पीएसीएल का फ्रॉड और भंगू का झूठ : इनके सामने सहाराश्री तो बेचाराश्री नजर आते हैं

पीएसीएल फ्रॉड प्रकरण सामने आने के बाद से एक चेहरा जो मीडिया में छाया हुआ है वो है पर्ल्स ग्रुप के संस्थापक निर्मल सिंह भंगू का। 61 वर्षीय भंगू ने दावा किया है कि वो पीएसीएल के सिर्फ ‘सलाहकार’ हैं और सेबी ने गलती से उनको कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है। लेकिन सच्चाई ये है कि भंगू और उसके नजदीकी रिशतेदारों की उन तीन में से दो कंपनियों में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है जो पीएसीएल को नियंत्रित करती हैं।

पीएसीएल की वार्षिक रिपोर्ट तीन कॉर्पोरेट इकाइयों को अपना शीर्ष शेयरधारी बताती है। ये हैं- सिंह एंड सिंह टाउनशिप डेवलेपर्स, याशिका फिनलीज़ और अलार्मिंग फिनवेस्ट। 1994 में निगमित याशिका फिनलीज़ में 8 सितंबर, 2013 तक निर्मल सिंह भंगू की 8.84 प्रतिशत हिस्सेदारी थी। परिवार के करीबियों का कहना है कि भंगू के पुत्र हरविंदर सिंह, जिसकी याशिका में 9.55 प्रतिशत हिस्सेदारी थी, का कुछ साल पहले निधन हो गया था। भंगू की दो बेटियां है जो ऑस्ट्रेलिया में उनके व्यापार हितों की देखरेख करती हैं। इसी तरह सिंह एंड सिंह टाउनशिप में परमिंदर सिंह की 50 प्रतिशत हिस्सेदारी है जो निर्मल सिंह भंगू के बड़े भाई का लड़का है।

जुलाई 2013 में भंगू ने सेबी को लिखे एक पत्र में कहा था कि वो बहुत ही थोड़े समय, 3 जून, 1996 सो 3 फरवरी 1998 तक, के लिए पीएसीएल से जुड़े थे। भंगू ने बताया कि 1983 में उन्होने पीजीएफ लि. नामक एक कंपनी प्रोमोट की थी और उसके चेयरमैन और प्रबंध निदेशक के रूप में काम किया। वो अपनी व्यक्तिगत हैसियत में रियल एस्टेट क्षेत्र में संपत्तियों की खरीद-बेच का काम करते हैं और अपनी आजीविका चलाते हैं। कृषि और रीयल एस्टेट के क्षेत्र में उनके ज्ञान और अनुभव को देखते हुए ही उन्हें पीएसीएल के बोर्ड में ‘सलाहकार’ के रूप में जुड़ने के लिए आमंत्रित किया गया था। इसलिए भंगू का कहना है कि सेबी द्वारा उनको कारण बताओ नोटिस का भेजा जाना गलत है।

खैर, कॉर्पोरेट जगत के खिलाड़ियों द्वारा कंपनी कानून से खिलवाड़ करना और उसे तोड़-मरोड़ कर अपना रक्षा कवच बना लेना कोई नई बात नहीं है। भंगू और सहारा की कहानी काफी हद तक समान है। दोनो ऐसा बिज़नेस चलाते हैं जिसके परिचालन को उनके आलोचक अपारदर्शी बताते हैं। दोनों ही राजनीतिज्ञो और फिल्म सितारों से अच्छे रिश्ते रखते हैं। भंगू के बारे में कहा जाता है कि उसके शुभचिंतक हर राजनीतिक दल में हैं। पंजाब के एक पूर्व कांग्रेसी सांसद के वो बहुत ही करीब हैं। वहीं सत्तासीन भाजपा और शिरोमणी अकाली दल के नेताओं से भी उसके रिश्ते बहुत अच्छे हैं।

भंगू और सहारा दोनो की रियल एस्टेट परियोजनाएं चल रही हैं। दोनो के होटल व्यवसाय भी हैं। रॉय के जहां न्यूयॉर्क और लंदन में होटल हैं (जिन्हे फिलहाल वे ज़मानत की रकम जुटाने के लिए बेचने की फिराक में हैं) वहीं भंगू ने भी ऑसेट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में होदल खरीदा है और ब्रिसबेन में काफी घरों का निर्माण कराया है। दोनो की रुचि खेल-कूद में भी है। रॉय एक लम्बे समय तक भारतीय क्रिकेट टीम के प्रायोजक रहे हैं, आईपीएल की पुणे टाम और फार्मूला वन टीम के मालिक हैं वहीं भंगू ने भी आईपील और कबड्डी टूर्नामेंट आयोजित किए हैं। पीएसीएल ने पिछले चार सालों में कबड्डी के प्रायोजन पर करीब 35 करोड़ रुपए खर्च किए हैं।

भंगू और रॉय दोनो का ही दख़ल मीडिया के क्षेत्र में भी है। रॉय के राष्ट्रीय सहारा अखबार और सहारा समय न्यूज़ चैनल से तो सभी वाकिफ हैं भंगू का पीएसीएल भी P7 टेलीविज़ न्यूज़ नेटवर्क परिचालित करता है। P7 का उपयोग कंपनी की स्कीमों और हितों को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है। इसके साथ ही पीएसीएल ने पर्यटन, निर्माण, शिक्षा और मसालों के क्षेत्र में भी अपने पैर पसार रखे हैं।

कहते हैं कि राजनीतिज्ञों से ज्यादा दोस्ती और गैरकानूनी धन आपको मुसीबत में डाल ही देता है। भंगू के साथ भी ऐसा ही हुआ। अपनी जवानी के दिनों में जो व्यक्ति अपने बड़े भाई नक्षत्तर सिंह के साथ, भारत-पाक सीमा के निकट स्थित बेला गांव में दूध बेचा करता था, वही भंगू आज पोंजी योजनाओं से इकट्ठा किए धन और राजनीतिज्ञों से निकटता को लेकर चर्चा में है। देश में इस समय छोटे बड़े स्तर पर न जाने कितने ही भंगू हैं जो पोंजी स्कीमें चला रहे हैं। कुछ लोग थोड़े समय स्कीम चला कर पैसा ले कर भाग जाते हैं और निवेशक ठगा रह जाता है। ऐसे न जाने कितने हैं जो न कभी सरकार या सेबी की नज़र में आए हैं और न आने की उम्मीद है।

वहीं कुछ, भंगू की तरह एक लंबे समय तक पोंजी स्कीमों को चलाने का माद्दा रखते हैं और अपने लाखों कमीशनखोर एजेंटों के माध्यम से ग्राहकों के दिलो-दिमाग में एक बिज़नेस मॉडल की छवि बना देते हैं कि वो भूमि की खरीद-बेच से पैसा कमा रहे हैं। तो असल में पीएसीएल कर क्या रही थी? बस यही कि अपने एजेंटों के माध्यम से नए निवेशकों से पैसा लेकर उन निवेशकों को देना जिनके निवेश की अवधि पूरी हो चुकी है। यही वह साधारण सा बिज़नेस मॉडल है जो सरकार की सतत निगरानी के अभाव में किसी रॉय या भंगू को असाधारण धन का मालिक बना देता है।

उल्लेखनीय है कि सेबी ने पिछले सप्ताह पीएसीएल को तीन माह के अन्दर 5.85 करोड़ निवेशकों का 49,100 करोड़ रुपया लौटाने का आदेश दिया था। अपने 92 पेज के आदेश में सेबी ने कहा कि निवेशित धन का यह आंकड़ा और अधिक हो सकता था यदि पीएसीएल ने 1 अप्रैल, 2012 से 25 फरवरी 2013 के बीच के धन इकट्ठा करने के आंकड़े भी उपलब्ध कराए होते। सेबी के अनुसार अब तक किसी भी गैर-कानूनी सामूहिक निवेश योजना (सीआईएस) में इतनी रकम और निवेशक सामने नहीं आए हैं जितना पीएसीएल द्वारा इकट्ठी की गई रकम और निवेशकों की संख्या है। पीएसीएल की रकम के सामने सुब्रत रॉय बेचाराश्री नज़र आते हैं जो इस साल मार्च से ऐसे ही मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के चलते तिहाड़ में बंद हैं और अपनी ज़मानत की रकम जुटाने के लिए उन्हे अपनी विदेशों में खरीदी गई संपत्तियां तक बेचनी पड़ रही हैं। पीएसीएल का ये मामला नया भी नहीं है। करीब 16 साल पहले, 1998 में सेबी ने कंपनी के खिलाफ कार्यवाही की थी। तब मामला कानूनी दांव-पेचों में उलझ गया था। मामला बाद में अदालत पहुंचा और पिछली साल सुप्रीम कोर्ट ने सेबी को निर्देश दिया कि कि वो जांच कर इस बात को सुनिश्चित करे कि पीएसीएल का धंधा सामूहिक निवेश योजना (सीआईएस) की श्रेणी में आता है या नहीं और तत्पश्चात कानून के अनुसार कार्यवाही करे।

मुंबई से दीपक कुमार की रिपोर्ट.


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