पप्पू वर्सेज फेंकू, राजनीति में गिरती शाब्दिक मर्यादा

आजकल भारतीय राजनीति में शब्दों की मर्यादा खण्ड खण्ड होकर बिखर गयी है , राजनेतागण अपनी वाचाल शैली से जनता को निराश कर रहे हैं , कब कहाँ किस नेता को कौन सा नेता किस नए पुराने और अमर्यादित शब्दों से किस जगह उद्बोधित कर दे कोई नहीं जानता। ताजा मामला हालिया चल रही लोकसभा कार्यवाही का है जहाँ बीजेपी के संसदीय कार्यमंत्री और बेहद वरिष्ठ नेता वेंकैया नायडू ने राहुल गांधी को उनके भाषण के बाद विचलित होकर भरे पूरे सदन के बीच पप्पू पप्पू कह कर संबोधित किया और अगले दिन उनके भाषण को “शैतान का प्रवचन” कह कर मर्यादा तोड़ने के क्रम में एक कदम और बढ़ाया।

ये शब्द उस पार्टी के नेता द्वारा कहे गए जो पार्टी अपने आपको “पार्टी विद डिफ़रेंस” कहते नहीं थकती अघाती, और चलिए मान भी लिया जाये कि ये शब्द आम हो गए हैं और शोशल मीडिया एवं रैलियों में आम भाषा और कटाक्ष के तौर पर लिए जाते रहे हैं मगर संसदीय इतिहास में मेरे जानकारी में किसी संसदीय कार्यमंत्री के द्वारा ऐसी भाषा शैली सदन में प्रयोग की गयी हो ऐसा मैंने अपने जीवन के काल में 12 वर्षों से सदन की कार्यवाही को बराबर देखने के दौरान नहीं देखा जाना सुना और न ही कहीं इतिहास में भी ऐसा पढ़ा जाना , ये शब्द सदन में लोकसभा के लाइव टेलीकास्ट के दौरान एक ऐसी पार्टी के सांसद मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष के द्वारा बोले गए जो संसदीय कार्यप्रणाली में नए नहीं हैं और कहीं किसी दूसरी पार्टी से आयातित नहीं हैं जो कि बाद में ये कहकर बचा जा सके कि अजी वो तो चुनाव के दौरान दूसरी पार्टी से आये थे और अभी उनके डीएनए में दूसरी अभद्र पार्टी के डीएनए का अंश शेष है और जाते जाते जायेगा , जैसा कि मा.प्रधान मंत्री महोदय ने साध्वी निरंजना के “हरामजादा काण्ड पर ये कहकर इतिश्री पा ली थी कि वे ऐसे समाज से आई हैं जहाँ कि ऐसे शब्दों का प्रयोग आम भाषा शैली में किया जाता है और साध्वी जी का डीएनए भी सुधर जाएगा….

हांलाकि इस मामले में कांग्रेस पार्टी भी दूध की धुली नहीं है जिसकी राष्ट्रीय अध्यक्षा ने कुछ वर्ष पूर्व तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री को चुनावी सभा के दौरान मंच से “मौत का सौदागर” कहा था और जिसका कि चुनावी मुद्दा बनाकर भाजपा ने चुनाव में इसका फायदा ले लिया , और दूसरा मामला कांग्रेस के दिग्विजय सिंह का है जिन्होंने नरेंद्र मोदी को “फेंकू” शब्द से संबोधित किया , माना कि मोदी जी इतिहास के अल्पज्ञान और अतिशयोक्ति की बिमारी से ग्रसित हैं मगर फिर भी ऐसे उद्बोधनों से हमारी संसदीय मर्यादा खंडित होती है या ये कहा जा सकता है कि जैसे पुरानी फिल्मों में अश्लीलता नहीं होती थी और आज की फिल्मों में अश्लीलता की बहार होने के बावजूद उसे स्वीकार कर लिया गया है उसी तरह इस असंसदीय भाषा शैली को भी अखिरकार जनता स्वीकार कर ही ले ? 

हांलाकि इसी क्रम में मायावती जी का अमर्यादा का अंदाज़ पुराना है और वे अपने राजनैतिक विरोधियों को तू तड़ाक कहने के लिए जानी जाती हैं और उसी क्रम में लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को “ललुआ” कहकर संबोधित किया और उनके पिता और पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व केंद्रीय रक्षा मंत्री मुलायम सिंह जी को और उनके परिवार को भैंस चराने वाला और अन्य कई अमर्यादित शब्दों से संबोधित किया,

आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविन्द केजरीवाल जी भी स्टिंग मास्टरी करते करते मंच न सही मगर स्टिंग के दौरान ही सही मगर “कमीनपंथी और पिछवाड़े पर लात” अभद्र टिप्पणी करते पकडे गए और छीछालेदर हुई , ममता बनर्जी का अभद्र गुस्सा , जयललिता का सत्तासीन होते ही करूणानिधि को पुलिस द्वारा उठवाना और अमर्यादित टिप्पणी करना सभी को याद ही होगा , 

राजनैतिक विरोधियों को सम्मान देने के क्रम में पंडित जवाहर लाल नेहरू और गोबिंद बल्लभ पंत , अटल बिहारी वाजपेयी और चंद्रशेखर जी के बाद अखिलेश यादव और उनके पिता मुलायम सिंह यादव जी का नाम अग्रणी रूप से आता है , कभी भी राजनैतिक विरोधियों के प्रति सामने या अकेले , मंच हो या सदन , कहीं भी समाजवादी पार्टी के यूपी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जी के मुंह से ऐसी कोई असंसदीय अमर्यादित भाषा नहीं सुनाई दी , समस्त मीडिया जगत और विरोधी राजनेता भी और आम जनता भी अखिलेश यादव की इस बात की कायल है कि जबर्दस्त झूठी सच्ची आलोचना के क्रम और दौर में कभी अखिलेश यादव ने अपनी भाषा का नियंत्रण नहीं खोया बल्कि बहुत ही संयमित ढंग से अपना राजनैतिक जीवन जिया है , 

भारतीय राजनीति में शुचिता सौम्यता और सम्मान देने की राजनीति को कब ये अमर्यादा का कीड़ा लग गया कोई जान भी नहीं पाया , और हमारे देश की बौद्धिक मीडिया जो कि बात को समझे बिना अपने स्वार्थ और पैकेज अनुसार खबर और ब्रेकिंग न्यूज चलाती है उसने भी अपनी विश्वसनीयता खोयी जिसकी वजह से कोई मंच नहीं रहा जहाँ इसकी आलोचना और समाधान पर बात हो सके , मीडिया का हाल तो बिल्कुल वैसा ही है जैसे बिल्ली अपने शिकार के घात में बैठी रहती है और बिना जाने समझे देखे अपने शिकार पर हमला करती है और शिकार का आधा अधूरा हिस्सा ही ले भागती है और इसी क्रम में कभी कभी गर्म दूध के कटोरे से अपना मुंह भी जला लेती है जैसा कि मुलायम सिंह जी के बयान “बच्चों से गलतियां हो जाती हैं” और आजम खान के “भारत माता डायन”मामले में देखा गया , उक्त दोनों ही बयानों में और बयान देने वाले की भावनाओं में कोई कमी कोई गलती नहीं थी मगर फिर भी मीडिया ने उपरोक्त बिल्ली की माफिक व्यवहार किया और अपनी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया ,

खैर इन पप्पू , फेंकू, ललुआ,चायवाला,कमिनपंथी, इत्यादि और विपक्षी नेताओं के प्रति असंसदीय आचरण की प्रवृत्ति जायेगी या रहेगी मैं नहीं जानता मगर हमारे भारत देश के समस्त राजनेताओं मैं आप सबसे ये जरूर कहना चाहता हूँ कि हमारे देश की बौद्धिक जनता ये सब देख कर बहुत आहत है , कृपया संस्कृति से भरे पूरे इस अच्छे देश और आने वाली पीढ़ी को गंदा मत करें और संस्कृति पर रहम करें …..

मनीष जगन के एफबी वॉल से

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Comments on “पप्पू वर्सेज फेंकू, राजनीति में गिरती शाब्दिक मर्यादा

  • sushil singh says:

    jab se modi desh ke pm bane hain tab se har vyakti jo bjp ka samarthak hai . belagam ho gaya hai
    kisi chij par n neta par kisi ka koi kantrol nahi
    badjobani belagam
    mahgai belgam
    bas sirf modi ka prachar

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