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आज के अखबार : संसद की कार्यवाही की रिपोर्टिंग में पक्षपात और सरकार का समर्थन साफ दिख रहा है

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों में संसद की कार्यवाही की रिपोर्टिंग में पक्षपात साफ-साफ दिख रहा है। सत्ता का विरोध मीडिया का काम है लेकिन मीडिया अब सत्ता का प्रचार और बचाव ही करता है। पाठकों के पास तथ्य जानने का एक तरीका किताबें थीं पर उसका हाल भी आप देख रखे हैं। आज उससे संबंधित खबर भी है। मोटे तौर पर सरकार अपनी राजनीति चमकाने के लिए न सिर्फ अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर रही है बल्कि प्रकाशक को बिला वजह परेशान भी कर रही है। यह ईज ऑफ डूइंग बिजनेस – के प्रचार के बावजूद है। किताब के कथित ‘लीक’ अंश से अगर सेना को खुली छूट और 56 ईंची सच का खुलासा हुआ है तो अब कॉपीराइट की रक्षा (या बचाव) में प्रकाशक को ही परेशान किया जा रहा है। एक पूर्व सेना प्रमुख के रिटायरमेंट के बाद, नियमानुसार लिखी गई आत्मकथा में क्या गोपनीय हो सकता है और नियमों का उल्लंघन हुआ है तो बताया क्यों नहीं जा रहा है। इसमें यह सब रह जाता है कि एक पूर्व सेना प्रमुख को आत्मकथा लिखने से क्यों रोका गया और इसके लिए अलग से नए नियम-कानून की जरूरत क्यों है। इसमें द हिन्दू की आज की लीड उल्लेखनीय है। इसका शीर्षक है, रक्षा कार्मिकों द्वारा किताबें के लिए दिशा निर्देशकों की केंद्र सरकार की योजना। खबर के अनुसार, रक्षा मंत्रालय ने एक बैठक का आयोजन किया जिसका मकसद सेवारत और रिटायर कार्मिकों के लिए नियम बनाना था। एक अधिकारी के अनुसार, सरकार एक ऐसा ढांचा बनाना चाहती है जिसका पालन किसी भी किसी भी पांडुलिपि के प्रकाशन से पहले किया जाना होगा। कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार अगर अब ऐसे नियम और ढांचे बनाने की बात कर रही है तो अभी तक ऐसा कुछ नहीं था और चूंकि कार्रवाई कॉपी राइट नियम के अनुसार हो रही है इसलिए अभी तक किसी कानून के उल्लंघन का मामला नहीं है। कॉपीराइट प्रकाशक और लेखक का होता है लेकिन यहां पीड़ित जो संयोग से सरकार है, उसे चिन्ता हो रही है।

मेरी चिन्ता यह है कि अभी तक के नियम और उनके दुरुपयोग के तमाम मामले हैं। इसके बावजूद अब ऐसे नियम बनाने पर विचार हो रहा है और सरकार के बड़बोलेपन की रक्षा की व्यवस्था हो रही है। संयोग हो या प्रयोग सरकार वही है जो कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाती थी और साबित नहीं कर पाई। अपने ऊपर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच नहीं कराई और विपक्ष के खिलाफ जिन आरोपों की जांच कराई उनमें अभी तक कुछ मिला नहीं है जबकि मुख्यमंत्री तक को गिरफ्तार किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव के समय राहत दी तो उसपर भी टिप्पणी की गई और बाद में कोर्ट पर दबाव के उदाहरण भी सामने आए। जजों को ईनाम देने के मामले पहले से थे। ऐसी सरकार ने मीडिया को पूरी तरह गुलाम बना लिया है, चार साल में रक्षा मंत्रालय ने 35 किताबों के प्रकाशन के आवेदनों में से 34 को निपटा दिया और एक के मामले में दो साल से ज्यादा कोई फैसला नहीं हुआ तो उसके अंश सार्वजनिक हुए और निश्चत रूप से यह पूर्व सेना प्रमुख के साथ सरकार के व्यवहार से संबंधित खबर और उसका अंश था फिर भी सरकार ने स्थिति को सुधारने के लिए कुछ नहीं किया। तथाकथित आपत्तिजनक अंश के लीक होने से अगर परेशानी हुई है तो वह कारवां के कारण है लेकिन उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं हो रही है क्योंकि उसमें कुछ गलत नहीं (हो सकता) है। फिर भी जांच चल रही है। आज की खबरों के अनुसार, प्रकाशक से पूछा जा रहा है जबकि उसने पीड़ित होकर भी शिकायत नहीं की है। स्पष्टीकरण भी दिया है और लोगों को समझ में नहीं आया तो 24 घंटे में दो बार दिया है। ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के दावे के बावजूद उसे तथाकथित जांच में सहयोग करने के लिए कहा गया है।

प्रकाशक ने भले नहीं कहा है कि किताब छपी है प्रकाशित नहीं हुई है पर उसने यह भी नहीं कहा है कि किताब छपी नहीं है। उसने कहा है कि छपी हुई किताब बेची नहीं गई है पर यह नहीं कहा है कि किसी को दी ही नहीं है। वैसे भी किताब जैसी चीजों का नमूना तैयार करने और उसके आधार पर ऑर्डर लेने का रिवाज रहा है इसलिए कुछ लोगों के पास कॉपी होने की बात से इनकार नहीं किया जा सकता है। मैं लिख चुका हूं कि किताब में पांच लोगों ने किताब की प्रशंसा लिखी है। जाहिर है, इन लोगों ने किताब पढ़ी होगी या देखी होगी। छपी हुई नहीं तो पीडीएफ और इसके अलावा इसके अंश कारवां में छपे हैं। इतना सब के बावजूद लीक कैसे हुई की जांच बेमतलब है और चोरी का पता लगाना है तो पहले वही बताएगा जिसके पास चोरी का माल मिला है। लेकिन जांच हो रही है प्रकाशक की जो पीड़ित है और अपने व्यवसाय से कमा नहीं पा रहा है। कहने की जरूरत नहीं है नरेन्द्र मोदी 2014 का चुनाव जीतने के बाद से ही अगला चुनाव जीतने में लगे हैं। ईवीएम और एसआईआर के बाद अब यह साफ हो चला है कि सरकार चुनाव को भी अपने नियंत्रण में करना चाहती हैं। अनिल मसीहों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होने से जो स्थिति बनी है वह भी सबको मालूम है। ऐसे माहौल में कल राहुल गांधी ने बजट पर भाषण देते हुए आरोप लगाया और यह देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, मोदी सरकार ने भारत को अमेरिका के हाथों बेच दिया। उन्होंने कहा और यह उपशीर्षक है, अमेरिका के साथ समझौते में पूरी तरह आत्मसमर्पण कर दिया। नवोदय टाइम्स ने पूरी खबर को बजट सत्र में विपक्ष का हमला शीर्षक से छापा है और राहुल गांधी के आरोप के जवाब में संसदीय कार्य मंत्री किरेन रीजीजू ने कहा है, कोई माई का लाल नहीं हुआ जो देश को खरीद सके। यही नहीं, रीजीजू ने यह भी कहा है कि राहुल गांधी ने सदन में एक मंत्री के खिलाफ बेबुनियाद आरोप लगाए हैं। इसलिए सरकार राहुल गांधी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाएगी। तथ्य यह है कि नरेन्द्र मोदी ने कई बार कहा है कि मैं देश नहीं बिकने दूंगा। मुझे लगता है कि किरेन रीजूजी ने इसे सुना या पढ़ा नहीं होगा – वरना वे ऐसा नहीं कहते या विस्तार से बताते कि उनका मतलब क्या है।

इसी तरह, राहुल गांधी ने जिस केंद्रीय मंत्री पर कथित बेबुनियाद आरोप लगाया उन्होंने मान लिया है कि वे एपस्टीन से मिले थे। यह खबर आज यह हिन्दुस्तान टाइम्स में फोटो के साथ और कई अखबारों में है। एक सजायाफ्ता और अब मृत बाल यौन आरोपी तथा जाने-माने दलाल से तीन चार-बार मिलने वाले केंद्रीय मंत्री पर बेबुनियाद आरोप लगाने के लिए संसदीय कार्यमंत्री विशेषाधिकार प्रस्ताव लाएंगे – यह पहले पन्ने की खबर है। इस तथ्य के बाबजूद कि ऐसा पहले भी कई बार कहा जा चुका है। यहां दिलचस्प यह भी है कि कांग्रेस ने शनिवार दावा किया था कि अमेरिकी यौन अपराधी और मानव तस्कर जेफ़री एपस्टीन से जुड़ी फ़ाइल्स में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी नाम है। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा था, “यह राष्ट्रीय शर्म का विषय है। पीएम मोदी हमारे तीन सवालों का जवाब सामने आकर दें।” तब, विदेश मंत्रालय ने इन आरोपों को ख़ारिज करते हुए कहा था कि जुलाई 2017 में प्रधानमंत्री की इसराइल की आधिकारिक यात्रा के अलावा, “ईमेल में बाक़ी बातें एक दोषी अपराधी की बेकार की बकवास से ज़्यादा कुछ नहीं हैं।” राहुल गांधी के आरोपों के जवाब में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने कहा है और अमर उजाला ने इसे लीड बनाया है, देश तो कांग्रेस ने बेचा, डब्ल्यूटीओ में किया था आत्मसमर्पण। कहने की जरूरत नहीं है कि यह जवाब नहीं है और कांग्रेस ने बेचा था तो निर्मला सीतारमन भी बेच देंगी जबकि संसदीय कार्य मंत्री कह रहे हैं कि खरीदने वाला कोई पैदा ही नहीं हुआ। इस तरह कांग्रेस ने अजन्मे खरीदने वाले को देश बेच दिया था। इसलिए निर्मता सीतारमन जवाब भी नहीं देंगी। जहां तक राहुल गांधी के आरोप की बात है, हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है, राहुल ने व्यापार समझौते पर सरकार की आलोचना की, उन्हें करारा जवाब मिला।

अमेरिका से करार के संबंध में कांग्रेस की ओर से राजीव शुक्ल ने कहा, अमेरिका के साथ ट्रेड डील बजट आने के बाद हुई है। इससे हमारा भार बढ़ जाएगा। ऐसे में सरकार को सप्लीमेंट्री या रिवाइज्ड बजट पेश करना चाहिए। राजीव शुक्ल ने यह भी कहा कि सरकार अपने प्रवक्ताओं को लगाकर हर झूठ को सच बताने की कोशिश करती है। उन्होंने सवाल किया, आखिर ये कैसी डील है जहां अमेरिका पर 0% टैरिफ है और भारत पर 18% टैरिफ है। ऊपर से अमेरिका द्वारा धमकाया भी जा रहा है कि हम निगरानी कर रहे हैं, अगर भारत ने रूस से तेल खरीदा तो पेनाल्टी लगाएंगे। साथ ही, वेनेज़ुएला से तेल खरीदने की बात कही जा रही है। इसके अलावा, यह डील किसानों के साथ भी धोखा है। इस ट्रेड डील के बारे में कॉमर्स मिनिस्टर से पूछो तो वो कहते हैं- विदेश मंत्री से पूछो। विदेश मंत्री से पूछो तो वो कहते हैं-कॉमर्स मिनिस्टर से पूछो। खबरों में यह सब मुझे नहीं दिखा। इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है, अमेरिकी सौदे को लेकर राहुल गांधी ने सरकार की आलोचना की, वित्त मंत्री ने कहा कांग्रेस ने डब्ल्यूटीओ में बेच दिया था। खबर में राहुल गांधी के आरोप नहीं हैं वित्त मंत्री का जवाबतो है ही, किरेन रीजीजू का विशेषाधिकार नोटिस का दावा भी है। देखना है होता क्या है। इंडियन एक्सप्रेस ने लीड के मुख्य शीर्षक के साथ हरदीप पुरी की स्वीकारोक्ति भी छापी है। इसका शीर्षक है, मसखरी, बदनामी का अभियान: पुरी ने राहुल की एपस्टीन टिप्पणी पर हमला बोला। इसके साथ टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड भी है जो यह संदेश देती लगती है कि ठीक तो कर दिया अमेरिका ने। कुल मिलाकर, यह राहुल के आरोपों पर बिलबिलाना और जवाब में उन्हें बदनाम करने वाले हमले बढ़ा देने का उदाहरण है।

द टेलीग्राफ ने सरकारी समारोहों में राष्ट्रगान से पहले वंदे मातरम के सभी छह छंदों का पाठ अनिवार्य किया गया खबर को लीड बनाया है। दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, वित्त मंत्री ने कांग्रेस पर हमला बोला, कहा अमेरिकी डील में कोई ‘सरेंडर’ नहीं है। यहां राहुल गांधी के आरोप को भी पर्याप्त जगह दी गई है। शीर्षक है, व्यापार करार एक पक्षीय, सरकार अमेरिकी दबाव के आगे हार गई। द टेलीग्राफ ने सरकार के जवाब को पहले पन्ने पर जगह नहीं दी है और राहुल गांधी के आरोप को पहले पन्ने पर ही रखा है। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड सबसे अलग है। शीर्षक है, अमेरिका ने दालों को हटाया, 500 बिलियन डॉलर की धारा में राहत दी। व्यापार सौदे पर फैक्ट शीट में 24 घंटे के अंदर संशोधन किया। वैसे तो यह खबर अमेरिकी राहत की बात करती है लेकिन इससे पता चलता है कि अमेरिका में भी काम-काज मोदी सरकार की ही तरह चल रहा है और मैंने पहले भी इसपर गौर किया है। पहले सरकारी निर्णय और आदेश की गंभीरता होती थी अब उसमें जल्दबाजी के साथ टाइपिंग की चूक, हिज्जे की गलतियां और तथ्यों में भूल – कुछ भी हो सकता है। दिलचस्प यह है कि ट्रम्प शासन में भारत से संबंधित मामलों में तो ऐसा होता ही है। पहले मैं समझता था कि फ्रैंड ट्रम्प से भारत को इतनी छूट मिल रही थी लेकिन इस बार तो लगा कि सौदा अमेरिका ने तैयार किया था भारत ने सिर्फ हां कहा था। अब इस संशोधन से लग रहा है कि वहां भी शायद यहीं के लोग हैं।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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