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सुख-दुख

शिमला की पत्रकारीय दुनिया में अब हम जैसे कुछ ही पत्रकार शेष बचे रह गए हैं!

कृष्ण भानु-

शिमला की पत्रकारीय-दुनिया में अब हम जैसे कुछ ही पत्रकार शेष बचे रह गए हैं। हम जैसे से अभिप्राय समकालीन यानी एक उम्र और एक बराबर तेवर के। यही वजह है कि महीने में एक बार मिल लेते हैं और “बैठ” भी लेते हैं। चार-छह घंटे एकसाथ बैठकर अपने युग की पत्रकारिता को याद करके कलेजा ठंडा हो जाता है। गजब की ऑक्सीजन मिलती है जो महीना भर सांसों में खुशबू बिखेरती रहती है।

मैं तो हूं ही हूं। केएस तोमर हैं, शशिकांत शर्मा हैं और विजय पुरी भी दिख जाते हैं। तोमर हिंदुस्तान टाइम्स के राजस्थान में संपादक रहे। हिमाचल प्रदेश पब्लिक सर्विस कमीशन में चेयरमैन भी बने और वहां प्रदेश के युवाओं के हित में अनेक परिवर्तन लाए। शशिकांत शर्मा ट्रिब्यून ग्रुप में प्रधान संवाददाता रहे, फिर गवर्नर आचार्य देवव्रत के एडवाइजर और अब हिमाचल यूनिवर्सिटी शिमला में प्रोफेसर हो गए हैं। इन दिनों जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशंस विभाग में चेयरमैन भी हैं।

विजय पुरी ने दैनिक जागरण से शुरुआत कर, दिव्य हिमाचल से होते हुए, आपका फैसला और हिमाचल दस्तक में उच्च पदों पर रहकर हमारी तरह अपनी पत्रकारीय यात्रा को विराम दिया है। साथ में जगदीश प्रभाकर और चोतानी ने भी पूरा जीवन पत्रकारिता में खपा दिया। सतिंदर कुमार जी भी संगत दे रहे हैं।
जब मुलाकातें होती हैं तो बेहिसाब बातें होती हैं। रिफ्रेश हो जाते हैं।

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