
संजय कुमार सिंह
निशिकांत दुबे जब मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ ‘मन की बात’ कर चुके हैं तो बाकी किसी की क्या हैसियत। उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ राष्ट्रपति का बचाव करने आगे आये तो भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ मन की बात कर दी। भले ही कल मैंने लिखा था कि उनके बयान से भाजपा अध्यक्ष का पल्ला झाड़ लेना हेडलाइन मैनेजमेंट का हिस्सा था पर भाजपा अध्यक्ष को इसकी जरूरत पड़ी तो इसलिए भी कि बयान ऐसा ही था। भाजपा अध्यक्ष (जो केंद्रीय मंत्री भी हैं और कार्यकाल पूरा होने के बावजूद पद पर हैं क्योंकि पार्टी अपने अगले अध्यक्ष का चुनाव नहीं कर पा रही है) ने कहा था, “निशिकांत दुबे के विचार उनके निजी हैं, पार्टी का इससे कोई लेना-देना नहीं है।” इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार, नड्डा ने कहा था, “भाजपा सांसद निशिकांत दुबे और दिनेश शर्मा द्वारा न्यायपालिका और सीजेआई पर दिए गए बयानों से भाजपा का कोई लेना-देना नहीं है। ये उनके निजी बयान हैं, लेकिन भाजपा न तो ऐसे बयानों से सहमत है और न ही कभी ऐसे बयानों का समर्थन करती है। भाजपा इन बयानों को पूरी तरह से खारिज करती है।” यही नहीं, नड्डा ने यह भी कहा था, “भाजपा ने हमेशा न्यायपालिका का सम्मान किया है और उसके आदेशों तथा सुझावों को सहर्ष स्वीकार किया है, क्योंकि एक पार्टी के तौर पर हमारा मानना है कि सुप्रीम कोर्ट समेत देश की सभी अदालतें हमारे लोकतंत्र का अभिन्न अंग हैं और हमारे संविधान की रक्षा करने वाला मजबूत स्तंभ हैं। मैंने उन दोनों और बाकी सभी को इस तरह के बयान न देने की हिदायत दी है।”
इसके बावजूद आज (मेरे आठ अखबारों में सिर्फ) हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम की खबर है, भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी पर अपनी टिप्पणी से नया विवाद खड़ा किया। कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपा के उनके बयान से पल्ला झाड़ने और भाजपा अध्यक्ष की हिदायत के बावजूद सांसद का नया बयान पहले जैसा मामला नहीं है और इसलिए सिंगल कॉलम की खबर नहीं है। इससे संबंधित और भी बहुत सारी खबरें आज पहले पन्ने पर नहीं हैं जबकि भाजपा के पल्ला झाड़ने और कथित हिदायत के बावजूद दोबारा वैसी ही हरकत करना साधारण नहीं है और जैसा मैंने कहा था, हेडलाइन मैनेजमेंट का हिस्सा है। तो क्या इस खबर को पहले पन्ने पर नहीं छापना भी हेडलाइन मैनेजमेंट हो सकता है? इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता है लेकिन एक सांसद ने पहले मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ टिप्पणी की और फिर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सांप्रदायिक टिप्पणी की तो मामला गंभीर हो जाता है। पर आज यह खबर किसी अखबार में वैसे नहीं है जैसे होनी चाहिये। दि एशियन एज ने पहले पन्ने पर दो कॉलम की एक खबर जरूर छापी है जिसका शीर्षक है, भाजपा से कांग्रेस ने कहा मुख्य न्यायाधीश की आलोचना के लिए दो सांसदों के खिलाफ कार्रवाई कीजिये।
एबीपीलाइव डॉट कॉम के अनुसार, कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा है कि भाजपा अध्यक्ष का स्पष्टीकरण डैमेज कंट्रोल के अलावा कुछ नहीं है। इससे कोई मूर्ख नहीं बनेगा यह एंटायरपॉलिटिकल साइंस नहीं बल्कि एंटायर पॉलिटिकल हिप्पोक्रेसी की मिसाल है। उन्होंने कहा कि निवर्तमान भाजपा अध्यक्ष ने उच्च संवैधानिक पद पर बैठे अपनी ही पार्टी के एक विशिष्ट और वरिष्ठ सदस्य द्वारा न्यायपालिका पर बार-बार की जा रही अस्वीकार्य टिप्पणियों पर पूरी तरह चुप्पी साध रखी है। क्या इन टिप्पणियों पर उनका कोई मत नहीं है? क्या भाजपा इन बयानों का समर्थन करती है? कहने की जरूरत नहीं है कि इनके बाद भी बेलगाम रहना, सांप्रदायिक टिप्पणी करना आम नहीं है और इसलिए खबर तो बड़ी है। लेकिन इसमें भाजपा फंसी दिख रही है तो इसे नहीं छापना निश्चित रूप से हेडलाइन मैनेजमेंट हो सकता है। अगर संविधान पर इस तरह के निरंतर हमलों को प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी की मौन स्वीकृति नहीं है तो इस सांसद के ख़िलाफ़ कड़े कदम क्यों नहीं उठा रहे? क्या नड्डा जी ने इन्हें कारण बताओ नोटिस दिया है?
ऐसे में निशिकांत दुबे ने अब चुनाव आयुक्त के लिए जो कहा है उसकी खबर भी साधारण नहीं हो सकती। जैसी होनी चाहिये उसका एक उदाहरण आज द टेलीग्राफ की लीड है। नई दिल्ली डेटलाइन से जेपी यादव की बाईलाइन वाली इस खबर का शीर्षक भी बहुत कुछ बोलता है जो न जाने क्यों जर्नलिज्म ऑफ करेज का दावा करने वाले इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस को भले संघ समर्थक अखबार माना जाता है पर वहां काम करते हुए मैंने देखा था कि ऐसे निर्णय ऊपर से थोपे नहीं जाते हैं और हमलोगों को इस मामले में पूरी आजादी होती थी। इसीलिए मैं कहता रहा हूं कि जनसत्ता का पन्ना देखकर हमलोग समझ जाते थे कि किसने बनाया होगा या कौन ड्यूटी पर था। ऐसे में इस खबर का पहले पन्ने पर नहीं होना बताता है यह उसका निर्णय होगा जो कल रात एडिशन निकाल रहा था। मैं होता तो ढूंढ़कर इस खबर को (नहीं होती तो एजेंसी की सूचनाओं से खुद बनाकर) पहले पन्ने पर छापता और इसका कारण ऊपर बता चुका हूं। इस उदाहरण से मैं कहना और बताना चाहता हूं कि इंडियन एक्सप्रेस में आज यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है तो ऐसा डेस्क पर संघ समर्थक प्रचारकों की मौजूदगी के कारण हो सकता है जिन्हें पाठक नहीं जानते हैं। संपादक ड्यूटी लगाते समय इसका ख्याल जरूर रख सकते हैं। पर वह अलग मामला है।
द टेलीग्राफ का आज का शीर्षक इस प्रकार है, “जो भाजपा नहीं कर सकती, वह निशिकांत दुबे कर सकते हैं: एक बदमाश (अंग्रेजी में हैचेटमैन लिखा है जो हिन्दी में सिर्फ बदमाश नहीं, लठैत जैसा कुछ होगा) का वह भयावह रिकॉर्ड, जिस पर पार्टी दांव लगाती है। सुप्रीम कोर्ट से लेकर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी और पूर्व में टीएमसी नेता महुआ मोइत्रा तक, दुबे ने किसी को नहीं बख्शा है। भाजपा के लोकसभा सदस्य निशिकांत दुबे ने रविवार को पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी पर सांप्रदायिक टिप्पणी करते हुए कहा कि वह “चुनाव आयुक्त” नहीं बल्कि “मुस्लिम आयुक्त” थे। चार बार के सांसद, जिन्हें व्यापक तौर पर भाजपा नेतृत्व का लठैत (यहां गोलीबाज या गालीबाज भी कह सकते हैं) माना जाता है, ने शनिवार को सर्वोच्च न्यायालय पर “देश में धार्मिक युद्ध भड़काने” का आरोप लगाया था। इससे दो दिन पहले ही न्यायालय ने वक्फ संशोधन अधिनियम के कुछ प्रावधानों पर सवाल उठाये थे। रविवार को भाजपा के लोकसभा सदस्य निशिकांत दुबे ने पूर्व चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी पर सांप्रदायिक टिप्पणी की। कुरैशी पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि वह ‘चुनाव आयुक्त’ नहीं बल्कि ‘मुस्लिम आयुक्त’ रहे हैं। चार बार के सांसद, जिन्हें व्यापक रूप से भाजपा नेतृत्व का गालीबाज माना जाता है, ने शनिवार को सर्वोच्च न्यायालय पर ‘देश में धार्मिक युद्ध भड़काने’ का आरोप लगाया तो पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा से चेतावनी मिली थी। लेकिन एक दिन बाद ही दुबे ने सांप्रदायिक टिप्पणी कर दी। इससे यह धारणा मजबूत हुई कि इस तरह की फटकार आंखों में धूल झोंकने वाली है और बड़बोले सांसद को वह कहने का लाइसेंस है जो भाजपा आधिकारिक तौर नहीं कहना चाहती है। हालांकि, नरेन्द्र मोदी पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह को जेम्स माइकल लिंगदोह करके वही करते थे जो संविधान का ख्याल करते हुए किया जा सकता है। भाजपा अब सत्ता में है तो कार्रवाई सरकार को ही करनी है और हम देख रहे हैं कि कार्रवाई की बजाय लोगों को तरक्की मिलती रही है।
ऐसे में झारखंड के गोड्डा से सांसद निशिकांत दुबे ने कुरैशी द्वारा 17 अप्रैल को एक्स पर किए गए एक पोस्ट के जवाब में कहा, ‘आप चुनाव आयुक्त नहीं थे, आप एक मुस्लिम आयुक्त थे। कुरैशी ने अपनी पोस्ट में वक्फ कानून की आलोचना की थी। दुबे ने दावा किया कि भारत हिंदुओं और उनसे जुड़े “आदिवासियों, जैनियों और बौद्धों” का है। उन्होंने कुरैशी को देश को एकजुट करने और विभाजित न करने की सलाह दी। अपने गृह राज्य हिमाचल प्रदेश के दौरे पर गए नड्डा ने रविवार देर शाम तक कुरैशी पर दुबे के हमले पर कुछ नहीं कहा था। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर, भगवा इको सिस्टम ने दुबे के समर्थन में आवाज़ उठाई। कुरैशी की 17 अप्रैल की पोस्ट में कहा गया था कि नया वक्फ अधिनियम “निस्संदेह मुस्लिम भूमि हड़पने के लिए सरकार की एक संदिग्ध / बुरी योजना है”। कुरैशी ने कहा, “मुझे यकीन है कि सुप्रीम कोर्ट इसे स्पष्ट करेगा। शरारती प्रचार मशीन द्वारा गलत सूचना ने अपना काम बखूबी किया है।” शनिवार को समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए दुबे ने कहा था: “देश में धार्मिक युद्धों को भड़काने के लिए सुप्रीम कोर्ट जिम्मेदार है। सुप्रीम कोर्ट अपनी सीमाओं पार कर रहा है।” कुछ घंटों बाद, नड्डा ने दुबे की टिप्पणी और पार्टी के एक अन्य सांसद के सुप्रीम कोर्ट पर हमले से पार्टी को अलग कर दिया और कहा कि ये “व्यक्तिगत क्षमता” में किए गए थे। इस बारे में आप ऊपर पढ़ चुके हैं।
यह खबर आज हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों नवोदय टाइम्स और अमर उजाला में पहले पन्ने पर नहीं है। सरकार का प्रचार करने वाली खबरों को कैसे पहले पन्ने पर तान दिया जाता है वह मैं रोज यहां बताता हूं। प्रधानमंत्री का चुनावी भाषण देश में कहीं हो, कुछ भी हो अक्सर दिल्ली में पहले पन्ने पर रहता है लेकिन खरगे का भाषण खबर नहीं है। सिर्फ नवोदय टाइम्स ने छापा है, नेशनल हेराल्ड मामला डराने के लिए खरगे। पर यह किसी और अखबार में पहले पन्ने पर नहीं है। ऐसा नहीं है कि आज पहले पन्ने पर जनहित की क्रांतिकारी खबरें छपी हुई हैं। इसके अलावा, आज एक दिलचस्प खबर द हिन्दू में है। इस खबर के अनुसार वंदे भारत ट्रेन में बचाव की प्रणाली कमजोर है और इस कारण गाय (भैंस, बैल समेत) से टकराने और कुचलने की स्थिति में भी गंभीर दुर्घटना हो सकती है। यह जानकारी रेलवे सुरक्षा पर एक रिपोर्ट में दी गई है। द हिन्दू ने इस रिपोर्ट के हवाले से लिखा है कि वंदे भारत ट्रेन के लीडिंग कोच आम ट्रेन के लोकोमोटिव के मुकाबले बहुत हल्के हैं और इसलिए किसी भी बाधा से टकराने अथवा मवेशी के कुचल जाने की स्थिति में तेज रफ्तार होने पर गंभीर दुर्घटना हो सकती है। रेल सुरक्षा आयुक्त की रिपोर्ट बताती है कि तेज रफ्तार ट्रेन के परिचालन के लिए रेलवे को सुरक्षा के क्या उपाय करने चाहिये। इसके तहत रेल मंत्रालय से कहा गया है कि जिन मार्गों पर 160 किलोमीटर प्रति घंटा के रफ्तार से ट्रेन चलाई जानी है वहां रेल समपार खत्म किये जाएं तथा रेल लाइन के दोनों ओर मजबूर बाड़ / दीवार सुनिश्चित की जाये जिससे मनुष्यों और जानवरों के टकराने का खतरा नहीं रहे। यहां यह महत्वपूर्ण है कि खुलासा रेल सुरक्षा आयुक्त ने किया है और ट्रेन लंबे समय से चल रही है या जोखिम उठा रही है।
जहां तक रेल दुर्घटना की बात है, होती रही हैं और वंदे भारत की भी हुई है। इंजन का नाक टूट जाने की आलोचना भी हुई है पर यह जानकारी अब आ रही है और वह भी द हिन्दू की एक्सक्लूसिव खबर है, सरकार ने नहीं दी है। जो भी हो, हम जानते हैं कि रेल दुर्घटनाओं की जांच पहले रेल सुरक्षा आयुक्त करते थे और तमाम दुर्घटनाओं के तुरंत बाद अखबारों में यह विज्ञापन दिखता रहा है कि फलां दुर्घटना की जांच रेल सुरक्षा आयुक्त कर रहे हैं जिसके पास कोई जानकारी हो वह उन्हें दे। नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में खबर आती है कि दुर्घटना की जांच सीबीआई करेगी क्योंकि सरकार को हर दुर्घटना के बाद साजिश की आशंका होती थी। सीबीआई की जांच रिपोर्ट क्या रही, साजिश का आधार क्या था और जांच में क्या मिला तथा रेल सुरक्षा आयुक्त की जांच हुई या नहीं और उसका क्या नफा-नुकसान रहा यह सब बताया कभी नहीं गया। अगर तेज रफ्तार ट्रेन चलाने के लिए समपार खत्म किया जाना जरूरी है तो नई ट्रेन का उद्घाटन करके प्रचार करने की जगह समपार खत्म करने के लिए काम किया जाना चाहिये था और ट्रेन का परिचालन शुरू किये जाने से पहले इसे सुनिश्चित किया जाना चाहिये था। इंडियन एक्सप्रेस में आज एक खबर है जो बताती है कि आईसीएचआर (इंडियन कौंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च) के सरकारी ऑडिट और पूर्व सदस्य व सचिव के खिलाफ वित्तीय अनियमितताएं मिली हैं जिन्हें रेखांकित किया गया है। दिल्ली के अखबारों में कल एक बिल्डिंग गिरने से 11 लोगों की मौत की खबर लीड थी टाइम्स ऑफ इंडिया ने बताया था कि पुलिस ने लापरवाही का मामला दर्ज किया था। टाइम्स ऑफ इंडिया ने आज बताया है कि बिल्डिंग के भूतल पर दुकानें थीं और दीवार तोड़कर एक बनाया जा रहा था। अखबार ने इसे कारण होने की आशंका बताई है लेकिन मुस्तफाबाद की यह बिल्डिंग किसी तहसीन की थी और जो दुकान बड़ी की जा रही थी वह मांस की थी। इसलिये संभव है कि मामला सही भी हो गढ़ा हुआ हो क्योंकि देश के तमाम इलाकों में बिल्डिंग ऐसे ही बनती गिरती रही है। ऐसी एफआईआर कम सुनाई पड़ी है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने फॉलोअप किया है जो नई बात है वरना अब फॉलोअप का रिवाज खत्म होता लग रहा है।


