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वरिष्ठ पत्रकार अमरेंद्र कुमार की किताब ‘नीले आकाश का सच’ खोजी पत्रकारिता के लाइव अनुभव बयाँ करती है!

रांची : कालेज कैंपस से निकल कर पत्रकारिता के क्षेत्र में आने वाले नए छात्रों के लिए अक्सर यह सवाल होता है कि इस ‘फील्ड’ की असलियत क्या है? क्या पत्रकारिता सिर्फ वही है, जो कक्षाओं में पढ़ाई गई है या वह जो सत्ता के बंद कमरों से ‘स्कूप’ निकाल कर लाती है? अमरेंद्र कुमार की नई पुस्तक ‘नीले आकाश का सच’ इन सवालों का न केवल जवाब देती है, बल्कि पत्रकारिता के छात्रों के लिए एक अनिवार्य पाठ्य-पुस्तक की तरह सामने आती है।

छात्रों के लिए क्यों जरूरी है यह किताब?

  1. इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग/जर्नलिज्म का ‘लाइव’ अनुभव
    लेखक ने बिहार के बहुचर्चित चारा घोटाले (पशुपालन घोटाला) के उन पहलुओं को उजागर किया है, जो फाइलों में दबे रह गए थे। पत्रकारिता के छात्र अक्सर थ्योरी पढ़ते हैं, लेकिन यह किताब बताती है कि एक ‘टिप’ से लेकर ‘एफआईआर’ तक का सफर कैसे तय होता है। इसमें बताया गया है कि कैसे साक्ष्यों को जुटाया जाता है और दबाव के बावजूद खबर पर टिके रहा जाता है।
  2. ‘सचिवालय का सच’: बीट रिपोर्टिंग का पाठ
    लेखक का चर्चित कॉलम ‘सचिवालय का सच’ इस बात का उदाहरण है कि कैसे विभागों की कार्यप्रणाली को समझा जाता है। छात्रों के लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि ब्यूरोक्रेसी में कौन-सा अधिकारी जानकारी दे सकता है और ‘असंतोष’ को खबर में कैसे बदला जाता है।
  3. नैतिकता और निष्पक्षता की कसौटी
    आज के दौर में जब पत्रकारिता पर पक्षपाती होने के आरोप लग रहे हैं, यह किताब सिखाती है कि ‘तनी हुई रस्सी’ पर चलते हुए निष्पक्ष कैसे रहा जाए। रशीद किदवई के अनुसार, अमरेंद्र कुमार ने न केवल तटस्थ भाव से घटनाओं को प्रस्तुत किया है, बल्कि खुद को निष्पक्ष दिखाने में भी कामयाब रहे हैं।
  4. डॉक्यूमेंटेशन की ताकत
    किताब यह स्पष्ट करती है कि बिना दस्तावेजों के खोजी पत्रकारिता संभव नहीं है। चारा घोटाले में ऑडिट पेपर्स और फर्जी बिलों के माध्यम से कैसे लूट हुई, इसका विवरण छात्रों को डेटा और साक्ष्यों के महत्व को समझने में मदद करता है।

इस पुस्तक में सीखने लायक: कैसे एक पत्रकार को अपनी आँखों और कानों को खुला रखना चाहिए। लेखक ने बताया कि कैसे एक अधिकारी के मुँह से निकली एक छोटी सी बात ने उन्हें बड़े घोटाले तक पहुंचा दिया।

चुनौती: यह किताब उन संघर्षों को भी दिखाती है जहां पत्रकार को अपनी पहचान बनाने के लिए चप्पलें घिसनी पड़ती हैं।

पुस्तक: नीले आकाश का सच
लेखक: अमरेंद्र कुमार (वरिष्ठ पत्रकार, वर्तमान में दैनिक भास्कर के झारखंड ब्यूरो चीफ)
प्रकाशक: विद्या बिहार प्रभात प्रकाशन, दिल्ली

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