
हिन्दी के दो-दो टाइम्स – एक ने तो बंगाल एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को भी पहले पन्ने पर जगह नहीं दी है।
संजय कुमार सिंह
मीडिया के जरिए नैरेटिव सेट करने का खेल अब नंगा होता जा रहा है। नंगई पर पड़े पर्दे का रंग उड़ गया है। आज देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, मोदी ने अपनी छवि बचाने के लिए भारत को बेचा। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा है कि प्रधानमंत्री पर एपस्टीन-अदाणी केस का दबाव है। वे पहले से कहते रहे हैं कि अदाणी का केस असल में प्रधानमत्री और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की आर्थिक व्यवस्था पर है। भ्रष्टाचार दूर करने का सपना दिखाकर सत्ता में आई भारतीय जनता पार्टी ने सहारा पेपर्स में नाम होने को हवा में उड़ा दिया था और कोई जांच नहीं हुई। ना खाउंगा ना खाने दूंगा जैसे दावे के बाद इलेक्टोरल बांड आया। सुप्रीम कोर्ट ने उसे गैर कानूनी कहा लेकिन पैसे जब्त नहीं हुए। इस बात की जांच भी नहीं हुई कि पैसे किसने-किसलिए दिए। जांच तो अनिल मसीह की भी नहीं हुई। ऐसी सरकार पुलवामा के साजिशकर्ता को नहीं पकड़ पाई, पहलगाम के हमलावरों का क्या हुआ – समझ में नहीं आया और तो और जेएनयू पर हमले के वक्त पहचानी गई कोमल शर्मा नहीं मिली लेकिन, एआई इम्पैक्ट समिट में शर्टलेस प्रदर्शन मामले में दिल्ली पुलिस कार्रवाई कर रही है। पुलिस ने यूथ कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदय भानु चिब को गिरफ्तार किया है और अदालत ने 4 दिन की पुलिस रिमांड को मंजूरी दे दी है। सोनम वांगचुक पहले से जेल में हैं। उन्हें जमानत न मिले उसके लिए सरकार की ओर से लगाए जा रहे जोर को देखा जा रहा है। फिर भी हिन्दी के मेरे तीन में से दो अखबारों में राहुल गांधी के आरोप पहले पन्ने पर लीड नहीं हैं। अमर उजाला की लीड केरल का नाम बदलने की है। पहले पन्ने पर तीन कॉलम की खबर बता रही है, एआई सम्मेलन में प्रदर्शन साजिशन था युवा कांग्रेस अध्यक्ष गिरफ्तार। पुलिस का दावा है, उदयभानु मुख्य साजिशकर्ता हैं, कोर्ट ने चार दिन का रिमांड दिया है।
अमर उजाला के पहले पन्ने की तीसरी बड़ी (ज्यादा जगह घेरने वाली) खबर सरकारी प्रचार है। बेटियों को मिलेगी सर्वाइकल कैंसर से ढाल। उपशीर्षक है, सरकार की बड़ी मुहिम : 14 साल की किशोरियों को लगाई जाएगी एचपीवी वैक्सीन। अमर उजाला के पहले पन्ने पर एक और बड़ी खबर का शीर्षक है, ट्रम्प का 10 फीसदी टैरिफ लागू। अमेरिका ने कहा, जल्द 15 फीसदी होगा, बढ़ाने की चल रही है प्रक्रिया। आप जानते हैं कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रम्प के टैरिफ को खारिज कर दिया है और 6-3 के बहुमत से कहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति इस तरह टैरिफ नहीं लगा सकते हैं। भारत में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा है कि प्रधानमंत्री को पता था कि मामला सुप्रीम कोर्ट में है, किसी भी समय फैसला आ सकता है फिर भी करार की घोषणा जल्दबाजी में हुई और ट्रम्प ने लिखा है कि प्रधानमंत्री से बातचीत के बाद करार हुआ और तब प्रधानमंत्री ने घोषणा की। ऐसे राहुल गांधी ने चुनौती दी है कि मोदी जी भारत अमेरिका व्यापार करार रद्द करके दिखाएं। राहुल गांधी ने रैली में तो कहा ही है एक्स पर भी लिखा है लेकिन यह खबर में नहीं है कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रम्प के टैरिफ़ रद्द कर दिए, दुनिया भर के देशों ने अपने समझौते पर फिर से चर्चा शुरू की है। आप क्यों खामोश हैं? सारा देश जानता है आप ये नहीं कर सकते – क्योंकि आप अमेरिकी ग्रिप में चोक होकर पूरा सरेंडर (समर्पण) कर चुके हैं। मैं नहीं समझता कि यह खबर नहीं है और टैरिफ लागू होगा से कम महत्वपूर्ण या कम तथ्यात्मक है और अगर वह खबर है तो इसे छोड़ा जाना पक्षपाती पत्रकारिता के अलावा कुछ और है। नवोदय टाइम्स में भी लगभग यही स्थिति है। यहां शीर्षक है, दुनिया पर ट्रम्प का 10 प्रतिशत टैरिफ लागू। लीड वही, केरल नहीं अब केरलम है। और एआई समिट में युवक कांग्रेस अध्यक्ष गिरफ्तार और बच्चियों को कैंसर से बचाएगा टीका – जैसी खबरें हैं। लेकिन राहुल गांधी के आरोप-चुनौती से संबंधित कोई खबर नहीं है। जबकि राहुल गांधी पहले भी ऐसे आरोप लगाते रहे हैं और प्रधानमंत्री ने इन मुद्दों पर होंठ सिल रखे हैं।

ट्रम्प की पोस्ट पहले की है। इसमें जो लिखा है वह इतिहास बन गया है। लिखे समय के अनुसार प्रधानमंत्री से पहले पोस्ट किया गया है। एक ही साथ किया गया हो और तकनीकी कारणों से आगे पीछे हुआ हो सकता है लेकिन यह संयोग भी हो तो गौर करने लायक है। जो लिखा है वह तो है ही। दूसरा वाला प्रधानमंत्री का है और भारत की स्वीकारोक्ति भर है। यह उसी दिन गैर गोदी अखबारों में छपा था। सोशल मीडिया में तो चर्चा में है ही।
आज पश्चिम बंगाल एसआईआर से संबंधित सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी बड़ी खबर है। देशबन्धु ने पहले पन्ने पर छापा है और यह दिलचस्प है कि इसके साथ ही बताया गया है, एनसीईआरटी में अब न्यायिक भ्रष्टाचार भी पढ़ाया जाएगा। मुझे याद आता है कि हमलोगों ने स्कूल में पंच परमेश्वर की कहानी पढी थी और एक सवाल हमेशा याद रहा, “क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे?” मुंशी प्रेमचंद की इस मशहूर कहानी में जुम्मन शेख की खाला ने अलगू चौधरी से कहा था। पूरी कहानी पंच की निष्पक्षता और इस कारण उसके परमेश्वर होने की है। अब जब अपने आदमी को पंच बनाने, जज लोया, न्यायमूर्ति द्वय यशवंत वर्मा और शेखर कुमार यादव के मामले तथा धनखड़ होने के किस्से हैं तो ‘पंचायत’ के फैसले होते कुछ हैं, कहते कुछ और हैं। हालत यह है कि मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति से संबंधित मामले पर फैसला नहीं हुआ है या हो पाया है लेकिन उसके मनमाने नियम बनाने, दावों पर रोज सुनवाई की स्थिति और अक्सर विशेषाधिकार के उपयोग के बावजूद जो अनूठा आदेश आया उसे समाज (कई अखबारों) ने महत्वपूर्ण नहीं माना। आज यह लीड नहीं है। असल में हुआ यह है कि बंगाल एसआईआर के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पड़ोसी राज्यों के न्यायिक अधिकारियों को लगाकर इतिहास रच दिया है। इससे यह साबित हुआ है कि एसआईआर बिना किसी तय नियम और जरूरत के जबरन किया गया और होने दिया गया। न सिर्फ बिहार में, उसके बाद असम छोड़कर कुछ चुनावी राज्यों में और अब आगे बाकी बचे राज्यों में भी करने की तैयारी है। क्योंकि सत्तारूढ़ और सत्ता में होने का बेजा इस्तेमाल करने वाली भारतीय जनता पार्टी को यह फायदे का काम लग रहा है। इसलिए बहुत सारे सवालों का जवाब नहीं होने के बावजूद हो रहा है। पता नहीं, कंप्रोमाइज्ड पीएम के समर्थन में या कंप्रोमाइज्ड व्यवस्था द्वारा।
आइए देखें अखबारों ने इसे कैसे रिपोर्ट किया है, क्या शीर्षक है। द हिन्दू में यह खबर लीड है। शीर्षक हिन्दी में होता तो कुछ इस तरह होता – सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक टीम का विस्तार किया। बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया में सहायता के लिए पीठ ने कहा कि जरूरत पड़ने पर पड़ोसी राज्यों, उड़ीशा और झारखंड के न्यायाकि अधिकारियों की सेवाएं ली जा सकती हैं। यह कदम कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा राज्य में लाखों मतदाताओं के दावों और आपत्तियों के सामने आने के बाद उठाया गया है। मैं सिर्फ यह रेखांकित करना चाहता हूं कि आम तौर पर मतदाता सूची में होने वाले परीक्षण, जांच, अपडेशन आदि के अलावा सघन पुनरीक्षण की जरूरत मुख्य रूप से घुसपैठियों का पता लगाने या उन्हें वोट देने से रोकने के लिए किया जाना था। नरेन्द्र मोदी सत्ता में नहीं थे तो इसे सत्तारूढ़ पार्टी का वोट बैंक बताते थे और 10 साल से ज्यादा सत्ता में काट कर संविधान बदलने के लिए 400 पार का नारा देने के बाद बैसाखियों के सहारे सरकार बनाने के बाद घुसपैठ से पल्ला झाड़ लिया। उसे पश्चिम बंगाल सरकार के सिर थोप दिया और डबल इंजन वाले राज्यों में भी बांग्लादेशी मिलने लगे तो बांग्ला बोलने वालों को बांग्लादेशी समझ लिया गया तथा ऐसी महिला को भी जबरन बांग्लादेश भेज दिया गया जिसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर वापस लाना पड़ा। इसके बावजूद एसआईआर चलता रहा और तर्कसंगत विसंगतियां दूर करने के लिए लाखों लोगों को परेशान किया गया, करोड़ों बहा दिए गए। बंगाल में समझ में आया कि व्याहारिक नहीं है और नियमानुसार काम करने की मांग के कारण पहले तो एसआईआर का काम न्यायिक अधिकारियों को सौपना पड़ा और फिर पड़ोसी राज्यों के न्यायिक अधिकारियों की भी सेवा लेने की स्थिति बन गई।
फिर भी जो खबर और शीर्षक है उसमें टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा है – ऐसी व्यवस्था की जरूरत है जो मतदान को आवश्यक बनाए : सुप्रीम कोर्ट। यह शीर्षक तब है जब शुरू से कहा जाता रहा है कि एसआईआर को समावेशी होना चाहिए। पर जो हुआ उसमें लोगों को बाहर कर दिया गया फिर सबूत मांगे गए वह भी तय समय सीमा के अंदर पेश किया जाना था और बहुतों के लिए सशरीर देने की मजबूरी थी जो खर्चीला भी था। जो रह गए उनकी कोई परवाह नहीं है और अब जो सूची में रहने के लिए चुने गए हैं उनका वोट देना जरूरी महसूस किया जा रहा है। अखबार की खबर यही है। इसमें स्पष्टीकरण भी है कि, वोट देना जरूरी किया जाए तो जरूरी नहीं है कि नहीं देने वालों के लिए दंडात्मक कदम उठाया जाए यह नोटा के विकल्प को अमान्य करने का उपाय भी हो सकता है। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक सुप्रीम कोर्ट का आदेश है। इसके अनुसार, चुनाव आयोग से कहा गया है कि वह (घोषित) अंतिम तिथि के बाद भी पश्चिम बंगाल की (मतदाता सूची) प्रकाशित करता रहे और यह 28 फरवरी को अंतिम (फाइनल) मतदाता सूची प्रकाशित होने के बाद भी जारी रह सकता है। इस असाधारण कदम का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना बताया गया है कि कोई भी मतदाता विधानसभा चुनाव से पहले मतदान अधिकार से वंचित न रहे। अखबार ने लिखा है कि अब चुनाव के आंशिक रूप से देर से होने की आशंका है।
इंडियन एक्सप्रेस में भी यह खबर लीड है। शीर्षक हिन्दी में इस तरह होगा, सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल एसआईआर में मदद के लिए उड़ीशा, झारखंड के जजों की भी मदद लेने की इजाजत दी। एक खबर यह भी है पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ टीएमसी ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि अनधिकृत समीक्षाएं हुई हैं, संदिग्ध लॉग इन हुए हैं और अपलोड किए गए दस्तावेज धुंधले नजर आते हैं। जाहिर है, सत्तारूढ़ दल एसआईआर से संतुष्ट नहीं है और सबको पता है कि भाजपा राज्य विधानसभा चुनाव जीतने के लिए हर संभव उपाय करती रही है। ऐसे में 250 न्यायिक अधिकारियों को अगर कम समय में 50 लाख विसंगतियों पर फैसला करना था तो यह भी कहा जा सकता था कि वे उन्हीं मामलों को छांट लें जो विदेशियों या घुसपैठियों के लगते हैं और बाकी को रहने दें। अगर घुसपैठियों की संख्या लाखों में हैं तो गांठ बांध लीजिए कुछ होना नहीं है उन्हें (वो जो भी हैं) हटाने का कारण घुपैठिया होना नहीं पार्टी विशेष को वोट देने वाला या नहीं देने वाला होना ही देखा जाएगा। इंडियन एक्सप्रेस में युवक कांग्रेस प्रमुख को गिरफ्तार किए जाने की खबर के शीर्षक में ही लिखा है, अपने बब्बर शेर सहकर्मियों के साथ मजबूती से खड़ा हूं। द टेलीग्राफ की लीड एसआईआर ही होनी थी। शीर्षक है, बंगाल एसआईआर के लिए बाहर के लोग। फ्लैग शीर्षक सुप्रीम कोर्ट का आदेश, अगर जरूरत हो तो उड़ीशा, झारखंड के न्यायिक अधिकारियों की सेवा ली जाए। दि एशियन एज अंग्रेजी के मेरे अखबारों में अकेला है जिसने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इजराइल दौरे की खबर को लीड बनाया है और बताया है कि आज पहुंचेंगे और यहां भी रक्षा, व्यापारिक संबंध एजंडा आयटम है। इस खबर के बाद संपादकीय लिखकर प्रधानमंत्री की प्रशंसा की जा सकती है कि तमाम आरोपों से प्रधानमंत्री डिगे नहीं और आगे भी व्यापार करने के एजंडा पर काम कर रहे हैं। पर वह अलग मामला है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


