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मुखौटे के पीछे का चेहरा: लोकतंत्र के नाम पर अघोषित आपातकाल

ज्ञानेंद्र अवस्थी-

कभी-कभी सत्ता खुद को इतना सजा-संवार लेती है कि वह अपने ही अपराधों को संविधान की वेशभूषा में छिपा देती है। वह विरोध का अभिनय भी करती है, और दमन भी। वह लोकतंत्र का उत्सव भी मनाती है, और नागरिकों की सूची से नाम भी काटती है। वह प्रेस की स्वतंत्रता के कसीदे भी पढ़ती है, और उसी प्रेस का गला भी दबाती है।

यह कोई विरोधाभास नहीं, यही भारत का नया राजनीतिक तंत्र है — मुखौटे का तंत्र।

आज जो शासन है, वह इंदिरा गांधी के घोषित आपातकाल को बार-बार कोसता है — क्योंकि वही उसकी ढाल है। हर अत्याचार को वह इस तर्क से ढंकता है कि “कम से कम हमने तो आपातकाल घोषित नहीं किया।” लेकिन सवाल यह नहीं है कि आपातकाल घोषित हुआ या नहीं — सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र जिंदा है? और अगर लोकतंत्र जिंदा है, तो फिर क्यों…

– रॉयटर्स जैसे विश्वसनीय मीडिया संस्थान का X अकाउंट भारत में बंद किया गया?
– बीबीसी पर दस्ते भेजे गए जब उन्होंने एक डॉक्युमेंट्री चलाई?
– न्यूज़लॉन्ड्री, वायर, कारवां जैसी संस्थाएं सतत जांच और मुकदमों के शिकंजे में हैं?
– चुनाव आयोग वोटर लिस्ट को “अपडेट” करने के नाम पर गरीब, प्रवासी, मुस्लिम और हाशिए पर खड़े नागरिकों को चुपचाप बाहर कर रहा है?

क्या यह सब “लोकतंत्र” की परिभाषा में आता है? विरोध का मुखौटा, नियंत्रण का शासन

सत्ता ने एक मासूम चेहरा ओढ़ रखा है — कि वह आपातकाल के विरुद्ध है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की समर्थक है, और लोकतंत्र की रक्षक है। पर जब कोई विदेशी मीडिया भारत में सत्ता की असुविधा बढ़ाए, तो उसका गला दबा दिया जाता है। जब कोई नागरिक सड़कों पर उतरकर संविधान की रक्षा करे, तो उसे UAPA या राष्ट्रद्रोह के कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है।

यह विरोध का मुखौटा इसलिए ज़रूरी है क्योंकि आज की सत्ता जानती है कि 1975 जैसी खुली तानाशाही अब स्वीकार नहीं की जाएगी। इसलिए ज़हर को अब “विकास”, “राष्ट्रवाद”, “संविधान प्रेम” की बोतल में बेचा जाता है। लेकिन मुखौटे गिरते हैं — देर से, मगर गिरते हैं

आज जब रायटर्स (Reuters) का अकाउंट “कानूनी आदेश” के तहत भारत में ब्लॉक होता है, जब नागरिकों से उनके “जिंदा होने” का प्रमाण मांगा जाता है, जब स्कूलों में Garbh Sanskar के नाम पर विचारों का पुनरुत्पादन सिखाया जाता है, तो हम समझ सकते हैं कि लोकतंत्र अब एक इवेंट है, शासन एक शो, और नागरिकता एक अनुबंध।

मुखौटे जितने सुंदर होंगे, चेहरा उतना ही कुरूप होगा। और आज भारत का सत्ता चेहरा एक ऐसा चेहरा है जो डरता है — पत्रकार से, शिक्षक से, छात्र से, कलाकार से, वोटर से — यानी हर उस नागरिक से, जो सोचता है।

क्या हम इस मुखौटे की सुंदरता में मग्न रहेंगे? या उसकी सिलवटों में छुपे भय, घृणा और नियंत्रण को पहचानेंगे?

क्योंकि जब शासन अपने सबसे गंदे इरादों को कानूनी आदेश, राष्ट्रहित और विकास योजना के नाम पर लागू करने लगे, तो समझ लीजिए—मुखौटा टूटने के कगार पर है।

अब ज़रूरत है उस एक धक्के की — जो उसे गिरा दे। बाकी चेहरा तो खुद ही अपनी कुरूपता में उजागर हो जाएगा।

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