पर्ल ग्रुप की संपत्तियों की नीलामी के लिए सुप्रीम कार्ट ने कमेटी बनाई

हाल ही में करीब 50,000 करोड़ रूपये की हेराफरी के मामले में केंद्रीय जांच एजेंसी ने पर्ल ग्रुप के मालिक निर्मल सिंह भंगू को गिरफ्तार किया था. उन पर निवेशकों के साथ धोखाधड़ी का आरोप लगा था. अब खबर आ रही है कि पर्ल ग्रुप की संपत्तियों की नीलामी के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी बना दी है. कोर्ट ने पूर्व जज आर एम लोढा की अध्यक्षता में कमेटी बनाई. सेबी के जरिये लोगों को पैसे लौटाया जाएगा और यह कमेटी इस बात की निगरानी रखेगी कि किस तरह अगले 6 महीनों में लोगों के कर्ज को चुकाया जा सके. सेबी को इस केस से जुड़े सारे दस्तावेज़ इस कमेटी को सौंपना होगा.

कंपनी पर पोन्जी योजना के जरिए निवेशकों के 55 हजार करोड़ रुपये की ठगी का आरोप है. P7 न्यूज़ चैनल और पर्ल्स ग्रुप के चेयरमैन निर्मल सिंह भंगू के साथ सीबीआई ने 4 दूसरे लोगों को भी गिरफ्तार किया है. कंपनी पर आरोप है कि इसने करीब 6,00,00,000 निवेशकों से 49,100 करोड़ रुपए जुटाये हैं. सेबी के आदेश के मुताबिक अगर पीएसीएल ब्याज समेत ये रकम रिफंड करती है तो उसे करीब 55,000 हजार करोड़ रुपये की व्यवस्था करनी होगी.

इस मामले की जांच सेबी के अलावा सीबीआई और ईडी भी कर रहे हैं. सीबीआई के वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि कंपनी के चारों कार्यकारियों को सीबीआई के मुख्यालय पर गहन पूछताछ के बाद गिरफ्तार किया गया। पूछताछ के दौरान उन्होंने बिना तालमेल वाले जवाब देने शुरू किए और साथ ही सहयोग करना भी बंद कर दिया, जिसके बाद उन्हें अरेस्ट कर लिया गया। इनके खिलाफ IPC की धारा 120B (आपराधिक साजिश) तथा 420 (धोखाधड़ी) की धाराओं में मामला दायर किया गया है। निवेशकों को भारी रिटर्न का लालच देकर उनसे धन जुटाया गया था.

सीबीआई ने 19 फरवरी, 2014 को पर्ल्स के 60 साल के संस्थापक निर्मल सिंह भंगू पर देश के इतिहास में सबसे बड़े चिटफंड घोटाले को चलाने की आपराधिक साजिश और धोखाधड़ी करने के आरोप में मामला दर्ज किया था। करीब 2 साल बाद अब उसे सीबीआई गिरफ्तार करने में सफल हुई है। घोटाले की रकम 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 5 करोड़ से ज्यादा छोटे निवेशकों से पर्ल्स एग्रोटेक कॉर्पोरेशन लिमिटेड और पर्ल्स गोल्डन फॉरेस्ट लिमिटेड के नाम पर धोखे से ली गई थी। पर्ल्स की ये दोनों कंपनियां जमीन-जायदाद का कारोबार करती दिखाई गईं थीं।

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भंगू का हाल में ही किडनी बदला गया है, जेल प्रशासन रखेगा ध्यान

देश के सबसे बड़े पौंजी घोटाले में गिरफ्तार पर्ल्स समूह के सीएमडी निर्मल सिंह भंगू का अभी हाल में ही किडनी ट्रांसप्लांट हुआ है. इस बात का उल्लेख उनके दो वकीलों ने कोर्ट में सुनवाई के दौरान किया. भंगू के अधिवक्ता मनीष जैन और विजय अग्रवाल ने अदालत से कहा कि भंगू का हाल में किडनी प्रत्यारोपण हुआ है इसलिये जेल में उनकी नियमित जांच होनी चाहिये. साथ ही उनकी मेडिकल कंडीशन के मुताबिक इलाज व दवाइयां दिए जाने की मांग की. अदालत ने इस पर कहा कि जेल प्रशासन इसका ध्यान रखेगा. वकीलों की यह मांग भी कोर्ट ने मान ली कि उन्हें रोजाना एक घंटे अपने क्लाइंट यानि भंगू से मुलाकात की अनुमति दी जाए.

पर्ल्स समूह के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक निर्मल सिंह भंगू और तीन अन्य को 45,000 करोड़ रुपए की कथित धोखाधड़ी मामले में एक स्थानीय अदालत ने 14 दिन की न्याययिक हिरासत में भेज दिया. मुख्य महानगर दंडाधिकारी सुगंधा अग्रवाल ने सीबीआई के यह कहने पर कि अब हिरासत में उनसे पूछ-ताछ की जरूरत नहीं है, आरोपियों को छह फरवरी तक के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया. अदालत ने कहा, ‘आरोपियों को 14 दिन के पुलिस रिमांड के बाद अदालत में पेश किया गया. अब 14 दिन की न्यायिक हिरासत के लिए एक याचिका दायर की गई है. आवेदन में दी गई वजहों के तहत इसकी मंजूरी दी जाती है.’

इस प्रकार ये लोग 6 फरवरी तक के लिए जेल भेज दिए गए. इन पर आपाराधिक साजिश रचने और धोखाधड़ी के आरोप हैं. सीबीआई ने इन आरोपियों को आठ जनवरी को दो साल की लंबी जांच पड़ताल के बाद गिरफ्तार किया था. जांच के आदेश उच्चतम न्यायालय ने दिये थे.

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तिहाड़ जेल के हवाले हुए चिटफंड के सरगना भंगू और उनके गिरोह के प्रमुख सदस्य

चिटफंड कंपनियों पीएसीएल और पर्ल्स ग्रुप के मालिक भंगू समेत कई घपलेबाजों को 14 दिन के लिये दिल्ली की तिहाड़ जेल में भेज दिया गया है। अदालत ने उसे और उसके साथियों को न्यायिक हिरासत में रखने का फैसला किया है। पर्ल्स समूह के सीएमडी और प्रबंधक निदेशक निर्मल सिंह भंगू और उसके तीन अन्य साथियों को 45,000 करोड़ रूपये की धोखाधड़ी मामले में अदालत ने 14 दिन के लिए जेल भेजा है। अदालत ने कहा, ‘आरोपियों को 14 दिन के न्यायिक रिमांड के बाद अदालत में पेश किया गया। अब अगले 14 दिन की न्यायिक हिरासत के लिए एक याचिका दायर की गई है। आवेदन में दी गई वजहों के तहत इसकी मंजूरी दी जाती है।’

सीबीआई ने बताया कि निर्मल सिंह भंगू के अलावा जिन आरोपियों को जेल भेजा गया है उनमें सुखदेव सिंह एमडी तथा प्रमोटर डायरेक्टर पर्ल्स एग्रोटेक कॉरपोरेशन, गुरमीत सिंह एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर वित्त तथा सुब्रत भट्टाचार्य हैं। चारों आरोपियों को गत आठ जनवरी को गिरफ्तार किया गया था। इस बीच महाराष्ट्र की पुलिस ने एक दूसरे मामले में निर्मल सिंह भंगू की हिरासत की मांग की है।

पर्ल्स गोल्डन फारेस्ट लिमटेड (पीजीएफ) के चेयरमैन एंव प्रबंध निदेशक तथा पर्ल्स आस्ट्रेलिसिया प्रा. लिमिटेड के पूर्व चेयरमैन भंगू के अलावा पीएसीएल के प्रबंध निदेशक और प्रवर्तक-निदेशक सुखदेव सिंह, कार्यकारी निदेशक (वित्त) गुरमीत सिंह और पीजीएफ एवं पीएसीएल में कार्यकारी निदेशक सुब्रत भट्टाचार्य को सीबीआई ने गिरफ्तार किया था। दो साल से इस मामले की जांच चल रही थी जिसमें सीबीआई अधिकारियों ने पर्ल्स कंपनी के 1300 बैंक खातों का पता लगाया और 108 करोड़ रुपये हाईकोर्ट में जमा कराए थे। सीबीआई ने भंगू तथा कंपनी से संबंधित संपत्तियों के 20 हजार दस्तावेज बरामद किए थे। इनका मूल्य करीब पांच हजार करोड़ आंका गया है। दिल्ली में भंगू की 583 एकड़ भूमि भी मिली है।

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अंतत: अरेस्ट हो गए चिटफंड कंपनियों पीएसीएल और पर्ल्स ग्रुप के दिग्गज निर्मल सिंह भंगू, सुखदेव सिंह, गुरमीत सिंह और सुब्रत भट्टाचार्य

सीबीआई ने 45 हजार करोड़ रुपये के घोटाले में पीएसीएल व पर्ल्स ग्रुप के सीएमडी निर्मल सिंह भंगू तथा इनके तीन सहयोगी एमडी सुखदेव सिंह, गुरमीत सिंह, सुब्रत भट्टाचार्य को गिरफ्तार कर लिया है। इन्हें पोंजी स्कीम केस के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया। बताया जा रहा है कि ये लोग लगातार बयान बदल रहे थे और जांच में सहयोग नहीं कर रहे थे। सीबीआई के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार भंगू के साथ पीएसीएल के प्रमोटर-डायरेक्टर तथा एमडी सुखदेव सिंह, एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर (फाइनेंस) गुरमीत सिंह तथा ईडी सुब्रत भट्टाचार्य से शुक्रवार को एजेंसी के मुख्यालय में विस्तृत पूछताछ की गई।

इसके बाद सभी को गिरफ्तार कर लिया गया। आरोप है कि इन लोगों ने कृषि भूमि के विकास तथा बिक्री के नाम पर देश भर के 5.5 करोड़ निवेशकों से 45 हजार करोड़ रुपये एकत्रित किए थे। निवेशकों को भारी रिटर्न का लालच दिया गया था। जांच में पता चला है कि आरोपियों ने पीड़ितों को फर्जी भूमि आवंटन पत्र दिए थे। सीबीआई सूत्रों के मुताबिक छानबीन में भारत तथा विदेश में करोड़ों रुपये की बेनामी संपत्ति के भी दस्तावेज मिले हैं। यह भी पता चला है कि पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने जब पर्ल्स गोल्डेन फॉरेस्ट लिमिटेड (पीजीएफ) को स्कीम बंद करने तथा निवेशकों का रुपया वापस करने का आदेश दिया तो पर्ल्स एग्रोटेक कारपोरेशन लिमिटेड (पीएसीएल) के नाम से वैसी ही दूसरी फर्जी योजना चला दी गई।

इसका ऑफिस नई दिल्ली के बाराखंभा में खोला गया और पीएसीएल से मिले रुपये पीजीएफ के निवेशकों को लौटाने में इस्तेमाल किए गए। लोगों से पैसा ऐंठने के लिए पूरे देश में लाखों कमीशन एजेंट का जाल बिछाया गया था। इन एजेंटों को मोटा कमीशन दिया जाता था। पीएसीएल और इसके प्रमोटर रहे निर्मल सिंह भंगू के खिलाफ ईडी और सीबीआई का शिकंजा लगातार कसता जा रहा था. पिछले महीने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने देश के कई शहरों में पीएसीएल के दफ्तरों पर छापे मारे थे.

मनी लांड्रिंग रोकथाम कानून के तहत दिल्ली, मुंबई, मोहाली, चंडीगढ़ और जयपुर में छापे मारे गए थे. सन् 2015 में सीबीआई की एफआईआर के आधार पर प्रवर्तन निदेशालय ने पीएसीएल के खिलाफ आपराधिक केस दर्ज किया था. इसके बाद जांच शुरू कर दी थी. पीएसीएल ने रीयल एस्टेट प्रोजेक्ट के नाम पर बिना पूंजी बाजार नियामक की मंजूरी लिए सामूहिक निवेश योजनाएं यानी पोंजी स्कीम चलाई. इसके जरिए निवेशकों से करीब 45 हजार करोड़ रुपये जुटाए गए, जिसे वसूलने का आदेश दिया गया था.

सीबीआई जांच से पता चला कि इन्होंने पांच करोड़ निवेशकों को लूटा. कुल 45 हजार करोड़ रुपये निवेशकों से इकठ्ठा किए. बटोरी गई बेहिसाब दौलत को निजी फायदे के लिए इस्तेमाल किया. इस दौलत का बड़ा हिस्सा विदेश ले गए. ऑस्ट्रेलिया में कारोबार शुरू किया. यूपी में ठगे गए 1.30 करोड़ निवेशक. महाराष्ट्र में लुटे 61 लाख निवेशक. तमिलनाडु में लुटे 51 लाख लुटे निवेशक. राजस्थान में लुटे 45 लाख निवेशक. हरियाणा में लुटे 25 लाख निवेशक.

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पीएसीएल वाले निर्मल सिंह भंगू के कई ठिकानों पर ईडी ने की छापेमारी

पीएसीएल और इसके प्रमोटर रहे निर्मल सिंह भंगू के खिलाफ शिकंजा कसता जा रहा है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने देश के कई शहरों में पीएसीएल के दफ्तरों पर छापे मारे। ईडी निवेशकों से गैरकानूनी तरीके से जुटाई गई करीब 60 हजार करोड़ रुपये की राशि के मामले में मनी लांड्रिंग के पहलू की जांच कर रहा है। यह राशि कई पोंजी स्कीमों के जरिये जुटाई गई।

ईडी के अधिकारियों ने बताया कि पर्ल और इसके निदेशकों व सहयोगियों के ठिकानों पर मनी लांड्रिंग रोकथाम कानून के तहत दिल्ली, मुंबई, मोहाली, चंडीगढ़ और जयपुर में छापे मारे गए हैं। सीबीआई की एफआईआर के आधार पर इस साल की शुरुआत में प्रवर्तन निदेशालय ने पीएसीएल के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया था। कंपनी के खिलाफ कई सरकारी एजेंसियां जांच में जुटी हुई हैं। पर्ल पर आरोप है कि इसने रीयल एस्टेट प्रोजेक्ट के नाम पर बिना पूंजी बाजार नियामक की मंजूरी लिए अनधिकृत रूप से सामूहिक निवेश योजनाएं यानी पोंजी स्कीमें चलाईं। इनके जरिये निवेशकों से कई सालों में तकरीबन 60 हजार करोड़ रुपये जुटाए गए।

देश की सबसे बड़ी गैरकानूनी धन उगाही स्कीम के चलते शिकंजे में फंसे पीएसीएल (पर्ल) के निदेशक निर्मल सिंह भंगू सेबी के खिलाफ सैट के शरण में पहुंच गए हैं। पूंजी बाजार नियामक सेबी ने 22 अगस्त 2014 को पीएसीएल और भंगू समेत कंपनी के सभी निदेशकों को निवेशकों सेवसूले गए लगभग 50 हजार करोड़ रुपये वापस करने का आदेश दिया था। अब यह रकम ब्याज समेत लगभग साठ हजार करोड़ रुपये पहुंच गई है।

इस बीच रामपुर से खबर है कि सिविल लाइंस क्षेत्र में डीएम आवास किनारे स्थित पर्ल बनाम पीएसीएल लिमिटेड के ऑफि‍स में मुरादाबाद के एजेंट्स ने जमकर हंगामा किया। इस दौरान मौका पाकर ऑफि‍स मैनेजमेंट और कर्मचारी वहां से खिसक लिए। पड़ोसी जिले मुरादाबाद से पहुंचे एजेंटों के मुताबिक, उन्हें कई दिन से पीएसीएल के ऑफि‍स में रुपयों के जमा होने की सूचना मिल रही थी, जिसके चलते शुक्रवार को एजेंट यूनियन ने ऑफि‍स पर छापा मारा। छापे के दौरान ऑफि‍स में बदस्तूर काम जारी मिला। साथ ही बैकडेट में कलेक्शन जमा किया जा रहा था।

एजेंट की बात पर अगर यकीन किया जाए तो सेबी और हाईकोर्ट ने पर्ल बनाम पीएसीएल को ग्राहकों का रुपया आगे जमा करने पर रोक लगा रखी है। यह रोक 22 अगस्त 2014 से जारी है। इसके बावजूद कंपनी बदस्तूर हाईकोर्ट और सेबी के आदेशों का उल्लंघन करते हुए ग्राहकों से रुपया जमा कर रही है। साथ ही पुराने जमा रुपयों के प्लान की मैच्योरिटी होने के बावजूद पिछले करीब एक साल से कोई भुगतान नहीं कर रही है।

सेबी ने वर्ष 2014 में तीन महीने में ग्राहकों का भुगतान करने के आदेश दिए थे। ऐसा नहीं होने पर ग्राहकों और अभिकर्ताओं में जबरदस्त नाराजगी है। इसी के चलते आज अभिकर्ताओं की यूनियन ने कंपनी के ऑफि‍स पहुंचकर सारी ट्रांसएक्शन बंद करवा दी। इस दौरान ऑफि‍स मैनेजमेंट और कर्मचारी मौका देखकर वहां से खिसक लिए। साथ ही आक्रोशित अभिकर्ताओं ने कंपनी ऑफि‍स में ही डेरा डाल लिया। अभिकर्ताओं ने टीडीएस काटने और आयकर विभाग को सूचना न देने का इल्जाम भी लगाया। कलेक्शन एजेंट्स का मानना है कि इस तरह पूरे यूपी और इंडि‍या में कंपनी ने हजारों करोड़ जनता का रुपया ठग लिया है और फ्रॉड जारी है। इसपर यूनियन ने पुलिस और जिला प्रशासन को सूचना देकर कार्रवाई और जांच की मांग की है।

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पीएसीएल को निवेशकों का 49100 करोड़ रुपया लौटाने का आदेश बरकरार

मुंबई। भारतीय प्रतिभूति अपीलीय ट्राइब्यूनल (सैट) ने बाजार नियामक सेबी के उस आदेश पर रोक लगाने से इन्कार कर दिया जिसमें प्रॉपर्टी डेवलपर पीएसीएल को निवेशकों का 49,100 करोड़ रुपया लौटाने का आदेश जारी किया गया था। सेबी ने अवैध सामूहिक निवेश योजना को लेकर पीएसीएल के खिलाफ कार्रवाई की थी। इसके बाद पिछले साल सेबी के आदेश के खिलाफ पीएसीएल ने ट्रिब्यूनल में अपील किया था। लेकिन ट्रिव्यूनल ने पीएसीएल की अपील खारिज करते हुए उसे सेबी के निर्देशों पर तीन महीने में अमल करने को कहा।

सेबी ने अवैध योजनाओं के जरिये निवेशकों से धन जमा करने के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करते हुए पीएसीएल लिमिटेड (पहले पर्ल्स एग्रोटेक कॉर्पोरेशन) को तीन महीने के भीतर 49 हजार 100 करोड़ रुपये निवेशकों को लौटाने का आदेश दिया था। सेबी ने कंपनी से अवैध सामूहिक निवेश योजना (सीआईएस) को बंद करने को भी कहा है।  सेबी के आदेश के बाद पीएसीएल ने इसे प्रतिभूति अपीलीय ट्राइब्यूनल (सैट) में चुनौती दी। वहीं, पीएसीएल के बयान में कहा गया कि दुर्भाग्य से सेबी इस बात पर ध्यान नहीं दे सका कि कंपनी ने कहा था कि उसे सीआईएस नहीं माना जाए। कंपनी ने कहा है, ‘पीएसीएल ने सेबी की बेंच के सामने कहा था कि वह सीआईएस नहीं चला रही है। कंपनी ने अपने रीयल एस्टेट कारोबार के लिए जो धन जुटाया है, उसके पास उचित मात्रा में परिसंपत्तियां हैं।’

सेबी ने कहा है कि वह उच्चतम न्यायालय के एक दिशानिर्देश के अनुसार कंपनी तथा निदेशकों के खिलाफ धोखाधड़ी तथा व्यापार में अनुचित व्यवहार करने वह सामूहिक निवेश योजनाओं (सीआइएस) के बारे में सेबी के नियमों के उल्लंघन के आरोप में पीएसीएल के खिलाफ कार्रवाई की है।  भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने इस संबंध में 92 पृष्ठ का आदेश जारी किया था। इसके अनुसार कंपनी ने खुद स्वीकार किया है कि उसने 49,100 करोड़ रुपये जुटाये है और अगर पीएसीएल एक अप्रैल 2012 से 25 फरवरी 2013 के बीच जुटाये गये कोष का पूरा ब्योरा दे तो यह राशि और भी अधिक हो सकती है। जिन निवेशकों से यह राशि जुटायी गयी, उनकी संख्या करीब 5.85 करोड़ है। इनमें वे ग्राहक भी शामिल है। जिन्हें जमीन आवंटित करने की बात कही गयी थी और उन्हें अभी तक जमीन नहीं दी गयी। अवैध तरीके से धन जुटाने के मामलों में यह न केवल राशि के लिहाज से बल्कि निवेशकों की संख्या को लेकर भी सबसे बड़ा मामला है।

वही, पीएसीएल तथा निर्मल सिंह भांगू समेत उसके शीर्ष कार्यकारियों के खिलाफ सीबीआई भी जांच कर रही है। साथ ही यह सेबी की जांच के घेरे में पुराने मामलों में से एक है। नियामक ने 16 साल पहले फरवरी 1998 में पीएसीएल को कहा था कि वह न तो कोई योजना शुरू कर सकती है और न ही अपनी मौजूदा योजनाओं के तहत कोष जुटा सकती है। कंपनी ने अपनी दलील में कहा कि वह कोई अवैध योजना नहीं चला रही है और जमीन की खरीद-बिक्री में शामिल है। सेबी ने अवैध तरीके से धन जुटाने की योजना चलाने को लेकर 1999 में पीएसीएल को नोटिस जारी किया था। बाद में मामला अदालतों में गया। उच्चतम न्यायालय ने पिछले साल फरवरी में आदेश जारी कर सेबी को यह पता लगाने को कहा कि क्या पीएसीएल का कारोबार सामूहिक निवेश योजना के दायरे में आता है या नहीं और कानून के मुताबिक कार्रवाई करने को कहा।

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नई दिल्‍ली। बाजार नियामक सेबी ने पर्ल्स एग्रोटेक कॉर्पोरेशन लिमिटेड (पीएसीएल) और इसके चार डायरेक्‍टर्स पर 7,269 करोड़ रुपए की पेनल्‍टी लगाई है। पीएसीएल को यह रकम 45 दिनों के भीतर चुकानी होगी। सेबी द्वारा किसी कंपनी पर लगाई गई यह सबसे बड़ी पेनल्‍टी है। सेबी के अनुसार पीएसीएल के डायरेक्‍टर्स तरलोचन सिंह, सुखदेव सिंह, गुरमीत सिंह और सुब्रता भट्टाचार्य ने लोगों से अवैध तरीके से पैसा जुटाया है। इसके चलते कंपनी पर इतना बड़ा जुर्माना लगाया गया है। ज्ञात हो पर्ल और पीएसीएलल की तरफ से ही एक न्यूज चैनल पी7 न्यूज चलाया जाता था। साथ ही कई पत्रिकाएं भी निकाली जाती थीं। बाद में कंपनी के फ्राड का खुलासा होने और कई एजेंसियों के शिकंजे में फंसने के बाद ये मीडिया हाउस बंद हो गया। यहां के कर्मचारियों ने अपने बकाया वेतन के लिए लंबा आंदोलन चलाया जिसके बाद उन्हें उनका हक मिल सका। हालांकि अब भी ढेर सारे कर्मी अपना बकाया पाने के लिए भटक रहे हैं।

पिछले साल सेबी ने पीएसीएल को पिछले 15 साल में फर्जी स्‍कीमों के माध्‍यम से जुटाए गए 49,100 करोड़ रुपए निवेशकों को वापस करने का आदेश दिया था। हालांकि इस आदेश के खिलाफ पीएसीएल ने सिक्‍युरिटी अपीलेट ट्रिब्‍युनल (सेट) में अपील की थी। लेकिन पीएसीएल की अपील को खारिज करते हुए पिछले महीने सेट कंपनी की अपील खारिज करते हुए निवेशकों को पैसा वापस करने को कहा था। सेबी ने अपने आदेश में कहा है कि पीएसीएल ने पिछले एक साल में भारी मात्रा में निवेशकों से अवैध स्‍कीमों के माध्‍यम से पैसा जमा किया है। इसके चलते कंपनी का मुनाफा सिर्फ एक साल के भीतर बढ़कर 2,423 करोड़ हो गया। सेबी ने इस मामले में कड़े शब्‍दों का प्रयोग करते हुए कहा कि जिस तरह कंपनी ने अवैध तरीके से पैसा जुटाया है। उसे देखते हुए अभी तक की सबसे बड़ी पेनल्‍टी लगाए जाने के लिए पीएलसीएल से बेहतर कोई दूसरा मामला नहीं हो सकता।

सेबी के अनुसार पीएसीएल पर उसका यह सख्‍त रवैया अवैध तरीके से पैसा जुटाने की कोशिश में जुटी फाइनेंस कंपनियों को एक कड़ा संदेश देगा। पिछले कुछ वर्षों में इस प्रकार की गतिविधियों में तेजी आई है। देश में लाखों लोगों की बड़ी रकम इन्‍हीं स्‍कीमों में निवेश के चलते डूब गई है। ऐसे गंभीर मामलों को हल्‍के में नहीं लिया जा सकता। सेबी के नियमों के तहत यह फर्जी तरीके से धन जुटाने वाली कंपनियों पर 25 करोड़ रुपए से लेकर उनके सालाना मुनाफे के तीन गुना तक पेनल्‍टी वसूलने का अधिकार है। जहां तक मौजूदा मामले का सवाल है, सेबी ने इसी नियम का पालन करते हुए कंपनी पर उसके मुनाफे की तीन गुनी पेनल्‍टी लगाई है।

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पीएसीएल और पर्ल ग्रुप की संपत्ति बेचकर निवेशकों का पैसा लौटाने के आदेश, पेड मीडिया ने इस बड़ी खबर पर साधी चुप्पी

एक बड़ी खबर सुप्रीम कोर्ट से आ रही है. सहारा के घोटाले साइज से लगभग डबल साइज के घोटाले से घिरी पीएसीएल और पर्ल ग्रुप नामक कंपनियों की संपत्ति बेचकर निवेशकों का पैसा लौटाने का आदेश उच्चतम न्यायालय ने दिया है. इस बीच सीबीआई ने पीएसीएल और पर्ल ग्रुप के मालिक निर्मल सिंह भंगू समेत कंपनियों के कई निदेशकों के खिलाफ चीटिंग और साजिश की नया केस दर्ज किया है. पीएसीएल और पर्ल ग्रुप को करीब छह हजार करोड़ निवेशकों को छियालीस हजार करोड़ रुपये लौटाना है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इन छह हजार करोड़ रुपये के निवेशकों को उनका पैसा मिल जाएगा लेकिन कई लोगों का कहना है कि भंगू ने अपना पूरा कारोबार और ज्यादातर पैसा विदेशों में ट्रांसफर कर लिया है. इसलिए भारत में बेचने के लिए बहुत कुछ मिलने वाला नहीं है.

46,000 करोड़ रुपये की उगाही करने वाली पर्ल और पीएसीएल नामक कंपनियों के छह हजार करोड़ निवेशक पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश समेत कई प्रदेशों में हैं. बताया जा रहा है कि निवेशकों का पैसा लौटाने के लिए इन कंपनियों की दस हजार से ज्यादा संपत्तियों को बेचा जाएगा. निर्मल सिंह भंगू द्वारा संचालित दो कंपनियों Pearls Agrotech Corporation Limited (PACL) और Pearls Golden Forest Limited (PGFL) ने ये जनता को लुभावने सपने दिखाकर ये पैसे उगाहे हैं. ज्ञात हो कि सहारा वालों ने गैरकानूनी तरीके से 24,000 करोड़ रुपये इकट्ठे किए जिसके कारण सुब्रत राय अभी तक जेल में है लेकिन पर्ल / पीएसीएल वालों ने गैरकानूनी तरीके से सहारा वालों से दोगुना ज्यादा पैसा वसूला लेकिन इसका मालिक भंगू जेल से बाहर घूम रहा है. चर्चा है कि इसने मीडिया से लेकर सारी एजेंसीज तक को मैनेज कर रखा है ताकि यह पूरा महाघोटाला मीडिया ट्रायल का हिस्सा न बने और न ही कोई एजेंसी ज्यादा सक्रिय होकर उसे गिरफ्तार कर पाए. भंगू को बचाने में कई जाने माने राजनीतिक लोग भी लगे हुए हैं. कई मीडियाकर्मी भी दिन रात भंगू के लिए काम कर रहे हैं. अब जब भंगू की भारत की संपत्ति बेचने के सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिए हैं तो यह भी खबर लगभग दबा दी गई क्योंकि ज्यादातर मीडिया घराने भंगू और पीएसीएल के पैरोल पर हैं.

सुप्रीम कोर्ट की एफएमआई कलीफुल्ला और शिवा कीर्ति सिंह की बेंच ने पर्ल / पीएसीएल ग्रुप की संपत्ति बेचने के लिए एक स्पेशल कमेटी बनाई है. यह कमेटी निवेशकों के पैसे लौटाने के लिए ग्रुप की कंपनियों की चल अचल संपत्ति के शीघ्र बिक्री और पैसे को निवेशकों तक पहुंचाने की गारंटी करेगी. इस कमेटी में हाईकोर्ट के रिटायर जज के. राममूर्थी और इश्वर हैं. इस कमेटी को सेबी और सीबीआई की तरफ से पूरा सहयोग दिया जाएगा. ये दोनों एजेंसीज चल अचल संपत्ति के कागजों की जांच पड़ताल कर बिक्री के काम में मदद करेंगी. साथ ही ग्रुप की कंपनीज पर मारे गए छापे के दौरान जब्त किए गए पैसे को कमेटी को सौंपेंगी ताकि उसे निवेशकों तक पहुंचाया जा सके.

बीते अप्रैल महीने में सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि उसने छापे मारकर अस्सी करोड़ रुपये नगद और पर्ल / पीएसीएल की करीब अठारह सौ संपत्तियों के कागजात जब्त किए. कोर्ट ने आदेश दिया कि सेबी और सीबीआई सारे कागजात व कैश कमेटी को दे दे ताकि वह जांच पड़ताल के बाद बिक्री आदि कर पैसे जल्द से जल्द निवेशकों तक लौटा दे. देखना है कि क्या अठारह सौ संपत्तियों की बिक्री से 48 हजार करोड़ रुपये मिल पाता है. अगर इन पैसों पर मिलने वाले ब्याज आदि की गणना करें तो पूरा मामला पचास हजार करोड़ रुपये तक जाएगा. ऐसे में लोग चर्चा कर रहे हैं कि भंगू तो सारा पैसा लेकर विदेश भाग गया. अब देश में बस नाम की संपत्तियां हैं. अगर यह बात सच हुई तो यह दूसरा महाघोटाला होगा जिसके लपेटे में मीडिया से लेकर राजनीति तक के कई दिग्गज आएंगे जिनकी मदद से भंगू घोटाला प्रकरण दबा रहा और भंगू पूरा पैसा विदेश ले जाने में कामयाब हुआ.

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पीएसीएल के हजारों करोड़ रुपये के फ्राड के पीड़ित धीरे धीरे सामने आ रहे हैं लेकिन पूरे तंत्र को भंगू ने इस तरह साध लिया है कि कहीं पीड़ितों की आवाज तक नहीं उठ रही है. सहारा उगाही मामले में सेबी और सुप्रीम कोर्ट ने भले तल्ख रुख दिखाकर सुब्रत राय को अंदर कर दिया लेकिन भंगू मामले में सारी मशीनरी असहाय दिख रही है. भारतीय सेना के रिटायर अधिकारी केएल शर्मा ने अपनी बिटिया की शादी के मकसद से पीएसीएल में अपनी सेविंग को इनवेस्ट कर दिया था. यह बात 2007 की है. बीते साल यह निवेश मेच्योर हो गया. उन्होंने कुल पौन तीन लाख रुपये लगाए थे. कंपनी ने मेच्योरिटी पर जो देने का वादा किया था, उसे तो छोड़िए, सेना के इस रिटायर अधिकारी को अपना मूल धन वापस नहीं मिल रहा. इस अधिकारी ने धन डबल होने के लालच में पैसा लगा दिया था.

राजस्थान के रहने वाले केएल शर्मा कहते हैं कि उन्होंने अपने गांव के एक एजेंट के लोकलुभाव वादों में आकर पीएसीएल में निवेश कर दिया था पर अब मैं स्तब्ध हूं. कहीं से पैसे मिलने की उम्मीद नहीं दिख रही है. ज्ञात हो कि पीएसीएल पर किसी भी तरह का पैसा उगाहने पर रोक है लेकिन इसके एजेंट अब भी बैकडोर से भोले भाले लोगों से पैसे जमा करा रहे हैं. सहारा की तरह पीएसीएल में भी जिन लोगों ने पैसे लगाए हैं और वापसी की मांग कर रहे हैं, उन्हें पैसे वापस मिलने में कई साल लग जाएंगे और कई किस्म की कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ेगा. 

बात सिर्फ पीएसीएल की ही नहीं है. ऐसी दर्जनों कंपनियों का मामला सेबी और अन्य एजेंसियों के पास पड़ा है लेकिन इनके खिलाफ सहारा जैसी सख्त कार्रवाई नहीं हो पा रही है. इन चिटफंड कंपनियों के आका पूरे सिस्टम को साधने में सफल हो जाते हैं और इस तरह लाख कोशिश के बावजूद सेबी की लाचारी नजर आने लगती है. पीएसीएल का प्रकरण सबसे ज्यादा ज्वलंत और सामयिक है लेकिन यह पूरा मामला मीडिया से इस कदर गायब हुआ पड़ा है कि लोगों कई बार मीडिया की तरफ शक की नजर से देखते हैं. साथ ही अन्य एजेंसीज के कर्ताधर्ता भी शक के दायरे में आते हैं. आखिर क्या वजह है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद पीएसीएल के कर्ताधर्ता अब तक सींखचों के बाहर हैं. उधर, हजारों करोड़ डूबने की आशंका से निवेशक परेशान हैं और मारे-मारे घूम रहे हैं.

मिलेनियम पोस्ट नामक वेबसाइट पर पीएसीएल और इसके मालिक भंगू के बारे में छपी खबर यह बताने के लिए पर्याप्त है कि किस तरह बड़े लुटेरों पर सत्ता-सिस्टम मेहरबान हो जाता है और इनका कुछ भी नहीं बिगड़ता. झेलता सिर्फ गरीब आदमी है. सीरियस फ्राड इनवेस्टीगेशन आफिस यानि एसएफआईओ की तरफ से दर्जनों नोटिस और सम्मन पीएसीएल के मालिक भंगू को भेजे गए लेकिन भंगू ने सबको डस्टबिन में फेंक दिया. पूरी स्टोरी यूं है….

PACL founder Bhangoo not responding to SFIO summons

New Delhi : Pearl Agrotech Corporation Limited’s (PACL) founder Nirmal Bhangoo is not responding to ‘couple of summons’ sent by Serious Fraud Investigation Office (SFIO), an organisation that probes financial frauds. It was found that the company continues to be involved in collecting money ‘illegally’ despite an ongoing CBI inquiry, which is monitored by the Supreme Court.

SFIO has sent letters to Bhangoo’s office in Delhi and Chandigarh on January 28 and February 2 and asked him to respond to it at the earliest. The probe agency, which falls under the Ministry of Corporate Affairs (MCA) asked Bhangoo to explain over his ‘agents’ continued involvement in collecting money mainly from the rural areas.

“He has failed to provide any explanation to us. We have sent reminders but (got) no reply,” sources said.

It was learnt that SFIO wanted to have the exact figures of PACL’s collection and funds mobilised during the period of April 1, 2012 to February 25, 2013. Also, he was asked to provide details of funds collected during April 2013 to August 2013 and in December 2013 to February 2014.

“This is the period, which are crucial in terms of his collection as we are anticipating that the figures could be more. So, far as per our total amount mobilised by the company, by its own admission comes to a whopping Rs 49,100 crore. But we suspect that this could be more and therefore, we have asked for his explanation,” sources said.

Earlier, on November 14, 2014, the SEBI has written an ‘alert letter’ to the MCA and requested it to take action against Company’s agents involved in such activities. Probe revealed that they are mainly targeting people living in the rural areas of South India and some parts of Uttar Pradesh, Bihar and Jharkhand.

Meanwhile, CBI and Serious Fraud Investigation Office (SFIO) made contact with its Australian counterparts to get ‘every single’ piece of information about his other investments.

CBI Chief Anil Sinha had recently claimed that they have formed four separate teams to go deep in to the case. It was learnt that one of the teams, was asked to look in to foreign affairs of Bhangoo and already they are in touch with the Australian authorities in getting details of Bhangoo’s dubious investment in real estate, hotels, sports and remittance business. Also, Indian sleuths are also in touch with the Australasian Consumer Fraud Taskforce (ACFT) to strengthen their case against Bhangoo.

There are reports that Bhangoo has made some investments in Dubai too and that the probe agency will take on with its Dubai counterparts soon. “If required we will also take help from the Interpol to unearth how he came in contact with the notorious fugitive Christopher Skase, who died in 2001.

Bhangoo’s Pearls Australasia Company paid $62 million cash for the luxurious Sheraton Mirage Resort and Spa to Skase, and spent another $20 million on its renovations. There must be some middleman who broke the deal and we need those information,” sources said. (मिलेनियम पोस्ट में प्रकाशित सुजीत नाथ की रिपोर्ट.)

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केसर सिंह, शरद दत्त, विधू शेखर और उदय सिन्हा के खिलाफ नोटिस जारी

: उड़ीसा में भी विधु शेखर और केसर सिंह पर केस, अनशन कर रहे संजय कुमार की हालत खराब : पी7 न्यूज सैलरी विवाद की आंच उड़ीसा तक जा पहुंची है। जिस तरह से चिटफंड कंपनी पीएसीएल के पीड़ित लोग पूरे देश से सामने आ रहे हैं, उसी तरह पीबीसीएल के न्यूज़ चैनल पी7 से जुड़े पीड़ित पत्रकार भी देश भर से अपने हक की आवाज़ उठाते नज़र आ रहे हैं। पी7 चैनल मुख्यालय नोएडा में सैकड़ों पत्रकार कई दिनों से अपने हक के लिए डेरा डाले हैं। वहीं उड़ीसा में भी पत्रकारों ने पी7 न्यूज़ चैनल के खिलाफ लेबर कोर्ट में मामला दाखिल कर दिया है।

लेबर कोर्ट की ओर से कंपनी के डायरेक्टर केसर सिंह, शरद दत्त और ग्रुप एचआर हेड विधू शेखर और एडिटोरियल हेड उदय सिन्हा के खिलाफ नोटिस जारी कर सभी पत्रकारों का बकाया चुकता करने का नोटिस जारी किया गया है। नोएडा सेक्टर 57 स्थित पी7 न्यूज़ के परिसर में पत्रकार संजय कुमार का आमरण अनशन जारी है। सुबह-सुबह संजय कुमार की तबीयत खराब हुई थी। डॉक्टर से परामर्श के उपरांत जबरन उन्हें दवा दी गई है जिससे उनकी स्थिति स्थिर हुई लेकिन शाम होते होते उनका स्वास्थ्य फिर गिरने लगा है। बावजूद इसके संजय कुमार ने अस्पताल जाने से इनकार कर दिया है। आंदोलनकारी पत्रकारों का कहना है कि संजय की इस हालत का ज़िम्मेदार पी7 मैनेजमेंट है। हालांकि आज भी कुछ लोगों का छुटपुट पैसा आया है। लेकिन आंदोलनकारी पत्रकारों का कहना है कि सभी का पैसा आने तक वो यहां से हटने वाले नहीं।

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पीएसीएल ने भारतीय तंत्र को दिखाया ठेंगा, पाबंदी के बावजूद जमकर उगाही जारी

चिटफंड कंपनी पीएसीएल को हजारों करोड़ रुपये का फ्रॉड करने के कारण भले ही सरकारी सिस्टम चौतरफा शिकंजे में लिए हो लेकिन इस कंपनी की सेहत पर कोई असर पड़ता दिख नहीं रहा है. कंपनी के मालिक निर्मल सिंह भंगू के अघोषित आदेश के कारण पीएसीएल का पैसा उगाही अभियान जोरों पर जारी है. एक ताजे आंतरिक सर्वे में पता चला है कि इस कंपनी ने बिहार, यूपी, राजस्थान, मध्य प्रदेश समेत भारत के बहुत बड़े हिस्से में निवेशकों को बरगलाकर पैसे जमा कराने का काम जारी रखा हुआ है.

(राजस्थान का कोटा शहर. यहां चिटफंड कंपनी पीएसीएल का चमचमाता बड़ा सा आफिस बीच शहर में जोर शोर से चालू है. यहां हर रोज लाखों रुपये निवेशकों का जमा कराया जाता है. पीएसीएल के एजेंट स्थानीय लोगों को लंबे चौड़े सपने दिखाकर पैसे जमा कराते हैं और खुद भारी भरकम कमीशन खाते हैं. यह खेल पूरे देश में जारी है. हालांकि सेबी, सुप्रीम कोर्ट समेत कई एजेंसियों संस्थाओं ने इस कंपनी पर पाबंदी लगाकर निवेशकों से पैसे जमा कराने पर रोक लगा दी है और पहले जमा कराए गए पैसे लौटाने को कहा है. पर पीएसीएल के कर्ताधर्ता भारतीय तंत्र को धता बताकर अपना धंधा जारी रखे हुए हैं.)

उधर, जो निवेशक परिपक्वता अवधि पूरी होने के बाद पैसे मांगने कंपनी के आफिस आ रहे हैं तो उन्हें हर हाल में बिना पैसे दिए टरका दिया जा रहा है. इन लोगों को उनका पैसा किसी अन्य स्कीम में डालने का प्रलोभन दिया जा रहा है ताकि पैसा कंपनी से बाहर न जाए. ऐसे हजारों लोगों ने पिछले दिनों पीएसीएल के मालिकों के घरों के सामने प्रदर्शन किया लेकिन अभी तक कोई नतीजा नहीं निकला है. कंपनी प्रबंधन अब भी भारतीय सिस्टम को पटाने और खरीदने में जुटा हुआ है. चर्चा है कि इसी कारण अभी तक भंगू गिरफ्तार नहीं हो पा रहा है.

एक चर्चा यह भी है कि भंगू ने सारी संपत्ति देश से बाहर ले जाकर दूसरे देशों में धंधा जमा लिया है. इसने भारत में अपनी कंपनियों में खुद की पोजीशन ऐसी कर ली है कि मालिक के रूप में दूसरे लोग फंसेंगे, वह खुद को बेदाग निकाल लेने में सफल रहेगा. मास्टर माइंड निर्मल सिंह भंगू के इस खेल पर से आंतरिक सर्वे एजेंसी ने परदा उठाया है.

पर्ल्स और पीएसीएल के संस्थापक निर्मल सिंह भंगू और उनके रिश्तेदारों का पीएसीएल लिमिटेड की तीन में से दो मातृ कंपनियों पर नियंत्रण है. ये ब्योरा 61 वर्षीय भंगू के उस दावे के बाद सामने आ रहा है जिसमें उन्होंने खुद को कंपनी का ‘सलाहकार’ होने का दावा किया. जिन दिनों बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने पीएसीएल लि. से 5.85 करोड़ निवेशकों से जुटाए गए 49,100 करोड़ रुपये लौटाने के लिए कहा था तब भंगू ने सेबी को बताया कि उन्हें कारण बताओ नोटिस गलत भेजा गया है.

पीएसीएल की वार्षिक रिपोर्ट में उसके शीर्ष शेयरधारकों में तीन कारोबारी इकाइयों के नामों का उल्लेख है. ये सिंह एंड सिंह एंड सिंह टाउनशिप डेवलपर्स लिमिटेड याशिका फिनलीज लि. और अलार्मिंग फिनवेस्ट लि. थीं, जिनके पास पीएसीएल की कुल 20 फीसदी हिस्सेदारी थी. निर्मल सिंह भंगू के पास याशिका फिनलीज की 8.84 फीसदी हिस्सेदारी है. निर्मल सिंह भंगू के रिश्तेदार हरविंदर सिंह भंगू की याशिका में 9.55 फीसदी हिस्सेदारी है. शेयर बाजारों को दी गई जानकारियों में इस शख्स और भंगू के बीच संबंध को स्पष्ट नहीं किया गया. इसमें हरविंदर को दिल्ली के पश्चिम विहार का निवासी बताया गया है और पिता / पति के कॉलम में ‘निर्मल सिंह भंगू’ लिखा था. इस प्रकार यह भंगू का बेटे हो सकता है. परिवार के बारे में जानकारी रखने वाले लोगों ने बताया कि भंगू के बेटे का नाम हरविंदर था, जो कुछ साल पहले गुजर गया. उनकी दो बेटियां ऑस्ट्रेलिया में कारोबार का प्रबंधन करती हैं. याशिका की स्थापना वर्ष 1994 में की गई थी.

ऐसे तमाम खेल, गणित, तिकड़मों के जरिए भंगू खुद बचा लेने का मंसूबा पाले हुए है. देखना है कि भारतीय न्याय प्रणाली, भारतीय जांच व्यवस्था भारत के इस सबसे बड़े चारसौबीस को सीखचों के पीछे पहुंचाने और निवेशकों को उनका वाजिब धन दलाने में में कामयाब हो पाती है या फिर सबको चकमा देकर भंगू भारत से भागकर विदेशों में ऐश का जीवन बसर करता रहेगा व भारत के करोड़ों निवेशक अपनी गाढ़ी कमाई के लिए खून के आंसू रोते रहेंगे.

भड़ास4मीडिया के स्पेशल इनवेस्टीगेशन टीम (एसआईटी) के हेड सुजीत कुमार सिंह प्रिंस की रिपोर्ट. संपर्क: 09170257971

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चिटफंड कंपनी पीएसीएल से एक बड़ी खबर आ रही है. इस कंपनी में पैसे लगाने वाले निवेशक इन दिनों बेचैन हैं. चर्चा आम है कि पीएसीएल कंपनी दिवालिया हो गई है. जो भी निवेशक परिपक्वता अवधि पूरे होने के बाद पैसे मांगने जाता है उसे कोई न कोई बहाना बनाकर बिना पैसे दिए लौटा दिया जाता है. इससे नाराज पीएसीएल के सैकड़ों निवेशकों ने पिछले दिनों पीएसीएल कंपनी के मालिक निर्मल सिंह भूंग के गुड़गांव स्थित घर के बाहर प्रदर्शन किया.

गुड़गांव के सेक्टर 57 सुशांत लोक फेज 3 के ब्लाक ए स्थित भंगू के मकान के बाहर सैकड़ों निवेशक जमा हो गए और तोड़फोड़ करने लगे. ये लोग अपने पैसे वापस मांग रहे थे. इन लोगों का कहना था कि कंपनी पिछले दो साल से किसी के भी पैसे नहीं लौटा रही है और तरह तरह के बहाने कर टाल रही है. मौके पर पहुंची पुलिस ने नाराज निवेशकों को शांत किया और कानून अपने हाथ में न लेने की अपील की. पुलिस ने आश्वासन दिया कि पूरे मामले को उच्चाधिकारियों के संज्ञान में लाया जाएगा.

उधर, सेबी और सीबीआई के शिकंजे में फंसी कंपनी पीएसीएल के मालिक भंगू के बारे में सूचना मिल रही है कि वे फरार हो गए हैं. सीबीआई की चार टीमें भंगू को तलाशने और गिरफ्तार करने के लिए बनाई गई हैं. लाखों लोगों को घर का सपना दिखाकर अरबों खरबों रुपये वसूलने वाला निर्मल सिंह भंगू कहां फरार है, ये किसी को पता नहीं चल पा रहा है. पीएसीएल से जुड़े उच्चाधिकारियों ने अपने अपने फोन बंद कर लिए हैं. पूरे देश भर में पीएसीएल के निवेशकों में बेचैनी का माहौल है. चर्चा यहां तक है कि भंगू ने दो तिहाई पैसा भारत के बाहर आस्ट्रेलिया व अन्य देशों में ट्रांसफर करा दिया है और वहां अपना रीयल स्टेट समेत कई तरह के धंधों को जमा लिया है. ऐसे में यह संभव है कि भारत में एक नए किस्म का सारधा घोटाला हो और लाखों लोगों के पैसे मारे जाएं.

इस बीच, केंद्रीय जांच ब्यूरो ने 45 हजार करोड़ रुपये के पीएसीएल पर्ल घोटाला मामले में पर्ल समूह के खिलाफ जांच में तेजी लाने के लिए चार टीमें गठित की हैं. सीबीआई सूत्रों ने बताया कि पर्ल समूह की दो कंपनियों पर्ल एग्रोटेक कॉरपोरेशन लिमिटेड (पीएसीएल) और पर्ल गोल्डेन फॉरेस्ट लिमिटेड (पीजीएफएल) द्वारा पोंजी योजनाों के माध्यम से बटोरी गई हजारों करोड़ के घोटाले की जांच को गति प्रदान करने के लिए चार टीमें गठित की गई हैं. ये टीमें जल्द से जल्द जांच करके त्वरित सुनवाई के लिए अदालत को अपनी रिपोर्ट सौंपेंगी.
    
सीबीआई ने समूह के प्रबंध निदेशक निर्मल सिंह भंगू, उसकी दो कंपनियों तथा निदेशक सुखदेव सिंह के खिलाफ आपराधिक साजिश रचने सहित विभिन्न धाराों के तहत मुकदमा र्दज किया था तथा गत वर्ष फरवरी में पल्र्स समूह के खाते जब्त कर लिये थे. सेबी ने पीएसीएल के परिचालन पर सवाल खड़े किये थे. सेबी का दावा है कि पीएसीएल ने रीयल एस्टेट कंपनी के माध्यम से गरीब निवेशकों से करीब 45 हजार करोड़ रुपये अर्जित किये हैं. उच्चतम न्यायालय ने शारदा चिटफंड घोटाले के अलावा अन्य पोंजी बचत योजनाों की भी जांच का जिम्मा सीबीआई को सौंपा है.

ज्ञात हो कि गैरकानूनी रूप से निवेशकों से धन जमा करने के मामले में अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई करते हुए भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने पीएसीएल लिमिटेड की मनी पूलिंग स्कीम पर रोक लगा दी है. करीब 50 हजार करोड़ की रकम जुटाने वाली इस स्कीम के निवेशकों को उनकी रकम लौटाने का सेबी ने कंपनी को आदेश दिया है. पीएसीएल की स्कीम पर रोक लगाने के साथ ही सेबी ने फर्जीवाडे़ और और नियमों का उल्लंघन करते हुए कारोबार के अनुचित तरीके अपनाने को लेकर कंपनी के नौ प्रोमोटरों और निदेशकों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार कार्रवाई शुरू करने की बात भी कही है.

सेबी ने अपने 92 पन्नों के आदेश में कहा है कि कंपनी की स्वीकारोक्तियों के आधार पर इस स्कीम के तहत जुटाई गई रकम 49,100 करोड़ रुपये बैठती है. सेबी के मुताबिक पीएसीएल की ओर से 1 अप्रैल 2012 से 25 फरवरी 2013 के बीच हस्तांतरित धनराशि संबंधी पूरे विवरण उपलब्ध कराए जाने पर स्कीम के जरिए जुटाई गई राशि कहीं अधिक बैठती. सेबी ने बताया कि पीएसीएल की इस स्कीम के जरिए करीब 5.85 करोड़ ग्राहकों से रकम जुटाई गई है. इसमें वह लोग भी शामिल हैं जिन्हें कथित रूप से रकम के एवज में जमीन दे दी गई है और वह भी, जो अभी जमीन मिलने के इंतजार में हैं. गौरतलब है कि इस मामले में सीबीआई निर्मल सिंह भंगू सहित पीएसीएल के शीर्ष प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों से पूछताछ कर चुकी है. पीएसीएल के प्रोमोटर और निदेशक पर्ल ग्रुप और पीजीएफ ग्रुप के साथ भी जुडे़ रहे हैं.

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पी7 चोर है… पी7 शर्म करो… पी7 प्रबंधन हॉय हॉय… (देखें अनशन स्थल की कुछ तस्वीरें)

पी7 चोर है… पी7 शर्म करो… पी7 प्रबंधन हॉय हॉय… जी हां, ऐसी ही कई तख्तियां लगाकर, आफिस की दीवारों पर चिपका कर अनशन पर बैठे हैं दर्जनों पत्रकार. जबर्दस्त ठंढ में और अपने बीवी-बच्चों को घर पर अकेला छोड़कर दर्जनों पत्रकार साथी खुद के साथ हुई धोखाधड़ी के खिलाफ नोएडा में पी7 आफिस में अनशन पर बैठे हैं. कहा भी जाता है कि अगर पत्रकार अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ नहीं लड़ सकता तो वह दुनिया में चल रहे शोषण उत्पीड़न के खिलाफ कलम किस नैतिकता से उठा सकता है. तो, दर्जनों पत्रकार साथियों ने नोएडा में स्थित पीएसीएल और पर्ल ग्रुप के न्यूज चैनल पी7 के आफिस में डेरा डाल दिया है. 
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इन सच्चे दिल पत्रकार साथियों को मैं सलाम करता हूं. ये लोग लगातार प्रबंधन के खिलाफ नारेबाजी कर रहे हैं और तख्तियों पर नारे लिखकर आफिस के चारों ओर चिपका रहे हैं. पत्रकारों के आंदोलन को न तो कोई न्यूज चैनल कवर करता है और न ही कोई अखबार इसे छापता है. इसलिए हमारी आपकी, यानि सोशल मीडिया वालों की बड़ी जिम्मेदारी बनती है कि हम सब इस आंदोलन को ज्यादा से ज्यादा प्रचारित प्रसारित करें ताकि धन्नासेठों, करप्ट अफसरों और हरामखोर नेताओं के बंद कान खुल सकें व पीड़ित पत्रकारों को न्याय मिल सके. एनसीआर में रहने वाले सभी पत्रकार व गैर-पत्रकार साथियों को धरना स्थल C-55, Sector-57, Noida पहुंचना चाहिए, भले ही घंटे भर के लिए सही. मैं तो चला अब आंदोलनकारियों के बीच. बिछौना वहीं बिछेगा. ये पूरा प्रकरण क्या है, इसे जानने के लिए इस लिंक http://goo.gl/AOXTbH पर क्लिक करके विस्तार से जान समझ सकते हैं. मौके से आईं कुछ तस्वीरें चस्पा कर रहा हूं….

भड़ास के एडिटर Yashwant Singh के Facebook वॉल से.

मूल खबर….

मुकर गए चिटफंडिये भंगू के चेले, नाराज पत्रकारों ने सेलरी के लिए पी7 आफिस में फिर अनशन शुरू किया

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मुकर गए चिटफंडिये भंगू के चेले, नाराज पत्रकारों ने सेलरी के लिए पी7 आफिस में फिर अनशन शुरू किया

जनता के अरबों-खरबों रुपये दबाए बैठी चिटफंड कंपनी पीएसीएल की तरफ से एक चैनल शुरू किया गया था, पी7 न्यूज नाम से. अब जबकि पीएसीएल और इसके मालिक भंगू पर सीबीआई, ईडी, आईटी, सेबी समेत कई एजेंसियों ने पूरी तरह शिकंजा कस दिया है, इस कंपनी के प्रबंधन से जुड़े लोगों ने जनता का जमा धन लौटाने की बात तो छोड़िए, अपने कर्मचारियों तक का बकाया देने से इनकार करना शुरू कर दिया है. पी7 प्रबंधन ने एक बार फिर कर्मचारियों के साथ धोखा किया है.  पिछले दिनों हड़ताली कर्मियों और प्रबंधन के बीच हुए समझौते के मुताबिक प्रबंधन को कर्मचारियों को सैलरी 15 दिसंबर को देना था, लेकिन वो अब तक नहीं दिया है… इससे नाराज सौ से ज्यादा कर्मचारी आज से P7 ऑफिस कार्यालय में धरने पर बैठ गए हैं…

इस बीच कर्मचारियों के धरना प्रदर्शन की खबर मिलते ही डायरेक्टर केसर सिंह, डायरेक्टर शरद दत्त, एचआर हेड विधु शेखर समेत सभी प्रबंधन से जुड़े लोग दफ्तर से नदारद हो गए हैं… आंदोलनरत कर्मचारियों का कहना है जब तक उनको सैलरी और सेटलमेंट की राशि नहीं मिल जाती है तब तक वे यहां से नहीं जाएंगे…. पिछले महीने ही हंगामों के बीच सिटी मजिस्ट्रेट और तमाम अधिकारियों की मौजूदगी में समझौता कराया गया था… इस समझौते के तहत 15 दिसंबर को माह नवंबर की सैलरी और 30 नवंबर को सेटलमेंट की पहली किस्त मिल जानी चाहिए थी…. हैरत की बात तो ये है कि पी7 प्रबंधन ने सिटी मजिस्ट्रेट की तरफ से कराए गए आधिकारिक समझौते को ठेंगा दिखा दिया…..

कर्मचारियों का कहना है कि प्रबंधन निहायत ही नीच है और वो बार बार समझौते का उल्लंघन कर रही है…. कर्मचारियों का आरोप है कि 15 दिसंबर के बाद रोज प्रबंधन की तरफ से कहा जाता है कि आज, कल सैलरी आ जाएगी लेकिन अब दस दिन से ज्यादा हो गए है… आलम ये है कि कर्मचारी परेशान हैं और वे अब सोचकर आए हैं कि जब तक प्रबंधन सैलरी व सेटलमेंट की राशि नहीं देगी तब कर सभी लोग यहीं मौजूद रहेंगे…. कर्मचारियों के रुख देखते हुए डायरेक्टर केसर सिंह और एचआर हेड विधु शेखर मौके से फरार हो गए… कर्मचारी इस मूड में हैं कि जब तक समझौते का हूबहू पालन नहीं होता, वे धरना प्रदर्शन से नहीं उठेंगे…..

अनशन स्थल की अन्य तस्वीरें देखने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें:  पी7 चोर है… पी7 शर्म करो… पी7 प्रबंधन हॉय हॉय…

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दिल्ली में ममता बनर्जी ने एक बार फिर सारधा घोटाले में सीबीआई कार्रवाई को राजनीतिक प्रतिशोध बताया. मुख्यमंत्री ने सवाल किया कि सारधा घोटाले के समय सीबीआई व सेबी आखिर क्या कर रही थी? उन्होंने कहा, हमने पीएसीएल चिटफंड घोटाले के बारे में सुना है, जो 49 हजार करोड़ रुपये का है. इस मामले में सीबीआई ने अब तक कोई गिरफ्तारी क्यों नहीं की? उन्होंने कहा कि राजग सरकार में सीबीआई स्वतंत्र होने के बजाए प्रधानमंत्री कार्यालय के विभाग के तौर पर काम कर रही है. केंद्र इसका इस्तेमाल राजनीतिक हितों के लिए तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ कर रहा है. ममता बनर्जी ने सारधा घोटाले में अपने मंत्री मदन मित्रा की गिरफ्तारी के विरोध में पार्टी सांसदों को दिल्ली में प्रदर्शन करने का निर्देश दिया है. मुख्यमंत्री ने खुले मंच से केंद्र के खिलाफ मोर्चा खोलने का भी एलान किया था.

उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान में भाजपा का रवैया तानाशाही हो गया है. सारधा घोटाले का मुद्दा हमने ही उठाया और इसकी जांच के लिए न्यायिक आयोग का गठन किया. चिटफंड में रुपये गंवाने वाले लोगों को ढाई सौ करोड़ वापस भी कराए. राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के स्वास्थ्य का हालचाल लेने उनसे मुलाकात करने दिल्ली पहुंचीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को चिकित्सकों ने इजाजत नहीं दी. राष्ट्रपति के स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए ममता बनर्जी को उन तक नहीं जाने दिया गया, जिससे वह नाराज भी हो गईं. उनका कहना था कि एक दिन पहले ही अस्पताल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति से मुलाकात की थी, लेकिन उन्हें इजाजत नहीं दी गई. मुख्यमंत्री ने दावा किया कि राष्ट्रपति भवन से उन्हें मुलाकात का समय दिया गया था, इसलिए वह अपना सभी प्रशासनिक काम छोड़ दिल्ली आईं थीं. अंत समय में उनको मना कर दिया गया, जिससे काफी निराशा हुई.

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: तमाम कानूनों और सेबी को शक्ति दिए जाने के बावजदू अब भी बहुत आसान है जनता को ठग लेना : सचमुच लोकतंत्र में लोक यानी प्रजा यानि देशवासी ठगे जाने के लिए ही जन्मे हैं. राजशाही का तो ठगने के मामले में जनता पर पहला अधिकार है ही, अगर उसके बाद किसी को आसानी से ये अधिकार प्राप्त है तो वे हैं इस देश के नटवरलाल. फिर चाहे वे चिटफंड कम्पनियां बना कर लूटें या बुद्धू बना कर. जैसे लोकतंत्र में जनता को लूटने वाले नेताओं से सुरक्षा प्राप्त है फिर भी वह लुटती है और बार -बार लुटती है, जान बूझकर लुटती है, मानो उसे लूटा जाना ही उसकी नियति है वैसे ही बातों के मायाजाल में फांस कर इसी जनता को लूटने वालों से भी बचाने के लिए कानून है लेकिन फिर भी जनता लुटती है, क्योंकि कानून को ऐसे नटवरलाल जेब में रख कर चलते हैं.

अब सेबी को ही लीजिये. अब सब साधनों से संपन्न है ताकि जनता को नटवरलालों से लुटने से रोक सके. लेकिन फिर भी इतनी मजबूर है कि 58 फर्जी कम्पनियों पर रोक लगाने के बावजूद ये कंपनियां जनता को लुटे चली जा रहीं है और सेबी बेचारी बयानबाजी कर रही है कि हमने तो रोक लगा दी, फिर भी कम्पनियां लोगों को उल्लू बनाने वाली योजनायें चला कर लूटे चली जा रहीं हैं. सीबीआई हमारे देश की सबसे ताकतवर इन्वेस्टीगेशन संस्था है लेकिन उसकी जांच है कि चार साल में भी पूरी नहीं हो पा रही है. हो भी कैसे, जब मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री और सांसद से लेकर विधायक तक सीधे-सीधे या दायें-बाएं से लूट में शामिल हों. नेताओं से लेकर खिलाड़ी तक इसमें साझीदार हों तो कौन इस गोरखधंधे में हाथ डाले. फिर वह सीबीआई ही क्यों न हो. रोज कानून बन रहे हैं या बनाये जाने के आश्वासन हैं लेकिन सारे के सारे कानून चिटफंड के इन ‘होनहारों’ से हलके सिद्ध हों तो कैसे बचेगी जनता लुटने से.

इन चिटफंडवालों के पास सब कुछ है. नेता से लेकर अभिनेता तक. कानून से लेकर कचहरी तक. पुलिस से लेकर प्रशासन तक. गुंडों से लेकर पत्रकारों तक. बल्कि पत्रकारों को तो अपनी चेरी बनाने का शगल हो गया है इनका. हर चिटफंडिया कोई न कोई चैनल या अखबार निकाले जा रहा है. फिर कौन आवाज उठाये इन पर. लेकिन आवाज तो उठ रही है. नहीं उठ रही होती तो सहारा जेल में न होते. भंगु फरार न होते. तमाम चिटफंड वाले जेल की यात्रा न कर आये होते. और, कितने जाने की तैयारी न कर रहे होते. सिर्फ इतना हो जाए कि जो भी कार्यवाहियां चल रहीं हैं, अगर वे पटरी पर तेजी से चल जाएँ, तो वे गरीब और अशिक्षित लोग लुटने से बच जाएँ जो पढ़े -लिखे नहीं हैं जो बड़ी मुश्किलों से अपना पेट काटकर इस उम्मीद में कि चार पैसे बच जाएँ और फिर डबल भी हो जाएँ तो आड़े वक़्त में उनके काम आयें. उन मासूमों को क्या पता कि जिस पैसे को वे आड़े वक़्त के लिए बचा रहे है, नटवरलालों की उस पर बुरी नजर है, थी और रहेगी. जो इन नटवरलालों के पसंदीदा शिकार हमेशा रहे हैं और रहेंगे. काश सरकार शारदा के सुदीप्तो, सहारा के सुब्रतो और पीएसीएल – पर्ल्स के भंगुओं टाइप लोगों को एक अपराधी की ही तरह माने और कानून उन्हें भटका हुआ न मान कर उनके साथ रियायत न बरते तो…

लेखक हरिमोहन विश्वकर्मा चिटफंड के मामलों के विशेषज्ञ हैं. उनसे संपर्क vishwakarmaharimohan@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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‘PACL’ की असलियत : परिपक्वता अवधि पूर्ण होने के बाद भी एजेंट का लाखों रुपये दाबे बैठी है कंपनी

लगता है पीएसीएल कंपनी भी धराशाई होने की कगार पर है. यही कारण है कि यह कंपनी अपने निवेशकों का धन उन्हें परिपक्वता अवधि पूरी होने के बाद लौटा नहीं रही है. भड़ास4मीडिया को भेजे एक मेल में पीएसीएल के एक निवेशक सुरेंद्र कुमार पुनिया ने बताया है कि उनका इस कंपनी में एजेंट कोड Agent Code 1950022771 है. इनके कुल आठ एकाउंट हैं जिसमें कुल चार लाख रुपये यानि 4,00,000/- जमा हैं. इनकी परिपक्वता अवधि दिसंबर 2013 और जनवरी-फरवरी 2014 थी. पर कंपनी पैसे लौटाने में आनाकानी कर रही है. सुरेंद्र ने PACL Amount Refund मामले में भड़ास से दखल देने की गुजारिश की है.

ज्ञात हो कि ऐसे मामलों को सेबी देखती है और सेबी ही वो प्लेटफार्म है जहां निवेशक / एजेंट सीधे मेल कर रिफंड की फरियाद लगा सकते हैं. Surendra Punia की मेल आईडी surendrak.punia@gmail.com है.  सुरेंद्र पुनिया तो मात्र एक उदाहरण हैं. ये मेल लिख भेज लेते हैं इसलिए इनकी बात सुनी भी जा रही है, प्रकाशित भी हो रही है. लेकिन ऐसे हजारों एजेंट हैं जो अपढ़ हैं और मेल वगैरह का इस्तेमाल नहीं करते. वे लोग अपनी शिकायत बात कहां रख पाते होंगे. पीएसीएल के कई एजेंटों का कहना है कि उन्हें परिपक्वता अवधि पर पैसा लौटाने की जगह कंपनी किन्हीं दूसरी योजनाओं में पैसा लगवा दे रही है, वह भी बिना सहमति लिए. ऐसी गुंडागर्दी देखकर आज ये निवेशक / एजेंट उस क्षण को कोस रहे हैं जब उन्होंने अपना पैसा पीएसीएल में लगाने का फैसला किया.

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सुब्रत राय की राह पर निर्मल सिंह भंगू… SEBI ने दिया आदेश- निवेशकों को 50 हजार करोड़ रुपये PACL लौटाए

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‘पी7 न्यूज’ के निदेशक केसर सिंह को हड़ताली कर्मियों ने बंधक बनाया, चैनल पर चला दी सेलरी संकट की खबर

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सहारा की कई कंपनियां आज भी मार्केट से पूंजी उठाने में जुटीं हैं… कहां है सेबी?

चिटफंड कम्पनी टिम्बरवर्ल्ड के खिलाफ निर्णय सुनाते हुए दिल्ली की तीसहजारी कोर्ट ने सेबी के हुक्मरानों को भी खरी-खरी सुना दी. कोर्ट ने कहा है कि यदि नियामक संस्थाओं ने सुस्ती या लापरवाही न दिखाई होती और समय पर सख्त कार्यवाई की होती तो आज निवेशकों के करोड़ों रुपये डूबने से बच जाते. कोर्ट ने कम्पनी पर 25 करोड़ का जुर्माना लगाया है. इस कम्पनी ने नियमों की कमजोरी का फायदा उठाते हुए बाजार से सामूहिक निवेश के जरिये 22 करोड़ रुपये उठाये और फिर अन्य चिटफंड कम्पनियों की तरह कभी वापस नहीं किया. Continue reading

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पी7 न्यूज प्रबंधन अपने कर्मियों को 15 जनवरी तक फुल एंड फाइनल पेमेंट दे देगा, बवाल खत्म

पी7 न्यूज चैनल से सूचना आ रही है कि कल देर रात हड़ताली मीडियाकर्मियों और प्रबंधन के बीच समझौता हो गया. ये समझौता असिस्टेंट लेबर कमिश्नर शमीम अख्तर, सीओ द्वितीय अनूप सिन्हा और सिटी मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में हुआ. समझौते पर प्रबंधन की तरफ से केसर सिंह, शरद दत्त, विधु शेखर और उदय सिन्हा ने हस्ताक्षर किए. समझौते के मुताबिक प्रबंधन अपने स्टाफर और कांट्रैक्ट पर कार्य करने वाले कर्मियों को नवंबर खत्म होने से पहले अक्टूबर की सेलरी मिल जाएगी. 15 दिसंबर तक नवंबर की सेलरी मिल जाएगी. 30 दिसंबर तक फुल एंड फाइनल पेमेंट का आधा हिस्सा मिल जाएगा. 15 जनवरी को बाकी सारे ड्यूज क्लीयर कर देंगे.

हड़ताली कर्मियों के दबाव में प्रबंधन तीन महीने की सेलरी बतौर कंपनसेशन देने के लिए राजी हुआ है. प्रबंधन की कोशिश थी कि सिर्फ एक महीने की सेलरी कंपनसेशन के रूप में दी जाए लेकिन कर्मियों ने साफ कर दिया कि वे तीन महीने से कम कंपनसेशन नहीं लेंगे. अंततः कर्मचारियों की एकता और दबाव के कारण प्रबंधन को झुकना पड़ा. प्रबंधन ने साफ कर दिया कि उनकी मंशा अब चैनल चलाने की नहीं है. 30 नवंबर तक वह सब कुछ बाइंड अप कर देंगे. 30 नवंबर तक चैनल कर्मी चाहें तो आफिस आ सकते हैं.

प्रबंधन और कर्मियों के बीच हुए समझौते को बाकायदा लीगल डाक्यूमेंट पर लिखा गया और दोनों पक्षों ने हस्ताक्षर किए. असिस्टेंट लेबर कमिश्नर ने मीडियाकर्मियों की तरफदारी करते हुए प्रबंधन पर दबाव डाला कि वह कर्मियों के हितों की कतई अनदेखी ना करे और सारे ड्यूज दे. सिटी मजिस्ट्रेट ने कहा कि वह मौके पर इसीलिए आए हैं ताकि समझौते को लीगल रूप दिया जा सके जिससे कोई पक्ष बाद में मुकर ना जाए.

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‘पी7 न्यूज’ के निदेशक केसर सिंह को हड़ताली कर्मियों ने बंधक बनाया, चैनल पर चला दी सेलरी संकट की खबर

कई महीनों से सेलरी के लिए लड़ाई लड़ रहे पीएसीएल / पर्ल समूह के न्यूज चैनल पी7 न्यूज के हड़ताली कर्मचारियों के सब्र का बांध आज टूट गया. इन कर्मियों ने अपने ही चैनल पर सेलरी संकट की खबर चलाlते हुए चैनल का प्रसारण रोक दिया. साथ ही कई महीनों की बकाया सेलरी देने की मांग करते हुए चैनल के निदेशक केसर सिंह को उनके केबिन में ही बंधक बना लिया. कर्मचारियों का आरोप है कि केसर सिंह गुपचुप तरीके से चैनल बंद कर भागने और बकाया सेलरी हड़पने की फिराक में थे.

हड़ताली कर्मियों ने सेलरी दिए बिना अपने चैनल निदेशक को आफिस से न जाने देने का ऐलान कर दिया. इस तरह केसर सिंह को उनके ही कक्ष में बंधक बना कर बिठा दिया. उग्र कर्मचारियों ने निदेशक कक्ष के दरवाजे को घेर लिया और वहीं खड़े होकर निदेशक से सेलरी देने की मांग करते हुए नारेबाजी करने लगे. देर तक चले हंगामे के बाद प्रबंधन की तरफ से किसी ने नोएडा पुलिस को सूचित किया तो पुलिस मौके पर पहुंची और केसर सिंह को सुरक्षित निकालने की कोशिश कर रही है. वहीं नाराज कर्मचारियों का कहना है कि कंपनी अपने अफसरों पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है लेकिन जी जान से काम करने वाले कर्मचारियों को पैसे नहीं दे रही है. चैनल के आफिस नोएडा सेक्टर 57 में हड़ताली कर्मचारियों का हंगामा जारी है. सूचना है कि पुलिस मौके पर पहुंच गई है.

मूल खबर….

चैनल बंद कर भाग रहे निदेशकों को पी7 न्यूज कर्मचारियों ने घेरा, आफिस में बवाल

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चैनल बंद कर भाग रहे निदेशकों को पी7 न्यूज कर्मचारियों ने घेरा, आफिस में बवाल

नोएडा से खबर है कि पी7 न्यूज चैनल बंद करके भाग रहे निदेशकों को मीडियाकर्मियों ने घेर लिया है. कई महीने से सेलरी न मिलने से नाराज मीडियाकर्मी चैनल के निदेशकों केसर सिंह आदि को उनके केबिन से बाहर नहीं निकलने दे रहे हैं. मीडियाकर्मियों का आरोप है कि चैनल के निदेशकगण सेलरी न देने और बकाया पैसा हड़पने के इरादे से गुपचुप तरीके से चैनल बंद कर फरार होने की तैयारी कर रहे थे.

श्रम विभाग और प्रोविडेंट फंड डिपार्टमेंट समेत कई विभागों की तरफ से इन दिनों चैनल प्रबंधन पर कर्मचारियों को उनका बकाया भुगतान और पीएफ आदि के पैसे देने को लेकर दबाव बनाया जा रहा है. ये कई विभाग चैनल के अंदर अनियमितताओं की जांच भी कर रहे हैं. देश भर में चिटफंड के कारोबार से हजारों करोड़ रुपये इकट्ठे करने वाली कंपनी पीएसीएल इन दिनों सेबी और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद से संकट में फंस गई है. बावजूद इसके पीएसीएल की तरफ से बैकडेट में निवेशकों से अवैध उगाही का कार्यक्रम जारी है.

ये कंपनी अपने कर्मचारियों को सेलरी देने में खुद को अक्षम बता रही है लेकिन कंपनी के पदाधिकारियों पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रही है. चैनल के हड़ताली कर्मचारियों ने साफ कर दिया है कि वे बिना सेलरी लिए जाने वाले नहीं हैं, भले ही इसके लिए उन्हें चैनल गेट के सामने आमरण अनशन करने को मजबूर होना पड़े. खबर लिखे जाने तक पी7 न्यूज चैनल के नोएडा मुख्यालय में हंगामा मचा हुआ है. कई मीडियाकर्मियों ने भड़ास को फोन करके जानकारी दी कि चैनल निदेशक सेलरी न देने के लिए चैनल बंद करके भागने की फिराक में थे जिन्हें रोक लिया गया है और उन्हें चैनल से बाहर नहीं निकलने दिया जा रहा है.

इसके आगे की कथा पढ़ने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें…

‘पी7 न्यूज’ के निदेशक केसर सिंह को हड़ताली कर्मियों ने बंधक बनाया, चैनल पर चला दी सेलरी संकट की खबर

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बिहार में पीएसीएल के चार ठिकानों पर छापेमारी, बैकडेट में जमा करा रहे थे पैसे

बिहार में ‘जमाकर्ता हित संरक्षण अधिनियम’ के तहत पहली बार आर्थिक अपराध इकाई (इओयू) ने पर्ल एग्रो टेक कॉरपोरेशन लिमिटेड (पीएसीएल) के खिलाफ कार्रवाई की है. इओयू ने कंपनी के पूर्णिया, वैशाली, सासाराम और बिहारशरीफ स्थित कार्यालयों पर छापेमारी कर करीब 20 लाख रुपये नकद बरामद किया और कुछ कार्यालय संचालकों और प्रबंधकों को गिरफ्तार किया. चारों जिलों में कंपनी के नौ निदेशकों सह प्रमोटरों पर एफआइआर दर्ज की गयी है.

बिहार में जिन जिलों में छापेमारी की गयी है, वहां पाया गया कि पीएसीएल लोगों से पैसा तो आजकल में ले रही थी, लेकिन उन्हें रसीद बैक डेट यानी 21 अगस्त, 2014 का दे रही थी. लोगों को यह झांसा दे रही थी कि बैक-डेट से रसीद दे रहे हैं, तो ब्याज भी उसी दिन से देंगे. इस झांसे में लोग बड़े आराम से फंस रहे थे. साथ ही जो लोग अपने पहले से जमा किये पैसे लौटाने की जिद कर रहे थे, उन्हें वर्तमान जमा राशि से ही लौटा रहा था. बिहार में कंपनी का आफर था कि किस्तों में पैसा दें और जमीन ले जाएं. पूर्णिया, वैशाली, नालंदा समेत कई जिलों में लैंड ब्लॉक होने की बात कंपनी कहती थी, लेकिन जांच में ऐसा कुछ नहीं मिला. इसके अलावा कंपनी कई तरह के लोक लुभावने ‘कलेक्टिव इंवेस्टमेंट स्कीम’ के तहत लोगों से पैसा जमा करवाती थी.

पूर्णिया से मिली जानकारी के अनुसार आर्थिक अपराध इकाई के निर्देश पर सोमवार को स्थानीय बस स्टैंड के सामने पाल मार्केट स्थित पीएसीएल ननबैंकिंग कंपनी के कार्यालय में की गई छापामारी में गिरफ्तार हुए शाखा प्रबंधक समेत 11 कर्मियों को मंगलवार को जेल भेज दिया गया है जबकि पुलिस ने इस मामले में कंपनी के डायरेक्टर समेत 23 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर आगे की कार्रवाई शुरू कर दी है. छापामारी के दौरान गिरफ्तार हुए शाखा प्रबंधक मनोज कुमार कर, सीनियर सहायक गोपाल कुमार मिश्र, बबन कुमार, सहायक गौतम कुमार, स्टोर कीपर अजीत कुमार के अलावा मृत्युंजय कुमार, चन्द्रमणि कुमार सिंह, अमरेन्द्र कुमार गुप्ता, नीरज कुमार सिंह, अरूण कुमार राव एवं रामजी सिंह को पुलिस ने आवश्यक कार्रवाई के बाद जेल भेज दिया है. पुलिस ने इसके अलावा पीएसीएल कंपनी के डायरेक्टर सुखदेव सिंह तथा दिल्ली स्थित कार्यालय के निर्मल सिंह भंगू, आनंद गुरूवंत सिंह, तरलोचन सिंह, गुरूनाम सिंह, उत्पल, दविन्द्र कुमार, योगिन्द्र सिंह, गुरमीत सिंह, सुब्रतो भट्टाचार्य के साथ-साथ कोलकाता के आईटी सुपरवाइजर शशिकांत मोहंती, पटना शाखा के सीएससी प्रभारी सतीश कुमार जैन, सीनियर असिसटेंट अजय कुमार के खिलाफ भादवि की धारा 406, 420, 468, 471, 109, 120 बी, 34 एवं सेक्शन 3 बिहार प्रोटेक्शन आफ इंटरेस्ट आफ डिपोजिट एक्ट 2002 सेक्शन 66 आई टी एक्ट के तहत प्राथमिकी दर्ज कर आगे की कार्रवाई शुरू कर दी गई है. सेबी के रोक के बावजूद तीन माह के भीतर ग्राहकों से करीब सवा करोड़ की राशि अवैध तरीके से जमा लिए गए थे जबकि सेबी ने तीन माह के अंदर ग्राहकों को रुपया वापस करने का निर्देश दिया था. 17 नवंबर तक राशि जमा करने वालों को भी 21 अगस्त का ही रसीद दिया जाता था. छापामारी के दौरान पुलिस ने लगभग साढ़े चार लाख नगद एवं पीएनबी एवं एक्सिस बैंक के कई चेक बुक भी बरामद किए थे जो फर्जी तरीके से राशि का लेनदेन करते थे. इस मामले में नामजद अभियुक्तों में से 11 को जेल भेज देने के बाद अन्य अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए कार्रवाई तेज कर दी गई है.

उल्लेखनीय है कि पर्ल ग्रुप के 45 हजार करोड रुपये के घोटाले की अब तक की जांच के दौरान सीबीआई को अनेक ऐसे दस्तावेज बरामद हुए है जिनसे पता चलता है कि जाली भूमि आवंटन पत्रों को जारी कर भारी मात्रा में निवेश इकट्ठा किया गया. सीबीआई ने ग्रुप के लगभग एक हजार संदेहास्पद बैंक खातों को सील कर दिया है और ग्रुप के निदेशको से अनेक बार पूछताछ करने के बाद उनके विदेश जाने पर रोक लगा दी है. प्रवर्तन निदेशालय ने भी पीएसीएल के खिलाफ मनी लांड्रिग एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर अनेक लोगों से पूछताछ की है. पीएसीएल के इस झांसे में देश के करीब 5 करोड़ निवेशक आ गए . कंपनी में करीब 45 हजार करोड़ रुपये निवेश हुआ. आरोप है कि जब पैसा लौटाने की बात आई तो निेवेशक को नहीं उनका पैसा मिला . पर्ल्स एग्रोटेक कॉर्पोरेशन लिमिटेड यानी पीएसीएल पर जाली दस्तावेजों के जरिए कई भूमि आवंटन करने का आरोप. कंपनी के एक हजार खाते शक के आधार पर सीज. कंपनी के प्रमुख प्रमोटरों के विदेश जाने पर रोक. पीएसीएल के खिलाफ सीबीआई ने आपराधिक षडयंत्र और धोखाधडी के तहत मुकदमा दर्ज किया. पीएसीएल का मामला शारदा घोटाले से अलग एक ही जमीन के कागज कई लोगों के पास अनेक राज्यों में जमीनों के दस्तावेजों की जांच जारी ईडी ने भी लोगों से पूछताछ शुरू की. सीबीआई ने इसी साल फरवरी महीने में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर पीएसीएल और उसकी सहयोगी कंपनी पीजीएफ के खिलाफ 45 हजार के तथाकथित घोटाले में जांच शुरु कर अनेक शहरो में छापेमारी की थी. इस छापेमारी के दौरान सीबीआई को एक ट्रक से भी ज्यादा दस्तावेज बरामद हुए थे. इन दस्तावेजों की अब तक की जांच के दौरान सीबीआई को जमीनों के आवंटन को लेकर अनेक ऐसे दस्तावेज मिले है जिनसे पता चलता है कि एक ही जमीन कई लोगों को आवंटित कर दी गई. छापे में मिली जमीनों की सेल डीड ट्रासंफर डीड और टाईटल डीडो की मौके पर पहुंच कर जांच की जा रही है.

कुछ दस्तावेज की जांच से पता चला है कि कई जगहो पर कंपनी ने अपनी जमीनें दिखाई थी लेकिन सीबीआई अधिकारी जब जांच के लिए उन जगहो पर पहुंचे तो वहा वह जमीनें नहीं थी जैसा कि कंपनी ने दावा किया था. सीबीआई ने मध्य प्रदेश सरकार के साथ मिल कर भी कई जमीनों की जांच की है और अनेक राज्यों में सीबीआई की टीमें जमीनों और खाताधारकों दोनों की जांच कर रही है . सीबीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस मामले में पीएसीएल कंपनी के निदेशको से कई चरणों में पूछताछ की गई है और पूछताछ के बाद पासपोर्ट अथारिटी को सूचित कर दिया है कि कंपनी के मेन प्रमोटर्स के लिए विदेश जाने पर रोक लगा दी गई है. अधिकारी ने बताया कि शक के आधार पर कंपनी के एक हजार बैंक खातों को सीज कर दिया गया है. सीबीआई का अधिकारिक तौर पर कहना है कि इस मामले की जांच के दौरान ऐसे तमाम सबूत मिले है जिनसे पता चलता है कि कंपनी ने आपराधिक षडयंत्र और धोखाधडी के जरिए पैसे एकत्र करने का काम किया मसलन जब पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने पीएसीएल कंपनी को अपनी योजना को खत्म करने और निवेशको का पैसा वापस करने को कहा तो दिल्ली में दूसरे नाम से जाली योजना चलाई गई औऱ इसके लिए दूसरी कंपनी खोल ली गई. आरोप है कि दिल्ली की इस दूसरी कंपनी ने नए निवेशको से फंड इकट्ठा किया औऱ पहली कंपनी के निवेशकों को इसके जरिए पैसा वापस किया गया . पीएसीएल के खिलाफ सीबीआई के अलावा प्रवर्तन निदेशालय ने भी मनी लाड्रिग एक्ट यानि पीएमएलए के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया है और इस बाबत अनेक लोगों से पूछताछ की जा रही है ईडी जानना चाहता है कि इस मामले में कहीं हवाला के जरिए पैसा बाहर तो नहीं भेजा गया ईडी ने इस मामले में अधिकारिक तौर पर केवल इतना कहा कि मामले की जांच जारी है.

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सेबी का आदेश- पीएसीएल नामक कंपनी के पास कोई मान्यता नहीं, जनता पैसा न लगाए

सेबी ने अखबारों में विज्ञापन निकालकर आम जन को आगाह किया है कि वे पी7न्यूज चैनल चलाने वाली कंपनी / समूह ‘पीएसीएल’ नामक कंपनी में एक भी पैसा न लगाएं क्योंकि इस कंपनी के पास किसी तरह का कोई लाइसेंस या मान्यता नहीं है. सेबी का कहना है कि जो कोई भी इस कंपनी में पैसा लगाएगा या लगाए हुए है, वह खुद जिम्मेदार होगा और इसका जोखिम वह खुद झेलेगा. जनहित में जारी विज्ञापन की कटिंग इस प्रकार है…

उधर, पीएसीएल समेत शारदा, सहारा जैसी चिटफंड कंपनियों में संकट आ जाने के बाद इनके एजेंट बेहद परेशान हैं. आंकड़े कहते हैं कि ये घोटाला उजागर होने से अब तक शारदा से जुड़े ३० एजेंट भी आत्महत्या कर चुके हैं और कई के सामने मरने के अलावा कोई और चारा नहीं बचा है. ऐसा ही सहारा काण्ड उजागर होने के बाद सामने आ रहा है जहां उसके कई एजेंट आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं. ये वो लोग हैं जिन्होंने सहारा, शारदा, रोजवैली और पर्ल्स जैसी कम्पनियों के झांसे में आकर मोटी रकमें जनता से उगा कर दीं और अब परेशान -हलकान हैं. पहले चिटफंड काण्ड में फंसे असम के एक्स डीजीपी बरुआ ने ख़ुदकुशी कर ली और अब सांसद कुणाल घोष ने कोशिश की जान देने की.

आखिर कौन हैं इस सबकी हत्याओं के लिए जिम्मेदार लोग? जो जेल में बंद है और चैन की रोटी खा रहे हैं वो या ममता बनर्जी जैसे लोग, जिन्होंने सत्ता के साथ ऐसे लोगों का कॉकटेल बनाया और आगे बढ़ने के बाद इन कम्पनियों और जनता दोनो को मरने को छोड़ दिया। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के अलावा उड़ीसा में भी अब ऐसी कम्पनियों पर कार्यवाई चल रही है लेकिन बड़ा सवाल ये उठता है कि ऐसी कंपनियां किन कानूनों के लचीलेपन का लाभ उठा कर इतना लंबा रास्ता तय कर लेतीं हैं कि लाखों क-करोड़ों लोग इनके जाल में फंस जाएँ और अपनी जमा पूंजी गवां बैठें।

आज देश के बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र ऐसी कम्पनियों के संजाल में हैं, पच्छिम बंगाल में शारदा और रोजवैली जैसी कम्पनियों का भंवरजाल सामने आ ही गया है, मध्य प्रदेश में लगभग ५० कंपनियां शिकंजे में हैं और हाल ही में छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में बड़ी संख्या में इन कम्पनियों पर कार्यवाई जारी है, लेकिन फिर भी ये सवाल अपनी जगह खड़ा है कि कौन है इन कम्पनियों को बढ़ावा देने वाली वे ताक़तें जो इन्हें अभयदान देतीं है कि वे जनता का आर्थिक शोषण कर सकें? सवाल का जवाब शायद हमारे राजनेता, प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों का वर्ग दे सके जो इन्हें अपनी नाक के नीचे पलने का मौक़ा देता है लचीले कानूनों की आड़ का बहाना बना कर, क्योंकि इनके लिए ये धन की अमरबेल बन जातीं है.

हरिमोहन विश्वकर्मा की रिपोर्ट.

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पर्ल ग्रुप पर पीएफ डिपार्टमेंट का छापा, बड़ा गड़बड़-घोटाला मिला

पर्ल ग्रुप की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही है। पहले निवेशकों को सपना दिखाकर उनसे उनकी गाढ़ी कमाई लूट कर धोखा किया गया और अब पर्ल्स ग्रुप के अधीन चल रहे न्यूज़ चैनल ‘पी7’की स्थिति लगातार चरमराती चली जा रही है। जहाँ चैनल ने अपने कर्मचारियों को सितम्बर से अब तक सैलरी नहीं दी है और मामला लेबर कमिश्नर की चौखट पर है वहीं बेशरमी की हद पार करते हुए चैनल का एक और फ्रॉड सामने आया है।  ताजा मामला पीएफ से जुड़ा हुआ है।  बताया जा रहा है कि चैनल ने पिछले सात महीने से कर्मचारियों का पीएफ ही नहीं जमा किया है। इस बात की पुष्टि तब हुई जब पीएफ डिपार्टमेंट की स्क्वाड टीम ने शुक्रवार को दोपहर 12 बजे चैनल में छापा मारा।

ये भी पता चला है कि मीडियाकर्मियों की सैलरी से हर महीने THE EMPLOYEES’ PROVIDENT FUNDS AND MISCELLANEOUS PROVISIONS ACT, 1952 के नाम पर लाखों रुपये काटा जा रहा था लेकिन इसको चैनल ने प्रोविडेंट फंड की बजाय पर्सनल फंड के तौर पर हज़म कर लिया और पिछले सात महीनों से पीएफ डिपार्टमेंट को पैसा जमा नहीं किया। सूत्रों के मुताबिक पीएफ डिपार्टमेंट को शिकायत मिली थी की चैनल ने पिछले कई महीनों से पीएफ का पैसा जमा नहीं किया है जिसके बाद असिस्टेंट कमिश्नर की अगुवाई में तीन लोगों की स्क्वाड टीम ने चैनल में छापा मारा और तमाम कागज़ातों और फाइलों को खंगालने के बाद कंपनी के फॉर्म ५ को अपने कब्ज़े में ले लिया। 

ये भी बताया जा रहा है पीएफ कार्यालय से आई टीम ने चैनल के एचआर से करीब तीन घंटे तक पूछताछ की। साथ ही चैनल मैनेजमेंट को हिदायत दी कि शुक्रवार शाम ५ बजे तक पीएफ ऑफिस, नॉएडा में पीएफ का बकाया जमा कर दें नहीं तो चैनल के निदेशक समेत कई लोगों के खिलाफ नोएडा के सेक्टर २४ में violation of Section 6 of the Employees Provident Fund & Miscellaneous Provisions Act, 1952 में मामला दर्ज करा दिया जायेगा। इसके तहत आईपीसी की धारा Section 406/409 में मामला दर्ज हो जायेगा।  इस छापे के बाद चैनल में हड़कंप मच गया जिसके बाद बताया जा रहा है कि करीब लाखों रुपये पीएफ का बकाया होने पर शाम को चैनल के मैनेजमेंट ने पीएफ ऑफिस में जाकर करीब अगस्त तक का EMPLOYEE CONTRIBUTION तो जमा कर दिया लेकिन EMPLOYER CONTRIBUTION जमा नहीं किया जिसके बाद पीएफ ऑफिस ने चैनल के प्रबंधन को १० नवंबर तक बकाया राशि जमा करने को कहा है। फिलहाल चैनल ने सितम्बर से अभी तक सैलरी नहीं दी है जिसके चलते मीडियाकर्मी परेशान है।

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‘पी7न्यूज’ में रमन पांडेय समेत कई वरिष्ठों की नो इंट्री, चैनल की कमान उदय सिन्हा को

जब लुटिया डूबती है तो हर कोई इसके आगोश में आ जाता है।  कुछ ऐसा हाल इन दिनों पर्ल्स ग्रुप के चैनल “पी7” का है। खिसयानी बिल्ली खम्बा नोचे वाली कहावत के तहत पी7 चैनल का मैनेजमेंट अपने कर्मचारियों के साथ बदतमीजी पर उतारू है। आउटपुट हेड रमन पांडेय समेत कई लोगों की चैनल में नो एंट्री कर दी गयी है। पीएसीएल ग्रुप सेबी के शिकंजे में जबसे फंसा है तबसे इसके मीडिया वेंचर का बुरा हाल है। चैनल की आर्थिक स्थिति कई महीनों से खराब है और लगातार बिगड़ती जा रही है।  वक्त से सैलरी न मिल पाने के कारण चैनल के साथ जी जान से काम करने वाले कर्मचारी परेशान हैं।

जुलाई से सैलरी की दिक्कत से जूझ रहे कर्मचारी अपनी हक़ की लड़ाई के लिए लेबर कमिश्नर तक पहुंच गए हैं। लेबर कमिश्नर की दखलंदाज़ी के बाद लोगों की अगस्त तक की तो सैलरी तो दे दी गयी लेकिन सितम्बर और अक्टूबर की सैलरी का पता नहीं है। कर्मचारी जब अपनी समस्या को लेकर लेबर कमिश्नर तक पहुंचे तो चैनल के मैनेजमेंट और कुछ चम्पुओं को ये बात नागवार गुजरी। इसके बाद अब मीडियाकर्मियों को निशाना बनाने के लिए एचआर द्वारा रोज कोई न कोई नया रूल बनाया जा रहा है। कर्मचारियों को इसलिए परेशान किया जा रहा है क्योंकि उन्होंने अपनी सैलरी की लड़ाई को लेबर कोर्ट तक पहुंचा दिया है।

लेबर कमिश्नर की लगातार लताड़ से प्रबंधन काफी परेशान है। लेबर कमिश्नर ने नोटिस भेजा है कि अगर प्रबंधन सैलरी देने में असमर्थ है तो उसके खिलाफ रिकवरी की कार्रवाई क्यों न की जाए।  असिस्टेंट लेबर कमिश्नर शमीम अख्तर की तरफ से चैनल को हिदायत दी गयी कि जब तक सबकी सैलरी नहीं दी जाती तब तक प्रबंधन किसी भी कर्मचारी को परेशान ना करे या उसको नहीं निकाले। इसके बावजूद रूल4 का उल्लंघन करते हुए चैनल ने तुगलकी फरमान जारी रखा और कई लोगों की चैनल के गेट पर नो एंट्री लगा दी है। उन सभी से ये बोला गया है कि वो अपना इस्तीफा दे दें।  इनमें आउटपुट हेड रमन पांडेय समेत कुल 7 लोगों को नो एंट्री का फरमान सुनाया गया है।  गार्ड्स को इन सभी को रोकने के लिए बोला गया है। मतलब साफ है कि किसी तरह इनको परेशान कर इनसे इस्तीफा माँग लो।  वहीं अब चैनल का सारा काम-काज लगभग उदय सिन्हा को सौंप दिया गया है। इनपुट, आउटपुट और पीसीआर डिपार्टमेंट का हेड फिलहाल कोई नहीं है। सारा कुछ उदय सिन्हा के निर्देशन में हो रहा है। बताया जा रहा है कि करीब 50 लोगों की लिस्ट प्रबंधन ने तैयार कर ली है जिनको अब बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा।  खासकर मोटी सैलरी वालों को प्रबंधन निकालना चाहता है।

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कंपनी के मालिकों को बचाने के चक्कर में दलाल बन गए चिटफंडिया चैनलों के कई पत्रकार

इन दिनों कई चिटफंडिया चैनलों के पत्रकार दलालों की भूमिका में नज़र आ रहे हैं. नौकरी करने और बचाने के चक्कर में पत्रकार इन चिटफंड माफियाओं के दलाल बन गए हैं. जिसकी दलाली रास नहीं आती, वो जल्द ही चैनल छोड़ देते हैं. जिन चिटफंडिया पत्रकारों में पत्रकारिता कम, दलाली का हुनर ज्यादा है, उनकी गाड़ी निकल पड़ी है. पी7 न्यूज  नामक टीवी चैनल का हाल सबको पता है. ये PACLग्रुप का चैनल है. इनके दलाल पत्रकारों की लाख कोशिशों के बावजूद भी कंपनी को बचाया नहीं जा सका, सो अब चैनल भी बुरे दिन झेल रहा है. कई जवान से लेकर बूढ़े पत्रकार तक इस कंपनी की दलाली के काम में लगे थे. इनकी हालत पर वाकई तरस आती है.

सहारा का “समय”, समृद्ध जीवन चिटफंड कंपनी का “लाइव इंडिया” और “मी मराठी” आदि चिटफंडिया मीडिया यूनिटों में मजबूरन ढेर सारे पत्रकार फंसे हैं. जिनको यहां की नौकरी रास आ गयी है उनकी बात और है, लेकिन जिसने कभी दलाली की नहीं है, उनके लिए मुसीबत बड़ी हो गयी है. निखिल वागले जी को ही लीजिए. हमेशा से समाजवादी, गांधीवादी, लोहियावादी आदि रहे हैं, लेकिन किस्मत का तकाजा देखो कि पहले जवाहर दर्डा के यहां काम किया. अब महेश मोत्तेवार की नौकरी कर रहे हैं. भगवान इस बन्दे को कोई अच्छा समूह दिलाये, क्योंकि यह ग्रुप उसके लायक नहीं है.

सतीश के. सिंह जैसे पत्रकार चिटफंडिया कंपनी के चैनल में काम करके और मालिकों के संकटमोचक बनकर जीवन काट कर रहे हैं. जिन पत्रकारों को इन चिटफंडिया चैनलों क़ी दलाली रास आ गयी है, वो पत्रकारिता भी भूल गए हैं और दिन भर पुलिस, वकील और कोर्ट के दलालों के चक्कर में पड़े रहते हैं. इनका फुल टाइम एक ही काम रहता है कि, कंपनी को एक झमेले से निकाल कर दूसरे झमले में डालना. अजब है चिटफंडिया पत्रकार कम दलालों की दुनिया..!

मोहम्द उस्मान की रिपोर्ट.

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पी7 न्यूज में हड़ताल, प्रसारण ठप, कई माह से सेलरी न मिलने के कारण लेबर कोर्ट गए कर्मी

 

पीएसीएल समूह की मीडिया कंपनी पर्ल मीडिया के न्यूज चैनल पी7 न्यूज से बड़ी खबर आ रही है कि यह चैनल मीडियाकर्मियों की हड़ताल के कारण बंद हो गया है. कई महीनों से सेलरी न मिलने के कारण चैनल का प्रसारण कर्मियों ने रोक दिया है. पी7 न्यूज चैनल में कार्यरत एक मीडियाकर्मी ने जानकारी दी कि पीएसीएल के चिटफंड के कारोबार पर सीबीआई, सेबी, इनकम टैक्स समेत कई विभागों के छापे व सुप्रीम कोर्ट के आदेश के कारण बुरा असर पड़ा है.

हजारों एकाउंट फ्रीज कर दिए गए हैं. इस कारण चैनल के कर्मियों को सेलरी नहीं दी जा रही है. कर्मचारियों ने नोएडा के लेबर डिपार्टमेंट शिकायत की है. आज मामले की सुनवाई थी. परसों भी सुनवाई होगी. करीब चार महीने से सेलरी न मिलने और बार-बार झूठे आश्वासन मिलने से दुखी कर्मियों ने आज पी7 न्यूज के तीनों चैनलों पर प्रसारण रोक दिया. इससे चैनल स्क्रीन पर सिर्फ चैनल का नाम और मीडिया कंपनी का नाम आ रहा है, बाकी कोई विजुवल नहीं दिखाया जा रहा है. सिर्फ टिकर के माध्यम से खबरें प्रसारित की जा रही हैं. नीचे एक वीडियो लिंक है जिस पर क्लिक कर आप देख सकेंगे कि पी7 न्यूज के तीनों चैनलों पर कोई विजुवल प्रसारित नहीं हो रहा है.

https://www.youtube.com/watch?v=-3cRIvk8Xuk

दीवाली करीब आने और अभी तक चार-पांच महीने की बकाया सेलरी न मिलने से पर्ल मीडिया के तीनों न्यूज चैनलों के कर्मियों में भयंकर आक्रोश हैं. आने वाले दिनों में मीडियाकर्मी सड़क पर उतरने की तैयारी कर रहे हैं. साथ ही जावड़ेकर से लेकर मोदी तक से मिलने का प्लान बना रहे हैं ताकि पीएसीएल के निदेशकों और चेयरमैन की निजी संपत्ति जब्त कर उसके जरिए कर्मियों की सेलरी दी जाए. नोएडा स्थित श्रम विभाग ने भी सेलरी न दिए जाने के प्रकरण को लेकर कड़ा रुख अख्तियार किया है और चैनल के निदेशकों को नोटिस भेजा है.

एक अन्य जानकारी के अनुसार निदेशक केसर सिंह फिर से काम पर लौट आए हैं. उन्होंने पिछले दिनों सेलरी संकट और अन्य कई दिक्कतों के कारण इस्तीफा दे दिया था. पर पीएसीएल के कर्ताधर्ताओं के हस्तक्षेप के बाद उन्होंने इस्तीफा वापस ले लिया. चर्चा है कि पीएसीएल से जुड़े लोगों ने केसर सिंह से कहा है कि वे कंपनी के मुश्किल दिनों में साथ न छोड़ें. अगर अच्छे दिनों में आपने कंपनी के साथ रहकर इसका फायदा लिया तो अब बुरे दिनों में भी कंपनी का साथ दें और मुश्किल घड़ी से उबरने में मदद करें. हालांकि इन दिनों पीएसीएल और पर्ल ग्रुप में दो तरह के खेमे बन गए हैं. एक खेमा किसी भी कीमत पर कर्मियों की सेलरी चाहता है तो दूसरा खेमा मुश्किल में फंसी कंपनी को उबारने के लिए निजी नुकसान को ध्यान न देने का आह्वान कर रहा है.

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पीएसीएल का फ्रॉड और भंगू का झूठ : इनके सामने सहाराश्री तो बेचाराश्री नजर आते हैं

पीएसीएल फ्रॉड प्रकरण सामने आने के बाद से एक चेहरा जो मीडिया में छाया हुआ है वो है पर्ल्स ग्रुप के संस्थापक निर्मल सिंह भंगू का। 61 वर्षीय भंगू ने दावा किया है कि वो पीएसीएल के सिर्फ ‘सलाहकार’ हैं और सेबी ने गलती से उनको कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है। लेकिन सच्चाई ये है कि भंगू और उसके नजदीकी रिशतेदारों की उन तीन में से दो कंपनियों में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है जो पीएसीएल को नियंत्रित करती हैं।

पीएसीएल की वार्षिक रिपोर्ट तीन कॉर्पोरेट इकाइयों को अपना शीर्ष शेयरधारी बताती है। ये हैं- सिंह एंड सिंह टाउनशिप डेवलेपर्स, याशिका फिनलीज़ और अलार्मिंग फिनवेस्ट। 1994 में निगमित याशिका फिनलीज़ में 8 सितंबर, 2013 तक निर्मल सिंह भंगू की 8.84 प्रतिशत हिस्सेदारी थी। परिवार के करीबियों का कहना है कि भंगू के पुत्र हरविंदर सिंह, जिसकी याशिका में 9.55 प्रतिशत हिस्सेदारी थी, का कुछ साल पहले निधन हो गया था। भंगू की दो बेटियां है जो ऑस्ट्रेलिया में उनके व्यापार हितों की देखरेख करती हैं। इसी तरह सिंह एंड सिंह टाउनशिप में परमिंदर सिंह की 50 प्रतिशत हिस्सेदारी है जो निर्मल सिंह भंगू के बड़े भाई का लड़का है।

जुलाई 2013 में भंगू ने सेबी को लिखे एक पत्र में कहा था कि वो बहुत ही थोड़े समय, 3 जून, 1996 सो 3 फरवरी 1998 तक, के लिए पीएसीएल से जुड़े थे। भंगू ने बताया कि 1983 में उन्होने पीजीएफ लि. नामक एक कंपनी प्रोमोट की थी और उसके चेयरमैन और प्रबंध निदेशक के रूप में काम किया। वो अपनी व्यक्तिगत हैसियत में रियल एस्टेट क्षेत्र में संपत्तियों की खरीद-बेच का काम करते हैं और अपनी आजीविका चलाते हैं। कृषि और रीयल एस्टेट के क्षेत्र में उनके ज्ञान और अनुभव को देखते हुए ही उन्हें पीएसीएल के बोर्ड में ‘सलाहकार’ के रूप में जुड़ने के लिए आमंत्रित किया गया था। इसलिए भंगू का कहना है कि सेबी द्वारा उनको कारण बताओ नोटिस का भेजा जाना गलत है।

खैर, कॉर्पोरेट जगत के खिलाड़ियों द्वारा कंपनी कानून से खिलवाड़ करना और उसे तोड़-मरोड़ कर अपना रक्षा कवच बना लेना कोई नई बात नहीं है। भंगू और सहारा की कहानी काफी हद तक समान है। दोनो ऐसा बिज़नेस चलाते हैं जिसके परिचालन को उनके आलोचक अपारदर्शी बताते हैं। दोनों ही राजनीतिज्ञो और फिल्म सितारों से अच्छे रिश्ते रखते हैं। भंगू के बारे में कहा जाता है कि उसके शुभचिंतक हर राजनीतिक दल में हैं। पंजाब के एक पूर्व कांग्रेसी सांसद के वो बहुत ही करीब हैं। वहीं सत्तासीन भाजपा और शिरोमणी अकाली दल के नेताओं से भी उसके रिश्ते बहुत अच्छे हैं।

भंगू और सहारा दोनो की रियल एस्टेट परियोजनाएं चल रही हैं। दोनो के होटल व्यवसाय भी हैं। रॉय के जहां न्यूयॉर्क और लंदन में होटल हैं (जिन्हे फिलहाल वे ज़मानत की रकम जुटाने के लिए बेचने की फिराक में हैं) वहीं भंगू ने भी ऑसेट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में होदल खरीदा है और ब्रिसबेन में काफी घरों का निर्माण कराया है। दोनो की रुचि खेल-कूद में भी है। रॉय एक लम्बे समय तक भारतीय क्रिकेट टीम के प्रायोजक रहे हैं, आईपीएल की पुणे टाम और फार्मूला वन टीम के मालिक हैं वहीं भंगू ने भी आईपील और कबड्डी टूर्नामेंट आयोजित किए हैं। पीएसीएल ने पिछले चार सालों में कबड्डी के प्रायोजन पर करीब 35 करोड़ रुपए खर्च किए हैं।

भंगू और रॉय दोनो का ही दख़ल मीडिया के क्षेत्र में भी है। रॉय के राष्ट्रीय सहारा अखबार और सहारा समय न्यूज़ चैनल से तो सभी वाकिफ हैं भंगू का पीएसीएल भी P7 टेलीविज़ न्यूज़ नेटवर्क परिचालित करता है। P7 का उपयोग कंपनी की स्कीमों और हितों को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है। इसके साथ ही पीएसीएल ने पर्यटन, निर्माण, शिक्षा और मसालों के क्षेत्र में भी अपने पैर पसार रखे हैं।

कहते हैं कि राजनीतिज्ञों से ज्यादा दोस्ती और गैरकानूनी धन आपको मुसीबत में डाल ही देता है। भंगू के साथ भी ऐसा ही हुआ। अपनी जवानी के दिनों में जो व्यक्ति अपने बड़े भाई नक्षत्तर सिंह के साथ, भारत-पाक सीमा के निकट स्थित बेला गांव में दूध बेचा करता था, वही भंगू आज पोंजी योजनाओं से इकट्ठा किए धन और राजनीतिज्ञों से निकटता को लेकर चर्चा में है। देश में इस समय छोटे बड़े स्तर पर न जाने कितने ही भंगू हैं जो पोंजी स्कीमें चला रहे हैं। कुछ लोग थोड़े समय स्कीम चला कर पैसा ले कर भाग जाते हैं और निवेशक ठगा रह जाता है। ऐसे न जाने कितने हैं जो न कभी सरकार या सेबी की नज़र में आए हैं और न आने की उम्मीद है।

वहीं कुछ, भंगू की तरह एक लंबे समय तक पोंजी स्कीमों को चलाने का माद्दा रखते हैं और अपने लाखों कमीशनखोर एजेंटों के माध्यम से ग्राहकों के दिलो-दिमाग में एक बिज़नेस मॉडल की छवि बना देते हैं कि वो भूमि की खरीद-बेच से पैसा कमा रहे हैं। तो असल में पीएसीएल कर क्या रही थी? बस यही कि अपने एजेंटों के माध्यम से नए निवेशकों से पैसा लेकर उन निवेशकों को देना जिनके निवेश की अवधि पूरी हो चुकी है। यही वह साधारण सा बिज़नेस मॉडल है जो सरकार की सतत निगरानी के अभाव में किसी रॉय या भंगू को असाधारण धन का मालिक बना देता है।

उल्लेखनीय है कि सेबी ने पिछले सप्ताह पीएसीएल को तीन माह के अन्दर 5.85 करोड़ निवेशकों का 49,100 करोड़ रुपया लौटाने का आदेश दिया था। अपने 92 पेज के आदेश में सेबी ने कहा कि निवेशित धन का यह आंकड़ा और अधिक हो सकता था यदि पीएसीएल ने 1 अप्रैल, 2012 से 25 फरवरी 2013 के बीच के धन इकट्ठा करने के आंकड़े भी उपलब्ध कराए होते। सेबी के अनुसार अब तक किसी भी गैर-कानूनी सामूहिक निवेश योजना (सीआईएस) में इतनी रकम और निवेशक सामने नहीं आए हैं जितना पीएसीएल द्वारा इकट्ठी की गई रकम और निवेशकों की संख्या है। पीएसीएल की रकम के सामने सुब्रत रॉय बेचाराश्री नज़र आते हैं जो इस साल मार्च से ऐसे ही मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के चलते तिहाड़ में बंद हैं और अपनी ज़मानत की रकम जुटाने के लिए उन्हे अपनी विदेशों में खरीदी गई संपत्तियां तक बेचनी पड़ रही हैं। पीएसीएल का ये मामला नया भी नहीं है। करीब 16 साल पहले, 1998 में सेबी ने कंपनी के खिलाफ कार्यवाही की थी। तब मामला कानूनी दांव-पेचों में उलझ गया था। मामला बाद में अदालत पहुंचा और पिछली साल सुप्रीम कोर्ट ने सेबी को निर्देश दिया कि कि वो जांच कर इस बात को सुनिश्चित करे कि पीएसीएल का धंधा सामूहिक निवेश योजना (सीआईएस) की श्रेणी में आता है या नहीं और तत्पश्चात कानून के अनुसार कार्यवाही करे।

मुंबई से दीपक कुमार की रिपोर्ट.


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सेबी के फैसले के खिलाफ सैट में अपील करेगी पीएसीएल

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सहारा के लिए गरम और पीएसीएल के प्रति नरम क्यों है सेबी?

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भंगू, भट्टाचार्या समेत पीएसीएल के नौ प्रमोटरों-डायरेक्टरों के खिलाफ फ्राड-चीटिंग का मुकदमा चलेगा

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सुब्रत राय की राह पर निर्मल सिंह भंगू… SEBI ने दिया आदेश- निवेशकों को 50 हजार करोड़ रुपये PACL लौटाए

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पीएसीएल के संकट से ध्वस्त होने लगा पर्ल ग्रुप, मैग्जीन बंद, चैनल बंद होने की आशंका

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सहारा के लिए गरम और पीएसीएल के प्रति नरम क्यों है सेबी?

सुप्रीम कोर्ट द्वारा मामला वापस भेज देने के बाद बाज़ार विनियामक सेबी (भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड) ने पीएसीएल कंपनी की योजनाओं की पूरी जांच-पड़ताल की. नतीजा ये निकाला कि ये कंपनी कई पोन्ज़ी योजनाएं चला रही है। सेबी ने कंपनी को 5 करोड़ 85 लाख निवेशकों से खुले तौर पर भूमि आवंटन के नाम पर जमा किए गए 49,100 करोड़ रुपए लौटाने का आदेश दिया है। तकरीबन 4 करोड़ 63 लाख निवेशकों को अभी भूमि आवंटित की जानी शेष है, और सेबी ने 500 निवेशकों के एक नमूने में पाया कि उनमें से किसी को कभी भी कोई भूमि आवंटित नहीं की गयी। इससे सेबी का ये मत पुष्ट हुआ कि भूमि-आवंटन इस पूरे मामले में धन-शोधन गतिविधियों पर पर्दा डालने के लिए एक छलावा मात्र है।

यह कि कंपनी के पास 5 करोड़ 85 लाख निवेशक हैं, जो कि अद्यतन 2 करोड़ 2 लाख डीमैट खातोदारों की संख्या के दोगुने से भी ज्यादा है, दिखाता है कि पीएसीएल घोटाला सहारा को भी फीका कर सकता है। पीएसीएल के लिए ये एक और उपलब्धि है कि निवेश जुटाने में उसने सहारा को बुरी तरह पीछे छोड़ दिया है। सहारा ने करीब 24,000 करोड़ जुटाए हैं। इस पर भी सेबी ने पीएसीएल पर नरमी बरती है। सेबी ने कंपनी से, निवेशित धन को उसे सौंप देने को नहीं कहा है ताकि वो धन को केवाईसी मानकों के आधार पर जांच कर उसके सही मालिकों को लौटा सके। सेबी ने सहारा के विरुद्ध कड़ा रुख़ अपना कर खूब वाहवाही लूटी थी। सहारा अपनी करनी का फल भुगते इसलिए सेबी ने सहारा से निवेशकों का धन उसको सौंपने के लिए कहा, ये जितना भी शरारतपूर्ण हो लेकिन सही कदम था और सुप्रीम कोर्ट ने भी इसका समर्थन किया।

बाद में सुप्रीम कोर्ट ने सहारा प्रमुख सुब्रत रॉय को, कई सम्मनो के बाद भी कोर्ट में हाज़िर न होने और सेबी को पूरा धन लौटाने में असमर्थ रहने पर, गिरफ्तार कर लिया। सेबी और उच्चतम न्यायालय एक योजना के तहत काम कर रहे हैं, जहां तक सहारा का संबंध है ये उसके निवेश के व्यवसाय के लिए एक चुनौती है। दोनों को शंका है कि सहारा असल में एक धन-शोधन फर्म है और उसके निवेशक बेनामी हैं। ये अच्छा है कि दोनो ने हाथ आए मौके को पकड़ लिया और बेनामी के इस धंधे पर कार्यवाही की क्योंकि सरकार की तरफ से इस संबंध में कोई भी सार्थक पहल नहीं की गयी।

बेनामी संव्यवहार (प्रतिषेध) अधिनियम, 1988 एक अप्रचलित कानून बन कर रह गया है। कहीं खुद का ही अहित न हो जाए इस डर से विभिन्न सरकारों ने बेनामी संपत्ती के अधिहरण(जब्ती) के लिए, अधिनियम के प्रावधानो के तहत प्राधिकरण का गठन नहीं किया। लेकिन उम्मीद है कि वर्तमान एनडीए सरकार, जिस पर किसी गठबंधन के सदस्यों का दवाब नहीं है, अधिनियम को अमली जामा पहनाएगी ताकि सुप्रीम कोर्ट और सेबी को अपरंपरागत, लेकिन असरकारक, तरीकों का सहारा न लेना पड़े। सेबी पीएसीएल से 49,100 करोड़ रुपए उसको सौंप देने के लिए कह सकती थी। पीएसीएल से स्वयं निवेशकों को रकम लौटाने और लौटाए गए धन का विवरण देने को कहना पर्याप्त नहीं है। इसी प्रकार की छूट सहारा के चतुर मुखिया सुब्रत रॉय भी मांग रहे थे। सेबी ने उनको ये छूट देने से इंकार कर दिया। सेबी को शक था अगर ज़रा भी छूट दी तो सुब्रत रॉय उसका फायदा उठाने में पीछे नहीं रहेंगे, इसलिए सेबी इस बात पर अड़ा रहा कि वो असली निवेशकों को स्वयं ढूंढेगा।

आश्चर्य होता है कि सेबी ने ऐसा पीएसीएल के साथ क्यों नहीं किया। सेबी के अधिकारी केवाईसी प्रमानो के हिसाब से सहारा का एक भी निवेशक नहीं ढूंढ पाए, इससे इस मत को बल मिला कि अधिकतर निवेशक बेनामी है या नाम ही फर्जी हैं। अगर सेबी ने सख्त कदम उठाए होते पीएसीएल का भी सहारा जैसा ही हाल होता। ये काफी नही कि पीएसीएल से विनम्रतापूर्वक निवेशकों का जमा-धन लौटाने को कहा जाए और उसे बाज़ार से धन इकट्ठा करने से रोक दिया जाए। धोखेबाज़ो के लिए बचने की कोई गुंजाइश नहीं छोड़नी चाहिए।

काले धन की घातक भूमिका को खत्म करने के लिए, भुगतान सरकारी अधिकारियों के द्वारा ही किया जाना चाहिए, इसलिए आयकर कानून के तहत घोषित पूर्वक्रय योजना(प्रीएम्पटिव पर्चेजेज़ स्कीम) को जानकारों ने सराहा था। इस योजना की ख़ासियत ये थी कि आयकर विभाग मूलतः काले धन से प्रायोजित किसी भी संदिग्ध संपत्ती की खरीद कर लेता था। नतीजा ये होता था कि विक्रेता को सारा धन सफेद में मिलता था और उसकी खरीद करने वोले को नुकसान उठाना पड़ता था। सहारा मामले में सेबी की भूमिका कुछ ऐसी ही है, दुर्भाग्यपूर्ण रूप से उक्त स्कीम को 2002 में बंद कर दिया गया था।

मुंबई से दीपक कुमार की रिपोर्ट.

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भंगू, भट्टाचार्या समेत पीएसीएल के नौ प्रमोटरों-डायरेक्टरों के खिलाफ फ्राड-चीटिंग का मुकदमा चलेगा

पहले सीबीआई की रेड, फिर इनकम टैक्स की मार और अब सेबी का प्रहार. एक के बाद एक झटकों से चिटफंड कंपनी पीएसीएल का धंधा चरमराने की कगार पर आ गया है. निवेशकों में आशंका व्याप्त हो गई है. सेबी के ताजे आदेश के बाद पीएसीएल के नौ प्रमोटरों-डायरेक्टरों के जेल जाने की नौबत आ गई है. सेबी ने पीएसीएल के निर्मल सिंह भंगू, सुब्रत भट्टाचार्या, तरलोचन सिंह, गुरमीत सिंह, सुखदेव सिंह, गुरनाम सिंह, आनंद गुरवंत सिंह, उप्पल देविंदर कुमार और टाइगर जोगिंदर के खिलाफ फ्राड, चीटिंग आदि का मुकदमा चलाने का आदेश दिया है. सेबी के 92 पेजी आदेश पर आधारित एक संक्षिप्त खबर इस प्रकार है…

Capital market regulator Sebi has ordered PACL to return Rs 50,000cr to investors. The company has allegedly collected this money by running illegal Ponzi schemes. Sebi has ordered PACL Ltd to refund the money within three months. Sebi has also announced to initiate further proceedings against the company and its nine promoters and directors for fraudulent and unfair trade practices, as also for violation of Sebi’s CIS Regulations, among others, as per a direction from the Supreme Court.

As per Sebi’s 92-page order, the total amount mobilised by the company, “by its own admission” comes to a whopping Rs 49,100 crore and “this figure could have been even more if PACL would have provided the details of the funds mobilized during the period of April 1, 2012 to February 25, 2013”.

It is estimated that the company has collected the total money from around 5.85 crore, which includes the customers who said to have been allotted land and who are yet to be allotted the land. According to the regulator, this is the biggest ever amount and the largest number of investors found involved in a case of unauthorised ‘collective investment scheme’ by them.

It is to be noted that PACL and its top executives, including Nirmal Singh Bhangoo, are being probed by CBI. PACL claimed it was in the business of purchasing and developing land, adding the developed land was transferred to investors, who could sell it for gains. “It is difficult to believe a person in Uttar Pradesh will purchase 100-150 yards of agricultural land 2,000 km away. The lack of maintenance of proper records/data is a clear indication the activities of PACL are in the nature of a Ponzi scheme,” Sebi said.

“PACL Ltd and its promoters and directors, including Tarlochan Singh, Sukhdev Singh, Gurmeet Singh and Subrata Bhattacharya, shall wind up all the existing collective investment schemes of the company and refund the monies collected under its schemes with returns due to its investors, according to the terms of offer, within a period of three months,” it added.

सेबी के 92 पेज के संपूर्ण आदेश की कापी को डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें: Sebi PACL ORDER

मूल खबर…

सुब्रत राय की राह पर निर्मल सिंह भंगू… SEBI ने दिया आदेश- निवेशकों को 50 हजार करोड़ रुपये PACL लौटाए

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