Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

प्रिंट

आज के अखबार : संविधान पर चर्चा की खबरों में राजनाथ सिंह का भाषण ‘राजा का बाजा’ बना है

संजय कुमार सिंह

संविधान पर चर्चा के पहले दिन सरकार और विपक्ष की भिड़ंत में प्रियंका गांधी का प्रदर्शन आज के अखबारों की खबरों से बहुत शानदार दिख रहा है लेकिन आज के अखबारों ने प्रियंका को बेहतर कहने-दिखाने से अलग, क्या-क्या कहा और किया है उसे देखना दिलचस्प है। यह भी कि राजनेता तो राजनीति करते ही हैं मीडिया भी शर्म लिहाज छोड़कर मैदान में है। मजेदार यह कि आज जब ज्यादातर अखबारों में संविधान पर चर्चा के दौरान सरकार और विपक्ष के बीच चर्चा की खबर लीड है तो अमर उजाला में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का प्रचार और उनकी धार्मिक राजनीति का समर्थन व उसका अंधाधुंध प्रसार लीड है। शीर्षक है, कुंभ मेला एकता का महायज्ञ, जहां जातियों और संप्रदायों का मिट जाता है भेद : मोदी। पहले पन्ने पर दूसरे अखबारों की तरह संविधान पर चर्चा जैसी खबर तो नहीं है पर राज्यसभा अध्यक्ष और उपराष्ट्रपति का पक्ष जमकार हंगामा हुआ कि आड़ में फोटो के साथ है। शीर्षक है, मैं किसान का बेटा हूं, देश के लिए मर-मिट जाउंगा। दि एशियन एज में प्रधानमंत्री वाली खबर लीड है। शीर्षक भी लगभग अमर उजाला जैसा है। संविधान पर चर्चा की खबर नीचे है और उसमें राजनाथ सिंह का बयान मुख्य शीर्षक है। प्रियंका गांधी का जवाब उपशीर्षक के रूप में है। इसके अनुसार प्रियंका ने प्रधानमंत्री, भाजपा पर निशाना साधा।   

आज बाकी के मेरे छह अखबारों की लीड इस प्रकार है

1. इंडियन एक्सप्रेस

कांग्रेस ने हमेशा संविधान के मुकाबले सत्ता को चुना है : राजनाथ

इसके साथ राजनाथ सिंह का कहा सिंगल कॉलम में है जिसका शीर्षक है, जाति जनगणना से दिक्कत नहीं है, अपने ब्लूप्रिंट में कोट स्पष्ट कीजिये। 

उपशीर्षक है, वह है जो प्रियंका गांधी ने कहा है, संविधान संघ का विधान नहीं है, झूठ फैलाने के लिए,  1975 से सीखिये : प्रियंका।

2. हिन्दुस्तान टाइम्स

संविधान पर चर्चा में सरकार, विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप  

इसके साथ की खबर का शीर्षक है, राज्य सभा में नये हंगामे में धनखड़ खरगे फिर आमने-सामने।

3. द हिन्दू

राजनाथ सिंह ने कहा, कांग्रेस ने हमेशा संविधान के मुकाबले सत्ता को चुना

इसके साथ सिंगल कॉलम की खबर का शीर्षक है, पहली बार के भाषण में प्रियंका ने पीएम का मुकाबला किया। इस खबर का उपशीर्षक है, लोकसभा में अपने भाषण में रक्षा मंत्री ने संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन करने के लिए इमरजेंसी, राज्य सरकारों की बर्खास्तगी का उल्लेख किया; एनडीए कभी भी संविधान के बुनियादी ढांचे को बदलने नहीं देगी।

4. लगभग यही शीर्षक और उपशीर्षक दि एशियन एज में है

आज के कई अखबारों में राजनाथ सिंह की ये बातें लीड के शीर्षक में हैं। लेकिन यह बात किस आधार पर कही गई है उसे कम ही अखबारों ने बताया है और इमरजेंसी को संवैधानिक सिद्धांतों के उल्लंघन के लिए उपयोग करने का आरोप तो पुराना है, इसमें दम नहीं है लेकिन बारबार झूठ बोलकर उसे सच बनाने की कोशिशों का कुछ किया नहीं जा सकता है। हिन्दू राष्ट्र बनाने और हिन्दुत्व की बात करने वाले लोग अगर संविधान की मूल भावना को नहीं बदलने की बात करें तो उसे भी समझना मुश्किल है क्योंकि सांप्रदायिक राजनीति तो वैसे भी संविधान के खिलाफ है।

5. द टेलीग्राफ

अकेले द टेलीग्राफ ने प्रियंका गांधी की बातों को लीड का शीर्षक बनाया है। फ्लैग शीर्षक है, प्रियंका ने संविधान पर चर्चा का टोन तय किया। मुख्य शीर्षक वह है जो प्रियंका ने कहा है, फोकस अभी पर (नाऊ) होना चाहिये न कि नेहरू पर। 

6. नवोदय टाइम्स

मुख्य शीर्षक है, ‘संविधान’ पर चर्चा में तर्क और तंज। उपशीर्षक है, एक पार्टी ने की संविधान निर्माण को हाईजैक करने की कोशिश :राजनाथ और दूसरा इसके बराबर में, भारत लंबे समय तक कायरों के हाथ में कभी नहीं रहा, देश उठेगा और लड़ेगा : प्रियंका। 

इन खबरों और शीर्षक से आप समझ सकते हैं कि वास्तविक स्थिति क्या है और अखबारों में उसकी रिपोर्ट कैसे छपी है। इसे और बढ़िया से बताने के लिए आज पत्रकारिता की क्लास। दैनिक हिन्दुस्तान की आज की लीड का शीर्षक है, संसद में महारथियों के बीच महासंग्राम। मुझे इसमें खबर से ज्यादा ‘महारथियों’ को बराबरी पर रखने की पत्रकारिता समझने की जरूरत लग रही है। ऐसा कोई तभी सोचेगा या लिखेगा जब वाकाई सबके सब महारथी हों। यहां अगर सबको अलग-अलग महाराथी मान भी लिया जाये तो मुकाबला बराबरी का नहीं है और इस लिहाज से महासंग्राम कैसे होगा? हो जाये, चले, टिका रहे सब बाद की बातें हैं लेकिन बराबर नहीं है उसे बराबर में प्रस्तुत क्यों करना? अगर आप बराबर मानते हैं तो मुद्दा ही नहीं है लेकिन मेरे हिसाब बराबर कैसे हो सकते हैं जब जगदीप धनखड़ किसी की कृपा से ईनाम के रूप में अपने पद पर आये और अगर वे पद की गरिमा के अनुकूल अब निष्पक्ष होते तो उस कृपा को नजरअंदाज किया जा सकता था। ऐसा भी नहीं है और विपक्ष ने हाल में उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया है। आप उनसे सहमत हों या नहीं, उनकी निष्पक्षता तो संदह के घेरे में है ही। इसलिए मैं दोनों को बराबरी में या मुकाबले में नहीं मानता। जगदीप धनखड़ भाजपा के लिए मल्लिकार्जुन खरगे की बराबरी के हो सकते हैं लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष की तुलना भाजपा अध्यक्ष से की जानी चाहिये और उसमें तुलना हो सकती है कि अध्यक्ष के रूप में दोनों कैसे हैं या क्यों बराबर हैं या क्यों नहीं हैं। भाजपा के पूर्णकालिक अध्यक्ष का मामला आप जानते हैं। अभी वह चर्चा का मुद्दा नहीं है। उपराष्ट्रपति और कांग्रेस अध्यक्ष या विपक्षी दल के अध्यक्ष का मामला तुलना करने योग्य नहीं है।

इसी तरह, लोकसभा में 75 वर्ष के संविधान पर चर्चा में राजनाथ सिंह के मुकाबले प्रियंका गांधी को रखा गया है। राजनाथ सिंह के मुकाबले प्रियंका गांधी पहली बार की सांसद हैं और मुझे नहीं लगता है कि दोनों में कोई मुकाबला या बराबरी है। राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनें और प्रियंका को गृहमंत्री बनाएं या रक्षा मंत्री बनाने के लिए अपने किसी अमित शाह को गृहमंत्री बना दें तो उनका अमित शाह ही कोई नहीं है। ऐसे में यह बराबरी नहीं है और नरेन्द्र मोदी इसी रिश्तेदारी का वंशवाद (और मेरा कोई नहीं है) कहकर विरोध करते रहे हैं। इस लिहाज से प्रियंका गांधी का मुकाबला राजनाथ सिंह के बेटे से तो हो सकता है पर राजनाथ सिंह बहुत वरिष्ठ हैं। दूसरी ओर, उनके बेटे विधायक हैं और प्रियंका सांसद इसलिए यहां भी बराबरी नहीं है। यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है कि दैनिक हिन्दुस्तान में अगर आज की लीड महारथियों के बीच संग्राम है को लीड के रूप में पेश किया है तो दैनिक भास्कर में इसका शीर्षक है संविधान पर आमने सामने। यहां भी राजनाथ सिंह के मुकाबले प्रियंका गांधी हैं। खबर और प्रस्तुति से लगता है कि यह तथ्य है और इसलिए खबर है। हि्न्दुस्तान के शीर्षक से लगता है जैसे कोई संग्राम चल रहा है (या हुआ) जो महारथियों के बीच है और बराबर के महाराथी आमने-सामने हैं इसलिए यह महासंग्राम है। दैनिक भास्कर की प्रस्तुति से लगता है कि संविधान पर राजनाथ सिंह और प्रियंका गांधी आमने-सामने हैं और यह मामला पार्टी का हो तो दोनों अपने-अपने दल की ओऱ से है। इसमें अखबार या संपादक ने जबरन दोनों को बराबर बनाने या किसी से कमजोर दिखाने क बजाय जैसा है वैसे रख दिया है। तय पाठक को करना है और यही अच्छी पत्रकारिता है।

ऐसा नहीं है कि खबरों में अखबार या संपादक को अपनी ओर से कुछ कहने या राय रखने का अधिकार नहीं है पर वह तथ्यों को बदलने या प्रभावित करने की कीमत पर नहीं होना चाहिये। तथ्यों का शुद्ध रूप भी स्पष्ट होना चाहिये। संपादक की मिलावट भी चलेगी लेकिन वह स्वाद या तथ्य खराब करने वाली तो न हो। उदाहरण के लिए, दैनिक भास्कर में राजनाथ सिंह और प्रियंका गांधी की ओर से दो का उपशीर्षक है। पहला है, कांग्रेस पार्टी ने हमेशा संविधान के बजाय सत्ता को ही चुना। दूसरा है, बैलेट पर चुनाव करा लें, दूध का दूध पानी का पानी हो जायेगा। यहां प्रियंका गांधी ने जो कहा है वह राजनाथ सिंह के (निराधार) आरोप का जवाब तो है ही चुनौती के रूप में आरोप भी है। पूरा मतलब यह है कि भाजपा ईवीएम के दम पर सत्ता में है जबकि कांग्रेस ने अगर संविधान को जेब में भी रखा तो असंवैधानिक काम नहीं किया। ऐसा मानने और कहने का आधार सार्वजनिक है और राजनाथ सिंह के आरोप की तरह प्रियंका गांधी की चुनौती का निष्कर्ष निराधार नहीं है।

हिन्दुस्तान और तमाम अखबारों ने राजनाथ सिंह के एक ही आरोप को प्रमुखता दी है (मतलब उन्होंने कुछ और या खास नहीं कहा है)। हिन्दुस्तान के अनुसार राजनाथ सिंह ने कहा है, विपक्ष के कई नेता संविधान की प्रति जेब में रखकर घूमते हैं क्योंकि उन्होंने पीढ़ियों से अपने परिवार में इसे जेब में ही रखे देखा है। इसपर प्रियंका गांधी का जवाब है, संविधान दस्तावेज भर नहीं है। यह इंसाफ, उम्मीद, अभिव्यक्ति और आकांक्षा की ज्योति है जो हर हिन्दुस्तानी के दिल में जलती है। स्पष्ट है कि प्रियंका गांधी ने जो कहा है उससे संविधान को जेब में रखना संभव ही नहीं है और राजनाथ सिंह अगर इमरजेंसी का उदाहरण देना चाह रहे हैं तो वह संविधान के प्रावधानों के तहत लगा था। जो उस समय की स्थितियों के कारण लगाया गया था और उसकी जरूरत से आप भले असहमत हों पर वह तानाशाही नहीं थी। वैसी तो बिल्कुल नहीं जैसी आजकल चल रही है जिसे अघोषित इमरजेंसी भी कहा जाता है। ऐसे में हि्न्दुस्तान की प्रस्तुति से लग रहा है कि कांग्रेस को कमजोर या भाजपा को मजबूत दिखाने की कोशिश है या खबर प्रस्तृत करने वालों की सोच भाजपा के पक्ष में है।

यहां दोनों नेताओं की बातें उपशीर्षक में हैं, विपक्ष ने 62 संशोधन किये : राजनाथ। दूसरा, संविधान बदलने नहीं देंगे : प्रियंका। राजनाथ सिंह अपनी बात नहीं विपक्ष की बात कर रहे हैं और इसके जरिये बताना चाहते हैं कि विपक्ष ने किये हैं तो हम भी कर सकते हैं लेकिन प्रियंका ने जो कहा है उसका मतलब साफ है, (हमने किये भी हैं तो) संविधान नहीं बदलने देंगे। यहां दोनों पक्षों की राय स्पष्ट है। अंतर साफ है, भाजपा अपनी राय सीधे नहीं कहती है कांग्रेस कह रही है। राजनाथ सिंह कह रहे हैं कि विपक्ष या कांग्रेस ने 62 संविधान संशोधन किये तो तथ्य है कि उसमें जाति-धर्म और समाज के लोग हैं जबकि भाजपा की सरकार या बहुमत में कम से कम मुस्लिम तो नहीं हैं। इसलिए संविधान संशोधन के लिहाज से भाजपा की सरकार ठीक नहीं है और कांग्रेस ने किये हैं तो आगे भी करेगी। शीर्षक यानी प्रियंका गांधी की बातों से स्पष्ट है कि प्रियंका गांधी अच्छी टक्कर दे रही हैं और उनके मुकाबले राजनाथ सिंह भी टक्कर नहीं दे पा रहे हैं। संपादकों की सहायता या कोशिश के बाद भी। वैसे भी बहुमत पाने का मतलब बाकी पर बुलडोजर चला देना नहीं होता है। चुनाव तो हर पांच साल पर होते हैं और ईवीएम नियंत्रित नहीं हो तो नतीजा हमेशा एक नहीं आयेगा (अगर विरोधियों पर बुलडोजर न चला दिया जाये)।

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन