पत्रकार जगेंद्र हत्याकांड पर केंद्र और यूपी सरकार को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस

नई दिल्ली : शाहजहांपुर के जुझारू पत्रकार जगेंद्र सिंह की हत्या के मामले को सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान ले लिया है। इससे हत्याकांड के आरोपी मंत्री और पुलिस वालों के खिलाफ कार्रवाई का रास्ता भी आसान होने की संभावनाएं बढ़ गई हैं। कोर्ट ने हत्याकांड के संबंध में यूपी सरकार, केंद्र सरकार और प्रैस काउंसिल ऑफ इंडिया को नोटिस भेजकर दो सप्ताह के भीतर जवाब तलब कर लिया है। 

जगेंद्र हत्याकांड पर पत्रकार सतीश जैन की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार और केंद्र के अलावा प्रैस काउंसिल ऑफ इंडिया को भी नोटिस भेजा है। याचिका में पत्रकार जगेंद्र सिंह की मौत की जांच सीबीआई से कराने की मांग भी की गई है। याचिका में मामले की सीबीआई जाँच के साथ-साथ पत्रकारों की सुरक्षा के लिए भी दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई है। 

याचिका में कहा गया है कि अगर किसी भी पत्रकार की आकस्मिक मौत होती है तो इसकी जाँच कोर्ट की निगरानी अदालत के देखरेख में हो। याचिकाकर्ता के वकील आदिश अग्रवाल ने बताया कि प्रैस काउंसिल ऑफ इंडिया के मुताबिक पिछले ढाई साल में 79 पत्रकारों की हत्या हुई है। ऐसे में जरूरी है कि पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कोई गाइडलाइन जारी की जाए। इसलिए काउंसिल को भी याचिका में पार्टी बनाया गया है। इस मामले में उसकी भूमिका अहम होगी क्योंकि ये एक सरकारी संस्था है जिसमें सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज चेयरमैन हैं।

उन्होंने कहा कि अब मध्यप्रदेश में भी पत्रकार की जलाकर हत्या कर दी गई है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट में एक और याचिका दाखिल की जाएगी। इसमें सभी राज्यों को पार्टी बनाया जाएगा। इस वक्त राज्यों में पत्रकारों की हालत खराब है और ऐसे में उनकी सुरक्षा के लिए पुख्ता इंतजाम जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट इस मामले की सुनवाई दो हफ्ते बाद करेगा।

आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुर ने पत्रकार जगेन्द्र सिंह केस में सीबीआई जांच के लिए पीआईएल में सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी कर स्थिति से अवगत कराने के आदेश का स्वागत किया है। उनका कहना है कि मात्र एक स्वतंत्र संस्था द्वारा तफ्तीश ही लोगों के मन में मंत्री और पुलिस की भूमिका के प्रति पर्याप्त विश्वास पैदा कर सकती है। ख़ास कर यदि इस बात पर ध्यान दिया जाए कि जगेन्द्र के आग लगने का एफआईआर उसके मरने के बाद ही दर्ज हो सका था। वह भी तब जब उनके परिवार वालों ने बिना एफआईआर हुए दाह संस्कार करने से साफ़ मना कर दिया था। 

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