
संजय कुमार सिंह
सरकार अदाणी पर बहस नहीं करवाकर संविधान पर बहस के लिए तैयार हुई तो उसके अपने कारण होंगे और निश्चित रूप से एक कारण यह था कि सरकार नहीं चाहती है कि अदाणी पर बहस हो। जो नहीं समझना चाहे वह नहीं समझने के लिए स्वतंत्र है पर यह बहुत समय नहीं चलने वाला है। ऐसे समय में सरकार जब संविधान पर चर्चा के लिए तैयार हो गई तो निश्चित रूप से उसे मजबूत दिखना चाहिये था। अखबारों की खबरों से नहीं लगता है कि इस चर्चा में सरकार के पास कुछ नया है या कांग्रेस कहीं से कमजोर है। दूसरी ओर, साफ दिख रहा है कि अखबारों में सत्ता पक्ष की बातों को महत्व दिया जा रहा है। कल राजनाथ सिंह का कहा सभी अखबारों में प्रमुखता से छपा था आज नरेन्द्र मोदी का कहा छपा है। उसपर आने से पहले याद दिला दूं कि मैंने कल लिखा था कि इमरजेंसी का विरोध भाजपा का प्रमुख मुद्दा रहा है और इमरजेंसी भी संविधान के प्रावधानों के तहत लगाई गई थी। प्रियंका गांधी ने कहा है कि भाजपा को उससे सीख लेनी चाहिये, गलतियों के लिए माफी मांगनी चाहिये।
दूसरी ओर सरकार ने अनुच्छेद 370 हटाकर, दिल्ली के मामले में सुप्रीम कोर्ट में हारने के बाद कानून बदलकर, दिल्ली को राज्य बनाने की अपनी ही मांग को भूलकर जो सब किया है, वह किसी से छिपा नहीं है। कोई भी समझ रहा है कि भाजपा के कट्टर हिन्दुत्व के जवाब में जातियों की राजनीति भी जरूरी हो गई थी और हिन्दुत्व के नाम पर हिन्दुओं के लिए भाजपा जो कर रही है उसका प्रसाद भी लोगों को मिल ही रहा है। मुझे यह चलते हुए गधे के आगे लटका दिये गये गाजर की तरह लगता है और जो नहीं समझता है उसके लिए बड़ा आकर्षण हो सकता है। ऐसे में शिक्षा, ज्ञान और चर्चा को खत्म करने के लिए जो सब हो रहा है उसमें यही सब चलता रहा तो आगे की राजनीति दूसरों के लिए मुश्किल और भाजपा के लिए आसान हो सकती थी और इसीपर लगाम लगाने के लिए जातियों का मुद्दा उठा। फिर आरक्षण, संविधान आदि आये। अब मुद्दा संविधान की रक्षा का बन गया है और भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने के लक्ष्य पर काम कर रहे लोगों के लिए संकट खड़ा हो गया है। यह काम संविधान को बदले बिना होगा नहीं और संविधान बदलने की बात करने से वोट कम होते हैं।
इसी बार कुछ और सीटें कम होतीं या जैसा ईवीएम पर आरोप है वह नहीं होता तो बात बदल गई होती। ईवीएम और अदाणी को बचाने के लिए या मुफ्त की रेवड़ी से सत्ता में बने रहे तथा अदाणी की सेवा करते रहने के लिए भाजपा का सत्ता में बने रहना जरूरी है और अगर हिन्दुत्व का मामला नहीं चले तो यह काम मुश्किल हो जायेगा। अदाणी पर बहस नहीं करवाकर संविधान पर बहस करवाने से लग रहा है कि भाजपा की राजनीति अंधेरी सुरंग में घुस रही है जहां उसे समझ नहीं आ रहा है कि वोट कैसे मिलेंगे। उसका मुद्दा ऐसा है जिसे सार्वजनिक रूप से स्वीकार करें तो नुकसान होगा और फिलहाल दूसरा कुछ है नहीं। आज की खबरों से लगता है कि भाजपा और उसके अब तक के महानतम नेता नरेन्द्र मोदी के पास कुछ नया है नहीं। किन्हीं कारणों से वे मणिपुर जाते नहीं है और प्रेस कांफ्रेंस करके अपनी बात कह नहीं सकते। आलोचना सुन नहीं सकते और अपने बारे में तो हर कोई जानता है। उम्र बढ़ ही रही है। ऐसे में भाजपा की हिन्दुत्व की राजनीति एक नये मोड़ से अंधेरी सुरंग में घुस गई है, भले अखबार नहीं बता रहे हैं।
जहां तक भाजपा की राजनीति से जनहित और भविष्य में लाभ क बात है सबको पता है कि इससे एवन और एटू जैसे ही अमीर हो रहे हैं और गरीब मुफ्त के राशनों और रेवड़ियों पर आश्रित होता जा रहा है। संविधान ठीक से लागू हो सब अपना वोट दे पायें और वह निष्पक्ष व स्वतंत्र रूप से पड़े तथा गिना जाये तो उसका असर क्यों नहीं होगा। आप जानते ही हैं कि नरेन्द्र मोदी पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था की बात करते हैं लेकिन प्रति व्यक्ति आय की बात नहीं करते हैं। यह सब 10 साल से चल रहा है लोग देख रहे हैं कि चुनाव में उनके पास बताने के लिए अपने काम नहीं होते हैं और वे कांग्रेस की आलोचना को ही मुद्दा बनाते हैं। ऐसे में 2024 को 2014 नहीं माना जा सकता है और भाजपा अचानक बदल नहीं सकती है। अदाणी पर बहस नहीं करवाकर और संविधान पर बहस करवाकर नवोदय टाइम्स की लीड के शीर्षक के अनुसार, कांग्रेस ने संविधान को छिन्न भिन्न किया जैसे हवा-हवाई आरोपों से बात नहीं बनने वाली है। अगर यह मुद्दा था तो 2014 में कहना चाहिये था और उसके बाद जब कांग्रेस सत्ता में है ही नहीं तो कैसे किया?
ऐसे किसी आरोप को गंभीरता से कहने की क्षमता नरेन्द्र मोदी में रह नहीं गई है और शैली तो कभी थी भी नहीं। इसका असर यह होगा कि कोई नया उनसे प्रभावित होने से रहा। पुराने तो सब देख ही रहे हैं। उदाहरण के लिए अमर उजाला की लीड का शीर्षक पढ़िये और सोचिये कि यह प्रधानमंत्री भाषा है और किसके लिए है। कांग्रेस को संविधान का शिकार करने की आदत संसोधन करने का खून पार्टी के मुंह लगा। जाहिर है, जिस और जैसे वोट का खून लगा हुआ है उसी के लिए है। कहने की जरूरत नहीं है कि कांग्रेस ने 50 साल में अगर संविधान में संशोधन किये हैं तो उसे शिकार करना नहीं कहा जा सकता है और ना इसे मुंह में खून लगाना कहा जा सकता है। फिर भी कहना हो तो यह कौन कहेगा कि कांग्रेस ने किये वो गलत और हमने (या मैंने) जो किये वह सही। मेरा संपादकीय विवेक कहता है ऐसी भाषा और ऐसे तर्कों को महत्व नहीं दिया जाना चाहिये। अगर यह शीर्षक बन रहा है तो कारण यह भी हो सकता है कि इससे अच्छा कुछ हो ही नहीं और प्रधानमंत्री को बड़ा या सम्मानित मानने की मानसिकता उन्हीं के कहे को प्रमुखता दिलवाती हो। यह मैं इसलिए कह रहा हूं कि प्रधानमंत्री राजा नहीं होते हैं।
ऐसे में संविधान पर चर्चा का केंद्र बिन्दु यह है कि उसकी रक्षा कौन बेहतर करता है या कर सकता है। कल की खबरों में राजनाथ सिंह का कहा जो सब छपा है उसमें भी कुछ ठोस नहीं था। जहां तक संविधान के अनुसार काम करने की बात है नरेन्द्र मोदी के राज में देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश खुले आम कह चुके हैं कि वे फैसले कैसे लेते हैं। उसका कारण और प्रेरणा जो भी हो, संविधान तो नहीं ही है। नरेन्द्र मोदी ने रोकने के लिए कुछ किया हो ऐसा भी नहीं है। 10 साल में जो सब जैसे हुआ है सबको याद है उससे पहले के लिए भाजपा के पास मुख्य रूप से इमरजेंसी थी लेकिन संविधान पर बहत में इमरजेंसी के मुकाबले अघोषित इमरजेंसी ज्यादा महत्वपूर्ण है। इसलिए अदाणी पर चर्चा नहीं करवाकर संविधान पर चर्चा करवाई जा रही है और खुद को बेहतर बताने की बजाय कांग्रेस को खराब बताने का काम चल रहा है। मीडिया उसमें खुलकर सहयोग कर रहा है।
हिन्दुत्व के मुद्दे पर सत्ता में आई भाजपा के पास इससे अलग कोई मुद्दा नहीं है और अब तो लगता है कि सुशासन भी चर्चा का विषय नहीं रह गया है। कुल मिलाकर, हिन्दुत्व की राजनीति में जाति का मुद्दा गुब्बारे में पिन चुभोने की तरह है और लटपटाई भाजपा इसमें छटपटाती दिख रही है। वैसे भी हिन्दुत्व के दम पर सरकार चलाना (या सत्ता पाना) आसान होता तो पहले ही हो गया होता पर गुजरात में जो सब हुआ वह आसान नहीं था और उसके बिना कोई राजनीतिज्ञ हिन्दू हृदय सम्राट नहीं बन सकता था। नरेन्द्र मोदी जो सब करके सत्ता में आये, उसके बाद जनहित में काम किये होते तो सत्ता में बने रहते और कोई दिक्कत नहीं थी। पर भाजपा और परिवार का लक्ष्य दूसरा है और इसीलिए राहुल गांधी को सक्रिय होना पड़ा। इसके बाद सीटें कम होने से तिलमिलाना स्वाभाविक था और यह स्पष्ट हो चला कि ईवीएम नहीं होता तो सिर्फ हिन्दुत्व कांग्रेस का लोगों को याद नहीं है।
ऐसे में इस चर्चा से भाजपा को कांग्रेस के खिलाफ आक्रामक होने का मौका मिला जबकि अदाणी पर चर्चा होती तो विपक्ष सरकार पर बहुत भारी पड़ता। जहां तक संविधान पर बहस की बात है कांग्रेस ने तथ्यों पर बात की है। राहुल गांधी ने पुरानी बातों का उल्लेख भी किया तो वह गुरु गोवलकर की बात है। राहुल गांधी ने इतना ही नहीं कहा उन्होंने कहा कि संविधान का समर्थन करके आप अपने नेता गोलवरकर का मजाक बनाते हैं। आप समझ सकते हैं कि भाजपा की स्थिति कैसी होगी और आज के अखबारों में क्या दिखना चाहिये था जो बिल्कुल नहीं दिख रहा है। इसके बावजूद भाजपा को अपनी लोकप्रियता पर भरोसा हो तो प्रियंका गांधी ने चुनौती दी है कि ईवीएम हटाकर या बैलट पेपर से चुनाव करवाकर देख लीजिये। भाजपा ने उसे स्वीकार नहीं किया है। आप समझ सकते हैं कि भाजपा की सत्ता बनी भी रही तो सरकार के रूप में कितनी मजबूत होगी और कितना काम कर पायेगी। हालांकि, वह अलग मुद्दा है।
आइये, आज के अखबारों में कल की चर्चा की प्रस्तुति देख लें। हिन्दी के दोनों अखबारों के शीर्षक की चर्चा कर चुका हूं पर नवोदय टाइम्स में राहुल गांधी के मुकाबले अनुराग ठाकुर के बयान बराबरी में छपे हैं। दोनों का शीर्षक जानने लायक है इससे आप बहस का स्तर और मुकाबला भी समझ सकेंगे। राहुल गांधी ने कहा है, देश में लड़ाई संविधान बनाम मनुस्मृति की। अनुराग ठाकुर ने कहा है, कांग्रेस राज में सिखों के काटे गये थे गले। इसे पढ़कर मुझे याद आया कि यह 1984 में हुआ था। क्यों हुआ था और क्या हुआ था कैसे हुआ था के मुकाबले सिर्फ इतना कहना (और छापना) कितना नैतिक है इसपर गये बिना मैं यह बताऊं कि अनुराग ठाकुर का जन्म 1974 अक्तूबर का है और 1984 अक्तूबर में वे 10 साल एक सप्ताह के रहे होंगे। उन्हें सिखों का गला काटना याद है पर गुजरात में जो 2002 में हुआ (जब वे 28 साल के थे) वह याद नहीं है या उसका उल्लेख नहीं कर रहे हैं तो साफ तौर पर राजनीति कर रहे हैं और उनकी यह राजनीति कितनी घटिया है उसपर कुछ कहने की जरूरत नहीं है।
आज भी ज्यादातर अखबारों ने जब सरकारी पक्ष या नरेन्द्र मोदी की बातों को लीड का शीर्षक बनाया है तो द टेलीग्राफ ने बताया है कि राहुल गांधी ने अभय मुद्रा में एक सवाल पूछा है – संविधान या मनुस्मृति। यह भी बताया है कि जवाब में नरेन्द्र मोदी ने जाने-पहचाने पत्ते चले। पांच कॉलम में फ्लैग शीर्षक वाली इस खबर का मुख्य शीर्षक, अभय मुद्रा में एक सवाल है। इस मूल खबर के साथ सिंगल कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, ‘एक प्रधानमंत्री एक निशाना : नेहरू परिवार’। जेपी यादव क इस खबर के अनुसार 100 मिनट के अपने भाषण में उन्होंने नेहरू-गांधी परिवार को कोसा। खबर लिखने का एक तरीका यह भी है। इसमें बताया गया है कि प्रधानमंत्री ने जो कहा उसे वे पहले भी कई बार कह चुके हैं और यह एक देश, एक प्रधानमंत्री के एक भाषण जैसा है। 1975 की घोषित इमरजेंसी का विरोध करने के लिए मशहूर इंडियन एक्सप्रेस अघोषित इमरजेंसी का प्रचार करने में लगा है। आज भी इसने प्रधानमंत्री के कहे को लीड बनाया है, नेहरू से राहुल तक कांग्रेस ने संविधान पर बार-बार हमले किये। इसके साथ यह जरूर बताया है कि राहुल ने एकलव्य का जिक्र किया और कहा कि सरकार युवाओं, छोटे कारोबारों के अंगूठे ले रही है।
हिन्दुस्तान टाइम्स में पांच कॉलम का शीर्षक है, मोदी ने कांग्रेस पर सात दशक तक संविधान का शिकार करते रहने का आरोप लगाया। इस खबर के साथ मोदी के भाषण की खास बातें भी बताई गई हैं और राहुल गांधी के आरोप सिंगल कॉलम में उनकी फोटो के साथ यानी आधे ही कॉलम में है। हालांकि यह राहुलगांधी के सबसे जोरदार हमले की खबर है और इसे कायदे से प्रस्तुत किया जाता तो काफी लोग पढ़ते। मामला वही, सावरकर ने संविधान के बारे में क्या कहा था उसका उल्लेख करना और फिर यह कहना कि यह अच्छी बात है कि आप सब संविधान का बचाव कर रहे हैं पर मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि क्या आप अपने नेता की बातों से सहमत हैं? क्या आप अपने नेता की बातों का समर्थन करते हैं? कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपाइयों के लिए यह इस समय का सबसे मुश्किल सवाल है। वे अदाणी का समर्थन करना और नहीं करना स्वीकार कर सकते हैं लेकिन गुरु गोलवरकर का विरोध कैसे करें और नहीं करें तो यह कैसे स्वीकार करें कि संविधान के बारे में उन्होंने जो कहा था उससे सहमत हैं या नहीं।
टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी आज कांग्रेस के खिलाफ प्रधानमंत्री के प्रचार के सुर में सुर मिलाया है। नेहरू से अब तक, एक परिवार ने संविधान का अधिकतम नुकसान किया। इसके साथ राहुल गांधी का भी पक्ष है लेकिन मेरा सवाल बहुत साधारण है, कांग्रेस 10 साल से ज्यादा से सत्ता में नहीं है और अगर संविधान का सबसे ज्यादा नुकसान किया है तो 10 साल से पहले तक ही किया होगा और 10 साल से मोदी जी ने कार्रवाई क्यों नहीं की? संविधान का नुकसान करने के लिए ही नहीं कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के जो आरोप लगाये थे उस मामले में या रॉबर्ट वाड्रा पर जो आरोप थे उसके मामले में भी। पर प्रचारक मीडिया के लिए वह सब मुद्दा नहीं है। द हिन्दू में भी कांग्रेस का आरोप ही लीड है हालांकि पांच कॉलम की इस लीड में दो कॉलम की खबर का शीर्षक है, आपके सर्वोच्च नेता ने मनुस्मृति को प्राथमिकता दी थी। इसमें दिल्ली आ रहे किसानों को हरियाणा में रोक दिये जाने की खबर सिंगल कॉलम में है। खबर के अनुसार किसानों को रोकने के लिए आंसू गैस के गोले दागे गये।


