मनीष सिंह-
अमूमन नेताओ के इंटरव्यू नहीं देखता, लेकिन प्रशान्त किशोर के देख रहा हूँ। उनकी राजनीति, नीयत, फ़ंडिंग, रणनीति पर शुबहे अपनी जगह हैं, मगर बन्दा बात बुद्धिमान जैसी करता है। तो घण्टे भर के इंटरव्यू पॉडकास्ट भी श्रवणीय होते है। लेकिन हाल में जिस तरह से वे पत्रकारों पर हमलावर और अधीर होते दिखते है, वह उनके वाक चातुर्य की छवि पर चोट करता है।
एक समय कन्हैया कुमार की स्पीच देखता था। तब उसकी बातों में भी फ्रेशनेस थी। अब तो सुनने का जी नहीं करता। एक बार टीवी शो में अशोक वानखेड़े से बदतमीजी कर ली।
हाल में एक सफेद बालों वाली महिला जर्नलिस्ट से जवाब में भटक गए। जबकि ये दोनों लोग गोदी मीडिया नहीं है। इनके पूछे प्रश्न ठीक थे। ज्यादा मात्रा में एक्सपोजर और रिपिटेड सवालों से इरिटेशन होता है। डिस्टॉर्टेड, पॉइंटेड सवाल, अधकचरी रिसर्च और व्यक्तिगत लांन्छन भी चिढ़ाते है। पत्रकार का अपना भी एजेंडा होता है, टीआरपी की ललक होती है।
मगर यह नेता का प्रोफेशनल चैलेंज है, जॉब है।
एबीपी की महिला पत्रकार का इंटरव्यू पीके ने अधबीच में छोड़ दिया। उस महिला को दवा की पर्याप्त डोज देने के बाद, उन्हें कंटीन्यू रखना चाहिए था। उन्हें उठता देख, “दोस्ती बनी रहे” वाले बड़े भाई साहब की याद आई, और फिर ऐसे शख्स का आगे का राजनीतिक कार्यशैली भी..
फिर एक वीडियो में अपने बच्चे की स्कूलिंग पर जवाब देते चिढ़ा हुआ दिखते हैं। सवाल बेमानी था, मगर नए नेताओं को इस जहरीले पत्रकारीय माहौल में घमंडी, डोमिनेटिंग, दिखने से बचना चाहिए।
हंसना, सवाल को जवाब दिए बिना जवाब देना, और पत्रकार के चैनल, फोरम को तमाम दुश्वारियों के बावजूद अपने पर्पज के लिए इस्तेमाल कर जाने का हुनर, नेता की बेसिक स्किल है। अखिलेश यह काम बखूबी करते है।
पीके, कन्हैया और बहुत से पक्ष विपक्ष के प्रवक्ता नेता इसमें हुनरमंद होते हुए भी अक्सर भटकते दिखते हैं। मीडिया में चौमू लोग बैठे हैं। इनके सामने बड़ा चौमू बनने की जरुरत नहीं। आप अलग तरह की बात करने के लिए जाने जाते हैं, तो फिर अपना संयत व्यक्तित्व को खोने से बचना चाहिए।
देखें कुछ वीडियो-




Sumit Gupta
October 23, 2025 at 10:45 am
आज के जमाने में पत्रकार जैसी कोई चीज नहीं होती