व्योमेश शुक्ल-
अमृत राय की किताब क़लम का सिपाही के आख़िरी अनुच्छेद में वर्णित प्रेमचंदजी की अंतिम यात्रा के तथ्यों पर लिखना मेरे लिए बहुत खेद का विषय था. इस प्रसंग में मैंने क्षण भर के लिए भी उत्साह का अनुभव नहीं किया. हिन्दवी पर उसके प्रकाशन के बाद और बातों के अलावा मुझे यह भी अनुभव हुआ कि हिंदी के श्रेष्ठ साहित्यिक और सुधी पाठक मेरे लिखे को गंभीरता से लेते हैं और मुझ न-कुछ को सहानुभूति, गरिमा और प्यार के साथ स्वीकार-अस्वीकार करते हैं.
ऐसे श्रेष्ठ साहित्यिकों में से कुछ लोग मेरी लिखाई से असहमत या कुछ नाराज़ हैं. मैं भी उनसे असहमत हूँ और साथ ही साथ उनके कृतित्व का बहुत आदर भी करता हूँ. यही हासिल है और कुछ कम नहीं है.
बहस में हमने नंददुलारे वाजपेयी-लिखित पृष्ठ भी पढ़ा. अब एक बार यह पन्ना भी पढ़ लिया जाय; जहाँ एक वाक्य ख़ास तौर पर ग़ौरतलब है : श्मशान जाने के लिये नगर के सैकड़ों संभ्रांत साहित्यिक उतावले हो रहे थे.

(पुस्तक का नाम : बीतीं यादें, लेखक : परिपूर्णानंद वर्मा; प्रथम संस्करण : नवंबर, 1976; पूर्वोदय प्रकाशन, नई दिल्ली; पृष्ठ 67)
पूरे प्रकरण को समझने के लिए इसे पढ़ें-
https://www.hindwi.org/bela/master-ki-arthi-nahin-thi-aashisq-ka-janaza-tha-vyomesh-shukla
प्रभात रंजन-
दो दिन से देख रहा था फ़ेसबुक पर प्रेमचंद की अंतिम यात्रा को लेकर घमासान मचा हुआ था। केंद्र में कवि-लेखक व्योमेश शुक्ल का हिंदवी पर प्रकाशित लेख था। उस लेख में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसको लेकर इतना विवाद होना चाहिए। उन्होंने एक अख़बार की कटिंग को प्रस्तुत करते हुए प्रेमचंद के पुत्र और प्रसिद्ध लेखक अमृत राय द्वारा बनाई गई इस धारणा का तर्कपूर्ण खंडन किया है कि प्रेमचंद की अंतिम यात्रा में बहुत कम लोग शामिल हुए थे। लेकिन व्योमेश शुक्ल द्वारा प्रस्तुत 10 अक्टूबर 1936 की आज अख़बार की कटिंग इससे एकदम उलट बात बताती है।
इतिहास इसी तरह से बनता-बिगड़ता रहता है। एक नया तथ्य सामने आता है और पुरानी अनेक धारणाएँ खंडित हो जाती हैं, इतिहास का नया पाठ तैयार होने लगता है। मैं इस कार्य के लिए व्योमेश शुक्ल का अभिनंदन करता हूँ। यह फाँस सिर्फ़ बनारस की ही नहीं थी, यह पूरे हिन्दी समाज की फाँस थी कि हिन्दी के सबसे बड़े आधुनिक लेखक की अंतिम यात्रा में बहुत कम लोग आये थे और लगभग गुमनाम आदमी की तरह उनकी अंतिम यात्रा निकली थी। व्योमेश शुक्ल का लेख पढ़कर राहत महसूस हुई कि ऐसा नहीं था। वह ‘मास्टर की अर्थी नहीं आशिक़ का जनाजा था’ और धूमधाम से निकला था।
अब सवाल यह उठता है कि क्या अमृत राय ने अपने पिता प्रेमचंद की जीवनी लिखते हुए उनकी ऐसी बेचारी छवि जानबूझकर गढ़ी थी? क्योंकि वे तो वहाँ मौजूद थे। फिर उन्होंने झूठ क्यों लिखा?
वीरेंद्र यादव-
अमृत राय द्वारा लिखित प्रेमचंद की जीवनी ‘कलम का सिपाही’ कल से बीच बहस है। जीवनी में उल्लिखित प्रेमचंद की शवयात्रा के दृश्य को प्रश्नांकित करते हुए Vyomesh Shukla ने बनारस के अखबार ‘आज’ के हवाले से अमृत राय के इस कथन को तथ्य परे सिद्ध करने की कोशिश की है कि :
“लमही खबर पहुंची। बिरादरीवाले जुटने लगे। अरथी बनी। ग्यारह बजते -बजते बीस- पच्चीस लोग किसी गुमनाम आदमी की लाश लेकर मणिकर्णिका की ओर चले। रास्ते में एक राह चलते ने दूसरे से पूछा –के रहल?
दूसरे ने जवाब दिया — कोई मास्टर था!”
अमृत राय प्रेमचंद के बेटे थे, वे इस शवयात्रा में शामिल थे, यद्यपि उनकी उम्र सिर्फ चौदह वर्ष की थी। ‘कलम का सिपाही’ प्रेमचंद के निधन के 26 वर्ष बाद प्रकाशित हुई थी। स्पष्ट है कि उन्होंने प्रेमचंद की जीवनी लिखने के लिए आधार सामग्री जुटाई होगी। और इस अंतिम दृश्य के लेखन के लिए अपनी स्मृति के साथ कुछ अन्य प्रकाशित सामग्री का सहारा भी लिया होगा। अमृत राय द्वारा वर्णित इस अंतिम दृश्य के तथ्य जिस पुस्तक में मिलते जुलते रुप में उपलब्ध है, वह पुस्तक नंद दुलारे वाजपेयी द्वारा लिखित और भारती भंडार, लीडर प्रेस प्रयाग द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘जयशंकर प्रसाद’ के ‘व्यक्ति की एक झलक’ अध्याय में उपलब्ध है।
नन्ददुलारे बाजपेयी की पुस्तक ‘जयशंकर प्रसाद’ के अध्याय ‘व्यक्ति की एक झलक’ के पृष्ठ सं0-160 पर इस आशय का उल्लेख है कि : “गत वर्ष जब प्रेमचन्द जी हिन्दी संसार को सूना करके जा रहे थे तब उनके साथ श्मशान तक प्रसाद जी भी गये थे और मैं भी गया था। अर्थी काशी की गलियों से होकर जा रही थी। इतने में किसी ने वहीं की बोली में कहा “मालूम होता है कोई मास्टर मर गया है।” बात यह थी कि अर्थी के साथ थोड़े से पढ़े लिखे लोग थे, कोई भीड़ न थी और ‘रामनाम सत्य है’ की आवाज भी वैसी नहीं हो रही थी। ऐसी अवस्था में कोई मामूली मास्टर ही मर सकता था, और कौन मरता!”
नंद दुलारे वाजपेयी ने यह लेख प्रेमचंद के निधन के एक वर्ष बाद लिखा था, तब जयशंकर प्रसाद जीवित थे। नंद दुलारे वाजपेयी के इस कथन से यदि जयशंकर प्रसाद की असहमति होती तो उसका भी उल्लेख कहीं होता ही। किसी अन्य द्वारा भी इससे असहमत होने का कोई तथ्य होता तो वह भी चर्चा में आता ही। लेकिन इसके अभाव में स्वाभाविक रुप से वाजपेयी जी और जयशंकर प्रसाद के बीच हुए इस संवाद को तथ्यपरक माना जाना चाहिए। कोई कारण नहीं है कि अमृत राय जो स्वयं हिंदी के यशस्वी लेखक थे वे अपने पिता और हिंदी के शिखर के लेखक प्रेमचंद की अंतिम यात्रा की गढंत करके उन्हें बनारस में उपेक्षित व्यक्तित्व के रुप में पेश करते।
‘कलम का सिपाही’ के संदर्भित प्रसंग के आधार पर इस शाहकार जीवनी को तथ्यों से परे करार देना जयशंकर प्रसाद और नंद दुलारे वाजपेयी के बीच हुए संवाद और संस्मरण को भी नकारना है। ‘आज’ अखबार में प्रकाशित समाचार को आधार बनाकर जयशंकर प्रसाद, नंद दुलारे वाजपेयी व अमृत राय को झुठलाना और ‘कलम का सिपाही’ को खारिज किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। काश, ऐसा न होता!
Jagdish Baranwal Kund के सौजन्य से नंद दुलारे वाजपेयी की पुस्तक का पृ 160 का लिंक संलग्न है:

शंभुनाथ-
प्रेमचंद की अंतिम यात्रा और बनारस
प्रेमचंद की शवयात्रा में कितने व्यक्ति थे और ’आज’ तथा अमृत राय में कौन ज्यादा प्रामाणिक है, इनसे कुछ अन्य सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। बनारस छोड़िए, उत्तर प्रदेश में कितने पुल, विश्वविद्यालय, महत्वपूर्ण सड़कें और अस्पताल प्रेमचंद के नाम पर हैं? रवींद्रनाथ की जयंती पर जितना उत्साह बंगाल की गली–गली, शहर–शहर में दिखता है उसका कितना प्रतिशत प्रेमचंद की जयंती पर उत्तर प्रदेश या अन्य हिंदी प्रदेशों में दिखता है?
प्रेमचंद की जन्मभूमि लमही को रवींद्रनाथ की जन्मभूमि कोलकाता के जोड़ासांको की तरह कितनी इज्जत मिली हुई है, वहां कितने उत्साह से कितने सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं? लमही की क्या दशा है?
बनारस ने बुद्ध को देखा है, कबीर को देखा है। बुद्ध और कबीर निर्भीकता से अपनी बातें सारनाथ–वाराणसी में कह सके थे और किसी ने उनकी क्षति नहीं की। यह वाराणसी का गौरव है! फिर इसी बनारस में दयानंद सरस्वती के साथ काशी के पंडितों ने शास्त्रार्थ (1869) में जो बुरा सलूक किया, वह भी इसी शहर की घटना है।
बनारस में प्रेमचन्द, प्रसाद, रामचंद्र शुक्ल जैसे लेखकों की एक उज्ज्वल परंपरा है, फिर हजारी प्रसाद द्विवेदी के साथ जो घटित हुआ, वह भी इसी शहर की घटना है!
प्रेमचंद की शवयात्रा में कितने व्यक्ति थे 25 या 100, यह गिना जा सकता था। इसी पर शर्म आनी चाहिए कि इतने महान कथाकार की अंतिम यात्रा में शामिल लोग गिने जा सकते थे! क्या श्री व्योमेश शुक्ल ने कभी दूसरे प्रदेशों के उसी दौर के महान साहित्यकारों की शवयात्रा में जन समुद्र की बात सुनी है?
हिंदी साहित्यकार हिंदी प्रदेशों में कितने सम्मान से देखे जाते रहे हैं और आज भी उनका कितना सम्मान है, यह किसी से छिपा नहीं है। 55 करोड़ की हिंदी आबादी में हिंदी के कितने साहित्यिक पाठक हैं और पुस्तकों की कितनी प्रतियां छपा करती हैं या ऑनलाइन पढ़ी जाती हैं, यह भी किसी से छिपा नहीं है।
कोई भी साहित्यिक आंदोलन, भक्ति आंदोलन तक यहां के लोगों को उतना नहीं छू पाया, जितना मंदिर के घंटे सुने गए, अबूझ मंत्रोच्चार सुने गए और आजकल फिल्मी धुन पर भजन या धार्मिक प्रवचन सुने जाते हैं!
हमारे महान प्राचीन कवि और महान आधुनिक साहित्यकार हमारी सांस्कृतिक आँखें हैं और जो समाज अपने महान साहित्यकारों की परवाह नहीं करता, उसे अंधा होने में देर नहीं लगती! इस बिंदु पर हिंदी समाज के लोगों को आत्मनिरीक्षण करना चाहिए कि उन्होंने भोगी महंतों– प्रवचनकर्ताओं को ज्यादा सम्मान दिया या कवियों–साहित्यकारों को?
हमें प्रेमचंद से संबंधित अभिमतों के संसार में अब दूसरे कमल किशोर गोयनका की जरूरत नहीं है। हालांकि गोयनका जी ने मेहनत से उनकी कई दुर्लभ रचनाएं ढूंढ़ी हैं, उनकी इस बात की हम सराहना करते हैं!
पंकज मोहन-
प्रेमचंद की अर्थी… 8 अक्तूबर 1936 की सुबह काशी-स्थित अपने आवास पर जब प्रेमचन्द दातुन से मुंह धोने की तैयारी कर रहे थे, उनकी सांस अचानक उलटी चलने लगी। थोड़ी ही देर में वे छप्पन साल की उम्र में इस दुनिया से विदा हो गये। प्रेमचंद ने देश और हिन्दी साहित्य की वेदी पर अपना सर्वस्व लुटाया, अपनी अंतिम सांस तक कलम का मजदूर बनकर स्वेद और रक्त से हिन्दीकथा की जमीन सींची और उसे शस्य-श्यामल बनाया, लेकिन उनकी शवयात्रा में सम्मिलित हिन्दीसेवियों और साहित्यकारों को उंगलियों पर गिना जा सकता था। लमही से आये उनके सगे-संबंधियों को अगर मिलाकर देखा जाये, तो उनकी शव यात्रा में ज्यादा से ज्यादा पैंतीस-चालीस लोग शामिल थे।
जब अर्थी को मणिकर्णिका घाट की दिशा में ले जाया जा रहा था, किसी राहगीर ने उत्सुकतावश पूछा, ‘कौन था?’ बगल में खड़े आदमी ने कहा ‘कोई मास्टर था, मर गया।’
अमृत राय और नन्द दुलारे बाजपेयी ने शवयात्रा का उल्लेख किया। “आज” समाचार-पत्र में प्रकाशित संक्षिप्त रिपोर्ट उपरोक्त साक्ष्य का खंडन नहीं करता। “आज’ के रिपोर्ट के अनुसार प्रेमचंद के अंतिम संस्कार के समय मणिकर्णिका घाट पर ‘साहित्यिकों की भीड़’ थी। आज के संवाददाता ने लिखा, “कितने लोग अरथी के साथ चले”, लेकिन जब प्रेमचंद के नश्वर, पार्थिव शरीर को चिता पर चढ़ाया गया, उस समय “बहुतेरे साहित्यिक और छात्र” वहां पहुंच गये थे। हमें “भीड़” शब्द को भी सही परिप्रेक्ष्य में समझने की जरूरत है। श्मशान घाट पर अंतिम दर्शनार्थ जुटे सत्तर-अस्सी (जो कुछ लोगों की नजर में सौ भी हो सकती है) की संख्या को भीड़ कहा जा सकता है।
हजार और दो हजार लोगों का हुजूम ही भीड़ नहीं कहलाता। प्रेमचंद जैसे हिन्दी कथा-साहित्य के चक्रवर्ती सम्राट के अंतिम संस्कार में सौ लोगों की उपस्थिति हिन्दी को कलंकित करने वाला समाचार है, और मैं इसे दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण मानता हूं कि इस “न्यूजक्लिप” को पढकर काशी नागरी प्रचारिणी सभा का सभापति अपनी पीठ ठोक रहा है, गौरवान्वित हो रहा है और इस तथ्य को हिन्दी के उन्नत, समुज्ज्वल भाल का पुख्ता प्रमाण मान रहा है।
1 जून 1885 को फ्रांसीसी उपन्यासकार विक्टर ह्यूगो की अर्थी के पीछे बीस से तीस लाख लोगों की भीड़ थी और 1936 में जब गोर्की का निधन हुआ, उनकी शवयात्रा जिसका नेतृत्व तत्कालीन सोवियत रूस का मुखिया स्टालिन स्वयं कर रहा था, में भी अपार भीड़ थी। प्रेमचंद के पार्थिव शरीर की अंतिम यात्रा को, उनकी स्मृति को बनारस की जनता ने, हिन्दी समाज ने, देश ने उचित सम्मान नहीं दिया। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने प्रेमचंद को वैसी श्रद्धांजलि नहीं दी, जैसी शरतचंद्र बाबू को दी, इसका उलाहना निराला जी ने 1939 में नेहरू जी को दिया।
अमृतराय की कालजयी पुस्तक में गलतियां हो सकती हैं और आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी की शवयात्रा-विषयक स्मृति सदोष हो सकती है, लेकिन “शवयात्रा” से सम्बन्धित इस स्थापना के खंडन के लिये हम श्मशान घाट पर जमा हुये स्वजन-परिजन और श्रद्धालुओं की संख्या का सबूत पेश नहीं कर सकते और न ही परवर्ती काल में विभिन्न संस्थाओं द्वारा आयोजित शोक सभाओं की उपस्थिति का तर्क प्रस्तुत कर सकते हैं। असम्बद्ध प्रसंग के हवाले से किसी तथ्य को नकारने के प्रयास को तर्कशास्त्र में intentional fallacy या epistemic fallacy कहते हैं।
प्रेमचंद की मृत्यु के ग्यारह दिन बाद 19 अक्तूबर 1936 को चीन के सांघाई नगर में चीनी कथाकार लू शुन जिन्हें माओ ने “चीन की नई संस्कृति का सिपहसालार” कहा, ने पचपन वर्ष की अवस्था में अंतिम सांस ली।
1936 मे सांघाई को इंग्लैंड, अमेरिका, फ्रांस और जापान जैसी साम्राज्यवादी ताकतों ने छोटे-छोटे हिस्सों में बांट रखा था। सांघाई के आधे हिस्से में विदेशी रहते थे और आधे में चीनी। संघाई मे लू शुन के एक जापानी मित्र थे उचियामा। वे किताब की एक बड़ी दुकान के मालिक थे। जुलाई 1936 में ही जब लूशुन बीमार पड़े, उचियामा ने जापान में उनके उपचार की व्यवस्था की। जापान के अखबारों में भी यह खबर छप गई। कोरिया के सर्वाधिक लोकप्रिय दैनिक “तोंग-आ इलबो” में भी समाचार छपा जिसका शीर्षक था “लूशुन का जापान आगमन?”।
लूशुन ने कहा, “जापान जाने पर जापानी प्रेस मेरा पीछा नहीं छोड़ेगा, वहाँ मैं स्वास्थ्य-लाभ नहीं कर पाऊँगा।” 1911 में छिंग राजवंश को धराशायी कर चीनी गणराज्य की स्थापना में अहम भूमिका निभाने वाले चीन के राष्ट्रपिता सन यातसेन की धर्मपत्नी शुंग छिंगलिंग ने लूशुन को उपचार के लिये सोवियत संघ भेजना चाहा। लूशुन ने कहा, मैं लम्बे समय तक अपनी कर्मभूमि से दूर नहीं रह सकता। मुझे यहाँ रहकर अपनी अंतिम सांस तक साम्राज्यवादी और सामन्तवादी ताकतों के गुलाम साहित्यकारों को बेनकाब करना है।”
प्रेमचन्द की तरह लूशुन की मृत्यु भी सुबह में हुई। जब लूशुन मृत्युशय्या पर लेटे हुये अपनी अंतिम सासें गिन रहे थे, उनके जापानी मित्र उचियामा ने तीन जापानी डाक्टरों को उनके उपचार के लिये भेजा था। पिछले कुछ महीनों से एक जापानी नर्स लूशुन की सेवा सुश्रुषा कर रही थी। मृत्यु के कुछ घ॔टे बाद उनके शव को मकान के निचले मंजिल पर जनता के अंतिम दर्शन के लिये रख दिया गया। दरवाजे पर एक रजिस्टर भी रख दिया गया ताकि आगंतुक जन अपना शोक संदेश व्यक्त कर सकें। उस रजिस्टर में नौ हजार लोगों ने शोक संदेश लिखे। शहर के गणमान्य नागरिकों से लेकर स्कूल-कालेज के छात्र, मजदूर, रिक्शाचालक सब आये। सबों की आंखों से आंसू छलक उठे थे। कई संस्थाओं और मजदूर संगठनों ने फूल मालायें भेजीं।
चीन के सभी समाचार पत्रों ने इस समाचार को “देश के साहित्य सम्राट का निधन” “राष्ट्र की आत्मा का देहान्त” आदि शीर्षक देकर प्रमुखता से छापा। जापान और कोरिया के अखबारों और रेडियो के माध्यम से भी लूशुन की मृत्यु का समाचार प्रकाशित-प्रसारित हुआ। लूशुन ने जापान के शेन्दाई नगर में उच्च शिक्षा पायी थी और उनकी मुख्य रचनाओं के जापानी अनुवाद की उपलब्धता के कारण जापान में उनके लाखों लाख प्रशंसक थे।
लूशुन अंत्येष्टि समिति के सदस्य की सूची में चेयरमैन माओ, सन यातसेन की विधवा शुंग छिंगलिंग, उस समय चीन में रह रही क्रान्तिकारी अमेरिकी लेखिका एगनिज स्मेडली आदि का नाम था। सांघाई के साम्राज्यवादी प्रशासक को भय था कि लूशुन की शवयात्रा साम्राज्यवाद-विरोधी जुलुस का स्वरूप धारण कर सकती है, इसलिए शवयात्रा को नियंत्रित करने के लिए घुड़सवार सिपाहियों का एक दल तैनात था। शवयात्रा में शामिल हजारों हजार लोग “लूशुन जिन्दाबाद” “लूशुन अमर रहे”, “चीन की जय” , “साम्राज्यवाद मुर्दाबाद” आदि के नारे लगा रहे थे। गाने-बजाने वालों की एक मंडली “राष्ट्र की आत्मा, लूशुन” नामक मर्सिया गा रही थी। ताबूत पर बिछे चादर पर भी “राष्ट्र की आत्मा” शब्द अंकित थे।
पेकिंग (पेइचिंग) नगर मे लूशुन के भाई जो स्वयं एक बड़े लेखक थे, माताजी और अपने परिवार के साथ रहते थे। अस्सी वर्ष की माताजी ने कहा, काश, मेरी उमर भी बेटे को लग जाती। लूशुन की परिणीता जो आजीवन पति के प्रेम से वंचित रही, फूट फूट कर रोयी और दो महीने के भीतर ही चल बसी। लूशुन के पेइचिंग-स्थित मकान में भी शोकाकुल जनता का हुजूम इकट्ठा हो गया।
प्रेमचन्द और लूशुन दोनो ने साहित्य के माध्यम से अपने देश की जनता की सोयी हुई चेतना को झकझोरने और उन्हें साम्राज्यवादी ताकतों द्वारा देश पर थोपी गई महाजनी सभ्यता के खतरे से अवगत कराने का प्रयास किया। साथ ही उन्होंने सामन्तवादी ढांचे की सामाजिक संरचना की विसंगतियों और धर्म के नाम पर सदियों से चली आ रही पाखंड की दुकानदारी पर भी प्रहार किया। चीन में लूशुन के बहुत से स्मारक हैं, विशाल पार्क है, उनके नाम पर स्कूल है, पुस्तकालय है, शोध संस्थान है। चीन में सन यात-सेन, माओ और उनके कार्यकाल के प्रधानमंत्री चौ सदृश चीन के दो-चार भाग्यविधाता अपवाद हैं — वहां भारत की तरह व्यक्ति के नाम पर स्कूल-कालेज खोलने या रोड का नामकरण करने की प्रथा या परिपाटी नहीं है। आज लूशुन का जन्मस्थान माओ के जन्मस्थान की तरह एक मशहूर पर्यटन स्थल है। हमें यह सोचना है कि हमने आधुनिक हिन्दी साहित्य के सबसे महान कथालेखक के लिये क्या किया।
प्रेमचंद की मृत्यु के बाद उनके समकालीन क्रातिदर्शी लेखक मन्मथनाथ गुप्त ने लिखा, “जिस समय वे गये, उस समय हिन्दीवालों ने उन्हें नहीं पहचाना, आज भी पहचाना है या नहीं, इसमें सन्देह है।” बिहार के यशस्वी साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी जो 1930 के दशक में आचार्य शिवपूजन सहाय के साथ या तो बनारस में रहते थे या अक्सर आया-जाया चरते थे, ने लिखा, प्रेमचंद को न तो हिन्दी-साहित्य सम्मेलन का सभापति बनाया गया और न ही उन्हें मंगला प्रसाद पारितोषिक के योग्य माना गया। “मेरे यू० पी० के दोस्त दोस्त माफ़ करें, उन्होंने जो इस सम्बन्ध में पाप किये हैं। उसका कोई भी प्रायश्चित नहीं है। मेरे कानों में वह वाक्य गूंज रहा है, जो हिन्दी-सम्मेलन के एक बड़े अधिकारी ने, ब्राह्मण होते हुए, मुझसे कहा था — बेनीपुरीजी, आप इन कायस्थों के चकमे में आते हैं, आप तो ब्राह्मण ठहरे!”




