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न्यूज चैनल देखते हुए डर लगता है कि इतनी चिल्लपों में अपनी ही तबीयत खऱाब न हो जाए!

अमिता नीरव-

टीवी देखना कई सालों से छोड़ दिया है, न्यूज चैनल देखते हुए डर लगता है कि कहीं इतनी चिल्लपों में अपनी ही तबीयत खऱाब न हो जाए। मगर जाकर भी कहाँ जाएँगे, रहेंगे तो इसी दुनिया में तो न्यूज चैनल्स की अलग-अलग तरह की क्लिपिंग यहाँ देखने को मिलती ही रहती है।
अभद्र बहसें, गाली-गलौच, हाथा-पाई और कभी-कभी मारपीट तक की क्लिपिंग देखकर लगता है सही ही किया जो टीवी देखना छोड़ दिया। लेकिन कई बार इस बात पर अचरज होता है कि जिन शोज में मेहमानों को बोलने नहीं दिया जाता, अभद्रता की जाती है, उन शोज में मेहमान पहुँचते ही क्यों हैं?

कई बार ऐसी क्लिप्स भी देखी, जिसमें न जाने कहाँ से मौलवी औऱ पंडित पकड़कर लाए जाते हैं और बेसिर-पैर की बातों पर एक-दूसरे के साथ बदतमीजी करते हैं। स्क्रीन इतनी गरम हो जाती है कि उससे धुआँ निकलने लगता है।

RSS विचारक राकेश सिन्हा ने एक कार्यक्रम में बताया कि 2016 में एक बार फोन पर न्यूज़ एंकर ने कहा कि आप बहुत शांत रहते हैं आपको पैनलिस्ट से लड़ना है। शो हिट जाएगा। आप भी ट्रेंड करेंगे हम भी ट्रेंड करेंगे। उन्हें कहा गया कि आप मुसलमानों की दाढ़ी और टोपी पर अभद्र बात कहें।

पाकिस्तानी पत्रकार हामिद मीर की एक रील है, जिसमें वे कहते हैं, “मुझे बहुत से पाकिस्तानी पत्रकारों और राजनेताओं ने बताया कि अर्नब गोस्वामी ने हमें पैसे देकर इंडिया को गाली निकालने लिए कहा है। हम इंडिया के खिलाफ गाली निकालते हैं और हमें बहुत पैसे मिलते हैं. इससे चैनल की टीआरपी बढ़ती है।”

धीरे-धीरे समझ में आया कि इसके पीछे पैसा तो खैर एक वजह है ही, लेकिन दूसरी वजह ज्यादा वजनदार है और वो है वायरल होने या ट्रैंड में होने का लालच। यहाँ भी मैंने कई लोगों को विवादास्पद पोस्ट लिखते देखा है और देखते-देखते उन्हें इंफ्लूएंसर होते भी देखा है।

किसी वक्त में विवाद पैदा करने वालों की बातों को कोई गंभीरता से नहीं लेता था, इन दिनों विवादास्पद बयान देने वालों की खासी पूछ-परख है। दो दिन से किसी नामालूम से मौलवी का बयान कि ‘यदि भारत औऱ ईरान के बीच जंग होगी तो भारतीय मुसलमान ईरान का साथ देगा’, इसे कई लोगों ने अपनी वॉल पर लगाया।

इसी तरह निशिकांत दुबे जैसे जाहिल आदमी के हर दिन दिए जाने वाले मूर्खतापूर्ण बयानों को हम अपनी वॉल पर जगह देते हैं, चाहे आलोचना करने के उद्देश्य से ही सही। असल में ये इन्हीं को प्रचार देना है। पहले भी लिख चुकी हूँ कि हम अनचाहे ही सत्ता के हाथों में खेलने लगे हैं।

आप सोचिए कि उस मौलवी के बयान को दक्षिणपंथी, मुसलमानों की फितरत की तरह जगह-जगह इस्तेमाल करेंगे। जबकि ऐसे मूर्खतापूर्ण बयान देश के जिम्मेदार पदों पर बैठे हुए लोग दिन में दस देते हुए मिलते हैं। हम उन्हें हाथोंहाथ लेते हैं और यही उनका मकसद है।

मैं पहले भी कह चुकी हूँ, आप चाहे जिस उद्देश्य से वाहियात बयानों को अपनी वॉल पर जगह दे रहे हों, मगर आप न चाहते हुए उन चीजों का प्रचार कर रहे हैं, हकीकत में आप जिनके खिलाफ खड़े हैं। आप इस्तेमाल हो रहे हैं और आप इसे समझ ही नहीं रहे हैं।

इस तरह आप अपनी लड़ाई में खुद ही खुद के खिलाफ खड़े हो जाते हैं। लिखने को यूँ ही जिम्मेदारी नहीं कहा जाता है।

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