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आज के अखबार : पचास हजार रुपये की खबर को 20,000 करोड़ रुपये की खबर से ज्यादा फुटेज मिला

संजय कुमार सिंह

संसद में राज्य सभा की एक सीट के नीचे 500 रुपए के नोटों का एक बंडल मिला और इस पर इतना विवाद खड़ा कर दिया गया है कि वह आज मेरे सभी अखबारों के पहले पन्ने पर है। अमर उजाला अपवाद है। मुझे नहीं लगता है कि संसद में 500 रुपये के अधिकतम 100 नोटों का बंडल मिलना इतना बड़ा मामला है कि उपराष्ट्रपति इसकी चर्चा करें, अपनी जिम्मेदारी मानें या अखबारों के पहले पन्ने पर छपे। अगर नोट पाकिस्तानी या नकली होता तो भी बात समझ में आती है कि विवाद हो सकता था। नोट के बंडल की जगह कंडोम या पुरुश सदस्य की सीट के नीचे सैनिटेरी नैपकिन होता तो भी बात समझ में आती लेकिन 50,000 रुपये या पांच सौ के करीब 100 नोट अगर राज्यसभा के किसी सदस्य के हैं और वो गिर गये या छूट गये तो कौन सी बड़ी बात हो गई।  राज्यसभा सदस्यों के वेतन के मुकाबले ना ही यह राशि इतनी बड़ी है कि किसी का ले जाना आश्चर्य माना जाये और ना ही इतनी कम है कि उसपर शर्म किया जाये। ऐसे में अगर कोई ले गया था और वह छूट गया या गिर गया तो कोई बड़ी बात नहीं है जिसका है वह बतायेगा तो उसे वापस दे दिया जाये या सुरक्षा कर्मयों को दे दिया जाये। जो भी हो, मामला इतना बड़ा नहीं है। खास कर तब जब अदाणी की कंपनियों में 20,000 करोड़ रुपये के बराबर का निवेश किसका है यह उन्हें पता नहीं है, सेबी को पता नहीं चल रहा है पता करने में सरकार की दिलचस्पी नहीं है आदि आदि।

अदाणी के मामले इस मूल और सबसे बड़े मामले से अलग हैं। राज्यसभा में पचास हजार रुपये में यह बवाल अदाणी पर चर्चा या उसकी मांग से ध्यान हटाने के लिए हेडलाइन मैनेजमेंट का काम तो कर ही रहा है। 20,000 करोड़ का अदाणी का यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है कि नरेन्द्र मोदी ने 2014 से पहले आरोप लगाया था कि कांग्रेस शासन में भ्रष्टाचार से कमाया गया पैसा स्विस बैंकों में रखा है और विदेशी शेल कंपनियों के जरिये भारत में निवेश किया जाता है। नरेन्द्र मोदी स्विस बैंक में रखा पैसा 100 दिन में वापस लाने वाले थे सबको 15 लाख मिलने थे और 50 दिन में सपनों का भारत बनना था। काला धन वापस नहीं आया। भ्रष्टाचार में कोई कांग्रेसी जेल नहीं गया लाखों (करीब चार लाख) शेल कंपनियां बंद करा गईं पर अदाणी के 20,000 करोड़ की चिन्ता नहीं है। सेबी को भी नहीं। दूसरी ओर, कुछ सौ करोड़ के लिए निर्वाचित सरकारें गिर गईं, मुख्यमंत्री और जनप्रतिनिधि जेल हो आये लेकिन यौन शोषण करने वाले से लेकर 20,000 करोड़ का स्रोत नहीं बता पाने वाले का बाल भी बांका नहीं हुआ। शेयर मूल्य गिरे तो संबित पात्रा को तकलीफ हुई, उसे देशभक्ति से जोड़ा कांग्रेस पर आरोप लगाया। कुल मिलाकर, स्थिति यह है कि अज्ञात तरीके से अज्ञात व्यक्ति के निवेश से अदाणी कमा रहे हैं, अज्ञात व्यक्ति को हिस्सा दे रहे हैं और यह सब करोड़ों में है पर उसकी चिन्ता नहीं है। वह मुद्दा भी नहीं है। 50,000 हजार रुपये मुद्दा है। और मुद्दा बनाने के लिए यह भी कि कांग्रेस अध्यक्ष ने क्यों कहा कि नाम नहीं लेना चाहिये था।

मुझे लगता है कि 222 नंबर सीट के नीचे मिली नोटों की गड्डी ऊपर-नीचे या बांये-दायें वाले की भी हो सकती है। इसलिए सुनिश्चित हुए बगैर किसी एक सदस्य का नाम लेने की जरूरत नहीं थी पर खबरों से पता चलता है कि अभी यह भी नहीं देखा गया है कि नोट असली हैं या नकली और पूरे 100 नोट हैं या कम-ज्यादा। हालांकि, इन बातों का कोई मतलब नहीं है लेकिन जब जांच के आदेश दे दिये गये हैं तो हंगामा किस बात का? और हंगामा है तो इस बात का भी होना चाहिये कि अरविन्द केजरीवाल ने आरोप लगाया है कि भाजपा उसके समर्थकों के नाम मतदाता सूची से हटवाने की साजिश कर रही है। द हिन्दू में आज शहर की खबरों के पन्ने पर यह खबर छह कॉलम में छपी है। यह अलग बात है कि पहले पन्ने पर आधा विज्ञापन होने के कारण द हिन्दू ने 500 का बंडल मिलने की खबर को भी पहले पन्ने पर नहीं छापा है लेकिन उसकी सूचना जरूर है जबकि केजरीवाल के आरोप की सूचना भी नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि केजरीवाल के इस गंभीर आरोप की खबर अखबारों के दिल्ली एडिशन में पहले पन्ने पर नहीं है जबकि 500 के नोटो के बंडल पर अटकलें जारी हैं। 

आइये देख लें कि मतदाता सूची से नाम हटवाने की साजिश के मुकाबले 50,000 को ज्यादा फुटेज देने वालों ने क्या-क्या उपाय किये हैं और बहाने ढूंढ़े हैं। मैं नहीं कहता कि यह खबर पहले पन्ने के लायक नहीं है। मेरा मानना है कि इस खबर को पहले पन्ने के लायक उन लोगों ने बनाया है जो 20,000 करोड़ रुपये पर चुप हैं। उसके मुकाबले पचार हजार रुपया सिर्फ एक करोड़ रुपया किसी भी बैंक में सबसे कम ब्याज दर पर रखा जाये तो महीने भर का ब्याज होगा। पर 20,000 करोड़ की चिन्ता नहीं करने वाले लोग एक करोड़ रुपये के महीने भर की ब्याज राशि से भ कम, 50,000 रुपए से परेशान हैं क्योंकि वह कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघव का हो सकता है और वे इससे इनकार कर रहे हैं। वैसे तो यह राशि इतनी नहीं है कि जिसका हो वह उससे मना करेगा फिर भी सांसदों के बैठने की जगह पर पैसे मिले हैं तो उसे वापस करने की बजाय तमाशा बनाने का मकसद और चाहे जो हो, हेडलाइन मैनेजमेंट तो है ही। क्या पता यह खबर नहीं होती तो केजरीवाल का आरोप पहले पन्ने पर छपा होता। इंडियन एक्सप्रेस में आज 50,000 रुपये की खबर तीन कॉलम में छपी है। शीर्षक है, धनखड़ के यह कहने पर कि नकदी का बंडल मिला, सदन में हंगामा। इंट्रो है, कांग्रेस सांसद ने कहा, उनका नहीं है, जांच की मांग की।

द हिन्दू में दो कॉलम में फोटो के साथ बताया गया है कि अंदर कौन सी खबरें हैं। इनमें कुल तीन खबरों का उल्लेख है। अंतिम या सबसे नीचे की खबर राज्य सभा में विवाद के फ्लैग शीर्षक से है। मुख्य शीर्षक है, कांग्रेस सदस्य की सीट के नीचे करंसी नोट मिली। अखबार में यह खबर पेज 11 पर है। दि एशियन एज में यह खबर टॉप पर सिंगल कॉलम में है। सिंघवी की सीट पर नकद को लेकर राज्य सभा में हंगामा, जांच के आदेश दे दिये गये। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर सेकेंड लीड है। गनीमत यह रही कि किसानों को शंभू बॉर्डर पर रोके जाने की फोटो और खबर इसके ऊपर है। पचास हजार में पहले पन्ने पर धनखड़ और अभिषेक मनु सिंघवी की फोटो भी छपी है। मुख्य शीर्षक है, 50,000 रुपये की बरामदगी ने संसद में विवाद शुरू किया। टाइम्स ऑफ इंडिया में 50,000 रुपये की खबर से पहले दिखी फोटो का शीर्षक है, हरियाणा के पुलिसियों ने किसानों की मार्च रोकी। अब आप दोनों शीर्षक के अंतर और उससे दिये जा रहे संदेश को समझिये और नहीं समझना चाहें तो बल्ले-बल्ले कीजिये। 

नोटों के बंडल की खबर टाइम्स ऑफ इंडिया में सिंगल कॉलम में सबसे छोटी है। शीर्षक है, सिंघवी (अभिषेक मनु) की राज्यसभा सीट के नीचे ‘नोट का बंडल’ मिला : उपराष्ट्रपति। नवोदय टाइम्स में यह खबर फोल्ड के नीचे दो कॉलम में है। शीर्षक है, राज्यसभा में सिंघवी की सीट के पास मिली 500 के नोटों की गड्डी। इस खबर के साछ छपी एक खबर का शीर्षक है, सदन में हंगामा, सत्ता पक्ष विपक्ष में तीखी नोंकझोंक। दूसरी खबर का शीर्षक है, सदन में सिर्फ तीन मिनट रहा। हालांकि इससे स्पष्ट नहीं होता है कि पैसे उनके नहीं है। पैसे इससे कम समय में वहां छोड़े जा सकते हैं और गिर भी सकते हैं। ऐसे में उन्हें क्या कहना चाहिये था यह मैं नहीं बताउंगा पर जो कहा वह सच नहीं है ऐसा मानने का कोई कारण मेरे पास नहीं है। हालांकि वे यह क्यों बता रहे हैं कि जब भी सदन जाते हैं उनके पास 500 रुपए का एक नोट होता है, मैं वह भी नहीं समझ पाया। जो भी हो, जांच के बाद सब साफ हो जाना चाहिये। हालांकि इसपर हंगामा बेकार है।

द टेलीग्राफ में भी यह खबर पहले पन्ने पर है तीन कॉलम में अभिषेक मनु सिंघवी की फोटो के साथ। द टेलीग्राफ की खबर बताती है कि 500 के नोटों का बंडल मिलने की खबर राज्यसभा के अध्यक्ष या उपराष्ट्रपति ने सदन को कैसे दी और यह भी कि उस समय संबंधित सदस्य नहीं थे। कहने की जरूरत नहीं है कि सामान्य तौर पर संबंधित सदस्य का इंतजार किया जाना चाहिये था उनसे पूछा जाना चाहिये था और वे अपना बताते तो उन्हें वापस कर दिया जाना चाहिये था और वे इनकार करते तो सार्वजनिक घोषणा की जा सकती थी कि जिसका भी हो ले जाये। पर यहां प्रस्तुति के अंदाज से लगता है कि मकसद कुछ औऱ है। कहने की जरूरत नहीं है कि आज इस खबर के कारण दूसरी खबरें कम महत्वपूर्ण हो गई हैं और इसमें किसानों का मामला शामिल है। अमर उजाला ने इसपर विस्तार से खबर दी है और इसमें बताया है कि केंद्रय कृषि राज्य मंत्री कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान नहीं, ने किसानों को बातचत के लिए बुलाया है या उनके पास जाकर बात करने की भी पेशकश की है।  

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