सूचना विभाग में पदस्थ एक बाबू से परेशान हैं बनारसी टीवी पत्रकार

वाराणसी :  बनारस में बीते रोज 27 मार्च को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का एक प्रतिनिधि मंडल सूचना विभाग में नियुक्त अनिल श्रीवास्तव के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रति उपेक्षा पूर्ण रवैये के खिलाफ सूचना प्रसारण राज्य मंत्री नीलकंठ तिवारी से मिलने उनके आवास पर पहुंचा. पत्रकारों ने अनिल श्रीवास्तव के रवैये और उनकी दुर्भावना को लेकर अपनी व्यथा मंत्री से बताई. 

बताया जा रहा है कि इसके बाद माननीय मंत्री ने मोबाइल पर अनिल श्रीवास्तव की जम कर क्लास लगाई और अपना व्यवहार  सभी पत्रकारों के साथ एक समान रखने की हिदायत दी. साथ ही मंत्री जी ने एक लिखित शिकायत भी देने की बात इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लोगों से कही ताकि अनिल श्रीवास्तव के खिलाफ विधिक कार्यवाही की जा सके. मंत्री से मिल कर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लोगों ने निम्न बातों की शिकायत की…

1 — वीवीआईपी दौरे के समय पास बनाने के नाम पर खास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रतिनिधियों को परेशान करना

2– कवरेज के दौरान सूचनाओं के आदान प्रदान में लेट लतीफी करना… अक्सर सूचनाएं छिपा लेना

3– पोर्टल के प्रतिनिधियों के संबंध में सीधे मना कर देना जबकि कई पत्रकार कई वर्षों से इसी बनारस में कर्यरत हैं…

4– कवरेज के दौरान मीडिया के प्रतिनिधियों के लिए चाय नाश्ते के लिए फण्ड आता है वो कुछ चुनिंदा प्रिंट के प्रतिनिधियों के साथ बंदरबाट कर लेना और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रतिनिधियों को मना कर देना जैसा कि कल राष्ट्रपति महोदय के कार्यक्रम के दौरान देखा गया…

5 – सामान्य दिनों में भी सूचना विभाग के बाबू अनिल श्रीवास्तव जो करीब 15 वर्षों से यहां जमे हुए हैं, उनका व्यवहार सूचना सही समय से देने के मामले में और बात करने के तरीके को लेकर हमेशा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लोगो के लिए उपेक्षा पूर्ण रहता है…

बनारस के एक टीवी पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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…तब सपा का राज था और अब भाजपा का है!

अवनिन्द्र कुमार सिंह ‘अमन’


वाराणसी : क्या संयोग है कि 23 सितंबर 2015 को संतों के ऊपर पुलिस ने लाठी चलाया और अब 23 सितंबर को ही पुलिसकर्मियों ने बीएचयू छात्राओं के ऊपर लाठियां भांजी। फर्क इतना है कि तब अखिलेश की सरकार थी और अब योगी आदित्यनाथ की। संतों का स्वाभव शांत का और लड़कियों को फूल कहा जाता है। जिला प्रशासन का हाथ उस वक्त भी नहीं कापा जब वह संतों की पीठ पर लाठी बरसाई और उस वक्त भी शर्म नहीं आई जब महिला महाविद्यालय में घुसकर पुलिसकर्मियों ने छात्राओं पर लाठियां तोड़ी।

उस वक्त युवा मुख्यमंत्री अखिलेश का राज था। गणेश प्रतिमा को गंगा में प्रवाहित करने के लिए पूजा पंडाल के आयोजक और काशी के संत डटे हुए थे। हाईकोर्ट का हवाला देकर जिला प्रशासन गंगा में प्रवाहित न करने देने पर अड़ा हुआ था। गणेश प्रतिमा चौराहे पर रखकर संत अपनी मांग को लेकर गाँधीवादी आंदोलन शुरु कर दिए, मगर गंगा सफाई की बात कहकर संतों पर कई आरोप लगाए गए। सच है यदि गंगा से धर्मिक अनुष्ठान पुरे नहीं किए जाएंगे तो किसके जल से होगी? यदि संत धर्मरक्षा के लिए लड़ाई नहीं लड़ेगा तो आखिर किसके लिए लड़ेगा? खैर बेरहम प्रशासन उस वक्त भी संतों पर लाठियां बरसाईं और उसके बाद राजनैतिक दलों को मुद्दा मिल गया। इस मुद्दे पर अखिलेश सरकार की जमकर किरकिरी हुई, अंत में सपा को बैकफुट पर आना पड़ा और जिला प्रशासन की ओर से डीएम, एसएसपी और मंत्रियों को संतों से माफी मांगनी पड़ी। सपा के करतूतों का जनता ने जबाब दिया और अर्श से फर्श पर ला दिया।

उस समय विपक्ष में भाजपा, कांग्रेस और बसपा थी। वही भाजपा जो संतों के सम्मान में मैदान में उतरी थी और राज्य चुनाव के ठीक पहले स्वाति सिंह के मुद्दे पर नारा दिया ‘नारियों के सम्मान में, भाजपा मैदान में’। इसी नारे को लेकर भाजपा ने प्रदेश के सभी मुख्यालय पर अखिलेश सरकार के खिलाफ कुर्ता फाड़ आंदोलन किया, देश की महिलाओं के सम्मान की शपथ ली। जब कैम्पस में अपने सम्मान में सुरक्षा की गारंटी मांग रही छात्राओं को बीएचयू छात्रावास में घुसकर पुलिसकर्मियों ने सैकड़ों लड़कियों को पिटा तो क्या उनका सम्मान भाजपाईयों को नहीं दिखा? यदि लड़कियों का सम्मान है तो फिर क्यों नहीं उतरे मैदान में इसलिए न क्योंकि तुम्हारी सरकार है। सम्मान से ज्यादा महत्त्व सत्ता का है।
कांग्रेस संतों के प्रकरण में भी जल्दी दिखाई जिसका खामियाजा पिंडरा से विधायक रहे अजय राय को भुगतना पड़ा। अजय राय की गिरफ्तारी हुई और गंभीर धाराओं में जेल की हवा भी खानी पड़ी। बीएचयू प्रकरण में भी कांग्रेस ने तेजी दिखाई और प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर को प्रकरण में पीड़ित छात्राओं का साथ देने के लिए भेजा मगर जिला प्रशासन ने उन्हें बीच रास्ते में ही जाने से रोक लिया।

सपा हो, कांग्रेस हो, भाजपा हो या बसपा किसी को न तो महिलाओं के सम्मान की फ़िक्र है और न ही मतलब। बस स्वार्थ है तो सत्ता के लिए वोटबैंक का। पीएम का संसदीय क्षेत्र होने के कारण मामला और भी संवेदनशील है। नवरात्र के इस पावन माह में संभवतः पीएम और सीएम शक्ति आराधना के लिए 9 दिन का उपवास होंगे। मगर दोनों ने लड़कियों के मुद्दे पर अब तक चुप्पी साधी है। सीएम का जो एक्शन दिखना चाहिए वह दिखा नहीं और आगे भी नहीं दिखेगा ऐसी प्रबल संभावना है। यह स्पष्ट हो गया जिस बदलाव की संभावना राज्य में थी वह नहीं होने वाली क्योंकि अब तक इस मुद्दे पर भी राजनीति हुई है और आगे भी होगी। दिखावे के लिए कुछ अफसरों को तास के पत्तों की तरह फेटा जायेगा, इधर से उधर कर मामले को ठंडा कर दिया जाएगा। मगर लड़कियों के दर्द पर मलहम लगाने कोई नहीं आएगा।

अवनिन्द्र कुमार सिंह ‘अमन’
पत्रकार, वाराणसी
avanindrreporter@gmail.com

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लेखकों की हत्या के खिलाफ बनारस में प्रदर्शन

देश में अभिव्यक्ति और विविधता पर हो रहे लगातार हमलो के खिलाफ और हाल के वर्षों में मारे गए कई लेखकों, पत्रकारो और विचारकों को श्रद्धांजलि देने हेतु बुधवार 9 सितम्बर को सायं  “साझा संस्कृति मंच” से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं ने शास्त्री घाट, वरुनापुल, वाराणसी पर बैठक की और उसके बाद कैंडिल मार्च किया. बैठक में वक्ताओं ने कहा कि साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात लेखक और विचारक तथा कन्नड़ साहित्यकार प्रो० एम.एम कलबुर्गी जो कि कन्नड़ विश्वविद्यालय के कुलपति भी रह चुके थे की कट्टरपंथियों द्वारा उनके घर में घुस कर गोली मारकर हत्या कर दी गयी जो यह बेहद ही कायराना हरकत है वरिष्ठ साहित्यकार उदय प्रकाश ने इसके विरोध में साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की घोषणा की है.

वक्ताओं ने कहा कि आज देश में फांसीवादी ताकतों को प्रगतिशील विचारों से इतना डर है कि वह लगातार विचारो का गला घोंटने को तत्पर हैं, हाल के वर्षों में सामाजिक कार्यकर्त्ता एवं विचारक डा नरेंद्र दाभोलकर, गंटी प्रसादम, गोविन्द पानसरे जैसे साहित्यकारों की निर्मम हत्याएं की जा चुकी है. प्रो कलबुर्गी की हत्या ने एक बार फिर वैज्ञानिक सोच-समझ रखने वाले लोगों और लोकतांत्रिक व्यवस्था को गहरी चोट पहुंचाई है. उक्त दुर्घटनाएं एक नियत और लक्ष्यपूर्ण ढँग से धर्मनिरपेक्ष, लोकतान्त्रिक और वैज्ञानिक सोच के खिलाफ काम करने वाली शक्तियों द्वारा की जा रहीं है, वक्ताओं ने कहा कि अपने देश में फिल्मों को प्रदर्शन से रोक दिया जा रहा है, कलाकारों को देश से पलायन करना पड़ रहा है, पुस्तकों को जलाया जा रहा है, अभिव्यक्ति के संविधान प्रदत्त अधिकारों पर लगातार कुठाराघात किया jaरहा है जो सर्वथा निंदनीय है.

इस क्रम में वक्ताओं ने महाराष्ट्र सरकार द्वारा हाल ही में जन आंदोलनों, शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन आदि की गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए बनाये गये नियमो को भी जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन बताया. बैठक के दौरान देश के गृह मंत्री श्री राजनाथ सिंह को संबोधित एक ज्ञापन तैयार किया गया जिसमे उनसे मांग की गयी कि उक्त दुर्घटनाओं की सततता और गंभीरता को देखते हुए यथाशीघ्र उचित कारवाई करते हुए अपने समाज के बुद्धिजीवियों, लेखकों, कलाकारों विशेषकर जो लोग धार्मिक कट्टरता आदि के खिलाफ हैं की सुरक्षा सुनिश्चित करवाएँ साथ ही उन सभी संगठनों, विचारकों और लोगों पर कड़ी कारवाई करें जिससे अपने संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति के अधिकार की उपलब्धता बनी रहे.

बैठक के बाद ऐसी घटनाओं में मारे गए सभी को श्रद्धांजलि देने के लिए कैंडल मार्च करते हुए महात्मा गांधी की लौह प्रतिमा के समक्ष शांति प्रार्थना की गयी. कार्यक्रम में डा आनंद तिवारी, मनीष, डा लेनिन रघुवंशी,  धनञ्जय त्रिपाठी , डा एम पी सिंह, रविन्द्र दुबे, विनय सिंह, श्री प्रकाश राय, वल्लभ पाण्डेय, फादर आनंद, रामाज्ञा शशिधर, जागृति राही, प्रदीप सिंह, सतीश सिंह, नन्द लाल मास्टर, फैसल खान, राजेंद्र चौधरी, एनामुल, दीन दयाल, कमलेश,  गिरी संत, डा मुनीजा, विजय मिश्र, अब्दुल कादिर, रवि शेखर, एकता सिंह, प्रो सोमनाथ त्रिपाठी, राम जनम भाई, श्रुति नागवंशी आदि उपस्थित रहे.

भवदीय
साझा संस्कृति मंच
संपर्क :
फादर आनंद :9598604926
जागृति राही: 9450015899
वल्लभाचार्य पाण्डेय: 9415256848

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रायपुर से लेकर लखनऊ वाया बनारस तक कौन-कौन ‘फासीवाद’ का आपसदार बन गया है, अब आप आसानी से गिन सकते हैं

Abhishek Srivastava : मुझे इस बात की खुशी है कि रायपुर साहित्‍य महोत्‍सव के विरोध से शुरू हुई फेसबुकिया बहस, बनारस के ‘संस्‍कृति’ नामक आयोजन के विरोध से होते हुए आज Vineet Kumar के सौजन्‍य से Samvadi- A Festival of Expressions in Lucknow तक पहुंच गई, जो दैनिक जागरण का आयोजन था। आज ‘जनसत्‍ता’ में ‘खूब परदा है’ शीर्षक से विनीत ने Virendra Yadav के 21 दिसंबर को यहीं छपे लेख को काउंटर किया है जो सवाल के जवाब में दरअसल खुद एक सवाल है। विनीत दैनिक जागरण के बारे में ठीक कहते हैं, ”… यह दरअसल उसी फासीवादी सरकार का मुखपत्र है जिससे हमारा विरोध रहा है और जिसके कार्यक्रम में वीरेंद्र यादव जैसे पवित्र पूंजी से संचालित मंच की तलाश में निकले लोगों ने शिरकत की।”

अच्‍छा होता यदि विनीत अपनी बात को वीरेंद्र यादव (और कहानीकार अखिलेश भी) तक सीमित न रखकर उन सब ”लोगों” के नाम गिनवाते जो ‘फासीवादी सरकार के मुखपत्र’ के आयोजन में होकर आए हैं। हो सकता है विनीत को सारे नाम न पता हों या वे भूल गए हों, लेकिन इस छोटी सी भूल के चलते उनके लेख का मंतव्‍य बहुत ”निजी” हो जा रहा है और ऐसा आभास दे रहा है मानो वे बाकी लोगों को बचा ले जाना चाह रहे हों। बहरहाल, उनकी बात बिलकुल दुरुस्‍त है और आज का उनका लेख ‘फासीवादी सरकार के मुखपत्र’ के आयोजन के क्रिएटिव कंसल्‍टेंट Satyanand Nirupam को तो सीधे कठघरे में खड़ा करता ही है। उसके अलावा Piyush Mishra, Swara Bhaskar, Prakash K Ray, Rahat Indori, Waseem Bareillvy, Munawwar Rana, malini awasthi, बजरंग बिहारी तिवारी, शिवमूर्ति समेत ढेर सारे लोगों को विनीत कुमार फासीवाद का साझीदार करार देते हैं जो लखनऊ के ‘संवादी’ में गए थे या जिन्‍होंने जाने की सहमति दी थी।

अब आप आसानी से गिन सकते हैं कि रायपुर से लेकर लखनऊ वाया बनारस तक कौन-कौन ‘फासीवाद’ का आपसदार बन गया है। सबसे दिलचस्‍प बात यह है कि इस आपसदारी में कहीं कोई खेद नहीं है, क्षमा नहीं है, अपराधबोध नहीं है और छटांक भर शर्म भी नहीं है। ‘हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे’ की तर्ज पर जवाब दिए जा रहे हैं। अपनी-अपनी सुविधा से खुद को और अपने-अपने लोगों को बख्‍श दिया जा रहा है। समझ में नहीं आ रहा कि कौन किसके हाथ में खेल रहा है। सच कहूं, मुझे तो कांग्रेस फॉर कल्‍चरल फ्रीडम के पढ़े-सुने किस्‍से अब याद आने शुरू हो गए हैं। इस नाम को गूगल पर खोजिएगा, मज़ा आएगा।

मीडिया विश्लेषक और सरोकारी पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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रायपुर बीस दिनों में ही बनारस चला आया… कोई जवाब है ज्ञानेंद्रपति, विमल कुमार और हरिश्‍चंद्र पांडे के पास?

Abhishek Srivastava : अगर रायपुर साहित्‍य महोत्‍सव में जाना गलत था, तो बनारस के पांच दिवसीय ”संस्‍कृति” महोत्‍सव में जाना सही कैसे हो गया? अगर रमन सिंह से हाथ मिलाना गलत था, तो नरेंद्र मोदी द्वारा उद्घाटन किए गए समारोह में कविता पढ़ना सही कैसे हो गया? अगर वहां कार्यक्रम राजकीय था, तो यहां भी यह संस्‍कृति मंत्रालय, भारत सरकार का है। दोनों आयोजक भाजपा की सरकारें हैं- रायपुर में राज्‍य सरकार और बनारस में केंद्र सरकार।

कोई जवाब है ज्ञानेंद्रपति, विमल कुमार और हरिश्‍चंद्र पांडे के पास? वही, पुराना घिसा-पिटा, कि हमने तो मोदी के विरोध में वहां पढ़ा था? शेर की मांद में ललकार के आए हैं? बोलिए भाई, नरेंद्र मोदी की तस्‍वीर के नीचे अपने नाम देखकर आप कैसा महसूस कर रहे हैं।

मित्रों, रायपुर बीस दिन में ही बनारस चला आया है। मौका था 25 दिसंबर यानी गुड गवर्नेंस डे… यानी अटल बिहारी वाजपेयी और महामना का जन्‍मदिवस… और जगह थी बनारस… यानी मोदीजी का चुनाव क्षेत्र। इस साल का अंत ऐसे ही होना था। अब मैं किसी को कुछ नहीं बोलूंगा, कुछ नहीं पूछूंगा। तस्‍वीर देखिए, नाम पढि़ए और नए साल का जश्‍न मनाइए। बस एक बात ध्‍यान रहे, काशीनाथ सिंह कार्यक्रम में नहीं गए थे।

युवा पत्रकार और मीडिया विश्लेषक अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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Varanasi : This is one of the filthiest and most congested cities in the world

Jagdish Singh : I frequently c posts of my Benarasi friends praising Benaras. I fail to understand them. I have studied in BHU and lived in Benaras for quite sometime. I hardly found anything praiseworthy in this city. This is one of the filthiest and most congested cities in the world. People have no sense of cleanliness. They keep spitting all the time, majority are quite backward and ignorant, arrogant and full of blind faith, ritualistic, intolerant and they hero worship gunda type people.

They believe in archaic caste system. Girls r frequently harassed and taunted. Most of the nastiest cults and rituals originated from here. Things like Purans, Chalishas, artis originated here. Most of the people here are always at the mercy of tantriks, jyotishis, pundits, pujaris, mahants, homeopathy, vaidyas and others. Lot many still believe in boot, pret, pishach and chudails.lathi and brains r prominent parts of it’s culture. The problem is that people don’t accept their weaknesses and try to glorify the darkness. This is the biggest hurdle to improvement of the city and it’s culture.

रिटायर्ड वरिष्ठ अधिकारी जगदीश सिंह के फेसबुक वॉल से.

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10 रुपये में बिकता है चौराहा, बनारस पुलिस से संपर्क करें!

वाराणसी। इस शहर से सांसद और देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की घोषणा ‘न लेंगे न लेने देंगे’ से परे बनारस की पुलिस का मानना है कि हर हाल में बेच के रहेंगे, भले ही चौराहा क्यों न हो. मात्र 10 रुपये के ऐवज में शहर की पुलिस चौराहों को आटो चालकों के हाथों बेच रही है. सातों दिन और चौबीसों घंटे बेचने का ये खेल जारी है. शहर के गिरजाघर, गौदोलिया, बेनियाबाग जैसे अति व्यस्तम और भीड़-भाड़ वाले चौराहों को तो आटो चालकों ने पुलिस को पैसे देकर अपने नाम दाखिल-खारिज करवा रखा है। बोले तो यहां अवैध आटो स्टैण्ड कायम हो गया है।

अब भले ही 15 फुट चौड़ी सड़क सिमट कर 5 फुट की रह गयी हो, आने-जाने वाले घंटो जाम झेलते रहे, लोग गीरते-पड़ते धक्के खाकर गुजरने के लिए विवष होते हो, लेकिन बेचने-खरीदने का ये गैरकानूनी खेल, काननू की वर्दी में बेरोक-टोक जारी है। अगर आप को भी चौराहों पर अवैध तरीके से जमना है तो फिर 10 रूपये में चौराहा बिकता है, वाराणसी पुलिस इस काम में आपकी मदद कर सकती है।

इनमें से सबसे महत्वपूर्ण चौराहा गोदौलिया है। इसी चौराहे से होकर रोजाना हजारों की संख्या में देसी-विदेशी पयर्टक गंगा घाट का रुख करते हैं। लेकिन अवैध तरीके से चल रहे आटो-स्टैण्ड के चलते लगे जाम में फंसकर वो भी अपना सर पीटने के साथ ही शहर के कानून-व्यवस्था की नकारात्मक छवि साथ लेकर अपने साथ लौटते हैं।
भले ही सुबह 8 बजे से इन रास्तों पर नो इन्ट्री का फरमान जारी है, पर दस रुपये रजिस्ट्ररी शुल्क अदा करते ही चौराहा आटो वालों का हो जाता है। फिर सीधे, उल्टे, दाये-बायें, आड़े-तीरछे जैसे मन करे आटो सड़क पर खड़ी कर दे, इधर बीच शहर की आबोहवा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए इलेक्ट्रानिक रिक्शा नाम के सैकड़ो वाहन सड़को पर दौड़ पड़े हैं। शहर प्रदूषण से कितना मुक्त हुआ ये तो पता नहीं पर खाकी के लिए मलाई काटने का एक और जरिया निकल आया है। अवैध तरीके से चौराहों पर जमे ये इलेक्ट्रानिक रिक्शे भी यातायात को बाधित करने में अपना योगदान दे रहे हैं।
 
याद रखने की बात ये भी है कि चंद महीने पहले ही यहां से ताबदला कर दिये गये एसएसपी अजय मिश्रा के कार्यकाल में सारे अवैध स्टैण्ड हवा-हवाई होकर रह गये थे। सड़के भी चौड़ी हो गयी थी और यातायात भी सुगम। पर अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता ये उनके जाते ही समझ में आ गया।  अब 10 रुपये जैसी छोटी रकम सुनने में भले ही मामूली लगे। पर गौर करें तो हजारों आटो और अन्य वाहनों से वसूली का ये खेल शहर में एक दिन में लाखों का सेंसेक्स पार कर जाता है। अंदर की खबर तो ये भी है कि नीचे से उपर तक सबका हिस्सा पहुंचता रहता है। इसलिए सब ठंडे पड़े रहते हैं। इसके उलट अवैध कब्जे के चलते जाम की चक्की में पीसते लोग बड़बड़ाते एक दूसरे को धकियाते अपना आगे का सफर तय करने को विवश है। ऐसे में तयशुदा वक्त में जाम मुक्त बनारस के सपने को खाकी की अवैध कमाई पलीता लगा रही है।

बनारस के युवा, तेजतर्रार पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट भाष्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट. संपर्क: 09415354828

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जानी-मानी कथक नृत्यांगना सितारा देवी का मुंबई में निधन

वाराणसी। आज घुंघरू उदास है। अपनी विषिश्ट शैली में उन्हें खनक देती कथक नृत्य का सितारा अस्त हो गया। मुबंई के अस्पताल में पिछले कई दिनों से कोमा में चल रही सितारा देवी की सांस 94 साल की उम्र में थम गयी। भले ही गुरूदेव रविन्द्र नाथ टैगोर ने 16 साल की उम्र में उनका नृत्य देख उन्हें नृत्य साम्राज्ञिनी की उपाधि दी हो पर जिस शहर में वो लम्बे समय तक रहीं हों उसी शहर ने उन्हें भुला दिया था।

अब भले ही उनके निधन के बाद शहर के कला-संस्कृति के प्रेमी उनके नाम पर लम्बा-चौड़ा व्याख्यान दें, श्रद्धांजलि के नाम पर उनकी तस्वीर रख पुष्प अर्पित करें पर कबीरचौरा स्थित उनके आवास के बाहर लगा शिलापट्ट तो न जाने कब से धूल फांक रहा था। तब किसी को सितारा देवी की याद नहीं आयी। सास्ंकृतिक नगरी कहे जाने वाले काशी के कला-जगत की अन्दरूनी तस्वीर बड़ी भयावह है। आपसी गुटबाजी के तानेबाने के चलते यहां जिन्दा लोग उनके नाम से जुड़ी चीजों तक का सम्मान नहीं कर पाते। हां, कला के नाम पर गाल बजाने वालों की यहां कमी नहीं है।

सितारा जी तो अब नहीं रहीं। भले ही उनका जन्म कोलकाता में हुआ लेकिन बनारस से उनका अटूट नाता था। कभी लंदन के एल्बर्ट हाल में नृत्य प्रस्तुत कर कथक नृत्य को उचाईयों तक ले जाने वाली सितारा देवी के नाम पर कबीरचौरा स्थित उनके घर के बाहर शिलापट् तो जरूर लगा दिया गया लेकिन वो शिलापट्ट न जाने कब से जमीन पर धूल-धूसरित होता रहा। किसी ने उसकी सुध तक नहीं ली। बेहतर होता कि हम कलाकार के जीते जी भी उससे जुड़े यादों को समेटते-सहेजते और उसका सम्मान करते। लेकिन यहां तो लोग तब याद आते हैं, जब सम्मान मिलता है, या फिर हम दुनिया से रुखसत हो जाते हैं। ऐसे में कहना पड़़ता है, बाद मरने के सलाम आया तो क्या।

बनारस से युवा और तेजतर्रार पत्रकार भाष्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट. संपर्क: 09415354828

 

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बीएचयू कांड ने हम पत्रकारों को समझा दिया…. मीडिया निष्तेज तलवार हो चुकी है…

BHU हंगामे के दूसरे दिन हम तब अवाक रह गए जब जिला प्रशासन ने खवरनवीसों को आइना दिखाते हुए मेडिकल कालेज से आगे बढ़ने से ही रोक दिया… कुछ बायें दायें से रुइया हास्टल चौराहे तक पहुंचे लेकिन यहाँ पहले से ज्यादा की तादात में डटे वर्दीधारियों ने प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के लोगों के साथ आंय-बांय करते हुए इन्हें आगे नहीं जाने दिया… एक दो बार के असफल प्रयास के बाद अखबार के रिपोर्टर, फोटोग्राफर, चैनल के कैमरापर्सन, स्ट्रिंगर और रिपोर्टर समझौतावादी नीति के तहत वहीं अपनी-अपनी धूनी जमा ली… लेकिन कुछ खुरचालियो किस्म के खबरनवीसों ने धोबिया पछाड़ दाँव लगाते हुए पुलिसिया करतूत को कैमरे में कैद कर ही किया…

असल में उस दौरान जिला प्रशासन बिरला हास्टल के छात्रों के हाथ ऊपर कराकर कमरे से पीटते हुए बारी बारी आकर हास्टल के लॉन में बैठा रहा था… दूसरी तरफ हर तरफ फैले खाकी वाले प्रेस के नाम पर गालियां देने को अपनी शान समझ रहे थे…. घंटे भर के लुकाछिपी के बाद भीड़ में प्रिंट के कैमरापरसन भाई आते दिखे… तय यह किया गया कि सामने आकर अपने अधिकार की बात की जाय और फोटो बनायी जाय…

हम, संजय, चन्दन, उत्तम, जावेद, भैरव सहित कुल दस लोग बिरला चौराहे पर जाने के लिए बढ़े ही थे कि ”मारो मारो” की आवाज ने हम सबका स्वागत किया… बिना कुछ जवाब के जब हम अधिकारियों के पास पहुंचे तो फोटो लेने के लिए नोकझोंक शुरू हो गई…. आखिरकार अधिकारियों की तुगलकी बातों के आगे हम सब देसी बम की तरह साबित हुए…. बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रेस पर्स हो गया है जिसे जब जहाँ चाहे रख दिया जाय? या फिर प्रेस प्रशासन का अंग है जो उनके निर्देश पर अपने काम को करे या फिर न करे? घटना ने हमें जो सीख दी वो यह है कि मीडिया शायद निष्तेज तलवार हो चुकी है और पुलिस के होमगार्ड से SSP या और आगे तक के अधिकारियो के लाइजनिंग को ही हम अपनी सफलता मान रहे हैं जबकि प्रशासन मीडिया को पप्पू से ज्यादा कुछ नहीं मानता…

लेखक डॉ. संतोष ओझा चैनल ‘इंडिया न्यूज़’ चैनल के वाराणसी संवाददाता हैं. इनसे संपर्क 09889881111 या dr.ojhasantosh@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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25 नवम्बर नजीर बनारसी की जंयती पर : …हम अपना घर न जलाते तो क्या करते?

हदों-सरहदों की घेराबन्दी से परे कविता होती है, या यूं कहे आपस की दूरियों को पाटने, दिवारों को गिराने का काम कविता ही करती है। शायर नजीर बनारसी अपनी गजलों, कविताओं के जरिए इसी काम को अंजाम देते रहे है। एक मुकम्मल इंसान और इंसानियत को गढ़ने का काम करने वाली नजीर को इस बात से बेहद रंज था कि…

‘‘न जाने इस जमाने के दरिन्दे
कहा से उठा लाए चेहरा आदमी का’’

एक मुकम्मल इंसान को रचने-गढ़ने के लिए की नजीर की कविताएं सफर पर निकलती है, हमे हमारा फर्ज बताती है, ताकीद करते हुए कहती है-

‘‘वहां भी काम आती है मोहब्बत
जहा नहीं होता कोई किसी का’’

मोहब्बत, भाईचारा, देशप्रेम ही नजीर बनारसी की कविताओं की धड़कन हैं। अपनी कहानी अपनी जुबानी में खुद नजीर कहते है, ‘‘मैं जिन्दगी भर शान्ति, अहिंसा, प्रेम, मुहब्बत आपसी मेल मिलाप, इन्सानी दोस्ती आपसी भाईचारा…. राष्ट्रीय एकता का गुन आज ही नहीं 1935 से गाता चला आ रहा हूं। मेरी नज्में हो गजलें, गीत हो या रूबाईया….. बरखा रूत हो या बस्त ऋतु, होली हो या दीवाली, शबेबारात हो या ईद, दशमी हो या मुहर्रम इन सबमें आपको प्रेम, प्यार, मुहब्बत, सेवा भावना, देशभक्ति कारफरमा मिलेगी। मेरी सारी कविताओं की बजती बासुरी पर एक ही राग सुनाई देगा वह है देशराग…..मैंने अपने सारे कलाम में प्रेम प्यार मुहब्बत को प्राथमिकता दी है।

हालात चाहे जैसे भी रहे हो, नजीर ने उसका सामना किया, न खुद बदले और न अपनी शायरी को बदलने दिया कही आग लगी तो नजीर की शायरी बोल उठी-

‘‘अंधेरा आया था, हमसे रोशनी की भीख मांगने
हम अपना घर न जलाते तो क्या करते?’’

25 नवम्बर 1925 में बनारस के पांडे हवेली मदपुरा में जन्में पेशे से हकीम नजीर बनारसी ने अंत तक समाज के नब्ज को ही थामे रखा। ताकीद करते रहे, समझाते रहे, बताते रहे कि ये जो दीवारे हैं लोगों के दरमियां, बांटने-बंटने के जो फसलफे हैं, इस मर्ज का एक ही इलाज है, कि हम इंसान बनें और इंसानियत का पाठ पढ़ें, मुहब्बत का हक अदा करें। कुछ इस अंदाज में उन्होंने इस पाठ को पढ़ाया-

‘‘रहिये अगर वतन में तो इन्सां की शान से
वरना कफन उठाइये, उठिये जहान से’’

नजीर का ये इंसान किसी दायरे में नहीं बंधता। जैसे नजीर ने कभी खुद को किसी दायरे में कैद नहीं किया। गर्व से कहते रहे मैं वो काशी का मुसलमां हूं नजीर, जिसको घेरे में लिये रहते है, बुतखाने कई। काशी यानि बनारस को टूट कर चाहने वाले नजीर के लिए बनारस किसी पारस से कम नहीं था। घाट किनारे मन्दिरों के साये में बैठ कर अक्सर अपनी थकान मिटाने वाले नजीर की कविता में गंगा और उसका किनारा कुछ ऐसे ढला-

‘‘बेदार खुदा कर देता था आंखों में अगर नींद आती थी,
मन्दिर में गजर बज जाता था, मस्जिद में अजां हो जाती थी,
जब चांदनी रातों मं हम-तुम गंगा किनारे होते थे।‘‘

नजीर की शायरी उनकी कविताएं धरोहर है, हम सबके लिए। संर्कीण विचारों की घेराबन्दी में लगातार फंसते जा रहे हम सभी के लिए नजीर की शायरी अंधरे में टार्च की रोशनी की तरह है, अगर हम हिन्दुस्तान को जानना चाहते है, तो हमे नजीर को जानना होगा, समझना होगा कि उम्र की झुर्रियों के बीच इस साधु, सूफी, दरवेष सरीखे शायर ने कैसे हिन्दुस्तान की साझाी रवायतों को जिन्दा रखा। उसे पाला-पोसा, सहेजा। अब बारी हमारी है, कि हम उस साझी विरासत को कैसे और कितना आगे ले जा सकते है। उनके लफजों में…

‘‘जिन्दगी एक कर्ज है, भरना हमारा काम है,
हमको क्या मालूम कैसी सुबह है, शाम है,
सर तुम्हारे दर पे रखना फर्ज था, सर रख दिया,
आबरू रखना न रखना यह तुम्हारा काम है।‘‘

बनारस से युवा और तेजतर्रार पत्रकार भाष्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट. संपर्क: 09415354828

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फिर साबित हुए झूठे, जीवित लोगों को मरा बता संवेदना भी जता दी

आदर्श ग्राम योजना के अंतर्गत वाराणसी के जयापुर गांव को गोद लेने की जो वजह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दी थी वह गलत निकली है। प्रधानमंत्री ने जयापुर गांव में बोलते वक्त कहा था कि इस गांव को गोद लेने के मेरे फैसले के पीछे मीडिया ने कई मनगढ़ंत वजहें गिनायी थी। लेकिन इस गांव को गोद लेने की जो वजहें मीडिया ने बतायी वह सब गलत है। लेकिन बड़ी बात यह है कि जो वजह पीएम मोदी ने बतायी वह भी गलत निकली है। प्रधानमंत्री ने कहा था कि जयापुर गांव में बिजली हादसे की वजह से पांच लोगों की मौत हो गयी थी। इस वजह से उन्होंने बुरे वक्त से गुजर रहे इस गांव को गोद लेने का फैसला लिया था। पीएम ने अपने भाषण के दौरान इमोशनल अपील करते हुए कहा था कि बुरे वक्त में वो आपके साथ है। साथ ही उन परिवारों के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त भी की थी।

जिन पांच लोगों को पीएम मोदी ने अपने भाषण में मृत घोषित किया था वो अभी जिंदा है। हादसे का शिकार हुई 20 वर्षीय डिम्पी उनमें से एक हैं और कहती हैं कि शायद मैं इसीलिए बच गई क्योंकि मुझे मोदीजी को काफी नजदीक से देखना था। इसी साल अप्रैल महीने में गांव से होकर गुजरने वाली एक हाई टेंशन बिजली लाइन लो टेंशन तार पर गिर गई, जिससे घरों में अचानक 11 हजार वोल्ट का करंट दौड़ने लगा। इसमें डिम्पी के साथ गांव के चार अन्य लोग बुरी तरह झुलस गए थे। हादसे में ‌सबसे ज्यादा झुलसी डिम्पी को कई दिनों तक अस्पताल में रखा गया, जबकि अन्य चार लोगों को फर्स्ट एड से ही राहत मिल गई और उन्हें ‌घर भेज दिया गया। कुछ दिनों बाद डिम्पी भी सही होकर घर पहुंच गई।

हादसे के बाद मोदी ने गांव की मुखिया को फोन करके मामले की जानकारी ली थी। यही नहीं हादसे की जानकारी लेने के लिए भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता नलिन कोहली खुद जयापुर गए थे। इसके बाद ही बिजली विभाग ने गांव में ऐसे हादसों को रोकने के लिए जरूरी इंतजाम कर दिए थे। वहीं गांव की मुखिया दुर्गावती जो पीएम मोदी के साथ मंच पर मौजूद थीं का कहना है कि प्रधानमंत्रीजी को हादसे के बारे में जरूर गलत जानकारी दी गई होगी, वरना वो ऐसा कतई नहीं कहते। जैसे ही उन्होंने भाषण खत्म किया, हमने उन्हें बता दिया था कि हादसे में कोई मरा नहीं था।’ लेकिन तब तक प्रधानमंत्री मंच छोड़ चुके थे। वहीं कांग्रेस विधायक अजय राय जो मोदी के खिलाफ बुरी तरह से हार गये थे उन्होंने इस मामले में एक प्रेस कांफ्रेंस करके हादसे में घायल तीन लोगों को मीडिया के सामने खड़ा कर दिया। अजय राय ने कहा कि पीएम छूठ बोल रहे हैं। लेकिन इससब के बीच जयापुर गांव के लोगों में प्रधानमंत्री के गांव के दौरे से लोग बहुत खुश हैं। लोगों का कहना है कि ऐसा पहली बार हुआ है कि चुनाव के बाद कोई सांसद उनके गांव आया हो।

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टाइम्स आफ इंडिया के पत्रकारों का गणित ज्ञान कमजोर, मोदी के गुणगान में आंख मूंद छाप दे रहे हैं कुछ भी

Abhishek Srivastava : ये है टाइम्‍स ऑफ इंडिया की खबर, जो वैसे तो कई अख़बारों में छपी है लेकिन जस यहां है तस कहीं नहीं है। खबर का शीर्षक देखें और पूरी खबर पढ़ें। इसके मुताबिक प्रधानजी बनारस में रोहनिया के जिस गांव को गोद लेने वाले हैं, उसने  ‘450’  साल पहले औरंगज़ेब की फौज को हराकर भगा दिया था। औरंगज़ेब 1618 में पैदा हुआ था यानी आज से 396 साल पहले, लेकिन टाइम्‍स ऑफ इंडिया ने 450 साल पहले बनारस पर उसका हमला करवा दिया है।

खबर के भीतर “nearly 450 years” भी आसपास नहीं बैठता।  दिलचस्‍प यह है कि इसी परिवार के दूसरे अखबार इकनॉमिक टाइम्‍स में संबंधित ख़बर में औरंगज़ेब का संदर्भ गायब है। Dilip Khan ठीक कहते हैं कि पत्रकारों को थोड़ा-बहुत गणित का ज्ञान होना बहुत ज़रूरी है। The Times of India की खबर का शीर्षक है- ”450 years ago, Modi village stopped Aurangzeb’s army

टाइम्‍स ऑफ इंडिया ने औरंगज़ेब का हमला बनारस पर 450 साल पहले करवाया तो हिंदी का पतरकार कैसे पीछे रहता। ये देखिए, दैनिक जागरण ने ”प्रधानजी के गांव” पर सीधे अकबर का ही हमला करवा दिया है। दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर का शीर्षक है: ”कभी अकबर को दी मात, आज खुद वक्त से हारा”।

मीडिया विश्लेषक और एक्टिविस्ट अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से अंकित अग्रवाल का कमेंट इस प्रकार है…

Ankit Agrawal : इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के मुताबिक संघ 2002 से ही इस गाँव का विकास कर रहा है और वो मोदी द्वारा इसे हथिया लिया जाने से खुश नहीं है। वैसे इस गाँव से जुडा एक रोचक तथ्य ये भी है की यहाँ एक भी मुस्लिम नहीं है ऐसा एक स्वयंसेवक ने बड़े उत्साह के साथ पत्रकार को बताया। ये सिम्बोलिज्म कितना भयावह है!

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मोदी की बनारस यात्रा : स्मृति ईरानी से मात खाकर हर्षवर्धन को औकात बोध हो गया!

Sheetal P Singh : प्रधानमंत्री की आज होने वाली बनारस यात्रा से “ट्रामा सेन्टर” के शिलान्यास कार्यक्रम को रद्द कराने में मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी कामयाब हो गईं। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन अपनी सारी कोशिशों के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मनाने में नाकामयाब साबित हुए। उन्होंने पिछले कार्यक्रम (जो टल गया था, अब हो रहा है) में इसे सबसे प्रमुख कार्यक्रम तय कराया था। क़रीब २०० करोड़ की लागत से बीएचयू में बना ट्रामा सेंटर पिछले डेढ़ साल से उद्घाटक की प्रतीक्षा कर रहा है।

सूचना यह आ रही है कि नेपाल में डेपुटेशन पर तैनात इसी संस्था के एक उच्चाधिकारी श्रीमती ईरानी के करीबी हैं और इस संस्था के सर्वोच्च पद पर तैनाती के इच्छुक हैं। स्मृति ईरानी ने हर्षवर्धन से इन्हें यह पद देने की सिफ़ारिश की थी पर दिल्ली AIIMS के CVO वाली controversy में बदनाम हुए हर्षवर्धन ने इसमें पड़ना ठीक न समझा और टाल गये। पर इस रस्साकशी में ईरानी से मात खाकर उन्हे “औक़ात बोध” जरूर हो गया है।

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह के फेसबुक वॉल से.

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गांधी जी को जब बनारस के एक पंडे ने काफी भला-बुरा कहा था…

Sanjay Tiwari : एक बार गांधी जी भी काशी गये थे. तब जब वे देश के आंदोलन का हिस्सा नहीं हुए थे. इन दिनों वे दक्षिण अफ्रीका में गिरमिटिया आंदोलन को गति दे रहे थे और उसी सिलसिले में समर्थन जुटाने के लिए भारत भ्रमण कर रहे थे. इसी कड़ी में वे काशी भी पहुंचे थे. बाबा विश्वनाथ का आशिर्वाद लेने के बाद बाहर निकले तो एक पंडा आशिर्वाद देने पर अड़ गया. मोहनदास गांधी ने जेब से निकालकर एक आना पकड़ा दिया. पंडा जी को भला एक पैसे से कैसे संतोष होता? आशिर्वाद देने की जगह बुरा भला कहना शुरू कर दिया और पैसा उठाकर जमीन पर पटक दिया.

मोहनदास तो ठहरे मोहनदास. उन्होंने वह एक पैसा उठाकर जेब में रख लिया और आगे बढ़ने को हुए कि पंडा चिल्लाया ‘क्या करता है अधर्मी.’ मोहनदास ने कहा आपको इतनी कम दक्षिणा नहीं चाहिए और मैं इससे ज्यादा दूंगा नहीं. झट पंडे ने पैंतरा बदला, एक तो कम दक्षिणा देकर तू खुद नर्क का भागी बन रहा है. तो क्या मैं भी इंकार करके तेरी तरह नर्क का भागी बन जाऊ. गांधी जी ने वह एक आना पंडे को पकड़ा दिया और वहां से बाहर आ गये.

वेब जर्नलिस्ट संजय तिवारी के फेसबुक वॉल से.

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चार नवम्बर के बाद टूट जायेगा ‘अपना दल’

अजय कुमार, लखनऊ

अपना दल 04 नवंबर को वाराणसी में 19वां स्थापना दिवस मनाने जा रहा है। स्थापना दिवस को लेकर तैयारी भी चल रही है, लेकिन अपना दल के संस्थापक अध्यक्ष स्वर्गीय सोनेलाल पटेल की विरासत संभाले उनकी पत्नी और पुत्रियों के बीच मची राजनैतिक होड़ ने स्थापना दिवस का रंग फीका कर दिया है। कार्यकर्ता गुटों में बंट गये हैं। पारिवारिक झगड़े के कारण अपना दल के स्थापना दिवस समारोह की कामयाबी पर ग्रहण लग गया है। सोनेलाल पटेल की मौत के बाद काफी तेजी के साथ राजनैतिक क्षितिज पर उभरी उनकी तीसरे नंबर की पुत्री अनुप्रिया पटेल के खिलाफ मॉ कृष्णा पटेल ने अपनी दूसरी बेटी पल्लवी पटेल को साथ लेकर बगावती रुख अख्तियार कर लिया है।

वैसे तो घर में मनमुटाव की खबरें काफी पहले से आ रही थीं, लेकिन यह झगड़ा उस समय सड़क पर खुल कर सामने आ गया जब अपना दल की राष्ट्रीय अध्यक्ष कृष्णा पटेल ने अनुप्रिया की मर्जी के खिलाफ दूसरे नंबर की बेटी पल्लवी पटेल को पार्टी उपाध्यक्ष की कुर्सी सौंप दी। कृष्णा पटेल यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने एक कदम और आगे बढ़ाते हुए अनुप्रिया पटेल को महासचिव के पद से भी हटा दिय। कृष्णा पटेल का आरोप था कि अनुप्रिया अपने आप को पार्टी से ऊपर समझती हैं और उनके पति की दखलंदाजी पार्टी में काफी बढ़ गई है। अनुप्रिया के पति पार्टी में तोड़फोड़ कर रहे हैं जो पार्टी हित में नहीं है। जबकि अनुप्रिया का कहना था कि उनके खिलाफ साजिश रची जा रही है।

जो हालात बन रहे हैं उससे तो यही लगता है कि पारिवारिक कलह के कारण दो गुटों में बंटता जा रहा अपना दल कभी भी टूट का शिकार हो सकता है। इसका नजारा स्थापना दिवस के बाद दिखाई पड़ जाये तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। दरअसल, अपना दल की राष्ट्रीय अध्यक्ष कृष्णा पटेल  ने सभी पदाधिकारियों कौर कार्यकताओं को स्थापना दिवस कार्यक्रम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने को कहा है, वहीं अनुप्रिया गुट की तरफ से ऐसे संकेत आ रहें हैं कि वह (अनुप्रिया) स्थापना दिवस के कार्यक्रमों से दूरी बना कर रखेंगी।

बात राजनैतिक परिपक्वता की कि जाये तो ऐसा लगता नहीं है कि अनुप्रिया के बिना अपना दल का वजूद कृष्णा पटेल बचा पायेंगी। अनुप्रिया पटेल अपने पिता के समय से राजनीति में शिरकत कर रही हैं और कई आंदोलन भी चला चुकी हैं। सोनेलाल पटेल की मौत के बाद अनुप्रिया ने ही चाहरदीवारी से बाहर निकाल कर मॉ कृष्णा पटेल को अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठाया था। अनुप्रिया ने पार्टी को नई पहचान दी। 2012 में वह वाराणसी की रोहनिया सीट से विधायक चुनी गईं और इसके बाद भाजपा के साथ मिलकर उन्होंने मिर्जापुर से संसदीय चुनाव लड़ा और सांसद बन गईं।

भाजपा के साथ मिलकर लोकसभा का चुनाव लड़ने जैसा अहम फैसला अनुप्रिया ने ही लिया था। अनुप्रिया के इस्तीफे से रिक्त हुई रोहनिया सीट से सोनेलाल पटेल की पत्नी चुनाव लड़ीं, लेकिन उन्हें जीत नसीब नहीं हुई। इस पर कहा यह गया कि अनुप्रिया अगर पूरा दमखम लगाती तो कृष्णा पटेल यह चुनाव जीत जातीं। इस तरह के आरोप कृष्णा पटेल ने भी अपनी बेटी पर लगाये। गौरतलब हो, पूर्वांचल की लगभग एक दर्जन लोकसभा सीटों पर अपना दल हार-जीत के समीकरण बदलने की ताकत रखता है। भारतीय जनता पार्टी 2017 के विधान सभा चुनाव भी अपना दल के साथ मिलकर लड़ना चाहती है, लेकिन फिलहाल वह दर्शक की भूमिका में नजर आ रही है।

उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक अजय कुमार की रिपोर्ट.

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संपादक है या जल्लाद : एक मिनट देर होने पर पैसे काट लेता है, देर तक काम करने के पैसे नहीं देता

वाराणसी। दिवाली थी। पूरा शहर रोशनी में डूबा हुआ था। पर मेरा मन किसी गहरे अंधेरे में दिशाहीन सा भटक रहा था। जेब में पैसे नहीं थे, और घर पर ढेरों उम्मीदें मेरा इन्तजार कर रही थी। ऐसे में घर कैसे जाता। बार-बार अपने होने पर रंज हो रहा था। खैर, किसी तरह से पैसों का इंतजाम किया और गोदौलिया से ठेले पर बिक रही मिठाई खरीद कर घर पहुंचा। बूढ़ी मां के हाथों पर मिठाई रखकर डबडबाई आखों से कहा- मां इस बार इतना ही कर पाया हूं। … और फिर उस संपादक का चेहरा जेहन में आया। जो एक मिनट आफिस देर से पहुंचने पर पैसा काट लेता था और तय समय के बाद भी घंटों काम करवाकर उसके पैसे नहीं देता था।

सच कहूं तो पत्रकारिता का ये पतन का युग है जिसमें हर ऐरा-गैरा संपादक बन बैठा है। ऐसे लोग जिनके लिए पत्रकारिता मिशन नहीं कमीशन है, पत्रकारिता अपना हित साधने का माध्यम भर है, वे लोग संपादक की कुर्सी पर विराजमान होकर संपादक होने का दंभ भर रहे है। अरूण यादव भी उन्हीं लोगो में से है। फिलहाल बनारस से निकलने वाले सांध्य कालीन अखबार भारत दूत के संपादक के पद पर विराजमान हैं। पत्रकारिता का कितना ज्ञान इन्हें हैं, ये तो मुझे पता नहीं लेकिन अपने यहां काम कर रहे कर्मचारियों को टार्चर करने का पूरा अनुभव इनके पास है। इसके लिए इनके पास ढेरों तरीके हैं।

जिन लोगों को ये सीधे तौर पर कुछ नहीं कहते उन्हें अपने ससुर राम मूर्ति यादव से परेशान करवाते है। इस अखबार में इन्होंने नियम भी अजीबो-गरीब बना रखे हैं। मसलन अगर आप एक मिनट देर से दफ्तर पहुंचते हैं, तो रजिस्टर में आपके नाम के आगे लाल स्याही लगा दी जाती है, आपसे कुछ कहा नहीं जाता, और अगर 4 दिन तक आपसे दफ्तर पहुंचने में देर हो जाती है तो वेतन आपके हाथों में देते समय एक पूरे दिन का पैसा काट लिया जाता है। लेकिन तयशुदा वक्त के बाद भी घंटों काम करने के ऐवज में आपको यहां कुछ नहीं दिया जाता।

मुझे याद आता है कि एक बार मैंने इनसे एडंवास में कुछ रूपये लिये थे, वक्त पर तनख्वाह मिलने पर उससे कटवाकर चुका भी दिया। एक दिन जब मैंने उनसे पूछा कि मैं तो अक्सर तयशुदा वक्त से ज्यादा काम करता हूं, उसके ऐवज में मुझे क्या मिलेगा, तो उनका जवाब था- वो तो रुपये एडंवास लेने के ऐवज में सूद था जो तुम्हें चुकाना था।

खैर मेरी तनख्वाह से ज्यादा मेरी परिवार की जरूरत और मेरे बेटियों के सपने थे जिनके लिए मैं कुछ हजारों की नौकरी सब सहने के बाद भी करता चला जा रहा था। उस दिन जब मैं दफ्तर पहुंचा तो अरूण यादव ने मुझे बुलाकर कहा कि तुम्हारी तनख्वाह अब आधी की जाती है। मैंने सुना तो जैसे मेरे पैरों के नीचे की जमीन ही खिसक गयी। जेहन में परिवार आ गया जिनके सारे सपने और उम्मीद मेरे छोटे से तनख्वाह से जुडे़ थे। उनका क्या होगा। दिपावली भी सामने है। निर्णय लेने का वक्त था, पर मन ने कहा कि बर्दाश्त की भी हद होती है। मैंने कहा कि अब मैं काम नहीं कर सकता। मेरा हिसाब कर दीजिए।  जवाब मिला- ठीक है, अगले महीने आकर ले जाना। अब मेरी बारी थी। सब्र का पैमाना छलका। मेरा जवाब था- पैसे लेकर ही मैं यहा से जांउगा, ऐसे नहीं जनाब।

मैंने तेवर कड़ा किया तब जाकर मेरा पैसा मुझे मिला। नहीं तो यहां काम करने वालों को यहां से विदा करते समय उनके पैसे काटने का इस अखबार की परम्परा रही है। वहां से निकल कर सड़क पर आ गया हूं। आगे की जिदंगी, बच्चों की जरूरत, घर का खर्चा… यही दिमाग में घूम रहा हूं। क्या करूं, नौकरी की तलाश में हूं इन दिनों। घूम रहा हूं….. चक्कर काट रहा हूं…..सड़कों को नाप रहा हूं…… बार-बार सोच रहा हूं कब तक ऐसी जिंदगी जीता रहूंगा जिसमें मेहनत है, संघर्ष है, पर उसका कोई फल नहीं है.

ये दास्तान है पत्रकार मनोज सिन्हा का जो मुझसे गोदौलिया पर मिले तो बताते चले गए. उनकी कहानी को सुनकर मुझे धूमिल की कविता याद आ गयी…

सचमुच मजबूरी है

पर जिंदा रहने के लिए पालतू होना जरूरी है।

बनारस से युवा और तेजतर्रार पत्रकार भाष्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट. संपर्क: 09415354828

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रस से रिक्त हो गया है पीएम मोदी का बनारस

बीते पखवाड़े पूर्वी उत्तर प्रदेश के भ्रमण पर था। इसकी विधिवत शुरुआत बनारस या वाराणसी में ट्रेन से उतरने के बाद सडक मार्ग से बस के जरिये हुई। लेकिन बस के सफर ने जिस-जिस तरह के जितने झांसे दिए, धोखाधड़ी की, चकमे दिए, बस जाएगी-नहीं जाएगी, के जितने सच्चे-झूठे पाठ पढ़ाए गए, बातें बनाई गईं, आनाकानी की गई, बहाने बनाए गए, उसकी मिसाल अपने अब तक के इस जीवन में मैंने न तो कहीं देखी, न सुनी, न ही पढ़ी है। यूपी सरकार की बस पवन सेवा में आजमगढ़ जाने के लिए जब मैं पत्नी संग सवार हुआ तो उसमें पहले से सवार समस्त यात्रीगण बेहद असमंजस में फंसे अनिश्चितता के भंवर में हिचकोले ले रहे थे। बस के कंडक्टर और ड्राइवर कभी कहते बस जाएगी, कभी कहते नहीं जाएगी। कभी ऐलानिया तौर पर बोल पड़ते, उतर जाइए-उतर जाइए बस कैंसिल हो गई, अब नहीं जाएगी, दूसरी बस जा रही है, उसमें बैठ जाइए, वह आजमगढ़ जाएगी। उहापोह का ऐसा माहौल इन दोनों बस कर्मचारियों ने बना रखा था कि सारे बस यात्री बेहद परेशान हो गए।

माल ढुलाई, मोटी कमाई:
आखिरकार यात्रियों ने फैसला किया कि पता करें कि सचमुच ये कर्मचारी बस को इसके गंतव्य पर लेकर जाएंगे या नहीं। घंटों की मशक्कत, पूछताछ, इंन्क्वायरी  के बाद पता चला, या कहें कि बस कर्मचारियों ने ही बताना शुरू कर दिया कि बैठिए-बैठिए, बस जाएगी। लेकिन सभी यात्री तब भौंचक रह गए जब इसी दौरान काफी मात्रा में एक बड़े रेहड़े पर सामान-माल आया और कंडक्टर की देखरेख में बस की छत पर लादा जाने लगा। लदाई पूरी होते ही कंडक्टर और ड्राइवर सहजता का इजहार करते हुए अपनी सीटों पर विराजमान हो गए और बस मूव करने लगी। जानकारी हासिल करने पर पता चला कि सारी आनाकानी-खींचतान इसी माल के इंतजार में हो रही थी क्यों कि इससे बस कर्मियों को मोटी कमाई होनी थी। मतलब ये कि ऐसे माल और सामान, जो व्यापारियों या मोटे लोगों के होते हैं, उन्हें गंतव्य तक निर्विघ्र पहुंचा देने में बस कर्मियों को अच्छा खासा पैसा मिल जाता है। इसीलिए बस कर्मी ये काम अपना फर्ज समझकर हमेशा करते हैं। अब इसका खमियाजा यात्रियों को भुगतना पड़ता है तो वे भुगतते रहें, अपनी बला से! लोगों की परेशानियों-मुसीबतों के मोल पर ऐसे गैरकानूनी-अमानवीय-उत्पीडक़ कार्यों का यह तो महज एक अदना सा नमूना है जो बनारस जैसे नामचीन शहर में हमेशा-हर वक्त-बराबर होता रहता है और जिसे आमजन निरंतर झेलता-सहता-बर्दाश्त करता जीवन की गाड़ी खींचता चलता रहता है।

रचना और कला को सींचने वाला रस नदारद:
वैसे बनारस की महत्ता, प्रसिद्धि और प्राचीनता के बारे में किसी को बताने की जरूरत नहीं है क्यों कि गंगा तट पर आबाद इस शहर में समाहित रस को मानव, उसकी संस्कृति-सभ्यता-रचना-कला-साहित्य-संगीत-आध्यात्म-दर्शन-चिंतन इत्यादि सभी ने पान किया है, सींचा है और स्वयं को उस बरगद की तरह विकसित-विस्तारित किया है जिसकी छांव में आज भी हम सुस्ताते हैं, थकान मिटाते हैं और नई ऊर्जा से आपूरित होकर आगे के सफर के लिए जीवन पथ पर निकल पड़ते हैं। बनारस का यह माहात्म्य तो शायद मानव सभ्यता के अभ्युदय के साथ ही बनता-विकसित होता चलता आया है, लेकिन इसका आधुनिकतम-अर्वाचीन महत्व-गौरव भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कारण विश्व पटल पर नए रंग-ढंग से उभर कर आया है। अब बनारस मतलब मोदी का लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र। और जब जगमगाते-दमकते-चहकते पीएम का क्षेत्र हो तो लोगों की अपेक्षाएं भी उसी के अनुरूप इस क्षेत्र-शहर से होंगी। लोकसभा चुनाव के काफी बाद इस शहर की धरा पर पांव रखते समय हमारे भी मन में यही भाव-विचार-ख्याल था कि गौतम बुद्ध, गुरुनानक देव, कबीर, तुलसी, प्रेमचंद आदि की इस तपस्या-ज्ञान-रचना-कला भूमि में नए परिप्रेक्ष्य, पर उसी क्रम में लुभावनी-जीवनदायिनी, स्वस्थ-सुंदर-साफ छवियां-चीजें-वस्तुएं और सबसे बढक़र लोग होंगे-मिलेंगे। जिनके दीदार करके आत्मतुष्टि मिलेगी और उम्मीदों-आशाओं-आकांक्षाओं को एक सर्वथा नया ठौर मिलेगा जहां से आमजन के विकास-प्रगति-तरक्की की नई सीढिय़ों को चढ़ा जा सकेगा या लोग उन सीढिय़ों पर चढ़ते दिख जाएंगे। पर ऐसा कुछ नहीं दिखा। हाथ निराशा ही लगी, जिसकी शुरुआत बस कर्मियों की बदमाशियों के साथ हुई।
 
सफाई बनाम पान की पीकें, खैनी-तंबाकू-जर्दा की थूक:
सफाई-स्वच्छता की बात मोदी सरकार ने सिर पर उठा रखी है। महात्मा गांधी की जयंती से भारत स्वच्छता अभियान में पूरी सरकार लगी दिखती है। इसे हर कोई सराह रहा है लेकिन मोदी के क्षेत्र बनारस में सफाई के दर्शन दुर्लभ से लगे। हालांकि मोदी साहब ने गंगा को गंदगी से मुक्ति दिलाने के लिए एक मंत्रालय ही बना दिया और गंगा तटों के घाटों को पावन गंगा जल से धोने-साफ करने के न जाने कितने काम किए गए, पर वे बनारस में आकर दिखावा-प्रचार ही लगे। ट्रेन से उतरते ही प्लेटफार्म से लेकर सडक़-गली-कूचे तक कहीं जरा सी भी वह जगह नहीं दिखी-मिली जहां पान-खैनी-तंबाकू-जर्दा आदि की थूकें-पीकें न बिखरी-फैली हों। हैरानी तो तब हुई जब भगवाधारियों के झुंड के झुंड बेखौफ-बेपरवाह यहां-वहां-जहां-तहां, यत्र-सर्वत्र थूके चले जा रहे थे। उन्हें टोकना-बोलना तो दूर यदि कोई ऐसा करते हुए उनकी तरफ शिकायती चक्षुओं-नजरों-निगाहों से देख भी ले, घूर भी दे तो बिफर पड़ते हैं, धमका देते हैं। हमारे सामने तो नहीं हुआ, पर क्या पता मार-पीट भी कर लेते हों। चंडीगढ़ से पहुंच कर पावन नगरी बनारस की सडक़ों-राहों पर चलना हम लोगों के लिए दुश्वार लगने लगा। थूक और गंदगी से अटी-भरी पड़ी सडक़ों पर सामान लेकर चलना तो हमारे लिए तो और भारी पड़ गया। जब सडक़ पांव तक रखने लायक नहीं तो सामानों को नीचे कैसे रखा जा सकता है, इसे सहज ही समझा-जाना जा सकता है। आम लोगों के रहने वाले शहर के हर हिस्से में गंदगी ही गंदगी। खासकर पान-खैनी-तंबाकू-जर्दा आदि की पीकें-थूकें तो बनारसियों के जीवन का हिस्सा बन गई हैं।     

ठीक-ठाक सडक़ें दुर्लभ:
वैसे पूर्वी उत्तर प्रदेश में यह नजारा आम है। या कहें कि यह एक तरह का सौंदर्यबोध बन गया है, लेकिन प्रधानमंत्री के चुनाव क्षेत्र में भी यही नजारा नजर आए तो कम से कम किसी बाहरी व्यक्ति-आगंतुक के लिए हैरानी से भर देने वाला है। यही नहीं, उसे कहीं सही सलामत, ठीक-ठाक सडक़ें भी नहीं मिलेंगी। जैसे कि हमें नहीं मिलीं, सिवाय पॉश इलाकों के।

स्पेशल नहीं मुसीबत की ट्रेन:
बात शुरू हुई थी सफर, आवागमन से, तो बता दें कि बनारस में रेलवे का भी हाल बदइंतजामी के दूसरे नाम के रूप में ही है। रेलवे से अपेक्षाएं यूपी सरकार की बसों की व्यवस्था से निश्चित रूप से अलग होंगी क्यों कि रेलवे केंद्र यानी मोदी सरकार के अधीन है। मोदी के मोह में फंसे-बंधे लोगों को अब पूरी उम्मीद रह रही है कि अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए होने वाली रेल यात्रा उनके लिए नियमित, अच्छी, सुविधाजनक होगी-रहेगी। पर हमारे सरीखे अनगिनत लोगों के लिए स्पेशल ट्रेन की वह यात्रा कभी न भूलने वाली बन गई। हुआ यह कि वापसी के लिए हमने वाराणसी-चंडीगढ़ स्पेशल ट्रेन का टिकट लिया था। लंबी यात्रा करके नियत समय पर हम वाराणसी स्टेशन पर पहुंचे। पता चला कि स्पेशल ट्रेन लेट है। कितनी लेट है? कब जाएगी? इसका जवाब देने वाला कोई नहीं था। यहां तक कि इंटरनेट पर भी इस ट्रेन के बारे में कोई भी जानकारी नहीं थी। हम लोगों ने स्टेशन के एक प्लेटफार्म पर डेरा डाला। इंतजार करते-करते इस ट्रेन ने रात के चौथे पहर में बनारस का पिंड, दामन छोड़ा। इस दौरान बेहद परेशानी, असमंजस से गुजरना पड़ा इस ट्रेन का टिकट लिए लोगों को। असहनीय गर्मी-उमस में बिना पंखे के लोगों को वक्त काटना पड़ा। लोगों को समझ ही नहीं आ रहा था कि प्लेटफार्म के पंखों को क्यों बंद रखा गया है।

भारत और मोदी के सिस्टम पर विदेशी की तल्ख टिप्पणी:
 हमारे ट्रेन इंतजार में एक विदेशी गौरवर्णीय सुंदर, पर बेहद समझदार-संवेदनशील कन्या भी अपने साथी के साथ शामिल रही। वह हमारे साथ ही बेंच पर बैठी रही। उसके पैर में थोड़ी चोट लगी थी जिससे वह परेशान थी पर उसकी सक्रियता, सूझ-बूझ और कलाशीलता ने हमको पूरे वक्त तक बांधे रखा। ट्रेन की अव्यवस्था-विलंबता पर उसने जितनी कड़ी-तीखी-तल्ख प्रतिक्रिया व्यक्त की, जताई उससे वहां उपस्थित सभी यात्री सहमत थे ही, उसने जब बनारस के संबंध में टिप्पणी करनी शुरू की तो सभी लोग हैरान रह गए। उस कन्या ने कहा, बनारस भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का क्षेत्र है। यहां रेलवे का आलम यह है कि ट्रेन कब आएगी, कब जाएगी, कोई पता ही नहीं है, कोई बताने वाला नहीं है। मिस्टर मोदी ने दुनिया भर का ध्यान अपनी ओर खींचने, बड़े-विकसित-धनाढ्य देशों से भारत को विकास के आसमान पर चढ़ाने के लिए आर्थिक मदद मांगी है, मांग रहे हैं। यह तो ठीक है, लेकिन जिन लोगों के वोट पर चढ़ कर देश की शीर्ष कुर्सी पर विराजमान हुए हैं उन लोगों की सुविधा के लिए क्या कर रहे हैं? क्या यही कि आपको अपने तरीके के जरूरी कामों के लिए कहीं जाना हो तो वह टे्रन ही धोखा दे जाए जिसके जरिए आप अपना मुकाम हासिल करना चाहते हैं, अपना काम पूरा करना चाहते हैं। भारत के मौजूदा सिस्टम पर उसने इसी तरह की अनेक टिप्पणियां कीं, और ट्रेन जब तक प्लेटफार्म पर नमूदार नहीं हुई वह करती रही। उसकी अंग्रेजी के लहजे को अपने भेजों में उतारने की असमर्थता के बावजूद वहां उपस्थित ढेरों लोग उसके लहजे, भाव भंगिमा को अपलक देखते-सुनते रहे और हामी में सिर हिलाते रहे।

हुनरमंद गौरांग विदेशी बाला:
वह गौरांग विदेशी बाला बेहद हुनरमंद भी दिखी। कुल्लू-मनाली के सफर पर जा रही अच्छे-सुंदर डीलडौल वाली इस कलाकार लडक़ी ने अपने रेखाचित्रों से तो मंत्रमुग्ध कर दिया। एक तरह से टाइम पास करने के लिए रेखाचित्रों-स्केचों-रेखांकनों से भरी अपनी डायरी निकाली और उस पर अपनी बाल पेन दौड़ाने लगी। देखते ही देखते उसने प्लेटफार्म पर बेतरतीब सोए लोगों, जिनमें उम्रदराज पुरुष, महिलाएं, बच्चे, शादीशुदा और कुंवारी युवतियां आदि सभी थे, के आकार अपनी पेन से कागज पर उतारने लगी। साथ ही आस-पास की सभी चीजों, सामने खड़ी एक ट्रेन, लटकते विज्ञापनों की होर्डिंग्स, आते-जाते लोगों, सभी को इतनी सफाई से रेखाचित्रों में संजो दिया कि मेरे समेत वहां उपस्थित सभी लोगों ने दांतों तले उंगली दबा ली। फिर हम लोग आपस में बात करते हुए कहने लगे कि यह लडक़ी जब अपने वतन वापस जाएगी तो बनारस से लेकर भारत में जहां-जहां जाएगी वहां की हकीकत जब अपने मुल्क के लोगों, खासकर अपने जानने वालों को बताएगी, संभवत: लिखेगी भी तो वहां के लोग मोदी के भारत के बारे में क्या सोचेंगे, क्या विचार-नजरिया बनाएंगे?

चंडीगढ़ के पत्रकार भूपेंद्र प्रतिबद्ध की रिपोर्ट. संपर्क: 09417556066

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काशी पत्रकार संघ के चुनाव में योगेश गुप्ता का पूरा पैनल हारा, फोटोग्राफर बीबी यादव अध्यक्ष बने (पढ़ें किसे कितने वोट मिले)

वाराणसी। काशी पत्रकार संघ के प्रतिष्ठापरक चुनाव में पूर्व अध्यक्ष योगेश गुप्ता पप्पू के पैनल के सभी प्रत्याशी पराजित हो गए। काशी पत्रकार संघ के इतिहास में पहली बार कोई फोटो जर्नलिस्ट अध्यक्ष बना है। जनसंदेश टाइम्स से जुड़े फोटोग्राफर बीबी यादव भारी मतों से विजयी हुए। पप्पू गुट के प्रत्याशी सियाराम यादव की करारी हार हुई और वह तीसरे स्थान पर चले गये। इस चुनाव में भ्रष्चाचार और मनमानी प्रमुख मुद्दा रहा।

पप्पू गुट ने अध्यक्ष के लिए सियाराम यादव, महामंत्री के लिए प्रदीप श्रीवास्तव और कोषाध्यक्ष पद के लिए दीनबंधु राय का पैनल बनाकर चुनाव लड़ाया था। इस गुट से चुनाव लड़ने वाले तीनों ही प्रत्याशी भारी मतों से चुनाव हार गये। वर्ष 2014-16 के लिए पराड़कर स्मृति भवन में सम्पन्न द्विवार्षिक चुनाव में अध्यक्ष पद पर बीबी यादव 113 मत पाकर विजयी घोषित हुये, वहीं महामंत्री पद पर 107 मत पाकर रामात्मा श्रीवास्तव और कोषाध्यक्ष पद पर 127 मत पाकर पवन कुमार सिंह निर्वाचित घोषित किये गये। इनका कोई पैनल नहीं था।

कल पूर्वाह्न नौ बजे से मतदान शुरू हुआ और अपराह्न तीन बजे तक चला। तदन्तर घोषित परिणामों के अनुसार अध्यक्ष पद के अन्य प्रत्याशी सुभाष चन्द्र सिंह को 70 मत, सियाराम यादव 52 मत और प्रमिला तिवारी को 11 मत मिले। उपाध्यक्ष पद पर राधेश्याम कमल (158 मत), कमल नयन मधुकर (143 मत), और जयप्रकाश श्रीवास्तव (136 मत) पाकर विजयी घोषित हुये। इसी पद पर वीरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव को 121 मत मिले। महामंत्री पद के अन्य प्रत्याशी प्रदीप कुमार श्रीवास्तव को 87 मत तथा शिवशंकर व्यास को 46 मत मिले। मंत्री पद पर देवकुमार केशरी (154 मत) और उमेश गुप्ता (132 मत) पाकर विजयी घोषित हुये। इसी पद पर आनन्द कुमार मौर्य को 105 मत मिले। कोषाध्यक्ष पद पर ही दीनबन्धु राय को 109 मत मिले।

सदस्य कार्यसमिति पद के लिए शंकर चतुर्वेदी (168), सुशील कुमार मिश्र (158), दिलीप कुमार (153), पुरूषोत्तम चतुर्वेदी (140), अमित शर्मा (118), शम्भूनाथ उपाध्याय (117), अरविन्द कुमार (117), बिमलेश कुमार चतुर्वेदी (116), सुधीर कुमार गणोरकर (104), अवधेश कुमार सिंह (100) निर्वाचित घोषित हुये। इसी पद पर बृजकुमार पाण्डेय को 97, मिर्जा अतहर हुसैन को 87, ओमप्रकाश सिनहा तथा स्वतंत्र कुमार विश्वकर्मा को 85-85 मत मिले।

निर्वाचन अधिकारी जगत शर्मा ने देर शाम परिणामों की घोषणा की। निर्वाचन मण्डल में संजय अस्थाना, डा॰ अत्रि भारद्वाज, रमेश सिंह और बद्री विशाल शामिल थे। नवनिर्वाचित पदाधिकारियों को काशी पत्रकार संघ के निवर्तमान अध्यक्ष कृष्णदेव नारायण राय, वाराणसी प्रेस क्लब के अध्यक्ष डा॰ अत्रि भारद्वाज, मंत्री जितेन्द्र श्रीवास्तव, कोषाध्यक्ष पंकज त्रिपाठी, राजेन्द्र रंगप्पा सहित सभी पदाधिकारियों ने बधाई दी।

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योगेश गुप्ता दलाल नहीं हैं इसीलिए परिवार चलाने के वास्ते सतना में नौकरी कर रहे हैं

साथी, तकलीफजदा हूं योगेश गुप्ता के बारे में यह सुन कर पढ़ कर। बनारस में योगेश ने पत्रकारों की लड़ाई के चलते नौकरी गंवाई। मैंने खुद एक बार एचटी प्रबंधन के अपने एक साथी से पूछा तो उनका जवाब था कि नेतागिरी छोड़ दें, सब बढ़िया हो जाएगा। योगेश ने नुकसान उठाया। सड़क पर रहे। स्ट्रिंगर के तौर पर भी काम किया पर समझौता नहीं किया।

देश भर में कहीं नहीं पर बनारस में छापे पड़े अखबारों के दफ्तर में पीएफ के रिकार्ड चेक करने को। और कितने लोग रोल पर हैं इसके लिए। योगेश मुसलसल चुनौती दे रहे हैं खुद को हटाए जाने को लेकर, स्थानांतरण को लेकर। वो दलाल नहीं जो बनारस में बैठ मलाई रोटी खाएं। परिवार चलाने के लिए सतना गए हैं काम करने। हक और दावा, अदालती केस उनका बनारस के लिए है। इंतजार करें। हमें बहुत से योगेश चाहिए, उनके साथ केडीएन राय चाहिए, राजेंद्र रंगप्पा चाहिए और कई काशी के जुझारु साथी चाहिए।

लेखक सिद्धार्थ कलहंस लखनऊ में पदस्थ हैं और बिजनेस स्टैंडर्ड के प्रिंसिपल करेस्पांडेंट हैं. उनसे संपर्क 09336154024 के जरिए किया जा सकता है.

मूल पोस्ट…

काशी पत्रकार संघ योगेश गुप्ता की जेब में, नौकरी करते हैं सतना में फिर भी हैं मानद सदस्य

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काशी पत्रकार संघ योगेश गुप्ता की जेब में, नौकरी करते हैं सतना में फिर भी हैं मानद सदस्य

वाराणसी। आगामी 28 सितंबर 2014 को होने जा रहे काशी पत्रकार संघ का चुनाव मनमानी की भेंट चढ़ने जा रहा है। सालों से संघ पर कब्जा जमाये बैठे योगेश गुप्ता और उनका गिरोह किस तरह हावी है इसे संघ की मतदाता सूची में देखा जा सकता है। पूर्व अध्यक्ष योगेश गुप्ता पप्पू सतना के मध्यप्रदेश जनसंदेश में कार्यरत हैं। इनकी उम्र भी इतनी नहीं कि मानद सदस्य बन सकें। लेकिन संघ का संविधान इनके और इनके गिरोह के लोगों की जेब में है। इसलिए वह जनसंदेश टाइम्स वाराणसी के नाम पर मानद सदस्य बन बैठे हैं।

योगेश गुप्ता दो बार काशी पत्रकार संघ का अध्यक्ष और दो बार महामंत्री रह चुके हैं। इन्होंने जोड़-तोड़कर संघ का कानून इस तरह से बना लिया है कि वह और उनके गिरोह के लोग ही हर समय संघ के विभिन्न पदों पर काबिज रहें। योगेश गुप्ता ने अपने कार्यकाल में तमाम ऐसे लोगों को जोड़ा जो वर्किंग जर्नलिस्ट की श्रेणी में ही नहीं आते। काशी पत्रकार संघ के संविधान में यह स्पष्ट है कि इस संस्था का वही सदस्य रह सकता है जिसका कार्यक्षेत्र वाराणसी हो। साथ ही जिसके आय का मुख्य स्रोत पत्रकारिता (श्रमजीवी) हो। गैर राज्य में नौकरी करते हुए योगेश गुप्ता संघ में किसी तरह का सदस्य नहीं रह सकते। फिर वह मानद सदस्य कैसे बन गये? यह सवाल काशी के पत्रकारों के लिये यक्ष प्रश्न बन गया है।

28 सितंबर को काशी पत्रकार संघ के अध्यक्ष, महामंत्री, उपाध्यक्ष, कोषाध्यक्ष, मंत्री और दस कार्यकारिणी सदस्य पदों के लिए चुनाव हो रहा है। योगेश गुप्ता और इनका गिरोह गुट बनाकर चुनाव लड़ा रहा है। इससे काशी के पत्रकारों में नाराजगी बढ़ गई है। चुनाव में इस कदर गुटबाजी बढ़ गई है कि चुनाव लड़ने वाले एक दूसरे को दुश्मन की तरह देखने और मानने लगे हैं। नामांकन के दिन योगेश गुप्ता सतना से यहां आये और अपने गिरोह को लामबंद कर पर्चा भरवाया। योगेश गुप्ता के कार्यकाल में कई नई परंपरायें डाली गईं जो न सिर्फ शर्मनाक हैं, बल्कि काशी की पत्रकारिता के इतिहास को कलंकित करने वाली हैं।

काशी पत्रकार संघ का सालाना जलसा 26 जनवरी को होता है। इस दिन खेल प्रतियोगिता के प्रतिभागियों को पुरस्कृत किया जाता है। योगेश गुप्ता और इनके गिरोह ने इससे इतर शहर के धनपशुओं और नेताओं को खुश करने के लिए 25 जनवरी को दावत देने की नई परंपरा डाली है। इस कार्यक्रम में गुप्ता के अलावा इनके गिरोह के सदस्य तरह-तरह के (शाकाहारी-मांसाहारी) व्यंजन का लुफ्त उठाते हैं। अगले दिन 26 जनवरी को संघ के सदस्यों को सतही भोजन खिलाया जाता है। कुछ साल पहले तक इस तरह की व्यवस्था नहीं थी। भेदभाव की नीति के चलते साधारण सभा की बैठक में संघ के अधिसंख्य सम्मानित सदस्य शामिल होने से कतराते हैं। यही वजह है कि संघ की बैठक में अब कभी कोरम पूरा नहीं होता। काशी पत्रकार संघ के सदस्यों को पहले साल के शुरू में ही डायरी बंट जाती थी। पिछले कुछ सालों से डायरी का प्रकाशन तब होता है जब साल बीतने लगता है और डायरी का कोई औचित्य नहीं रहता। काशी पत्रकार संघ कब तक भ्रष्टाचारियों और मनमानी करने वाले चंद पत्रकारों के खेल का अखाड़ा बना रहेगा? यह कह पाना कठिन है।

काशी पत्रकार संघ के एक सदस्य के पत्र पर आधारित रिपोर्ट. रिपोर्ट के साथ संघ के मानद सदस्यों की सूची भी संलग्न है.


उपरोक्त आरोपों पर अगर योगेश गुप्त पप्पू या उनकी तरफ से कोई विस्तार से लिखकर अपना पक्ष रखना चाहता है तो भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.


इस पूरे प्रकरण पर पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस क्या कहते हैं, पढ़िए…

योगेश गुप्ता दलाल नहीं हैं इसीलिए परिवार चलाने के वास्ते सतना में नौकरी कर रहे हैं

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वाराणसी के सांस्कृतिक पत्रकार शायद सांस्कृतिक थे भी नहीं और हो भी न पाएंगे!

प्रिय भड़ास, कहीं से सुना की आपके ब्लॉग पर यदि भड़ास निकली जाये तो उसे गंभीरता से ले लिया जाता है कभी-कभार. तो उत्साहित हो उठा. मैं बनारस का एक रंगकर्मी हूँ जो अब बनारस के रंगकर्म से खिन्न होकर विदा ले चुका है. कारण बहुत से हैं. हमारा वाराणसी जितना धार्मिक रहा है उतना ही साहित्यिक भी. जैसा की आपको विदित होगा ही की हिंदी साहित्य के निर्माण में यहाँ के रचनाकारों की कितनी बड़ी तादात है. सबसे मशहूर कुछ दो लोगों का ज़िक्र करना चाहूँगा. एक भारतेंदु हरीश चन्द्र दूसरे प्रेमचंद. दोनों ही चंद अब भुलाये जा चुके हैं यहाँ. चौखम्बा स्थित भारतेंदु भवन तो फिर भी ठीक है पर लमही स्थित प्रेमचन्द निवास के क्या कहने. जाकर देखने योग्य भी नहीं है.

स्थानीय संस्कृति विभाग हर वर्ष एक लमही महोत्सव आयोजित करता है जिसका कारण असल में क्या है ये मुझे आजतक समझ में नही आया. इस सांस्कृतिक आयोजन में मैंने भी कुछ नाटक प्रस्तुत किये हैं. अनुभव ही बयां करूँगा. पहले ज़रा सा प्रिंट मिडिया का तार्रुफ़ आपसे करवा दूं. यहाँ के सांस्कृतिक पत्रकार शायद सांस्कृतिक थे भी नहीं और हो भी न पाएंगे. बड़ी अजीब सी बात है की किसी भी सांस्कृतिक आयोजन का इश्तेहार जैसा आर्टिकल बदस्तूर अखबार में छप जाया करता है पर मौका ए वारदात पर कोई पत्रकार कभी दीखता क्यूँ नहीं.

मुझे बाद में अनुभव मिला कि यहाँ स्टोरी निमंत्रण पत्र देख कर ही बना दी जाती है. अक्सर किसी बड़े नाटक को देखने ये पत्रकार कई बार के रिमाइंडर पर आ जाते तो हैं, पर नाटक इनसे कभी बर्दाश्त हो नहीं पाते. चाहे दर्शक अपनी कुर्सियों पर खड़े तालियाँ पीट रहें हों. अतः ये पहले पन्द्रह मिनट के बाद दिखाई नहीं देते. आलोचानात्मक व्याख्यान की उम्मीद भी करें तो हम खुद पर ही हंस दिया करें. पत्रकारों की कृपा हाल ही के कुछ नए रईसों की पार्टियों, और गप्पेबाजी के आयोजनों पर होती है. जैसे दैनिक जागरण का एक टेबलेट I-next. इसके पिछले पेज पर सिर्फ वीभत्स मेकप धारी मोटी चमचमाती महिलाएं लगभग रोज़ ही दिखतीं हैं. पर नगर के किसी विख्यात कवि-साहित्यकार या किसी नाटक के दृश्य कभी नहीं. हमने खुद भी इस अखबार से उस अखबार के दफ्तर जा जा कर कई बार निमंत्रण छोड़े हैं. पर सात सालों में आखिर के दो साल ही अखबारों में आने का सौभाग्य मिला.

लमही महोत्सव के दौरान ही एक सज्जन पत्रकार से हमने इस बाबत बात छेड़ी थी पर जवाब मिला- भैया मीडिया विज्ञापन से ही न चलता है.

मुझे उसकी बात में दम लगा. क्यूंकि हमारे स्थानीय अखबार वैसे भी अखबारों से ज्यादा पम्पलेट ही लगते हैं.

अब मैं स्थानीय नाटकों की पीढ़ा लिखना चाहूँगा. यहाँ एक निर्मम संस्था है जो पिछले कई सालों से नाटकों की हत्या और संकृति के ह्रास की ज़िम्मेदार है. नाम है नगरी नाटक मंडली. ये ऐसी एक मात्र संस्था है जहाँ राजवंश अब भी कायम है. मसलन यहाँ के न्यास की नियुक्ति.

मंडली की अपनी एक अलग दबंगई है. जैसे की किसी किसी नाटक संस्था/कलाकार पर प्रतिबन्ध लगना और कारण ये होना की वो इन्हें काफी समय से भाव नहीं देता. नगर में दूसरा कोई ऑडिटोरियम है ही नहीं. एक संस्कृतिक संकुल नामक संस्कृतिक केंद्र है जहाँ के हॉल का किराया लगभग 40000 है. और भीतर घुसने पर पता चलता है की कुछ भडभडाते पंखो और दूर तक फैली शिला के अलावा इसमें कुछ भी नहीं.

अपनी नगरी नाटक मंडली की दशा इससे कुछ बेहतर है. यहाँ फटी-उधडी टिन के किनारों वाली कुछ कुर्सियां हैं और लकड़ी का एक मंच भी है. बस. हमारे बनारस की सांस्कृतिक भूख इसी से मिट जाती है. मजबूरी ही है. क्यूंकि सरकार के पास कांवड़ियों के अस्थायी शौचालयों के लिया कई करोड़ होते है पर यहाँ के सांस्कृतिक केंद्र के लिए बस एक सावन मेला. जिसमे कोई सावन का मारा भी नहीं पहुँचता.

मैं खिन्न हूँ क्यूंकि यहाँ किसी भी प्रकार के अवसर अब बचे ही नहीं. कहने के लिए बहुत कुछ है पर आप पढ़ते-पढ़ते बोर हो जायेंगे. वैसे भी यहाँ कई सारे मुद्दे अब आपस में घुस-मूसा गए हैं.

भड़ास निकाल दी गयी. इ-मेल के लिए धन्यवाद.

भड़ास का कुछ हिस्सा बाकि रह गया. पिछला मेल भूमिका था. किस्सा मैं अब भेज रहा हूँ.

हाल ही के हुए एक लमही महोत्सव में एक युवा रंगकर्मी ने मंच पर जाकर अपनी भड़ास निकाल दी.

लमही महोत्सव का आखिरी दिन था जिसमे आखिरी नाटक कफ़न शुरू हो चुका था. जिसमे यह युवा रंगकर्मी पिछले एक महीने से चार किलोमीटर दूर जा-जाकर रिहर्सल कर चुका था. महोत्सव के मुख्य अतिथि, जैसे नगर के कुछ प्रमुख उस दिन अनुपस्थित थे. सो आयोजन सांस्कृतिक विभाग प्रमुख द्वारा शुरू करवा दिया गया. पहले नाटक के होते-होते कई लोग उठ कर जा चुके थे. पत्रकार तो पहले ही निकल जाते हैं.

हुआ यूँ की आयोजन समापन होते-होते वे सारे मुख्य अतिथि आ गए. आयोजक ने तत्परता से प्रबंध करवाए और बड़े ही अजीब ढंग से नाटक के निर्देशक को चलता नाटक रोक देने के आदेश दे दिए.

मज़े की बात ये की थोड़ी सी न-नुकुर के बाद निर्देशक मान भी गया.

हमारा युवा रंकर्मी पूरी तल्लीनता से अभिनय में लिप्त था. प्रेमचंद का माधव जीवित हो चुका था की उसे पोडियम से निर्देशक की आवाज़ सुनाई दी- “समय के आभाव के चलते हम क्षमा चाहेंगे की हमे नाटक यही रोकना पड़ रहा है.”

खून खौल जाना स्वाभाविक था. वाराणसी जैसे क्षेत्र में नाटक को वैसे भी गंभीरता से नहीं लिया जाता. चाहे वो प्रेमचंद को समर्पित महोत्सव ही क्यूँ न हो. गंभीर तो अतिथियों के भाषण होते हैं. अब वो आये हैं तो भाषण तो देंगे ही.

बनारस में होने वाले लगभग हर नाटक का यही एक रिवाज है जो अक्सर नाटकों, संगीत, साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर भारी पड़ जाता है. आज भी पड़ गया. युवा रंगकर्मी का उबलना लाज़मी ही था.

पहले तो वह उठकर ग्रीन रूम चला गया पर बाद में फुन्फुनाता हुआ मंच पर वापस आया. भाषण देते किसी विभाग के प्रमुख के हाथ से माइक छीन उसने बोलना शुरू किया. “मैं पिछले एक महीने से अस्सी से DLW जा-जाकर रिहर्सल करता रहा हूँ. मेरा नाटक सिर्फ आधे घंटे का था जिसे भाषणों के लिए बंद करवा दिया गया. सिर्फ ये पूछना चाहता हूँ की क्या ये सही हुआ?

कहकर युवा रंगकर्मी सवाल का बिना जवाब लिए अतिथि को माइक थमा कर अपना सामान ले वहां से चला गया. हम रंगर्मियों के लिए ये एक क्रांतिकारी कदम है. पर जिसे यहाँ के स्थानीय समाचार पत्रों में एक शब्द भी नसीब नही हुआ. क्यूँ होगा. कार्यक्रम सरकारी तो था ही साथ में हमारे समाचार पात्र तो पम्पलेट हैं. उनके लिए नाटक और साहित्य समय बर्बादी से ज्यादा वैसे भी कुछ कहाँ है.

अब जाकर भड़ास पूरी हुई.

ऋत्विक जोशी

Ritvik Joshi

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