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उत्तर प्रदेश

नोएडा हिंसा मामले में TOI का बड़ा खुलासा, एक एसआई और डीसीपी के ड्राइवर ने बुना बवाल का तानाबाना!

Newspaper front page article about protests and arrests, with a small photo of two men under the headline; caption mentions alleged custodial torture.

टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) में प्रकाशित एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि नोएडा में मजदूर आंदोलन के दौरान हिंसा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार किए गए एक्टिविस्टों ने सुप्रीम कोर्ट में उत्तर प्रदेश पुलिस के दावों को चुनौती दी है। एक्टिविस्टों की ओर से कहा गया है कि प्रदर्शनकारियों को उकसाने वाले जिन व्हाट्सऐप संदेशों और पोस्ट का हवाला पुलिस दे रही है, वे दरअसल एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर और डीसीपी के ड्राइवर द्वारा पोस्ट किए गए थे।

रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल में हुई मजदूरों की हिंसक झड़प और आगजनी मामले में गिरफ्तार दो एक्टिविस्टों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जवाब में कहा गया है कि सड़क जाम करने और कार जलाने से जुड़े स्क्रीनशॉट “रिचा ग्लोबल नोएडा” नामक व्हाट्सऐप ग्रुप में पोस्ट किए गए थे। इस जवाब में दावा किया गया है कि ये पोस्ट सेक्टर-142 में तैनात एसआई बीना और डीसीपी के ड्राइवर अनिल कुमार द्वारा किए गए थे।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील मणिक गुप्ता और पूजा शर्मा ने कोर्ट में दाखिल दस्तावेजों में कहा कि पुलिस ने इन पोस्टों को एक्टिविस्टों से जोड़कर उन्हें फंसाने की कोशिश की।

यह याचिका इंजीनियर आदित्य आनंद और ट्रेड यूनियन एक्टिविस्ट रूपेश रॉय की ओर से दाखिल की गई है। दोनों ने हिरासत में प्रताड़ना का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। आदित्य आनंद को 18 अप्रैल और रूपेश रॉय को 11 अप्रैल को गिरफ्तार किया गया था।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अन्य गिरफ्तार लोगों में लखनऊ निवासी अनुवादक और पत्रकार सत्याम वर्मा भी शामिल हैं, जो ‘मजदूर बिगुल’ पत्रिका के लिए लिखते हैं। साथ ही डीयू की छात्रा आकृति चौधरी का नाम भी सामने आया है। आकृति चौधरी ने जमानत की मांग की है, जबकि सत्याम वर्मा की पत्नी ने उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों की सीबीआई जांच की मांग की है।

पुलिस ने इन सभी पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत कार्रवाई की है। पुलिस का दावा है कि आठ व्हाट्सऐप और टेलीग्राम ग्रुप — जिनमें “रिचा ग्लोबल नोएडा”, “Against Labour Code”, “Hundred Flowers Group”, “Progressive Artists League Group”, “SFS Air Pollution Group”, “X-Storms”, “Naujawan Bharat Sabha” और “Bigul Media” शामिल हैं — के जरिए मजदूर आंदोलन को भड़काने वाले संदेश प्रसारित किए गए।

हालांकि एक्टिविस्टों की ओर से कोर्ट में कहा गया कि ये ग्रुप पुराने सामाजिक और वैचारिक चर्चा समूह हैं, जिनमें छात्र, शोधकर्ता, शिक्षक और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं। उनका कहना है कि इन समूहों का मजदूर आंदोलन की हिंसा से कोई संबंध नहीं है।

रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने अपनी अतिरिक्त एफिडेविट में दावा किया है कि नोएडा हिंसा की जड़ें दिल्ली के करावल नगर में 22 मार्च को आयोजित एक कार्यक्रम से जुड़ी हैं। यह कार्यक्रम भगत सिंह युवा केंद्र में आयोजित हुआ था, जिसमें कथित रूप से हरियाणा और नोएडा में मजदूर आंदोलन को तेज करने की रणनीति पर चर्चा हुई थी।

हालांकि याचिकाकर्ताओं ने इस दावे को भी खारिज किया है। उनका कहना है कि यह कार्यक्रम एक सार्वजनिक उद्घाटन समारोह था, जिसमें गरीब और वंचित बच्चों के लिए चलाए जा रहे शैक्षणिक कार्यक्रम से जुड़े लोग शामिल हुए थे। कार्यक्रम में बच्चों ने पेंटिंग, शतरंज और क्विज प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था।

सामाजिक कार्यकर्ता प्रियंवदा ने भी टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में कहा कि कार्यक्रम में बच्चों की गतिविधियां आयोजित हुई थीं और वहां किसी तरह की हिंसा भड़काने वाली चर्चा नहीं हुई।


अभिषेक उपाध्याय-

नोएडा पुलिस एक बार फिर से चर्चा में। नोएडा श्रमिक प्रतिरोध मामले में सुप्रीम कोर्ट के आगे बयां की गई पुलिस हिरासत में हुई मारपीट की गवाही। आरोपी आदित्य और रुपेश ने सुप्रीम कोर्ट के आगे पेश होकर बयान की पूरी कहानी। सुप्रीम कोर्ट का निर्देश। मज़दूरों से न हो दुर्व्यवहार।

Amar Ujala news page header with Hindi headline: Noida Protest: यूपी पुलिस को सुप्रीम कोर्ट का निर्देश—कानून अपना काम करेगा
Hindi news article screenshot from amarujala.com with a bold headline and body text about a court case, shown in Devanagari script.

इस बीच, सुप्रीम कोर्ट में नोएडा हिंसा मामले में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट देखें। नोएडा पुलिस द्वारा कस्टडी में टॉर्चर की कहानी बयान करने के लिए, सुप्रीम कोर्ट में पेश नोएडा हिंसा के दो आरोपियों रुपेश रॉय और आदित्य आनंद के वकीलों का चौंकाने वाला खुलासा। उनके मुताबिक नोएडा पुलिस ने हिंसा के लिए मज़दूरों के जिन व्हाट्सएप ग्रुप को ज़िम्मेदार ठहराया है, उन व्हाट्सएप ग्रुप में ख़ुद नोएडा पुलिस ने हिंसा भड़काने वाले मैसेज डाले। जलती कार के वीडियो डाले। रोड ब्लॉक करने के लिए आह्वान किया।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के आगे वो चैट रख दी हैं जो एक SI और एक DCP के ड्राइवर की ओर से भेजी गई थी। जिसमें हिंसा भड़काने वाले संदेश थे। उल्टा मज़दूरों की ओर से इन संदेशों की ख़िलाफ़त की गई। शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के लिए कहा गया। ये बेहद चौंकाने वाले खुलासा है। सुप्रीम कोर्ट को चाहिए कि अपनी मॉनिटरिंग में इस मामले की CBI जांच करवाए। नोएडा हिंसा के चंगुल में फँसे या फँसाए गए ग़रीब गुरबों के लिए ही दुष्यंत कुमार लिख गए है-
“वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है
माथे पे उस के चोट का गहरा निशान है।”

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