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सुख-दुख

दो-तीन दशक पहले जमीन के तपे युवा पत्रकार बनते थे, आज बड़े बाप के बच्चे या असरदार पति की बीवीयाँ पत्रकार बनती है!

सुमंत कबीर-

आदरणीय और जनसत्ता के अग्रज Surendra Kishore जी के संस्मरण पढ़ रहा था, इसी बहाने कुछ कहने को याद आ गया। सोचा, साझा कर लूं।

जब कोई मित्र या युवा पूछता है, आपके समय और आज की पत्रकारिता में क्या अंतर आया?

मेरा उत्तर है, दो से तीन दशक पहले तक आंदोलन से निकले, जमीन के तपे युवा पत्रकार बनते थे.. क्योंकि पगार बहुत मामूली थी। जबकि आज बड़े बाप के बच्चे या असरदार पति की घरवालियाँ पत्रकार बनती है, क्योंकि पे-पैकेज बहुत भारी है।

यह सच है, मीडिया संस्थानों में पगार उन्हीं की मोटी है, जो शीर्ष पर हैं, और जिनका मुख्य कार्य नेटवर्किंग है। बाकी तो चवन्नी-अठन्नी में बैल की तरह खटते हैं, और बड़े बनने का ख्वाब लिए मरते जा रहे हैं। पहले आंदोलनों से निकले वास्तविक चेहरे पत्रकार बनाने की सिफारिश किया करते थे, धीरे-धीरे यह जिम्मा नेटवर्किंग गुरू अमर सिंह सरीखों ने उठा लिया।

कभी हर दबाव से हटकर इस बात पर गंभीरता से विचार करें, सूचना का कारोबार कितना बड़ा है? हर असरदार क्यों मीडिया से जुड़ा है..? सत्ता संघर्ष में सूचना के कारोबार की क्या भूमिका है? आखिर में आप, खासकर युवा तय करें, इस भीषण महाभारत में क्या पाने जा रहा है? या फिर जन्म ही ट्रोल बनने के लिए हुआ?

आज पत्रकारिता सूचना का कारोबार भी नहीं रहा। नादान जनता को दिखाने के लिए सामने मीडिया हाउस है, जबकि असल कारोबार, मीडिया कंपनी जरिए कंपनी के अलग-अलग स्वार्थ साधना है।

कितनी ही एप्सटीन फाइल्स मीडिया हाउस की अपनी है, जो कभी खुलेंगी ही नहीं। और मूर्ख नागरिक समाज है, जो आदर्श नायक की खोज में दुबला हुए जा रहा है। ढोंग स्क्रीन के भीतर है। तो ढोंग स्क्रीन के सामने बैठी जमात में भी है। पर दोनों कबूल नहीं करेंगे। दोनों एक-दूसरे को नैतिक पाठ पढ़ा रहा है।

दुर्भाग्य तो यह है, जिस विकल्प के तौर पर सोशल मीडिया उभरा, आज शुचिता से दूर छिटक कर वह भी क्रॉस प्रमोशन का जरिया बन गया। सोशल इंफ्लूएंसर धनिया, पुदीना और चटनी का प्रमोशन कर रहे हैं। यही असल धंधा है।

आपकी क्या राय है?

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