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सौरभ शब्द सत्ता युग के पत्रकार नहीं बल्कि सिनेमाई युग की पत्रकारिता के प्रोडक्ट हैं!

देव श्रीमाली-

लल्लन टॉप वाले सौरभ द्विवेदी की बात… मैं बीते चालीस साल से पत्रकारिता मे हूं. अख़बार, टीवी, डिजिटल हर प्लेटफार्म पर काम किया है.. कर रहा हूँ. प्रभाष जोशी, राजेंद्र माथुर से लेकर चार दशकों के ज्यादातर वरिष्ठ, हमउम्र और अनुज पत्रकारों से मिला… अनेक के साथ काम किया. लेकिन सौरभ द्विवेदी Saurabh Dwivedi से कभी नहीं मिला… मिलने की कोशिश भी नहीं की और संयोग भी नहीं बना.

लेकिन मैं उनके पत्रकार से सदैव मिलता था. मेरे सबसे पसंदीदा पत्रकार स्व. अलोक तोमर बेढब जीवन जीने वाले वाले व्यक्ति थे. मुझे अजीब लगता था.. मैंने उनसे अपने भाव बताये तो उनका जवाब था… हम कोई फ़िल्मी कलाकार नहीं है कि अच्छे कपड़े पहनकर, साफ जूते पहनकर निकले… हम पत्रकार हैं… हमें लोग शक्ल से नहीं हमारे किये से…लिखे से पहचाने बस यही चाहता हूं।

सौरभ द्विवेदी से मेरा सम्पर्क उनके किये से था… वे शब्द सत्ता के युग के पत्रकार नहीं थे बल्कि सिनेमाई युग की पत्रकारिता के प्रोडक्ट है इसलिए उन्होंने पहनावा… रहन सहन और रीति नीति आलोक तोमर जैसी नहीं रखी. वे इन सबका पूरा का ख्याल रखते थे कि स्क्रीन पर अच्छे यानी मनोहारी दिखें. जाहिर है इस काम में स्टाइलिस्ट और प्रोडयूसर का भी दखल रहता होगा.

वे टीवी पर प्रभाष जोशी फेम पत्रकारिता लेकर उतरे. जोशी जी के नेतृत्व में मुझे भी जनसत्ता में काम करने का मौका मिला. जनसत्ता देश में अपने तरह का अलग अख़बार था. अभिजात्य वर्ग की टेबिलों पर सजा ठेठ गंवई, देहाती और जो बोलो वह लिखो…शैली, शिल्प और बोली में गढ़ी जाने वाली खबरों वाला अख़बार… उसकी लोकप्रियता सबको पता है.. उसी दौरान और उसी वजह से मुझे ग्रामीण पत्रकारिता विकास संस्थान बनाने का विचार आया.

जोशी युग का जनसत्ता उनके साथ ही चला गया. लेकिन जैसा कहा जाता है कि विचार मरता नहीं है. सालों बाद सौरभ द्विवेदी आये. देशी… आम बोलचाल की भाषा.. बोली वाली पत्रकारिता लेकर. मीडिया में कायाँतरित रूप लेकर….

वे उरई से है जो बुंदेलखंड का प्रवेश द्वार है. यहाँ के तीन बड़े पत्रकार निकले मेरे अग्रज केपी सिंह Kp Singh, उरई वाया दिल्ली, ग्वालियर भोपाल में सबका ध्यान आकर्षित करने वाले शरद श्रीवास्तव Sharad Srivastava और देश के क्षितिज पर चमकने वाले सौरभ द्विवेदी.

सौरभ बुंदेलखंडी पहचान के साथ हिंदी, अंग्रेजी बोलते स्क्रीन पर प्रकट होते. यह पहचान थी – गले में लोयी लपेटना. बस अंतर इतना कि वह बुंदेली आम लोगो के धूलिया या मक्खन रंग से अलग रंग बिरंगी होती थी… यह स्क्रीन प्रजेटेशन की जरूरत थी. वही के युवाओं की तरह सदरी के साथ शर्ट की बांहे चढ़ी हुई.

उन्होंने अपनी ठेठ उत्तर भारतीय देशज बोली भाषा में अभिजात्य वर्ग, आईआईटी, आईआईएम कैम्पस, विज्ञान भवन से लेकर दिल्ली और मुंबई के प्रेस क्लबों की टेबलों तक की चर्चा में शुमार किया. उन्होंने बदनाम इंसानों की कहानियाँ भी उनके साथ बैठकर सुनी सुनाई तो नामी लोगो की भी. सबके नजरिये को सहजता से उनसे ही कहलवाया और आम लोगों की जिज्ञासाओं के सवाल भी दागे और जवाब भी लिए.

टीवी युग में लगभग मरणासन्न हो चुकी साक्षात्कार की स्टोरी टेलिंग विधा विकसित कर बात ऐसे सुनाई कि अगर आप राग द्वेष से प्रेरित नहीं हैं और जिज्ञासु हैं तो एक घंटे का इंटरव्यू भी पूरा देखे बगैर नहीं हटेंगे. राजा भैया से वे असहज सवाल जिस सहजता से करते है कि जवाब भी आता है और शानदार जानकारी के साथ आता है.

स्व. आलोक तोमर की कही क़ो सच किया सौरभ ने. वे अपनी स्क्रिप्ट और प्रजेंटेशन के जरिये लोगों के बीच पहुंचे और दिल में बसे. उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ी. क्यों छोड़ी ये न मैं जानना चाहता हूं न मुझे पता है लेकिन ऐसा करके उन्होंने सही किया. वे अपनी पत्रकारिता के इस स्वरचित मॉडल में अर्श पर थे और शीर्ष की एक सीमा होती है. लोग आप से वही चाहते हैं और फिर नापसंद भी होता है.

राजेश खन्ना.. देव आनंद क़ो याद कीजिये… फिर अमिताभ बच्चन का जीवन बदलाव देखिये…. और अच्छे के लिए बदलाव जरूरी है…. आपकी रचनात्मकता बची रहे उसके लिए नये प्रयोग करने पड़ते हैं.

मैंने दैनिक भास्कर तब छोड़ा था जब मैं पीक पर था. बड़ा नुकसान हो रहा था. नाम का भी और नामा का भी. उससे ये सब मिला था लेकिन छोड़ा तो डूबते – उतराते यहाँ तक पहुंचा. संभव ये भी था कि लोकप्रियता का सूर्य अस्त हो जाता था लेकिन सूर्योदय की संभावना भी थी. हुई भी.

सौरभ उसी यात्रा पर निकलेंगे. हो सकता है इस रूप की लोकप्रियता न मिले लेकिन अपनी मन की करने क़ो तो मिलेगा क्योंकि जिंदगी न मिलेगी दोबारा. No Risk No Game

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