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साहित्य

मीडिया की तरह साहित्य ने भी अपनी प्रासंगिकता खो दी है!

दिनेश श्रीनेत-

यह मैं बहुत सोचने के बाद लिख रहा हूँ कि मौजूदा समय में साहित्य भी अपनी प्रासंगिकता मीडिया की तरह खोता जा रहा है। जब मैं यह बात कह रहा हूँ कि किसी पुराने सुनहरे दौर की नहीं बल्कि 17-18 साल पहले इंटरनेट पर हो रहे लेखन का उदाहरण सामने रख रहा हूँ। वह लेखन कहीं गया नहीं है। यदि आप पलटकर खंगालें, शुरुआती दौर के ब्लॉग लेखन को देखें तो इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। उस लेखन में एक खास किस्म की वैचारिक उर्जा के साथ एक जरूरी एकांत भी दिखता है।

ब्लॉगिंग के दौर में लिखने वालों के भीतर सेल्फ ऑब्सेशन नहीं था, बहुत से लेखक तो अपना नाम ही नहीं जाहिर करते थे। यह एक सार्वजनिक डायरी की तरह होता था, जिसे रास्ते पर मौजूद शिलालेख की तरह, कौन पढ़ेगा यह नहीं पता होता था। कुछ लोग अपनी उपस्थिति दर्ज करते थे, कुछ नहीं। यह दौर था जिसमें हिंदी वाकई समृद्ध हो रही थी। लेखन में बहुत सारे प्रयोग हो रहे थे, बनावटी परिवेश की जगह जिए गए परिवेश की तस्वीरें सामने आ रही थीं, लेखकीय दंभ से मुक्त लोग लिख रहे थे, उस दौर के शायदा, प्रतिभा कटियार, महेन, प्रमोद सिंह, अजय ब्रह्मात्मज, मनीषा पांडेय, गीत चतुर्वेदी, आशुतोष उपाध्याय, दीपा पाठक, चंद्रभूषण, इरफान रवींद्र व्यास (यशवंत, अविनाश और अशोक पांडे ने मजमा ही लगा लिया था) जैसे कितने नाम याद आ रहे हैं, जिन्हें पढ़ना न सिर्फ रोचक बल्कि सुखद होता था।

सुखद से मेरा आशय है, ऐसा लेखन जिसकी तरफ बार-बार लौटने का मन होता था। जैसे मनीषा पांडेय की जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल डायरी – जिसमें उन्होंने ओरहान पामुक और एडम जगायवस्‍की के बारे में दिलचस्प टिप्पणियां लिखी थीं। कुछ बेनाम लेकिन जाने-पहचाने किरदारों के साथ दर्ज डायरीनुमा गद्य। इसके अलावा वो सारे मुद्दे जिनकी वजह से फेसबुक पर बहुत सी लड़कियों उनको फॉलो किया या लिखना शुरु किया, वहां भी उपस्थित हैं।

फिर बात करें महेन की, बैंगलोर में जिनका ब्लॉग पढ़कर मैं उनसे मिलने चला गया। उन दिनों दोनों सुदूर दक्षिण के एक ही शहर में रहने वाले प्रवासी थे। महेन क्या कमाल का गद्य लिखते हैं। जिस दौर में म्यूज़़िक ऐप का बोलबाला नहीं था, वे पश्चिमी संगीत और कई बार सिनेमा संगीत पर शानदार टिप्पणियां लिखा करते थे। सबसे बढ़कर था सिनेमा पर उनका लेखन- खास तौर पर यूरोपियन सिनेमा पर। किसी समीक्षक के नजरिये से नहीं बल्कि सिनेमा को जीने वाले व्यक्ति के नजरिए से।

फिर दीपा पाठक याद आती हैं, ‘हिसालू काफल’ के नाम उनका ब्लाग पहाड़ के साधारण जीवन को कितनी जीवंत लेखनी में समेटे हुए था। या फिर वन्या अरण्या के नाम से ब्लॉग, जिसमें वे अपने बढ़ते बच्चों का बचपन शब्द चित्रों में सहेजकर रखना चाहती थीं। हालांकि महेन, दीपा और ऐसे कई ब्लॉगर्स ने बहुत कम लिखा, मगर वह उनका लिखा इंटरनेट स्पेस में आज भी मौजूद है, पुराने अल्बम की तस्वीरों सा। ऐसे जाने कितने ब्लॉग थे, जिन्हें पढ़कर मुझे कई बार रशियन लेखकों की सादगी याद आ जाती थी। जीवन जैसा है, उसको ठीक वैसा ही शब्दों में रचकर रख देने की कला, मगर उन सादा से शब्दों में भी जैसे हवाएं बहने लगतीं और पानी शोर करने लगता था।

प्रतिभा अपने ब्लॉग ‘प्रतिभा की दुनिया’ में अभी भी लिखती हैं। जब वे पत्रकार थीं तो लखनऊ से प्रकाशित अखबार में साथ काम करते हुए मुझे कभी ख्याल नहीं आया कि वे इतना पानी के बुलबुलों सा हल्का तैरता चमकता गद्य लिखती होंगी। उन्हें भी मेरे साहित्य प्रेम के बारे में अंदाजा नहीं होगा। क्योंकि उन दिनों हम एक कसबई मगर चमकते शहरों में रहने वाले नवसाक्षर युवाओं के लिए एक टेब्लायड निकाल रहे थे।

कुछ ब्लॉग तो बस ऐसे ही थे कि मानो पड़ोसी के घर झांक रहे हों। राजेश उत्साही भी ऐसे ब्लॉग लिखा करते थे, जिनमें से एक में उन्होंने बैंगलोर वाले घर में मुझसे और शालिनी से मुलाकात का बहुत रोचक वर्णन किया है। बहरहाल, किसी अच्छे प्रकाशन, अच्छी मैगज़ीन या अच्छी किताबों की दुकान की तरह ब्लॉग भी खत्म हो चुके हैं। उनमें से बहुत से लोग या तो चुप लगा बैठे हैं या फिर फेसबुक पर लिख रहे हैं। फेसबुक पर खूब लिखा जा रहा है, मगर जाने क्यों उसमें वह बात नहीं है। उसे पढ़ने में कोई सुकून नहीं है। लिखने का असल मकसद खत्म है, इस प्लेटफॉर्म पर।

मैं खुद जब अपने ब्लॉग ‘इंडियन बाइस्कोप’ पर फ़िल्मों के बारे में लिखा करता था, तो जिस तरह की संतुष्टि अपने लेखन से मिलती थी, अब फेसबुक पर लिखे से नहीं मिलती है। बहुत अच्छा और सार्थक लिख सकने वाले लोग भी बीते कई सालों से हड़बड़ी में जी रहे हैं। इन दिनों एक नया शब्द खूब सुनने को मिल रहा है, FOMO यानी Fear of missing out, तो यह सचमुच एक वास्तविकता बन गया है।

हमें हर बात पर लिखना है, चाहे सार्थक हो या निरर्थक, पेट्रोल के दाम बढ़ गए, सरकार गिर गई, बारिश हो गई, किसी की जन्मशती है, हम ठोकर खाकर गिर गए, हमने पहाड़ों की सैर की, हमने किसी को भला-बुरा कहा… हमें सब कुछ कहना है। जी नहीं, सब कुछ बेकार नहीं है, लोग बहुत ही बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं, समस्या भी वहीं है, यह एक शोर है, सार्थक, निरर्थक, अच्छी और अनर्गल बातों के इकट्ठे होते रहने से उपजा शोर। और तो और, किताबें भी सोशल मीडिया के लेखन जैसी हो गई हैं। वहां भी एक हड़बड़ी और उत्तेजना है। छपते ही टिप्पणियों की भरमार, तस्वीरों की भरमार। जब बहुत शोर हो जाए तो सुकून से बात करने की संभावना ही खत्म हो जाती है।

भागती भी़ड़ के बीच आप ठहर नहीं सकते… लिहाजा आप भी भागने लगते हैं, फूलती-गिरती सांसों के बीच ठहरकर कुछ सार्थक रच पाने की उम्मीद में।

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