संपादक है या जल्लाद : एक मिनट देर होने पर पैसे काट लेता है, देर तक काम करने के पैसे नहीं देता

वाराणसी। दिवाली थी। पूरा शहर रोशनी में डूबा हुआ था। पर मेरा मन किसी गहरे अंधेरे में दिशाहीन सा भटक रहा था। जेब में पैसे नहीं थे, और घर पर ढेरों उम्मीदें मेरा इन्तजार कर रही थी। ऐसे में घर कैसे जाता। बार-बार अपने होने पर रंज हो रहा था। खैर, किसी तरह से पैसों का इंतजाम किया और गोदौलिया से ठेले पर बिक रही मिठाई खरीद कर घर पहुंचा। बूढ़ी मां के हाथों पर मिठाई रखकर डबडबाई आखों से कहा- मां इस बार इतना ही कर पाया हूं। … और फिर उस संपादक का चेहरा जेहन में आया। जो एक मिनट आफिस देर से पहुंचने पर पैसा काट लेता था और तय समय के बाद भी घंटों काम करवाकर उसके पैसे नहीं देता था।

सच कहूं तो पत्रकारिता का ये पतन का युग है जिसमें हर ऐरा-गैरा संपादक बन बैठा है। ऐसे लोग जिनके लिए पत्रकारिता मिशन नहीं कमीशन है, पत्रकारिता अपना हित साधने का माध्यम भर है, वे लोग संपादक की कुर्सी पर विराजमान होकर संपादक होने का दंभ भर रहे है। अरूण यादव भी उन्हीं लोगो में से है। फिलहाल बनारस से निकलने वाले सांध्य कालीन अखबार भारत दूत के संपादक के पद पर विराजमान हैं। पत्रकारिता का कितना ज्ञान इन्हें हैं, ये तो मुझे पता नहीं लेकिन अपने यहां काम कर रहे कर्मचारियों को टार्चर करने का पूरा अनुभव इनके पास है। इसके लिए इनके पास ढेरों तरीके हैं।

जिन लोगों को ये सीधे तौर पर कुछ नहीं कहते उन्हें अपने ससुर राम मूर्ति यादव से परेशान करवाते है। इस अखबार में इन्होंने नियम भी अजीबो-गरीब बना रखे हैं। मसलन अगर आप एक मिनट देर से दफ्तर पहुंचते हैं, तो रजिस्टर में आपके नाम के आगे लाल स्याही लगा दी जाती है, आपसे कुछ कहा नहीं जाता, और अगर 4 दिन तक आपसे दफ्तर पहुंचने में देर हो जाती है तो वेतन आपके हाथों में देते समय एक पूरे दिन का पैसा काट लिया जाता है। लेकिन तयशुदा वक्त के बाद भी घंटों काम करने के ऐवज में आपको यहां कुछ नहीं दिया जाता।

मुझे याद आता है कि एक बार मैंने इनसे एडंवास में कुछ रूपये लिये थे, वक्त पर तनख्वाह मिलने पर उससे कटवाकर चुका भी दिया। एक दिन जब मैंने उनसे पूछा कि मैं तो अक्सर तयशुदा वक्त से ज्यादा काम करता हूं, उसके ऐवज में मुझे क्या मिलेगा, तो उनका जवाब था- वो तो रुपये एडंवास लेने के ऐवज में सूद था जो तुम्हें चुकाना था।

खैर मेरी तनख्वाह से ज्यादा मेरी परिवार की जरूरत और मेरे बेटियों के सपने थे जिनके लिए मैं कुछ हजारों की नौकरी सब सहने के बाद भी करता चला जा रहा था। उस दिन जब मैं दफ्तर पहुंचा तो अरूण यादव ने मुझे बुलाकर कहा कि तुम्हारी तनख्वाह अब आधी की जाती है। मैंने सुना तो जैसे मेरे पैरों के नीचे की जमीन ही खिसक गयी। जेहन में परिवार आ गया जिनके सारे सपने और उम्मीद मेरे छोटे से तनख्वाह से जुडे़ थे। उनका क्या होगा। दिपावली भी सामने है। निर्णय लेने का वक्त था, पर मन ने कहा कि बर्दाश्त की भी हद होती है। मैंने कहा कि अब मैं काम नहीं कर सकता। मेरा हिसाब कर दीजिए।  जवाब मिला- ठीक है, अगले महीने आकर ले जाना। अब मेरी बारी थी। सब्र का पैमाना छलका। मेरा जवाब था- पैसे लेकर ही मैं यहा से जांउगा, ऐसे नहीं जनाब।

मैंने तेवर कड़ा किया तब जाकर मेरा पैसा मुझे मिला। नहीं तो यहां काम करने वालों को यहां से विदा करते समय उनके पैसे काटने का इस अखबार की परम्परा रही है। वहां से निकल कर सड़क पर आ गया हूं। आगे की जिदंगी, बच्चों की जरूरत, घर का खर्चा… यही दिमाग में घूम रहा हूं। क्या करूं, नौकरी की तलाश में हूं इन दिनों। घूम रहा हूं….. चक्कर काट रहा हूं…..सड़कों को नाप रहा हूं…… बार-बार सोच रहा हूं कब तक ऐसी जिंदगी जीता रहूंगा जिसमें मेहनत है, संघर्ष है, पर उसका कोई फल नहीं है.

ये दास्तान है पत्रकार मनोज सिन्हा का जो मुझसे गोदौलिया पर मिले तो बताते चले गए. उनकी कहानी को सुनकर मुझे धूमिल की कविता याद आ गयी…

सचमुच मजबूरी है

पर जिंदा रहने के लिए पालतू होना जरूरी है।

बनारस से युवा और तेजतर्रार पत्रकार भाष्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट. संपर्क: 09415354828

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Comments on “संपादक है या जल्लाद : एक मिनट देर होने पर पैसे काट लेता है, देर तक काम करने के पैसे नहीं देता

  • niyogi ji bahed hi damdar tarike se aap ne ek patrkar ki samsa ko ujagar kiya hai iske liye dil se dhanywaad aap ko. sachae to ye bhi hai ki ab is field me sosan barte hi ja rahe hai. bina ek hue samasayo ka smadhan nahi hone wala hai.

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  • एसे ही नीरज कुमार जी है न्यूज़ विज़न सहारनपुर से। उनोहोने भी पतरकारो से काम करवाया और पैसा भी नही दिया। बल्कि कुछ लोगो की सैलरी १ साल से भी रोक रखी है ! कुछ पत्रकार एसे है जो अपनी दादागिरी से कमा लेते है

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  • एच.आनंद शर्मा,शिमला says:

    आज पत्रकारिता जगत में असंख्य कहानियां भरी पड़ी है। पिछले करीब पांच वर्षों से पत्रकारों की हालत पर एक भी अच्छी खबर सुनने को नहीं मिली है। हर जगह दर्द है क्रंदन है। संपादक की पोस्ट मात्र शोषणकर्ता गुंडे की बन कर रह गई है। समय-समय पर उसे मुख्यमंत्री व मंत्रियों के चरणों में लोटने का भी उपक्रम करना पड़ता है। इसी में उसकी काबलियत तलाशी जाती है। वास्तव में पत्रकारिता बहुत संकट के दौर से गुजर रही है। देर सबेर इसका समाधान पत्रकारिता के लिए समर्पित लोगों को ही निकालना पड़ेगा।

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  • Bhaiyon, aisey-2 Tuchchey aur Dalal kism ke Sampadkon ki ab tak “Pitaayee” kyon nahin hui !!! Saalon ko Maaro 10 aur Geeno Ek (01). tabhi Akal Thikaaney aayegi… Maro Saalon ko…

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  • Sir jab majithia ke liye hi PATRKAAR ek jut nai ho rahe hain jabki PATRKAAR Bhai Jante hain ki ye majithia unke liye hi hai aur usse inke Ghar pariwaar ki financial stithee behtar ho Sakti hai tobhi PATRKAAR log ek jut nahin ho rahe. Maafi cahunga lekin Napunsak shabd ka istemaal karna Bhi hamare PATRKAAR bhaiyon ke liye napunsak shabd ki bezzati..! Lag rahi hai is se Bhi neeche ka shabd istemaal karna hoga!!
    Sale Sab ke Sab fattu hain fattu!! Supreme Court maukaa de raha hai aur Sab haanth pe haanth dhar k baithte hain!
    APSHABD BHASHA KE LIYE KSHMA CHAHUNGA LEKIN PATRKAAR BHAIYON MAJTHIYA KE LIYE JAAGO!!! Jab medical, vakeel, bank sahit vibhin kshetra se Jude log ek jut hoker Deshvyapi andolen kar sakte hain to humare PATRKAAR log kyon nahin
    Pls Kuch Karo
    Nahin to patrkaaron ka Shoshan ese hi hota rahega!!!!!!!!!!!!!!!

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