
हरीश मिश्र-
पिछले पखवाड़े का रोजनामचा लिखने बैठा हूं। कलम सामने रखी है, लेकिन लिखने से पहले मुझे ही घूर रही है—जैसे पूछ रही हो, सच लिखोगे या झूठ? झूठ लिखूं तो पाठक कहेंगे, कलम सरकारी हो गई। सच लिखूं तो कहा जाएगा उफ्फ! कलम विद्रोही हो गई। यही मन का स्थायी द्वंद्व है, सच लिखना अपराध है और चुप्पी मृत्यु प्रमाण-पत्र।
बीते पखवाड़े की घटनाएं स्मृति में हैं, नव वर्ष का जश्न और मातम इन आंखों ने देखा है। अब तय नहीं कर पा रहा हूं कि जश्न पर लिखूं या मातम पर। तिल के लड्डू पर लिखूं या गुड़ के बीज पर। कैलाश पर लिखूं या लाशों पर। मां की वेदना लिखूं पर या हाईटैक स्लॉटर हाउस पर। जूते पर लिखूं या घंटा पर—क्योंकि फर्क किसी को किसी से पड़ता नहीं। सच यह है कि लिख देने से भी कुछ बदलता नहीं। मन हल्का हो जाता है कि धमनियों में रक्त संचार अभी भी हो रहा है।

जनप्रतिनिधियों की घंटी नहीं बजती और जनता को घंटा फर्क नहीं पड़ता। जिनके गले पकड़ने चाहिए, उनके चरणों में माथा टेकने की आदत अब सामाजिक शिष्टाचार बन चुकी है।
साल के पहले दिन प्रदेश के मुखिया मोहन यादव ने नलखेड़ा में बगलामुखी की आराधना से वर्ष का शुभारंभ किया, कामना यही कि हर घर आंगन धन-धान्य से भरा रहे। उधर स्वच्छता के शिखर पर बैठे इंदौर नगर निगम ने कोरोना के बाद एक और “नया दौर” देखा , गली-गली में रोना। ऐसा दौर, जहां मां ने दूध में नल का पानी मिलाया और दूध ज़हर हो गया।
मेहंदी लगे हाथ माथे की बिंदी पोंछते दिखे, चूड़ियां फूटती रहीं और बाप अपने बेटे की लाश को कंधा देता रहा। कपाल क्रिया के लिए बांस में कलावा से लोटा बांधा और गरुण पुराण का पाठ सरकार की लापरवाही के कारण परिवार और पड़ोसी सुनने को मजबूर हुए।
भागीरथपुरा में आम आदमी की मौत से ठन गई, निगम के नल से ज़हर बहता रहा और सत्ता दो लाख का चेक लेकर खड़ी हो गई, जैसे मृत्यु का दाम तय हो गया। यह कोई साधारण दुर्घटना नहीं है ,मौत का नया दौर है, ये स्वच्छ इंदौर है। जहां बारह इंच पाइप (प्रेस) से मंत्री जी की फोकट में ठन गई।
कैलाश का इरादा लाशों पर राजनीति करने का नहीं था, पत्रकारों से मिलने का भी कोई वादा नहीं था, लेकिन वह रास्ता रोक कर खड़ा हो गया। ऐसा लगा जैसे आज लाश का सवाल आकाश से बड़ा हो गया है। मौत की उम्र क्या होती है? दो पल भी नहीं और ज़िंदगी की कहानी हमेशा के लिए अधूरी रह गई।
यही इस पखवाड़े का सार है। ये लड़ाई विचारों की नहीं, संवेदनाओं की है और सबसे खतरनाक यह कि संवेदनाएँ लगातार रो रही हैं, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं। कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष जीतू पटवारी ने जुबान से लेकर सड़क तक आक्रोश जताया, सत्ता की ठसक तोड़ने और कुर्सी के ठेकेदारों को सबक सिखाने की बात कही।


अभी नगर निगम इंदौर में ग़म के आंसू सूखे भी नहीं थे कि भोपाल नगर निगम अध्यक्ष हाथ मलती रह गईं। हिन्दूओं को ज़ख्म दे गईं, जिसे धोने के लिए भोपाल तालाब का पानी भी कम पड़ जाएगा। 26 टन मांस से भरे ट्रक में गौमाता के टुकड़े होने की पुष्टि लैब रिपोर्ट ने कर दी। इतिहास में लिखा जाएगा, बेटी के टुकड़े सूटकेस में और गौमाता के टुकड़े ट्रक में मिले। ग्वाले की सरकार कटघरे में खड़ी हो गई, नाक कट गई। हाईटेक स्लॉटर हाउस में बीफ से चीखें निकल रही है। कड़वा सच यह है कि स्लॉटर हाउस हाईटेक हुए और गौमाता भूखे पेट रह गई। गौशालाओं का भूसा धवल वस्त्रधारी बछड़ों ने खा लिया।
नल से ज़हर, ट्रक में गौमाता के टुकड़े और पूरे प्रदेश में जाति संघर्ष का अलावा जल रहा है। अलाव में वर्ग संघर्ष की लकड़ी डाली जा रही है। अनिल मिश्र सवर्ण वर्ग के लिए एक चिंगारी बनकर उभरे हैं, रावण की नाभि में तीर भेदते हुए। हाईकोर्ट ने भी मिश्रा की गिरफ्तारी को असंवैधानिक माना है।
कलेक्टर विदिशा अंशुल गुप्ता ने आश्रम अधीक्षक चैन सिंह चिढ़ार को “दो जूते मारने” जैसा शब्द कहकर मर्यादा रेखा लांघी है, जो निंदनीय है। लेकिन इससे बड़ा निंदनीय कृत्य यह है कि प्रदेश के कई शासकीय आश्रमों में अधीक्षक और शिक्षक बच्चों को छोटी रोटी और पानी मिली दाल खिलाकर खुद अपनी सेहत बना रहे हैं। कलेक्टर के शब्द पर आपत्ति जायज़ है, पर बच्चों की भूख पर गुस्सा आना क्या ग़लत है?

मंत्री तुलसी सिलावट ने टल्ली का स्वागत किया, ये संस्कार कांग्रेस के थे भाजपा के नहीं। शिवपुरी भाजपा विधायक देवेन्द्र जैन ने युवराज आर्यमान सिंधिया के पैर छुए अपने बेटे के उम्र के पैर छूना गुलामी का परिचय है और आपने पिता की उम्र के व्यक्ति से पांव छुलवाना अंहकार की वृत्ति है।
सीधी में रोती हुई अनामिका बैगा का वीडियो वायरल होने के बाद संवेदनशील मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने उसके डॉक्टर बनने के सपने को संबल दिया। सरकार अब बिटिया की पढ़ाई का पूरा खर्च उठाएगी, आंसू उम्मीद में बदल गए। मां बगलामुखी नलखेड़ा की आराधना से मुख्यमंत्री मोहन यादव ने नववर्ष की शुभकामनाएं दीं, उसी मंदिर के पुजारियों को एसडीएम ने आपत्तिजनक शब्द कह दिए—तो आक्रोश फूट पड़ा।
स्वाभिमान पर बात आई तो हवन-पूजन बंद हुआ और देखते-देखते एसडीएम प्रभाव से मुक्त कर दिए गए। ये पखवाड़ा आंसुओं से शुरू हुआ और आंसू पोंछकर खत्म हुआ।




Yagyawalkya
January 17, 2026 at 9:29 pm
अत्यंत भावपूर्ण। शब्द और शब्दों के पीछे छिपी भावनाएं, उद्वेलित करती है.
—याज्ञवल्क्य