Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

साहित्य

‘नवीन धुन’ के विमोचन में गूंजे अनुभव और संवेदना के स्वर, देखें तस्वीरें

नवल कांत सिन्हा-

मैं भी तो अपनी बात लिखूं अपने हाथ से,
मेरे सफ़े पे छोड़ दो थोड़ा सा हाशिया। -दुष्यंत कुमार

वरिष्ठ पत्रकार, संपादक नवीन जोशी (Naveen Joshi) ने कहा, “स्थितियां जैसी भी हों, हर संपादक के पास एक हाशिया होता है। उस हाशिये पर आप क्या लिखते हैं वह अहम है। मैंने उसी हाशिये पर लिखने की कोशिश की।”

कल होटल कसाया इन में उन पर लिखी गई पुस्तक नवीन धुन का विमोचन हुआ। मुख्य अतिथि कमर वहीद नकवी (Qamar Waheed Naqvi) थे, जबकि विशिष्ठ अतिथि पार्थ सारथी सेन शर्मा (Partha Sarthi Sen Sharma) थे। बाकी नवीन सर से सीखने वाले और उनके समर्थकों का मजमा था।

पुस्तक की संपादक शिखा श्रीवास्तव (Shikha Srivastav) और पब्लिशर अविनाश चंद्र (Avinash Chandra) को भी इस अद्भुत प्रयास के लिए बधाई।

नवीन जोशी। एक ऐसे जादुई शख़्स जिनकी जिंदगी के पन्ने पलटिए तो पता चलता है अच्छाई आपको कितनी दूर तक ले जाती है।
नवीन सर के सक्रिय पत्रकारिता से दूर होने के एक दशक बाद उन पर किताब आई तो कई साथी दिल्ली, गोरखपुर, वाराणसी, इटावा, कानपुर तक से आए। सोशल मीडिया के इंस्टेंट युग में ये जुटान ही ताकत देती है कि मानवीय संवेदनाओं से ऊपर कुछ भी नहीं।
उन सबका शुक्रिया जो इस आयोजन का हिस्सा बने।
“नवीन धुन” आप सबको समर्पित। इस किताब का संपादन मैने किया है। आप इसे अमेजन से मंगवा सकते हैं। लिंक कमेंट बॉक्स में है।

-शिखा श्रीवास्तव


संजय सिंह-

ज़िन्दगी की आपाधापी और भागदौड़ के बीच इस रविवार को एक ऐसे कार्यक्रम में शामिल होने का अवसर मिला, जिसने मन को बहुत सुकून और तसल्ली दी।
अवसर था नवीन धुन पुस्तक के लोकार्पण का।

लखनऊ के एक निजी होटल में, वरिष्ठ और अपने समय के चर्चित संपादक आदरणीय नवीन जोशी जी पर आधारित पुस्तक “नवीन धुन” का लोकार्पण किया गया।

इस अवसर पर लखनऊ के उस दौर के तमाम संपादक, प्रबुद्ध नागरिक और वर्तमान समय के समीक्षक बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

नवीन धुन नामक पुस्तक का संपादन शिखा श्रीवास्तव जी ने किया है।
शिखा जी ने इससे पहले बुंदेलखंड की जल सहेलियों पर भी एक उत्कृष्ट पुस्तक लिखी थी।
उस पुस्तक के लेखन में उन्होंने बहुत मेहनत की थी दिन-रात लगकर सच्ची घटनाओं, कहानियों और वर्तमान में जल सहेलियों के जीवन का जीवंत चित्रण किया था।

इस नाते मुझे उनके श्रम और समर्पण की बहुत कद्र रही है।
तमाम व्यस्तताओं और समयाभाव के बावजूद मैं इस कार्यक्रम के लिए लखनऊ गया, जहाँ नवीन धुन का विमोचन हुआ।
इस अवसर पर हमारे संकट के समय साथ देने वाले अनेक साथी भी मिले जिससे मन प्रसन्न हो उठा।

ज़िन्दगी जिस रफ़्तार से भाग रही है, उसमें कई अपने शुभचिंतक भी कहीं पीछे छूट गए हैं वे लोग जिन्होंने कभी न कभी हमें गिरने से बचाया, संभलने में मदद की, और हमें बनाने में अहम भूमिका निभाई।
निश्चय ही उनकी हमसे अपेक्षाएँ होंगी, लेकिन आज के कामकाज के दबाव में शायद उन्हें उतना समय नहीं दे पाते।

जिस तरह इस कार्यक्रम में सच्चाई और जीवन्तता का चित्रण हुआ, उससे यह महसूस हुआ कि पिछले लगभग पंद्रह वर्षों में मूल्य ज़रूर गिरे हैं, और लोग अब अधिकतर अपने लिए ही जीने लगे हैं।
वह दौर अलग था जब पत्रकारिता समाज के लिए होती थी, जब लोग सच्चाई के साथ खड़े होते थे, और मेरे जैसे अनेक कार्यकर्ताओं को गढ़ने, समझने और सम्मान देने का काम करते थे।

अब व्यावसायिकता के युग में स्वार्थ सर्वोपरि हो गया है, लेकिन इस अवसर पर ऐसा लगा कि अच्छे कार्यों की हमेशा समाज में कद्र होती है और हमेशा होती रहेगी।

इस अवसर पर हमारे साथ वरिष्ठ पत्रकार अनिल शर्मा जी भी उपस्थित रहे।


रविवार को लखनऊ में था। वजह साफ थी। हमारे प्रिय संपादक नवीन जोशी जी पर तैयार पुस्तक #नवीन_धुन का लोकार्पण समारोह था। एक होटल के सभागार में उन्हें चाहने और सीखने वालों की जुटान थी। सभी की ज़ुबां पर एक ही बात थी कि ये नायाब प्रयोग है। करीब साढ़े चार सौ से अधिक पेज वाली इस पुस्तक में उनके साथ काम करने वाले साथियों ने जो संस्मरण लिखे हैं उससे लगा ये अनकहे पलों की कहानी है। किताब में एक गहरी सादगी है,न कोई अलंकरण और न ही कोई चकाचौंध। सिर्फ संवेदना का प्रवाह है शायद यही उसकी ताकत भी है।
रात जब मैं लखनऊ से बनारस के लिए ट्रेन पर सवार हुआ तो मन में एक कुलबुलाहट थी। लगा कब मौका मिले और किताब पढ़ना शुरू करूं। बर्थ पर तकिया लगाया और सिरहाने की बत्ती जलाकर शुरू हो गया। बनारस कब आया, पता ही नहीं चला। वजह पुस्तक के हर शब्द में गुजरे समय की सरसराहट थी। इसलिए कुछ देर ठहरता ,अतीत में डुबकियां लगाता और फिर से पढ़ना शुरू करता। अभी कुछ शेष है..।
समारोह के मुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार Qamar Waheed Naqvi साहब थे, जबकि विशिष्ठ अतिथि Partha Sarthi Sen Sharma थे। पुस्तक की संपादक #Shikha #Srivastav और पब्लिशर #Avinash #Chandra को भी इस अद्भुत प्रयास के लिए बहुत -बहुत बधाई।

-एके लारी


नागेंद्र प्रताप-

खास तो है यह किताब! कुछ तो खास होगा न उस संपादक में कि उसके रिटायर होने के दस साल बाद उस पर केंद्रित एक किताब प्रकाशित होती है, जिसे लिखने वाले होते हैं उसके साथ काम करने वाले कभी किसी मोड़ पर साथ रहे उसकी टीम के लोग। उसके साथ काम किए जिम्मेदार पदों वाले उसके साथी सहयात्री। वे उसके बारे में, उसके साथ अपनी यात्रा के बारे में लिखते हैं, लेकिन स्तुतिगान नहीं करते। यहां उस यात्रा के उतार-चढ़ाव हैं और इस राह में जो नया मिला उसका ईमानदार बयान। यानी पत्रकारिता की रपटीली लेकिन घुमावदार राहों के तमाम अनुभव, जिनमें संतुलित स्पीड ब्रेकर वाली सुघड़ दौड़ती सड़कें हैं, तो झटके देने और रफ्तार थामने वाले अनचाहे अनगढ़ स्पीड ब्रेकर भी। वैसे ही जैसा हम अक्सर अपनी रफ्तार की राह में बहुत खूबसूरती से आगे बढ़ती राहों पर भी प्रायः देखते हैं।

यह संपादक हैं नवीन जोशी Naveen Joshi

“नवीन धुन”… 470 पेज की इस किताब में अधिकतर लेखों, टिप्पणियों, संवादों में पत्रकारिता के बदलते कालखंडों की तस्वीर ज्यादा उभरती है। बहुत कुछ ऐसा भी है जो रेखाओं के बीच (Between the lines) पढ़े जाने की मांग करता है।

नवीन जोशी हिन्दी पत्रकारिता की हमारी दुनिया के एक ऐसे संपादक रहे हैं, जो जमात या नस्ल अब खत्म होती दिख रही है… लेकिन क्या वाकई! अगर वाकई खत्म हो गई या खत्म हो रही होती तो यह किताब कैसे आती। ऐसे में यह किताब कई तरह से आश्वस्त भी करती है…!

यह किताब पत्रकारिता की नई जमात के लिए बहुत उपयोगी है और उस जमात के लिए भी जो अभी पत्रकारिता में जिम्मेदार पदों पर हैं और जिन्हें समाज को अभी बहुत कुछ देना है। लेकिन नवीन जोशी की ही बात से बात खत्म करें तो यह भी समय का कटु सत्य लगता है कि… “अगर 2014 के बाद रिटायर हुए होते तब शायद ऐसी किताब न लिखी जाती और न छपती…!”

किताब Grey Parrot Publication से आयी है जो प्रखर पत्रकार रहे, नवीन जी और हम सबके साथ लम्बे समय तक काम किए अविनाश चंद्र Avinash Chandra का नया उद्यम है, जो उन्होंने पत्रकारिता की राह छोड़ने के बाद शुरू किया है। किताब का सम्पादन किया है शिखा एस Shikha Srivastav ने।

यह किताब इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है कि यह एक वरिष्ठ पत्रकार के सक्रिय रहते, उसके जीवनकाल में आई है जो कम से कम हिन्दी पत्रकारिता की दुनिया में तो अब तक हमने नहीं देखा। इसलिए यह एक नई शुरुआत भी है। अविनाश इसके प्रति भी आश्वस्त करते हैं।

किताब का लोकार्पण बीती शाम गोमतीनगर के होटल कसाया इन में हुआ, जहां कई शहरों से आए और अलग अलग समय में इस यात्रा के साथी बराती रहे साथी बड़ी संख्या में मौजूद थे।

अहम मौजूदगी बतौर पत्रकार लखनऊ में लंबा समय बिताने वाले ‘आज तक’ के न्यूज डायरेक्टर रहे और अभी के सर्वाधिक चर्चित यूट्यूब चैनल “सत्य हिन्दी” के संस्थापकों में से एक कमर वहीद नकवी की रही, जो इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे।

किताब कैसे मिलेगी उसके लिए आप इस link का इस्तेमाल कर सकते हैं।

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन