मृणाल पांडेय को मैंने सार्वजिनक तौर पर संयम खोकर बोलते, लिखते देखा-सुना है!

मृणाल पांडे का बचाव जरूर कीजिए साहब लेकिन…

Vineet Kumar : मृणाल पांडे के बारे में मैं इतना और वो भी कई मौके पर मिले व्यक्तिगत अनुभव से जितना जानता हूं, जरूर कह सकता हूं कि वो खुद अपने लेखन और अभिव्यक्ति के लिए जितनी उदारता की उम्मीद रखती हैं, सामनेवालों के लिए उतनी ही अनुदार, जकडबंदी की शिकार और अलोकतांत्रिक भी है. वो वक्त- बेवक्त अपनी प्रांजल हिन्दी और ठसकदार अंग्रेजी के बूते न केवल उनका उपहास उड़ाती रहीं हैं बल्कि आहत करने से लेकर सत्ता का इस्तेमाल करते हुए दंडित भी करती रहीं हैं.

जो लोग उनकी भाषा दक्षता और सौम्य व्यक्तित्व के मुरीद हैं, उन्हें मुबारकबाद. उनकी आस्था आखिर-आखिर तक बची रहे लेकिन हमारी तरह बाकी ब्लॉगिंग के दौर के पुराने साथी पुरानी फाइलों की तरफ लौटकर एक नजर मारते हैं तो यह समझ पाना मुश्किल नहीं है कि वो नयी तकनीक के बीच लिखे जाने को लेकर कितनी आक्रांत और नए लोगों के प्रति कितनी हिकारत से भरी हुई हैं. वो संपादक का विवेक और जमीर जिंदा रखने के बजाय उसी कुर्सी बचाए रखने की पक्षधर रहीं हैं. वो पत्रकारिता नहीं, उसके बहाने बनी क्लास और क्लब बचाने की हिमायती रही हैं.

मैंने सार्वजिनक तौर पर उन्हें संयम खोकर बोलते, लिखते देखा-सुना है. उस दौरान उनका ज्ञान नहीं, क्लास का अहं उच्चरित हो रहा होता है. लेकिन जिसकी जैसी छवि बन जाती या बना दी जाती है, उसे बरकरार रखनेवाले लोग भी आसपास होते ही हैं. उनकी ये छवि सलामत रहे लेकिन लिखनेवाले इस कोशिश में इतने ज्यादा लहालोट न हो जाएं कि उनके लिखे के प्रति विश्वास जाता रहे.

बस ये उदारता और अभिव्यक्ति की आजादी की कामना एकतरफा न हो. एकतरफा कामना करनेवाले मसीहाओं की तो लंबी कतार है. उनकी सौम्य छवि जब उघडती है तो न केवल शक्ल बल्कि पूरा मंजर बेहद असह्य और घिनौना होता है.

मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार की एफबी वॉल से.

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