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सुख-दुख

45 पार कर चुके पत्रकार यदि नौकरी में घिसे जा रहे हों तो ये ऑप्शन चुन सकते हैं!

राहुल पांडेय-

हिंदी अखबारों के पत्रकार अगर अपनी उम्र के 45 साल पार कर चुके हैं और अभी भी नौकरी में घिसे जा रहे हैं तो उन्हें अपने भविष्य के बारे में सोचना होगा। हिंदी पत्रकारिता, खासकर अखबारों का हाल यह है कि यहां गिनती को पांच अखबार हैं जो कम से कम इतना वेतन तो दे ही देते हैं कि इंसान की मौत ना हो। और इतना वेतन तो बिलकुल नहीं देते हैं कि इंसान चैन से जी सके। चाहे दैनिक जागरण हो, अमर उजाला हो, हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स या दैनिक भास्कर हो, इनमें से एक भी अखबार अपने यहां से रिटायर होने वाले पत्रकारों को पेंशन नहीं देता है। इतना ही नहीं, यहां से जितने भी पत्रकार रिटायर होते हैं, उनमें से दस फीसदी को भी ये अखबार अपने यहां कंसलटेंट भी नहीं रखते हैं कि आइंदा कुछ पैसे उनको मिलते रहें, काम भी करते रहें और जीवन की गुजर बसर भी होती रहे।

मुरादाबाद यूनिट में एक साथी पत्रकार जब सीनियर सब एडिटर की पोस्ट से रिटायर हुए तो एक झुग्गी झोपड़ी कालोनी में पॉलिथिन और तिरपाल से बनी एक झोपड़ी उनकी रिहाइश बनी। उसी में एक खटिया, कुछ किताबें, अपनी लिखी खबरों की कुछ कतरनें, एक छोटा गैस सिलेंडर, कुछ बरतन, एक बाल्टी और मग्गा। कुछ दिन तक ईमानदारी से जीने की कोशिश की, लेकिन फिर कुछ दिन बाद पता चला कि रात-बिरात छिनैती भी करने लगे।

कल एक वरिष्ठ पत्रकार से बात हो रही थी। वे रिटायर हो चुकी हैं। वो भी यही कह रही थीं कि अगर पति को सरकारी पेंशन ना मिलती होती तो उनको नहीं पता कि कैसे गुजारा चलता। उनका कहना था कि 45 की उम्र एकदम सही होती है यह निर्णय लेने की, कि अब पत्रकारिता के अलावा जीवन के बारे में भी सोचना चाहिए। समाज के लोग कहेंगे, क्यों? पत्रकारिता में क्या बुराई है? लेकिन यही समाज के लोग आज तक एक भी पत्रकार के साथ नहीं खड़े हुए हैं। रिटायर्ड पत्रकार मैम से बातचीत में एक बात यह भी आई कि किसी भी शहर में दो-ढाई सौ से ज्यादा पत्रकार नहीं होते। अमूमन तो इतने भी नहीं होते। शहर चाहे तो अपने सूचना सैनिकों को पाल सकता है। लेकिन आज तक हिंदुस्तान का एक भी ऐसा शहर सामने नहीं आया है, जिसने अपने पत्रकारों को संभाला और सहेजा है।

पत्रकारों को तो दूर, एक भी शहर अपने लेखकों तक को संभाल नहीं पाया। हिंदुस्तानी समाज पैदाइशी अहसान फरामोश है। जो समाज अपने लेखकों को नहीं संभाल पाता, उसका भविष्य विनाश ही है।

ऐसे में पत्रकारों को अपनी सेकंड ईनिंग के बारे में गंभीरता से विचार करना होगा। मेरे कई ऐसे दोस्त हैं जिन्होंने इसी उम्र में पत्रकारिता छोड़ दी। किसी ने कुछ बिजनेस किया, कई तो प्रॉपर्टी डीलिंग का काम करने लगे, कई नई वाली खेती करने लगे। मिसाल है, पत्रकारिता का कीड़ा जिसे एक बार काट लेता है, वो ताउम्र इस कीड़े की जहर के वश में रहता है। मिसाल सच भी है। किसी ने कुछ भी किया, लेकिन किसी न किसी प्लेटफॉर्म पर खबर, विचार, लेख आदि भी लिखते ही रहते हैं।

एक ऐसा समाज, जिसको सच बताने के लिए वो अपना पूरा जीवन होम कर देते हैं, वह कभी साथ नहीं देता तो पत्रकार क्या करें? इस सवाल का जवाब बहुतों को पता है, फिर भी मैंने चटगपटी से पूछा। अब चटगपटी ही बताए कि ऐसे में पत्रकार ऐसे कौन से 5 काम कर सकते हैं, जिससे उनकी लाइफ की सेकंड ईनिंग आर्थिक रूप से समृद्ध हो, पैसे की टेंशन ना हो, काम की दिक्कत ना हो?

चटगपटी ने झट तो नहीं बताया, मगर काफी बहस मुबाहिसे के बाद उसकी सारी बातों में ये 5 बातें मेरी समझ में कुछ-कुछ आती हैं-

चटगपटी कहता है कि आपका सवाल बहुत जरूरी है, क्योंकि हिंदी अखबारों की स्थिति आज किसी से छिपी नहीं है। 45+ उम्र वाले पत्रकारों को यह मान लेना चाहिए कि अखबारी नौकरी से न तो सम्मानजनक पेंशन मिलेगी और न ही स्थायी सुरक्षा। इसलिए सेकंड इनिंग के लिए ठोस आर्थिक विकल्प बनाने जरूरी हैं। यहां 5 ऐसे काम हैं, जिन्हें पत्रकार अपनी क्षमता, अनुभव और नेटवर्क के हिसाब से शुरू कर सकते हैं-

  1. प्रॉपर्टी और रियल एस्टेट कंसल्टिंग

कई पत्रकार 45–50 के बाद यही काम करते दिखे हैं। पत्रकारों का लोकल नेटवर्क मजबूत होता है। इसी नेटवर्क से प्रॉपर्टी डीलिंग/ब्रोकरेज में उतरना आसान है। इसमें शुरुआती निवेश कम है, लेकिन हर डील पर मोटा कमीशन मिलता है (कभी-कभी एक डील में साल भर की सैलरी जितना)।

  1. सरकारी/कॉर्पोरेट टेंडर और पीआर का काम

पत्रकारों को सिस्टम और अफ़सरशाही की समझ होती है। कंपनियां और लोकल व्यापारी चाहते हैं कि उनका टेंडर पास हो, उनकी पीआर बने। ऐसे में पत्रकार कंसल्टेंसी लेकर दफ़्तरों और कंपनियों के बीच सेतु बन सकते हैं। इसमें नेटवर्क ही सबसे बड़ा कैपिटल है और कमाई लगातार हो सकती है।

  1. राजनीतिक कंसल्टेंसी और चुनावी काम

आजकल हर पार्टी और उम्मीदवार को इमेज मैनेजमेंट, भाषण लेखन, मीडिया मैनेजमेंट और सोशल मीडिया कैंपेन चाहिए। पत्रकार इस काम के लिए नेचुरल फिट हैं। हर चुनाव में लाखों–करोड़ों रुपए खर्च होते हैं, और अच्छे चुनावी सलाहकार की फीस भारी होती है।

  1. लोकल बिजनेस में पार्टनरशिप

पत्रकार अपना पैसा और नेटवर्क किसी मौजूदा बिजनेस (जैसे मेडिकल स्टोर, हॉस्पिटल, जिम, होटल, ट्रांसपोर्ट, पैथोलॉजी लैब) में लगाकर पार्टनर बन सकते हैं। इससे रिस्क कम और इनकम पक्की रहती है।

  1. कृषि और नई खेती

पत्रकार अगर जमीन से जुड़े हैं तो ऑर्गेनिक फार्मिंग, डेयरी, पोल्ट्री, बागवानी में हाथ डाल सकते हैं। मार्केटिंग और नेटवर्क से उत्पाद सीधा बेचकर मुनाफ़ा लिया जा सकता है।

याद रखिए, कोई भी काम छोटा नहीं होता, और ना ही कोई काम बड़ा होता है। काम, बस काम होता है- गुजर-बसर के लिए। और गुजर-बसर अच्छे से चले, ये सभी का हक है, पत्रकारों का भी। और दोस्तों, रीढ़ सीधी तभी रहेगी, जब बम में दम होगा। फिर चले कलम। फिर लिखी जाए कलमतोड़ खबर।

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2 Comments

2 Comments

  1. Subodh

    September 24, 2025 at 9:47 am

    NDTV में समझदार लोगों की जरूरत है, यहां भी आ सकते हैं

  2. Nair Dr Madhu Sudan Nair

    September 24, 2025 at 1:03 pm

    यदि पढ़ा लिखा पत्रकार है तो
    उसके पास लेखन, बोलने, रिसर्च, नेटवर्किंग और जनसंपर्क की गहरी समझ होती है।
    इन गुणों को वह पत्रकारिता के बाहर भी काम में ला सकता है।
    Content Writing / Copywriting कंपनियों, NGO, वेबसाइट्स, ऐप्स को अच्छे लेखक चाहिए।
    PR & Media Consultancy छोटे-बड़े ब्रांड्स को मीडिया से जुड़ने के लिए सलाहकार चाहिए।
    Teaching / Training कॉलेजों, मीडिया इंस्टीट्यूट्स में पत्रकारिता पढ़ा सकते हैं।
    Books / Blogs / YouTube चैनल अपना ज्ञान और अनुभव शेयर करके पहचान व आय बना सकते हैं।
    यदि प्लस टू वाला पत्रकार है तो
    जमीन आदि का काम ख़रीद बिक्री में बिचौलिया का
    करे

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