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उत्तर प्रदेश

आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे नंद गोपाल नंदी ने पत्रकार को ब्लैकमेलर कहा, वीडियो देखें

विनय मौर्या-

जब कोई पत्रकार ईमानदारी से सवाल करता है, सच को उजागर करने का साहस करता है, तो भ्रष्ट, प्रभावशाली और सत्ता में बैठे लोग उसके ऊपर पलटवार करने के लिए सबसे आसान हथियार का इस्तेमाल करते हुए “ब्लैकमेलर” कह देते हैं। यह आरोप इतना आम और सस्ता हो चला है कि अब हर दूसरा भ्रष्ट व्यक्ति इसका प्रयोग अपने बचाव में करता है, बिना किसी प्रमाण के। यह कोई नई प्रवृत्ति नहीं है, सरकार के एक मंत्री नंद गोपाल गुप्ता ‘नंदी’ द्वारा पत्रकार के सवाल पर पलटकर ब्लैकमेलर होने का आरोप नंदी की घटियाई का उदाहरण है।

भ्रष्टाचारीयों की रणनीति है की सवाल से भागो, और सवाल करने वाले पर कीचड़ उछालो। इससे दो फायदे होते हैं एक तो मुद्दे से ध्यान भटकता है और दूसरा, पत्रकार की छवि धूमिल कर जनता के सामने उसकी बातों को संदिग्ध बनाया जा सकता है। अगर कोई पत्रकार ब्लैकमेलर है, तो उसका प्रमाण क्यों नहीं दिया जाता।मंत्री जैसे पद पर बैठे व्यक्ति के लिए तो यह और आसान होना चाहिए। अगर हिम्मत है तो साफ-साफ बताएं कि किसे, कब, कैसे ब्लैकमेल किया गया।

दरअसल आम जनता के सामने पत्रकारों की विश्वसनीयता को इस हद तक गिरा दिया जाए कि जब वो सच्चाई भी बोले, तो लोग उस पर शक करें।


यशवंत सिंह-

भ्रष्ट नंदी ने पत्रकार को ब्लैकमेलर कहा। अरे नंदी जी, ब्लैकमेलर कहने के बजाय ब्लैकमेलिंग का प्रूफ मीडिया के सामने रखिए, ब्लैकमेलिंग की शिकायत पुलिस में करिए। लेकिन पत्रकार को तो वो बताइए जो वो पूछ रहा है। खुद आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा व्यक्ति दूसरे को ब्लैकमेलर कहे, शोभा नहीं देता!

माफिया अतीक अहमद से नंदी के रिश्तों की कहानी बाहर आनी बाकी है। सरकार बदले तो एसटीएफ फिर नई फाइल तैयार करे!


श्रुति शुक्ला-

Yashwant Singh सर सही कहा आपने! जब सवाल चुभने लगते हैं, तो जवाब देने की बजाय लांछन लगाना आसान लगता है।

पत्रकारों का काम सवाल पूछना है — और अगर कोई नेता जवाब देने की बजाय पत्रकार को ब्लैकमेलर कहने लगे, तो सवाल और गहरा हो जाता है कि क्या वाकई कुछ छुपाने की कोशिश की जा रही है?

नन्द गोपाल नंदी जी पर पहले भी भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं। ये कोई नई बात नहीं है कि जिन नेताओं पर खुद घोटालों, सिफारिशों और गठजोड़ों के गंभीर आरोप हों, वे अपनी आलोचना को दबाने के लिए पत्रकारों को बदनाम करने का सहारा लेते हैं।

अगर किसी पत्रकार ने वाकई ब्लैकमेल किया है — तो सबूत पेश कीजिए, FIR दर्ज कराइए, वरना उसे बदनाम करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं बनता।

और रही बात अतीक अहमद से कथित रिश्तों की, तो ये बात तो प्रयागराज की गलियों से लेकर लखनऊ के गलियारों तक घूम चुकी है। सत्ता बदलते ही इन ‘रिश्तों’ की जांच एक बार फिर ज़ोरों से उठेगी — क्योंकि सत्य ज्यादा देर तक दबता नहीं।

पत्रकार अगर गलत है, तो कानून से सज़ा दिलाइए, लेकिन अगर सिर्फ सवालों से घबराकर उसे ब्लैकमेलर कहा जा रहा है — तो ये लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है।

नेता जनता को जवाबदेह होता है — और जवाब से बचना, खुद सबसे बड़ा संकेत होता है कि दाल में कुछ तो काला है।

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