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दिल्ली

पंजाब केसरी समूह पर छापे के पीछे की मूल वजह स्वाती मालिवाल से जानिए!

नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के कथित सत्ता मॉडल पर उनकी ही पूर्व सहयोगी और राज्यसभा सांसद स्वाति मालिवाल ने बड़ा हमला बोला है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर किए गए एक पोस्ट में स्वाति मालिवाल ने पंजाब सरकार और मीडिया के रिश्तों को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं, जिससे केजरीवाल की राजनीति और ‘ईमानदार शासन’ के दावों पर सवाल खड़े हो गए हैं।

स्वाति मालिवाल ने लिखा कि देश के प्रतिष्ठित अख़बार पंजाब केसरी द्वारा पंजाब के ‘सुपर सीएम’ के शीश महल-2 से जुड़ी खबर छापने के बाद हालात ऐसे बना दिए गए, जैसे पूरा सरकारी तंत्र उस अख़बार के पीछे पड़ गया हो। उन्होंने आरोप लगाया कि पंजाब सरकार मीडिया को करोड़ों रुपये के विज्ञापन देकर यह तय करती है कि कौन-सा मीडिया संस्थान सरकार की तारीफ करेगा और कौन आलोचना करेगा।

मालिवाल के अनुसार, जो मीडिया सरकार की ज्यादा प्रशंसा करता है, उसे ज्यादा विज्ञापन दिए जाते हैं, जबकि जो 1 प्रतिशत भी नकारात्मक रिपोर्टिंग करता है, उसके विज्ञापन बंद कर दिए जाते हैं और ऊपर से पुलिस एक्शन तक तय हो जाता है। उन्होंने यह भी दावा किया कि जिन पत्रकारों को सरकार पसंद नहीं करती, उनकी मान्यता (एक्रिडिटेशन) तक रद्द कर दी जाती है।

पूर्व सहयोगी ने यह आरोप भी लगाया कि दिल्ली के पत्रकारों को पैसे देकर पंजाब में नौकरियां और ट्रांसफर कराए गए, ताकि मीडिया पर प्रभावी नियंत्रण रखा जा सके। अलग-अलग सरकारी विभागों के जरिए विज्ञापन के नाम पर भारी-भरकम खर्च किया जा रहा है, जिसका असली मकसद जनसूचना नहीं बल्कि सरकार का प्रचार बताया जा रहा है।

स्वाति मालिवाल ने चेतावनी देते हुए कहा कि जिस दिन सरकार के प्रचार और विज्ञापन पर किए गए खर्च का पूरा सच सामने आएगा, उस दिन “सबके होश उड़ जाएंगे”। उनके इस बयान को केजरीवाल सरकार के भीतर की नाराजगी और सत्ता की राजनीति में पैदा हुए टकराव के रूप में देखा जा रहा है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आम आदमी पार्टी जिस ‘नैतिक राजनीति’ और ‘ईमानदार शासन’ की बात करती रही है, उसी पार्टी के भीतर से ऐसे आरोप सामने आना, सत्ता की लालसा से जन्म लेने वाले उस घिनौने खेल की ओर इशारा करता है, जिसे अब तक पर्दे के पीछे रखा गया था। स्वाति मालिवाल का यह खुलासा न सिर्फ केजरीवाल सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा करता है, बल्कि मीडिया की स्वतंत्रता और सरकारी विज्ञापन नीति पर भी गंभीर बहस को जन्म देता है।

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