न्यूज़ चैनलों की चमक-दमक के पीछे एक ऐसी सच्चाई भी छुपी है, जिस पर शायद ही कभी खुलकर बात होती है—कर्मचारियों की सैलरी और उनके वर्षों से रुके हुए इन्क्रीमेंट। हर साल मार्च आते-आते, जब वित्तीय वर्ष समाप्ति की ओर होता है, कर्मचारियों के मन में एक उम्मीद जागती है—शायद इस बार मेहनत का कुछ फल मिलेगा, शायद इस बार सैलरी में बढ़ोतरी की घोषणा होगी।
लेकिन पिछले 4-5 वर्षों से यह उम्मीद सिर्फ उम्मीद बनकर रह गई है।
मार्च खत्म होता है, अप्रैल की शुरुआत होती है, और फिर अप्रैल के आखिरी सप्ताह तक आते-आते कर्मचारियों को यह एहसास होने लगता है कि इस बार भी कुछ नहीं बदलने वाला। वही सन्नाटा, वही इंतज़ार, और वही ‘खामोशी’।
इस खामोशी का असर सिर्फ कर्मचारियों के मनोबल पर ही नहीं, बल्कि उनके जीवन पर भी पड़ रहा है। पिछले पांच वर्षों में महंगाई लगभग दोगुनी हो चुकी है। किराया, बिजली, बच्चों की पढ़ाई, रोजमर्रा की जरूरतें—सब कुछ महंगा हो गया है। लेकिन सैलरी वहीं की वहीं अटकी हुई है।
न्यूज़ चैनलों में काम करने वाले कर्मचारी, जो दिन-रात देश-दुनिया की खबरों को दर्शकों तक पहुंचाते हैं, खुद अपनी ही जिंदगी की ‘खबर’ में पीछे छूटते जा रहे हैं। विडंबना यह है कि जहां चैनल्स नए स्टूडियो, नई टेक्नोलॉजी और बड़े-बड़े इवेंट्स पर खर्च कर रहे हैं, वहीं कर्मचारियों के इन्क्रीमेंट जैसे बुनियादी मुद्दे को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है।
अब इसका एक और गंभीर असर सामने आ रहा है—कर्मचारियों का लगातार नौकरी छोड़ना। पिछले कुछ महीनों में कई कर्मचारी या तो नोटिस पीरियड देकर जा रहे हैं, या फिर बिना नोटिस के ही इस्तीफा दे रहे हैं। यह सिर्फ कर्मचारियों की व्यक्तिगत मजबूरी नहीं, बल्कि सिस्टम से बढ़ती निराशा का संकेत है।
दिलचस्प और चिंताजनक बात यह है कि जिन पदों पर पुराने कर्मचारियों को सालों से इन्क्रीमेंट नहीं दिया गया, उन्हीं पदों पर नए लोगों की भर्ती अधिक सैलरी (हाइक) के साथ की जा रही है। इससे पुराने कर्मचारियों में असंतोष और भी बढ़ रहा है। उन्हें लगने लगा है कि उनकी मेहनत और वफादारी की कोई कीमत नहीं है।
इस स्थिति का सीधा असर कंपनी पर भी पड़ रहा है—अनुभवी लोगों के जाने से काम की गुणवत्ता प्रभावित होती है, टीम का संतुलन बिगड़ता है, और नए लोगों को ट्रेन करने में समय और संसाधन दोनों खर्च होते हैं।
कई कर्मचारी अब खुलकर कहने लगे हैं कि उनकी उम्मीदें धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं। जो लोग कभी अपने करियर को लेकर उत्साहित थे, अब वे सिर्फ नौकरी बचाए रखने की मजबूरी में काम कर रहे हैं। यह स्थिति न केवल व्यक्तिगत स्तर पर बल्कि पूरे मीडिया इंडस्ट्री के लिए चिंता का विषय है।
- क्या यह ‘खामोशी’ कभी टूटेगी?
- क्या मैनेजमेंट कभी कर्मचारियों की वास्तविक समस्याओं को समझेगा?
- या फिर हर साल की तरह यह उम्मीद भी अगले साल के मार्च तक टलती रहेगी?
समय आ गया है कि इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार किया जाए। क्योंकि अगर कर्मचारी ही निराश हो जाएंगे, तो न्यूज़ चैनलों की असली ताकत भी कमजोर पड़ जाएगी। खामोशी सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि आज न्यूज़ इंडस्ट्री के हजारों कर्मचारियों की सच्चाई बन चुकी है।
नोएडा स्थित एक न्यूज़ चैनल के कर्मचारी द्वारा भेजे गए इनपुट पर आधारित



