मृणाल पाण्डे की कथाकृति ‘हिमुली हीरामणि कथा’ का लोकार्पण

नई दिल्ली। हिमुली हीरामणि कथा की रचना युवाओं के लिए हुई है यदि इसे हज़ारी प्रसाद द्विवेदी की परंपरा को आगे ले जाने वाली कृति समझा जाता है तो यह मेरे लेखन का सम्मान है। सुप्रसिद्ध कथाकार और पत्रकार मृणाल पाण्डे ने मिरांडा हाऊस में अपनी सद्य प्रकाशित कथा कृति ‘हिमुली हीरामणि कथा’ के लोकार्पण एवं परिचर्चा के अवसर पर कहा कि यह नानी के घर और छठी के दूध के बीच की कथा है। पाण्डे ने परिहास भाव के लगातार विरल होते जाने को चिन्ताजनक बताते हुए कहा कि ऐसे दौर में मैंने बोलियों के बाल्यावस्था के साहित्य को पढ़ा और उस विरल होते परिहास भाव को इस कृति में समेटा है। उन्होंने कहा यह कहानी यथार्थ की कहानी है जिसकी भाषा दादी- नी की कहानियों वाली है।

इससे पहले पुस्तक के लोकार्पण के बाद परिचर्चा प्रारम्भ करते हुए आलोचक वैभव सिंह ने कहा कि इस उपन्यास की संरचना में लोक कथा को पुनः गढ़ा गया है जिसमें लोककथा का मनोविज्ञान है तो वर्तमान राजनीति और विडम्बनाओं की गूँज भी। उन्होंने कहा आज के समय के सत्य को लोककथाओं के माध्यम से सुनाया गया है जिससे आस्थाओं का पुनर्स्थापना भी होती है। सुखांत की अनिवार्यता इस आस्था को जीवित बनाए रखती है। डॉ वैभव ने कहा कि इस देश में आधुनिकता की ब्लैक मार्केटिंग की गयी है और ग्रामीण अनपढ़ लोगों से उनकी परंपरा को छीना गया है। उन्होंने कहा कि हिमुली की कहानी को जेंडर डिस्कोर्स की कहानी के रूप में भी देखा जा सकता है वहीं कथा में राजसत्ता से मिले हुए नगर सेठों की खबर लेने को रोचक प्रसंग बताया।

परिचर्चा में चर्चित कवि कथाकार प्रियदर्शन ने कहा कि शब्द की सत्ता पिछले दशकों में टूटी है और तकनीक के दौर में साहित्यिक चुनौती से संघर्ष का लेखन हुआ है। उन्होंने कहा आधुनिकता के पार जाने के क्रम में हम पीछे जाते हैं तो ‌इस किताब को पढ़ते हुए यथार्थ की परिधि को तोड़ने वाले मनोहर श्याम जोशी, विजयदान देथा, की याद आ जाती है। प्रियदर्शन ने कहा यह लोककथा नहीं है, बल्कि उसके विन्यास में वर्तमान दीखता है। यहां नीरा राडिया, अम्बानी, रतन टाटा सब दिख जायेंगे। कृति की प्रशंसा में उन्होंने कहा कि हिंदी का रस ठेठ भाव में यहां मौजूद है। उन्होंने कहा कि कृति में सत्ता के गलियारों के प्रपंच फूटता है और यह स्त्री के दुखों और प्रतिरोध की कथा भी बन जाती है।

बाद में छात्राओं से हुए संवाद में यथार्थवाद पर सार्थक और लंबी बहस भी चली। बहस में मृणाल जी ने एक उत्तर में कहा बहुधा लेखन खेल की तरह लगता है, जिसमें उत्सुकता और भावुकता भरी होती है। उन्होंने इस कृति के लिए कहा कि ‌मैंने व्यंजनों की थाली पड़ोसी है, जो मन आये आप आस्वादन कर सकते हैं। आयोजन में राजपाल एंड संज़ की मीरा जौहरी ने इस कृति के प्रकाशन को अपने लिए गौरव की बात कहा। अंत में मिरांडा हाउस के हिंदी विभाग की रजनी सिसोदिया ने आभार व्यक्त किया।

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मृणाल पांडेय को मैंने सार्वजिनक तौर पर संयम खोकर बोलते, लिखते देखा-सुना है!

मृणाल पांडे का बचाव जरूर कीजिए साहब लेकिन…

Vineet Kumar : मृणाल पांडे के बारे में मैं इतना और वो भी कई मौके पर मिले व्यक्तिगत अनुभव से जितना जानता हूं, जरूर कह सकता हूं कि वो खुद अपने लेखन और अभिव्यक्ति के लिए जितनी उदारता की उम्मीद रखती हैं, सामनेवालों के लिए उतनी ही अनुदार, जकडबंदी की शिकार और अलोकतांत्रिक भी है. वो वक्त- बेवक्त अपनी प्रांजल हिन्दी और ठसकदार अंग्रेजी के बूते न केवल उनका उपहास उड़ाती रहीं हैं बल्कि आहत करने से लेकर सत्ता का इस्तेमाल करते हुए दंडित भी करती रहीं हैं.

जो लोग उनकी भाषा दक्षता और सौम्य व्यक्तित्व के मुरीद हैं, उन्हें मुबारकबाद. उनकी आस्था आखिर-आखिर तक बची रहे लेकिन हमारी तरह बाकी ब्लॉगिंग के दौर के पुराने साथी पुरानी फाइलों की तरफ लौटकर एक नजर मारते हैं तो यह समझ पाना मुश्किल नहीं है कि वो नयी तकनीक के बीच लिखे जाने को लेकर कितनी आक्रांत और नए लोगों के प्रति कितनी हिकारत से भरी हुई हैं. वो संपादक का विवेक और जमीर जिंदा रखने के बजाय उसी कुर्सी बचाए रखने की पक्षधर रहीं हैं. वो पत्रकारिता नहीं, उसके बहाने बनी क्लास और क्लब बचाने की हिमायती रही हैं.

मैंने सार्वजिनक तौर पर उन्हें संयम खोकर बोलते, लिखते देखा-सुना है. उस दौरान उनका ज्ञान नहीं, क्लास का अहं उच्चरित हो रहा होता है. लेकिन जिसकी जैसी छवि बन जाती या बना दी जाती है, उसे बरकरार रखनेवाले लोग भी आसपास होते ही हैं. उनकी ये छवि सलामत रहे लेकिन लिखनेवाले इस कोशिश में इतने ज्यादा लहालोट न हो जाएं कि उनके लिखे के प्रति विश्वास जाता रहे.

बस ये उदारता और अभिव्यक्ति की आजादी की कामना एकतरफा न हो. एकतरफा कामना करनेवाले मसीहाओं की तो लंबी कतार है. उनकी सौम्य छवि जब उघडती है तो न केवल शक्ल बल्कि पूरा मंजर बेहद असह्य और घिनौना होता है.

मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार की एफबी वॉल से.

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तत्कालीन पीएम नेहरु को उस समय के मशहूर कार्टूनिस्ट शंकर ने गधा बनाकर दिखाया था!

Jaishankar Gupta : मृणाल पांडेय कभी हमारा आदर्श नहीं रहीं। हिन्दुस्तान के संपादक के रूप में एक सहकर्मी के तोर पर हमारे सामने उनका क्षेत्रवादी-जातिवादी चेहरा ही नजर आया। लेकिन जिस बात को लेकर उनकी आलोचना के स्वर तेज और तीखे हो रहे हैं, उनका हम समर्थन नहीं कर कर सकते। लोकतंत्र में इतनी आलोचना बर्दाश्त करने की क्षमता तो होनी ही चाहिए।

तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु को उस समय के मशहूर कार्टूनिस्ट शंकर ने अपने कार्टून में गधा बनाकर दिखाया था। लेकिन उस समय शंकर के बारे में नेहरू और उनके समर्थकों की इस तरह की कोई प्रतिक्रिया देखने में नहीं आई थी। अलबत्ता तब नेहरु ने फोन पर यह कहते हुए कि “क्या आप एक गधे के साथ चाय पीना पसंद करोगे?’ शंकर को चाय पर आमंत्रित किया था! लेकिन यह बीते जमाने की बातें हैं।

इस बार भी हम-आप मृणाल जी की भाषा से असहमत हो सकते हैं लेकिन उनके विरोध में जिस तरह की भाषा और शब्द गढ़े जा रहे हैं क्या उनसे सहमत हुआ जा सकता है! मृणाल जी की भाषा से परेशान लोगों को किसी को ‘मौन मोहन’और ‘पप्पू’ कहने में कितनी गर्वानभूति होती है!

वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त की एफबी वॉल से.

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भड़ास4मीडिया पर पहला मुकदमा मृणाल पांडेय के सौजन्य से एचटी मीडिया ने किया था

बेकार बैठीं मृणाल पांडेय को मिल गया चर्चा में रहने का नुस्खा!

Yashwant Singh : मृणाल पांडेय ने जो लिखा कहा, उस पर बहुत लोग लिख कह रहे हैं. कोई पक्ष में कोई विपक्ष में. आजकल का जो राजनीतिक विमर्श है, उसमें अतिवादी टाइप लोग ही पूरा तवज्जो पा रहे हैं, महफिल लूट रहे हैं. सो इस बार मृणाल पांडेय ही सही. मेरा निजी अनुभव मृणाल को लेकर ठीक नहीं. तब भड़ास4मीडिया की शुरुआत हुई थी. पहला पोर्टल या मंच या ठिकाना था जो मेनस्ट्रीम मीडिया के बड़े-बड़े मठाधीश संपादकों को चैलेंज कर रहा था, उनकी हरकतों को उजागर कर रहा था, उनकी करनी को रिपोर्ट कर रहा था.

मृणाल पांडेय ने हिंदुस्तान अखबार से मैनेजमेंट के निर्देश पर थोक के भाव पुराने मीडियाकर्मियों को एक झटके में बाहर का रास्ता दिखा दिया. करीब तीन दर्जन लोग निकाले गए थे. शैलबाला से लेकर राजीव रंजन नाग तक. इस बारे में विस्तार से खबर भड़ास पर छपी. मृणाल पांडेय ने अपने सेनापति प्रमोद जोशी के जरिए भड़ास पर मुकदमा ठोंकवा दिया, लाखों रुपये की मानहानि का, जिसके लिए कई लाख रुपये दिल्ली हाईकोर्ट में एचटी मीडिया लिमिटेड की तरफ से कोर्ट फीस के रूप में जमा किया गया.

मुकदमा अब भी चल रहा है. प्रमोद जोशी एक बार भी हाजिर नहीं हुए. भड़ास पर यह पहला मुकदमा था. हम लोगों ने इसका स्वागत किया कि यह क्या बात है कि आप अपने यहां से बिना नोटिस तीन दर्जन लोगों को निकाल दो और हम खबर छाप दें तो मुकदमा ठोंक दो, सिर्फ इस अहंकार में कि हम तो इतने बड़े ग्रुप के इतने बड़े संपादक हैं, तुम्हारी औकात क्या? भड़ास4मीडिया न डरा न झुका, बल्कि कई निकाले गए लोगों की मदद करते हुए उन्हें लीगल सहायता भी उपलब्ध कराई. मृणाल पांडेय मुकदमें में खुद पार्टी नहीं बनीं. उन्होंने प्रमोद जोशी को आगे किया. एचटी मीडिया यानि शोभना भरतिया की कंपनी को आगे किया. आज भी एचटी मीडिया बनाम भड़ास4मीडिया का मुकदमा चल रहा है. हमारे बड़े भाई और वकील साब Umesh Sharma जी इस मुकदमें को देख रहे हैं, बिना कोई फीस लिए.

कहते हैं न कि कई बार चींटीं भी हाथी को धूल चटा देती है. इस मुकदमें में कुछ ऐसा ही होने वाला है. अब तो वहां न मृणाल पांडेय रहीं न प्रमोद जोशी रहे. एचटी मीडिया के ढेर सारे वकील भारी भरकम फीस कंपनी से वसूल रहे हैं और भड़ास4मीडिया से लड़ने हेतु कोर्ट से तारीख पर तारीख लेते जा रहे हैं. अपन लोग भी इंज्वाय करते हुए मुकदमा लड़ रहे हैं, कि इतनी भी जल्दी क्या है, मुकदमा चल रहा है तो क्या… मुकदमा खत्म भी हो जाए तो क्या…

लेकिन उस वाकये ने मृणाल पांडेय को मेरी नजरों से गिरा दिया. वह एक दंभी, स्वार्थी, चापलूस पसंद, अलोकतांत्रिक और आत्मकेंद्रित महिला मुझे लगी. उसे अब किसी भी प्रकार से चर्चा में रहना है… क्योंकि उसके पास अब न कोई पद है न कोई काम… ऐसे में सहारा बचा है सोशल मीडिया जिसके जरिए उसे चर्चा में रहने का एक जोरदार मौका मिला है. आजकल ब्रांडिंग इसी को कहते हैं. आप लगे रहिए मृणाल के विरोध या पक्ष में, लेकिन सच बात तो ये है कि मृणाल फिर से मशहूर हो गई… मृणाल फिर से मुख्यधारा में आ गई… ये है नए दौर की ब्रांडिंग की ताकत… कोई मारी गई महिला पत्रकार को कुतिया कह कर चर्चा में आ जाता है तो कोई पीएम को गधा बताकर ताली बटोर लेता है. साथ ही साथ उतना ही तगड़ा विरोध भी झेलता है. इस तरह चरम विरोध और समर्थन के बीच वह अपना कद काठी काफी बड़ा कर लेता है.

जैजै

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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मृणाल के ट्वीट में ऐसा कुछ नहीं जिससे हमें या आपको शर्मिंदा होना पड़े!

Sandeep Maurya : मृणाल पांडेय द्वारा किए गए ट्वीट में ऐसा कुछ नहीं था जिससे हमें या आपको शर्मिंदा होना पड़े। एक प्रधानमंत्री जो गालीबाज़ों, रेप की धमकी देने वालों, गुंडों और मवालियों को ट्विटर पर फॉलो करे। देश दुनिया की मीडिया द्वारा ख़बर करने के बावजूद, आलोचना के बाद भी उन्हें अनफॉलो न करे, उसके प्रति मृणाल पांडे के इस नज़रिए से मुझे कोई आपत्ति नहीं।

मृणाल को घेरने वाले क्या नहीं जानते कि आज जिस भाषा में राजनैतिक विमर्श हो रहा है उसकी शुरूआत कहां से हुई। क्या उन्हें नहीं पता कि प्रधानमंत्री की बोली-भाषा, हावभाव, कटाक्ष, व्यंग्य किस दर्जे का हुआ करता है। जिस पद की गरिमा का 2014 के आम चुनावों के बीच चीरहरण किया गया, क्या हरण करने वालों के बारे में हमें नहीं पता। असल में हमें पता है, हम जानते हैं लेकिन हम सब उन बेबस और कमज़ोर भारतीय माँ बाप की तरह हैं जो दबंग द्वारा पीटे गए अपने ही बच्चों को डांट फटकार देते हैं।

भगवा खेमा काउंटर अटैकिंग करता है। वह बताता है कि देखिए, मृणाल भी वैसी हैं। कैसी हैं, मृणाल यह हमें पता है। मृणाल, वैचारिक विरोध करते वक्त माँ बहन की गाली नहीं देती, मृणाल अपने राजनीतिक पक्ष की आलोचना पर जान से मारने की बात नहीं करती। इतना भी क्षमाप्रार्थी नहीं होना चाहिए, कि उन्हें (भगवा खेमा) फ्री हिट दे दिया जाए। और फिर जिस प्रधानमंत्री के लिए मेरे उदारवादी मित्र छाती पीट रहे हैं उसी प्रधानमंत्री ने देश के पूर्व उपराष्ट्रपति के विदाई समारोह में उन्हें ट्रोल किया था। कई बार हम, अति नैतिकतावादी बन जाते हैं या फिर इस बहाने चीज़ों को बैलेंस करना चाहते हैं। जो भी हो, मैं वरिष्ठ पत्रकार, हिंदुस्तान समाचार पत्र की पूर्व चीफ एडिटर तथा प्रसार भारती की पूर्व चेयरपर्सन के पक्ष में खड़ा हूं।

युवा पत्रकार संदीप मौर्या की एफबी वॉल से.

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मृणाल जी को असहमति से सख्त एतराज है : विपेन्द्र कुमार

मृणाल जी को असहमति से सख्त एतराज है… एक पुराना वाकया बताता हं….उन दिनों मृणाल जी हिंदुस्तान की संपादक (विचार) थीं और मैं हिंदुस्तान के पटना संस्करण में मुख्य उपसंपादक. एक दिन संपादकीय पेज देखने वाली कनीय सहयोगी एक पत्र लेकर आई और पूछी कि इसे लोकवाणी (संपादक के नाम पत्र) में छाप सकते हैं? मैंने पत्र को पढा. पत्र में मृणाल जी के एक लेख में कही बातों की आलोचना की गई थी.

मैंने सहयोगी से कहा, निश्चित रूप से छाप सकती हो. ऐसे पत्रों को तो प्राथमिकता दी जाती है. पत्र दूसरे दिन छप गया. उसके दो-तीन दिन बाद वह सहयोगी मेरे पास आई और कहने लगी, “संपादक जी बुलाकर पूछ रहे थे कि वह पत्र कैसे छाप दी, तो मैंने कह दिया कि आपसे (मुझसे) पूछ कर छापी थी. फिर संपादक जी ने कहा आगे से ऐसा पत्र नहीं छापना.”

संपादक जी ने मुझसे कुछ नहीं पूछा लेकिन कुछ दिन बाद एक दिन मैं उनके कमरे में था तो उन्होंने अपने दराज से एक कागज़ निकाला और कहा, ”इसे पढिये.. आप लोगों को लगता होगा कि सबकुछ मैं अपने मन से ही करता हूं.”

वह तत्कालीन कार्यकारी अध्यक्ष नरेश मोहन का पत्र था जिसमें पूछा गया था कि अपने ही संपादक के लेख के ख़िलाफ़ अख़बार में कैसे छप गया. ज़ाहिर है नरेश मोहन ने तो खुद पत्र पढ़ा नहीं होगा. मृणाल जी ने ही शिकायत की होगी. इस घटना का उल्लेख बस मृणाल जी के ट्वीट का फ़ोटो देख कर दिया. और आगे कुछ कहना शालीनता के ख़िलाफ़ होगा.

पटना के वरिष्ठ पत्रकार विपेन्द्र कुमार की एफबी वॉल से.

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अजित अंजुम ने असहमति जताई तो मृणाल पांडे ने ब्लॉक कर दिया!

Ajit Anjum :  मृणाल जी, आपने ये क्या कर दिया? कल पीएम मोदी का जन्मदिन था. देश-दुनिया में उनके समर्थक / चाहने वाले / नेता / कार्यकर्ता / जनता / मंत्री / सासंद / विधायक जश्न मना रहे थे. उन्हें अपने-अपने ढंग से शुभकामनाएँ दे रहे थे. ये उन सबका हक़ है जो पीएम मोदी को मानते-चाहते हैं. ट्वीटर पर जन्मदिन की बधाई मैंने भी दी. ममता बनर्जी और राहुल गांधी से लेकर तमाम विरोधी नेताओं ने भी दी. आप न देना चाहें तो न दें, ये आपका हक़ है. भारत का संविधान आपको पीएम का जन्मदिन मनाने या शुभकामनाएँ देने के लिए बाध्य नहीं करता.

मृणाल पांडेय का वो ट्वीट जिस पर बवाल मचा है.

आप जश्न के ऐसे माहौल से नाख़ुश हों, ये भी आपका हक़ है. लेकिन पीएम मोदी या उनके जन्मदिन पर जश्न मनाने वाले उनके समर्थकों के लिए ऐसी भाषा का इस्तेमाल करें, ये क़तई ठीक नहीं… हम-आप लोकतंत्र की बात करते हैं. आलोचना और विरोध के लोकतांत्रिक अधिकारों की बात करते हैं.. लेकिन लोकतांत्रिक अधिकारों के इस्तेमाल के वक्त आप जैसी ज़हीन पत्रकार / लेखिका और संपादक अगर अपनी नाख़ुशी या नापसंदगी ज़ाहिर कहने के लिए ऐसे शब्दों और चित्रों का प्रयोग करेगा.. पीएम के समर्थकों की तुलना गधों से करेगा तो कल को दूसरा पक्ष भी मर्यादाओं की सारी सीमाएँ लाँघकर हमले करेगा तो उन्हें ग़लत किस मुँह से कहेंगे…

सीमा टूटी तो टूटी. कितनी टूटी, इसे नापने का कोई इंची-टेप नहीं है… सोशल मीडिया पर हर रोज असहमत आवाजों या विरोधियों की खाल उतारने और मान मर्दन करने के लिए हज़ारों ट्रोल मौजूद हैं.. हर तरफ़ / हर खेमे में ऐसे ट्रोल हैं. ट्रोल और आप में फ़र्क़ होना चाहिए… आप साप्ताहिक हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तान की संपादक रही हैं. हिन्दी और अंग्रेज़ी भाषा पर आपकी ज़बरदस्त पकड़ है. फिर अभिव्यक्ति के लिए ऐसी भाषा और ऐसे प्रतीक क्यों चुने आपने? सवाल आपके आक्रोश या आपकी नाराज़गी का नहीं है. अभिव्यक्ति के तरीक़े पर है.

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शुक्रिया मृणाल जी …मुझे ब्लॉक करने के लिए… अब देखिए.. मृणाल जी मुझे भी ब्लॉक कर दिया… मैंने तो शब्दों की मर्यादा नहीं खोई थी.. उन्हें लिखे पर मर्यादित ढंग से असहमति ही जताई थी… शुक्रिया मृणाल जी, आपने मुझे ब्लॉक करने के क़ाबिल समझा… अपनी इस पात्रता का अंदाज़ा नहीं था मुझे… फिर मैं आपके लोकतांत्रिक अधिकारों की क़द्र करता हूँ… आपको हक़ है ये तय करने का कि कौन आपको फ़ॉलो करे. किसे आप फ़ॉलो करें. लेकिन आप अगर अपनी थोड़ी भी आलोचना पर इतनी बौखला जाती हैं तो मैं समझ सकता हूँ कि एक संपादक के तौर पर कितनी लोकतांत्रिक रही होंगी..

अब ये बात तो ठीक नहीं न कि आप अपने लिए अभिव्यक्ति की आज़ादी के पैमाने ख़ुद करके उसका इस्तेमाल इस हद तक करें कि मोदी समर्थकों को गधा घोषित कर दें और मेरा जैसा कोई आदमी मर्यादित ढंग से आपको ऐसा न करने की नसीहत दे तो आप पट से ब्लॉक कर दें… नहीं.. नहीं.. मृणाल जी.. मुझे तकलीफ़ इस बात से नहीं कि आपने मुझे ब्लॉक किया. ग़ुस्सा इस बात का है कि आप सिर्फ़ अपने लिखे पर सिर्फ़ वाह-वाह क्यों चाहती हैं? किस-किस को ब्लॉक करेंगी आप? सुना है जो भी आपसे थोड़ा भी असहमत होता है, उसे तुरंत ब्लॉक कर देती हैं..

आज मैं शिकार हुआ. इससे पहले राहुल देव सरीखे वरिष्ठों को भी आप ब्लॉक कर चुकी हैं.. जबकि वो तो इतने तमीज़ से लिखते हैं कि कई बार असहमत होकर भी मैं उनसे कुछ सीखता ही हूँ… इसका मतलब ये हुआ कि आप थोड़ी भी आलोचना नहीं सकती हैं… अगर आप अपने लिखे / बोले को ब्रह्मवाक्य मानती हैं.. अपने को आलोचनाओं से परे मानती हैं तो आपको दूसरे की आलोचना का हक़ नहीं…

वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम की एफबी वॉल से.

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दगे हुए सांड़ों की दिलचस्प दास्तान : शशि शेखर महोदय के लेखों में थरथराहट काफी होती है…

अनेहस शाश्वत

आज यशवंत सिंह के इस भड़ास बक्से में आप सबके लिए कुछ हास्य का आइटम पेश करूंगा। पेशेवर पत्रकारिता को जब एक तरह से तिलांजलि दी थी तो सोचा था कि इस बाबत कभी कुछ लिखूं पढ़ूंगा नहीं, और न ही इस बाबत किसी से कुछ शिकायत करूंगा। क्योंकि इस पेशे में आने का निर्णय और फिर इसे छोड़ने का निर्णय भी मेरा ही था। इस पेश से जुड़े किसी भी आदमी ने कभी मुझसे यह नहीं कहा कि आओ और न ही यह कहा कि इसे छोड़ दो, लेकिन बीस वर्ष की अवधि कम नहीं होती और इस अवधि में मुझे भी कुछ मजेदार अनुभव हुए। कई साथियों ने कहा कि इस बाबत भी कुछ लिख दो। कड़वे अनुभवों का जिक्र बेकार है क्योंकि वे निरर्थक हैं और एकाध कमीने सम्पादकों के सम्पादनकाल में ही हुए। मजेदार अनुभव काफी हैं जिनमें से कुछ का जिक्र मैं करूंगा।

तो साहब मास्टर की औलाद हूं, और परिवार में पुश्तों से लोगों ने या तो वकालत की या फिर सरकारी नौकरी। इसलिए हिन्दी पत्रकारिता के बारे में मेरा ज्ञान शून्य था। उस जमाने में हिन्दी पत्रकारिता एक बंद सा पेशा था। जिसके बारे में आमजन को कुछ खास अनुभव नहीं था, इसलिए फीडबैक लेना सम्भव भी नहीं था। बाहर की दुनिया में जो छनकर आता था वह ये कि सम्पादकगण बहुत विद्वान होते हैं और जुझारू पत्रकार जनहित में जान देने पर आमादा रहते हैं। हालांकि बाद में अनुभव से पता चला कि पत्रकारों-सम्पादकों की दीनदशा आमजन से छिपाने के लिए उनके सामने सायास यह गढ़ी हुई छवि पेश की जाती थी। कम से कम हिंदी पत्रकारिता का यही सच है।

बहरहाल इसी फीडबैक के साथ दैनिक जागरण लखनऊ में तीन चार महीने के अपरेन्टिसशिप के बाद अमर उजाला मेरठ में पक्की नौकरी मिल गयी। जहां तनख्वाह जागरण के 700/-रूपये महीने से कहीं ज्यादा थी। सो लखनऊ का मोह छोड़ मेरठ चला गया। अब नौकरी भी चल रही थी और चीजों को आब्जर्व भी कर रहा था। मुझे लगता था कि अमर उजाला कुल मिलाकर एक ठीक अखबार था। उस पिछड़े इलाके में सामान्य पढ़े लिखे पत्रकारों की मदद से एक अच्छा अखबार निकल रहा था। लेकिन वहां पर भी एक मजेदार प्रहसन रोज होता था। सबसे पहले जब डाक एडीशन का फर्स्ट पेज छपकर बाहर आता था तो डाक इन्चार्ज और सिटी इन्चार्ज कहते थे कि प्रथम पृष्ठ का इन्चार्ज मूर्ख है और उसकी मूर्खता को मालिक पता नहीं क्यों झेल रहे हैं। इसने प्रथम पृष्ठ का सत्यानाश कर दिया। 

इसी तरह डाक एडीशन के लिए प्रथम पृष्ठ प्रभारी और सिटी इन्चार्ज कहते थे कि डाक इन्चार्ज अज्ञानी हैं और मालिक दयावश इसके अज्ञान को बर्दाश्त कर रहे हैं। वर्ना डाक एडीशन को तो इसने कूड़ाघर बना ही रखा है। सिटी एडीशन के लिए डाक और प्रथम पृष्ठ प्रभारी का मानना था कि अल्पज्ञानी और बड़बोले सिटी इन्चार्ज ने सिटी पेजेज को नष्ट कर दिया है। जो मालिक को दिखाई नहीं दे रहा है। अब मैं सोचूं कि यार अखबार तो कुल मिलाकर ठीक ही ठाक है और अगर ये तीनों इसे नष्ट कर रहे हैं तो मालिक कोई एक्शन क्यों नहीं लेता है। वह तो कालांतर में बाद में समझ में आया कि सभी पत्रकारों का मानना होता है कि उनके अलावा बाकी पत्रकार मूर्ख हैं और यह उनका दुर्भाग्य है कि मूर्ख ही अच्छे पदों पर बैठकर संस्थान का सत्यानाश कर रहे हैं।

ऐसे ही मजेदार अनुभवों के बीच दिन कट रहे थे कि मेरे एक भांजे ने कहा मामा मुझे भी पत्रकार बनवा दो। बहरहाल किस्सा कोताह यह कि मैंने उसे एक बड़े अखबार का ग्रामीण संवाददाता बनवा दिया। तीन-चार महीने बाद मुझे वह फिर मिला। मैने पूछा बेटा काम कैसा चल रहा है? उस हंसोड़ बालक ने कहा कि मामा मैने पत्रकारिता छोड़ दी है क्योंकि ग्रामीण पत्रकारिता का मतलब होता है सांड़रूपी पत्रकार को अखबार के नाम से दागकर छोड़ दिया जाता है कि जाओ चरो खाओ, जो मेरे बस का नहीं है। मजे की बात यह कि दो दशक बीते आज भी अखबार हो या टीवी चैनल ग्रामीण इलाकों में पत्रकाररूपी दगे सांड़ ही घूम रहे हैं। हालांकि सच यह भी है कि सारे कष्टों के बावजूद ये दगे सांड़ कभी-कभी बहुत शानदार खबरें देते हैं, जिनका क्रेडिट दफ्तरों में बैठे मोटाये सांड़ उठा ले जाते हैं।

खैर यह सब तो चल ही रहा था अब सम्पादकों के भी मजेदार अनुभव होने लगे थे। सहज, खासे पढ़े लिखे और सामान्य व्यवहार वाले सम्पादक हिन्दी पत्रकारिता में कम ही होते हैं। अधिकांश ‘यूनीक केस’ होते हैं। अशांत और षड्यंत्रकारी माहौल शायद उन्हें ऐसा बना देता हो जब मैं हिंदुस्तान में था तो प्रधान सम्पादक मृणाल पाण्डेय थीं। उनके लेख निहायत प्रांजल भाषा में लिखे जाते थे लेकिन कुल मिलाकर वे उपदेशपरक और निरर्थक होते थे अब भी ऐसा ही है। अब चूंकि वे सम्पादक थीं तो उन्होंने अपने पाठकों को यह बताना भी मुनासिब समझा कि वे पुश्तैनी साहित्यकार हैं। उनकी मां और नानी खासी बड़ी लेखिकायें थीं। अब बेचारे उस समय के हिन्दुस्तान के पाठकों की यह मजबूरी थी कि वे तीनों महान साहित्यकारों के बारे में न चाहते हुए भी उनके वृत्तांत जाने। सो साहब पाठकों ने मजबूरी में ही सही वह सारा वृत्तांत पढ़ा ही होगा।

कुछ पुरखों का पुरुषार्थ और कुछ खासे सम्पन्न बड़ी बहन और बड़े भाई की कृपा मेरे दिन बगैर कुछ खास किये भी बड़े आराम से कटते हैं। ऐसे में टाइम पास के लिए कई अखबार देखता हूं। कारण इससे सस्ता टाइम पास सम्भव भी नहीं। सो सम्पादकों के आलेख अब भी पढ़ता हूं। शशि शेखर महोदय के लेखों में थरथराहट काफी होती है। किसी घटना को अंजाम देने वाले पात्र घटना के समय उत्साह या आशंका से जितना थरथराते होंगे उससे कुछ ज्यादा ही उत्साह या आशंका से शशि शेखर अपने लेखों में थरथराते हैं। अपने लेखों में ही एकाधिक बात उन्होंने जिकर किया है कि न्यूज रूम में किसी घटना की जानकारी होते ही वह किस तरह से चीखने-चिल्लाने लगे। दैनिक जागरण के मालिक कम सम्पादक भी अपवाद नहीं हैं, वे समस्त विषयों के ज्ञाता हैं और आधिकारिक भाव से वे हर विषय पर कलम चलाते हैं। आश्चर्य है उन्हें अभी तक क्यों विश्वविद्यालयों ने मानद डॉक्ट्रेट की उपाधि नहीं दी।

सच यह है कि अधिकांश सम्पादकों के लेख उपदेशपरक और उबाऊ होते हैं। उनमें विषयों का विस्तार भी नहीं होता। क्योंकि वे सामान्य पढ़े लिखे हैं। ऐसे में उपदेशपरक लेख लिखना कहीं अधिक आसान होता है। मजे की बात यह भी कि उनके उपदेश उसी अखबार में छपते हैं जिसमें वे फिलहाल होते हैं। उनके जाने के बाद वह संस्थान उनके उपदेशों से लाभान्वित होने से कतई इनकार कर देता है। कभी-कभी मुझे यह भी लगता है कि इन पर उपदेश कुशल बहुतेरे सम्पादकों को अगर मोहल्ले स्तर की भी जमीनी सच्चाइयों से रूबरू होना पड़े और ठीक करने की जिम्मेदारी दी जाये तो ये भाग खड़े होंगे। लेकिन अपने लेखों में वे किसी को भी हिकारत की भावना से उपदेश दे डालते हैं।

और अंत में, वरिष्ठ पत्रकार अरविंद चतुर्वेदी का अनुभव बताना अप्रासंगिक नहीं होगा। चतुर्वेदी जी ने अपना कैरियर आज अखबार से शुरू किया था जिसकी महानता के बारे में आज भी तमाम झूठे सच्चे किस्से सुनाये जाते हैं। मैने चतुर्वेदी जी से पूछा कि महोदय आपने तो हिंदी पत्रकारिता के तथाकथित स्वर्ण युग में शुरुआत की थी और वह भी ‘आज’ अखबार जैसे स्वर्ण महल में रहकर, आपका क्या कहना है? चतुर्वेदी जी भले आदमी हैं। उन्होंने कहा- हिंदी पत्रकारिता का स्वर्ण युग कभी नहीं था, खुद को भ्रम में रखने के लिए हम लोगों ने सायास यह मानक गढ़ा है।

लेखक अनेहस शाश्वत उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. मेरठ, बनारस, लखनऊ, सतना समेत कई शहरों में विभिन्न अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम किया. घुमक्कड़ी, यायावरी और किस्सागोई इनके स्वभाव में हैं. इन दिनों वे लखनऊ में रहकर जीवन की आंतरिक यात्रा के कई प्रयोगों से दो-चार हो रहे हैं. उनसे संपर्क 9453633502 के जरिए किया जा सकता है.

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