
संजय कुमार सिंह
इसलिए कुछ नहीं बदला! संभव है यह भरोसा ईवीएम से हो। हालांकि चरण चुम्बक भी वैसे ही हैं पर उन्हें तो आखिर में बदलना था। समझना मुश्किल है कि सहयोगियों ने गच्चा क्यों नहीं दिया या किस लिये समर्थन कर रहे हैं। बिहार के लिए पैकेज तो छलावा है। नीतिश कुमार अगर 10 साल में साथ रहकर और अलग रहकर, विरोध और समर्थन करके नहीं ले पाये तो अब क्या लेंगे? कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न दिलाने की कीमत दे रहे हैं तो बेशक बहुत ज्यादा है। बताने की जरूरत नहीं है कि उनकी स्थिति जयंत चौधरी से बेहतर है। जयंत का दिल जीता गया था यहां बात बिहार की थी। आडवाणी के समर्थक मोदी का साथ दें तो उसे भी समझा जा सकता है।
आज के सभी अखबारों में विभागों के बंटवारे की खबर लीड है। इससे जाहिर है कि सरकार या नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जिद्द व अहंकार यथावत है। सीटें कम होने का कोई असर नहीं हुआ है। शायद इसलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत को कहना पड़ा है और अमर उजाला ने चार कॉलम में बॉटम बनाया है। इंडियन एक्सप्रेस इसे एंकर लिखता है और यहां यह खबर डबल कॉलम में प्रवचननुमा शीर्षक के साथ है। शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होता, सच्चा सेवक कभी अहंकारी नहीं होता, चुनावों में मर्यादा का पालन नहीं किया गया, आरएसएस प्रमुख भागवत ने रेखांकित किया। अमर उजाला में शीर्षक है, चुनावी बयानबाजी से बाहर निकलें, मणिपुर एक साल से शांति की राह देक रहा…. प्राथमिकता से सुलझायें :भागवत। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर सिंगल कॉलम में है और टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर चार कॉलम में लीड।
यहां जो शीर्षक है वह हिन्दी में कुछ इस तरह होता, “एनडीए के काम इसे वापस लाये, विपक्ष शत्रु नहीं है : भागवत”। इंट्रो है, देश की चुनौतियों पर सहमति बनाने की जरूरत। इस खबर की खास बातें एक बॉक्स में हाईलाइट की हुई हैं और इनमें जो अंश बोल्ड किया गया है वह है – 1. झूठ का उपयोग नहीं किया जाना चाहिये …. एक दूसरे के लिए जिस तरह की आलोचना की गई। 2. आरएसएस जैसे संगठन भी इसमें घसीट लिये गये (यह तो कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए ही हो सकता है)। 3. टेक्नालॉजी की मदद से (ध्रुव राठी के वीडियो प्रोजेक्टर से दिखाये जाने से पूरा परिवार परेशान है वह दिख रहा है) भ्रांति फैलाई गई। 4. वही सरकार वापस आ गई है। 5. इसका मतलब यह नहीं है कि अब हम चुनौतियों से मुक्त हैं 6. मणिपुर की स्थिति पर प्राथमिकता से विचार करना होगा 6. चुनावी आडंबरों से निकलिये और समस्याओं पर ध्यान दीजिये।

अगर आप इसे नहीं पढ़ेंगे और चुनाव से पहले जेपी नड्डा के बहुप्रचारित इंटरव्यू की खास बातों को याद करेंगे तो यही समझेंगे कि संघ और भाजपा अलग-अलग है। जबकि आप इसे चाहे जैसे देखिये, मुझे यह एक अभिभावक की दिखावटी झिड़की से ज्यादा संरक्षण, समर्थन और प्रशंसा दिख रही है। गौर कीजिये कि यह मंत्रिमंडल गठन के साथ कहा गया है और मंत्रिमंडल में जेपी नड्डा शामिल किये गये हैं उन्हें स्वास्थ्य मंत्रालय दिया गया है जो पहले हर्षवर्धन को हटाकर उन्हें सौंपा गया था। अभी वे भाजपा अध्यक्ष भी हैं और अपने पिछले इंटरव्यू में लगभग यही कहा है कि भाजपा को संघ की जरूरत नहीं है। अगर ऐसा होता तो क्या आज इस सलाह की जरूरत थी और मीडिया में इसे इतनी जगह या प्रमुखता मिलती? मुझे लगता है कि यह सब मिली-जुली है। आप इसे जैसे देखिये अब इसका महत्व अगले चुनाव के समय ही होगा। फिलहाल मुझे नहीं लगता कि आरएसएस से भाजपा को नुकसान हुआ है। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश में हार के लिए योगी को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है और यह भी स्मृति ईरानी की हार तय थी।
मैंने चुनाव परिणाम से पहले भाजपा की सीटें कम होने के 30 कारण बताये थे और मेरा अनुमान था कि भाजपा को 240 सीटें आयेंगी और वही आई हैं। अब मंत्रिमंडल विस्तार से नहीं लगता है कि नरेन्द्र मोदी (और पूरी भाजपा तथा संघ परिवार) में कोई अफसोस या चिन्ता अथवा बदलाव आया है। सब यथावत है क्योंकि सीटें भले कम हुई हों भाजपा या नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता कम नहीं हुई है। आपको लगता हो पर उन्हें लगता है ऐसा मानने का मेरे पास कोई कारण नहीं है। इसके अलावा, भाजपा का समर्थन करने वाले पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, एंकरों में कोई कमी नहीं आई है। कोई नहीं कहता कि पहले वह इन कारणों से समर्थन करता था अब नहीं करता या इन कारणों से नहीं करता। ऐसे में भाजपा की सीटें कम होने के दूसरे कारण हो सकते हैं लोकप्रियता उसमें बहुत महत्वपूर्ण नहीं है और हो तो उसे संभाला जा सकता है।
मेरे ऐसा मानने का कारण यह है कि नई दिल्ली ही नहीं, एनसीआर की भी सारी सीटें भाजपा को मिली हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि दिल्ली-एनसीआर की तुलना महाराष्ट्र में मुंबई, कर्नाटक में बैंगलोर, तमिलनाडु में चेन्नई या पश्चिम बंगाल में कोलकाता जैसे महानगरों से नहीं की जा सकती है। दिल्ली के वोटर न सिर्फ पढ़े-लिखे, अच्छा कमाने वाले हैं बल्कि मुफ्त के राशन और रेवड़ी दोनों से मुक्त या युक्त हैं। विधानसभा में भाजपा के खिलाफ वोट देते हैं और लोकसभा में भाजपा को तो इसका मतलब है कि सोच-समझकर देते हैं और इस बार भाजपा को दिया है तो मानना पड़ेगा कि जिन कारणों से सीटें कम हुई हैं वह भाजपा की लोकप्रियता में कमी नहीं है। कोई और कारण हो सकता है। यहां मैं बता दूं कि दिल्ली में मतदान से पहले मित्र हरिजोशी के यूट्यूब चैनल पर मैंने कहा था कि दिल्ली की सातों सीटें भाजपा हारेगी। इसके समर्थन में मेरे अपने कारण थे और मेरा अपना विश्लेषण था। तब एंकर हरि जोशी ने कहा था कि वे उम्मीद करते थे कि मैं कुछ सीटें भाजपा को दूंगा पर मैंने एक भी सीट नहीं दी। तब मैंने मजाक में कहा था कि अगर उल्टा हुआ और सारी सीटें भाजपा जीत गई तो (आरोप लगाने के लिए) ईवीएम है ना!
नतीजा आया तो दिल्ली ही नहीं, एनसीआर की सारी सीटें भाजपा की झोली में गईं। हालांकि 240 सीटों का मेरा अनुमान बिल्कुल सही निकला। तब मैं ईवीएम को दोषी नहीं ठहराता। अपनी गलती स्वीकार करता। मैंने फेसबुक पोस्ट में 20 कारण बताये जिनकी वजह से भाजपा को 40 सीटें ज्यादा आईं और वह राजग के साथ मिलकर सरकार बना पाई। यहां तक तो मामला अनुमान और उसे सही ठहराने का था पर जब प्रधानमंत्री ने कहा कि “…. मैंने पूछा ईवीएम जिन्दा है कि मर गया”। तो मुझे मानना पड़ा कि मामला ईवीएम की गड़बड़ी का हो सकता है और संभव है प्रधानमंत्री में बदलाव नहीं आने का कारण यही हो और इसी कारण उन्हें ईवीएम की चर्चा भी करनी पड़ी हो। जो भी हो, ईवीएम संदेह से परे नहीं है। एनसीआर का परिणाम और प्रधानमंत्री (पूरा संघ परिवार कहना चाहिये) का रवैया इसकी पुष्टि करता है। ऐसे में यह सवाल पूरी गंभीरता से मौजूद है कि प्रधानमंत्री के जिन भाषणों की आलोचना हुई वहां उन्हें उसका लाभ नहीं मिला, दिल्ली में उसका नुकसान नहीं हुआ तो उन्हें परेशान क्यों होना चाहिये या वे क्यों मानें कि उनकी लोकप्रियता कम हुई है। लोकप्रियता या साख अगर कम हुई है तो संवैधानिक संस्थाओं की हुई है, चुनाव आयोग की हुई है और दही चीनी खिलाने से हुई है। उनकी लोकप्रियता तो बढ़ी ही लगती है।
जहां तक अखबारों की बात है, मंत्रिमंडल बंटवारे की खबर वैसे ही छपी है और इसमें प्रचारकों की भूमिका भी नहीं बदली है या पहले की ही तरह है। पहले लीड का शीर्षक देख लेता हूं फिर आज खबरें तथा उनकी प्रस्तुति
1. इंडियन एक्सप्रेस
छह कॉलम में एक शब्द, कांटीन्यू का शीर्षक है। अंग्रेजी के कांटीन्यू शब्द का मतलब है जारी रहना या चलता रहना। इसमें न्यू का मतलब नया होता है इसलिए यहां कांटीन्यू का हिज्जे बदलकर CONTINEW कर दिया गया है जो निरंतर और नया का मेल हो सकता है। बाकी के दो कॉलम में विज्ञापन है।
2. टाइम्स ऑफ इंडिया
बैनर शीर्षक है। प्रधानमंत्री ने खास लोगों को बनाये रखा, शिवराज, खट्टर को शामिल किया। खास बातों को मोदी के पोर्टफोलियो आवंटन को डिकोड करना शीर्षक के तहत अखबार ने लिखा है, सभी प्रमुख मंत्रालय भाजपा के पास रखकर प्रधानमंत्री को किसी को इस भ्रम में नहीं रखा है कि यह गठजोड़ सरकार से ज्यादा मोदी सरकार है। अखबार ने यह भी लिखा है कि कोर टीम में शिवराज चौहान, मनोहर लाल खट्टर, जेपी नड्डा और सीआर पाटिल को प्रमुख मंत्रालयों के साथ शामिल करके मोदी ने अपनी टीम को मजबूत कर लिया है।
3. हिन्दुस्तान टाइम्स
एनडीए 3.0 के लिए टीम बनाने में प्रधानमंत्री मोदी निरंतरता का विकल्प चुना। इसके साथ तीन कॉलम में एक खबर का शीर्षक है, निर्णयों के पहले समूह में कल्याण, किसानों का भुगतान और आवास योजना के घर। इसपर जयराम रमेश ने कुछ कहा है जिसे टेलीग्राफ ने छापा है। उसपर आने से पहले बता दूं कि अमर उजाला ने इसे टॉप पर सात कॉलम में छापा है और हिन्दी में है तो समझने में असुविधा नहीं होगी। इसलिए आगे पढ़िये।
4. द हिन्दू
प्रमुख केंद्रीय मंत्रालयों को चलाने वालों में कोई बदलाव नहीं। लगभग सभी अखबारों ने मंत्रालयों की सूची पहले पन्ने पर छापी है। मुझे लगता है कि आज के समय में यह पहले पन्ने का माल नहीं है। मुझे तो कल शाम राष्ट्रपति भवन से जारी होने के साथ ही मिल गया था। व्हाट्सऐप्प पर सरकारी विज्ञप्ति है तो अखबार में लिस्ट कौन पढ़े जब इसे कभी भी बदल जाना है और पुराना अनुभव बताता है। अखबारों को समय के अनुसार बदलना चाहिये अन्यथा इनका महत्व कम हो रहा है और जरूरत खत्म हो जायेगी।
5. नवोदय टाइम्स
छह कॉलम का शीर्षक है, “बड़े मंत्री वही, कुछ में ही बदलाव”। इसके ठीक नीचे तीन कॉलम का एक शीर्षक है, तीसरे कार्यकाल में मोदी का पहला दिन किसानों के लिये।
6. अमर उजाला
छह कॉलम में लीड है। इसके ऊपर पहला दिन, पहला शो : फ्लैग शीर्षक है, पीएम मोदी ने काम संभालते ही पहले दस्तखत से किसान सम्मान निधि जारी की , दूसरा बुलेट प्वाइंट है – कैबिनेट के पहले निर्णय में पीएम आवास पर मुहर। दो खबरें अलग-अलग हैं। दोनों के शीर्षक भी। एक है, किसानों को 20 हजार करोड़ की किस्त जारी। दूसरा है, गरीबों के लिए बनेंगे तीन करोड़ नये आवास।
7. द टेलीग्राफ
लीड का शीर्षक है, मोदी का जोर भरोसेमंद टीम पर। इसका फ्लैग शीर्षक है, कौर कैबिनेट वैसे ही रखी गई, पुराने दिग्गज पुरस्कृत और साझेदार ‘धर्म’ के इंतजार में। इसके साथ दो कॉलम में जयराम रमेश का कहा छपा है। शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने किसानों के लिए किसान निधि की किस्त संबंधी फाइल लहराई; कांग्रेस ने कहा, यह कोई अहसान नहीं है। अनीता जोशुआ की बाईलाइन और नई दिल्ली डेटलाइन की यह खबर इस प्रकर है, कांग्रेस ने सोमवार को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की तीसरी सरकार के पहले निर्णय की पैकिंग करके नौकरशाही के एक सामान्य कार्य को विकास के एक प्रमुख कार्य और उसके प्रचार में बदलने की कोशिश पर सवाल उठाया। प्रधानमंत्री ने पीएम किसान निधि की 17 वीं किस्त भर जारी की है।
इससे पहले, सरकार ने एक मीडिया विज्ञप्ति और पीएम किसान निधि के तहत धन जारी करने की फाइल पर हस्ताक्षर करते हुए प्रधान मंत्री की तस्वीर जारी की और यह घोषणा की गई कि “नई सरकार का पहला निर्णय किसान कल्याण की सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।” बयान में कहा गया है कि इससे 9.3 करोड़ किसानों को फायदा होगा और करीब 20,000 करोड़ रुपये बांटे जाएंगे। प्रधान मंत्री का हवाला देते हुए, इसमें कहा गया है: “हमारी सरकार पूरी तरह से किसान कल्याण के लिए प्रतिबद्ध है। इसलिए यह उचित है कि कार्यभार संभालने पर हस्ताक्षर की गई पहली फ़ाइल किसान कल्याण से संबंधित है। इसके लिए हम आने वाले समय में किसान और कृषि क्षेत्र में और भी अधिक काम करना चाहते हैं।” प्रधानमंत्री पर कटाक्ष करते हुए, कांग्रेस के प्रभारी जयराम रमेश ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, ”एक तिहाई प्रधानमंत्री ने इस फाइल पर हस्ताक्षर करके किसी पर कोई बड़ा उपकार नहीं किया है: उनकी सरकार की अपनी नीति के अनुसार ये किसानों के वैध अधिकार हैं।” नियमित प्रशासनिक निर्णयों को उन्होंने लोगों को दिए जाने वाले महान उपहार में बदलने की आदत बना ली है, स्पष्ट रूप से, वह अभी भी खुद को जैविक नहीं, बल्कि दैवीय मानते हैं।
कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री और सरकार ही नहीं, मीडिया भी नहीं बदला है। सब वैसे ही हैं। यह अलग बात है कि सरकार ही नहीं बदली तो मीडिया क्यों बदले लेकिन मुझे सबसे ज्यादा आश्चर्य भाजपा के सहयोगियों के व्यवहार से है। वहां कोई नासमझ, नया या कच्चा खिलाड़ी नहीं है। साथ थे तो साथ रहने की मजबूरी समझ में आती है लेकिन मोदी सरकार का समर्थन करते रहना देश विरोध से कम नहीं है। मौका था समर्थन बदलने का, अनुभवी चोर कहकर विरोधियों को परेशान करने वालों को रोकने और सीबीआई-ईडी के डर या प्रभाव से मुक्त अपनी राजनीति खुद खुलकर करने का। लेकिन लोगों ने उसे चुना है। बदले में एक सांसद वाली पार्टी मंत्रिमंडल में है और सपा जैसा बेहतर प्रदर्शन करने वाली पार्टी को अपने सांसदों को अपने साथ बनाये रखने के लिए भारी मेहनत करनी पड़ेगी। दूसरी ओर यह भी स्पष्ट है कि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के लिए करो या मरो की स्थिति है। वे बचने और बचे रहने के लिए कुछ भी कर सकते हैं और सहयोगियों ने उन्हें एक और मौका दिया है। इसलिए झेलना विपक्ष को भी है। बिहार में चुनाव है। उसमें असर भी दिखेगा। भाजपा अगर अपना लक्ष्य हासिल करने में कामयाब हुई तो कौन बचेगा और कौन फंसेगा यह तो समय बतायेगा और देखना दिलचस्प होगा।



