबंदी में किये हैं.. “टू जी, थ्री जी और जीजाजी” से लेकर “जेपी को छोड़ा तो बीजेपी को क्यों नहीं छोड़ेगा” अनगिनत ऐसे उदाहरण है। मन की बात पर जब पेटिंग बनवाई जा सकती है तो फिर इन अनुपम सूक्तियों का संग्रह करके साहित्य अकादमी कोई किताब क्यों नहीं छाप सकता है?
चुनावों के दौरान विरोधियों तक से मोदीजी कहते हैं—
देखो ताल ना टूटे, हमारी चाल ना टूटे
ताल ना टूटे, चाल ना टूटे डिंग-डिंगा डिंग
विरोधियों ने जब भी सुर और ताल छोड़ा मोदीजी ने उन्हें फौरन याद दिलाया कि तू-तड़ाक राजनीतिक मजबूरी है और तुकबंदी सबसे ज्यादा जरूरी है। विपक्ष के ~चौकीदार चोर है” जैसे भाषिक सौंदर्य रहित भोंडे कैंपेन का जवाब में भी मोदीजी ने “चौकीदार प्योर है” और “चौकीदार श्योर है” जैसी तगड़ी काफियाबंदी से दिया। यूपी के चुनावी कैंपेन के दौरान मोदीजी ने “योगी उपयोगी है” नारा दिया।

इसका असर ये है कि यूपी की राजनीति ने अपना भाषिक सौंदर्य बनाये रखा है और पक्ष विपक्ष में जो भी विशेषण आते हैं, वो उपयोगी, भोगी, रोगी और ढोंगी क्रम में ही होते हैं। मुझे समझ में नहीं आया कि जो ज्ञानपीठ पुरस्कार रामभद्राचार्य को मिला वो मोदीजी को क्यों नहीं दिया जा सकता था?
विकास के मामले में मोदीजी के दो नंबर काट लूंगा और उन्हें 100 में 98 दूंगा। अगर हर विषय में 100 में 100 दिया तो लोग कहेंगे कि ये भी ढाई लाख रुपये वाली नौकरी का जुगाड़ बिठा रहा है। सौ अंक मोदीजी को भाषा और साहित्य में मिलते हैं।


