
संजय कुमार सिंह
आज अंग्रेजी के मेरे छह में से पांच अखबारों की लीड एक ही है। सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस ने लीड में दी गई अमेरिका की जानकारी के अतिरिक्त देसी जानकारी दी है। खास बात यह कि जानकारी ऐसी नहीं है जो नई ढूंढ़ी गई है या कहीं छिपी पड़ी थी। यह एक सार्वजनक जानकारी है जो आज सभी अखबारों में होनी चाहिये थी। पर मेरे आठ में से एक ही अखबार ने उसे मौके पर खबर के साथ पेश किया है। दि एशियन एज ने तो मूल खबर को पहले पन्ने पर रखा है पर हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों ने स्थानीय जानकारी जोड़ना तो छोड़िये मूल खबर को ही पहले पन्ने पर नहीं रखा है। द टेलीग्राफ में यह खबर सेकेंड लीड है। खबर आप जानते हैं, अमेरिका ने दावा किया है कि रॉ के पूर्व अधिकारी विकास यादव ने अमेरिका में पन्नू की हत्या की साजिश रची थी। कहने की जरूरत नहीं है कि यह अपने आप में बड़ी खबर है और इसीलिए लगभग सभी अखबारों में लीड है। इंडियन एक्सप्रेस ने इस खबर में अपनी तरफ से अतिरिक्त और नई जानकारी जोड़ी है और सामान्य पत्रकारिता के लिहाज से यह बहुत सामान्य बात है।
इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी अनूठी सूचना के साथ इसे आठ कॉलम में दो लाइन के शीर्षक के साथ छापा है। फ्लैग शीर्षक है, विकास यादव 18 दिसंबर 2023 को गिरफ्तार किया गया था, उसे 22 अप्रैल को जमानत मिली। यह कोई छिपी हुई या गोपनीय जानकारी नहीं है। मीडिया के अपराध संवाददाताओं को मालूम होगी और जब अमेरिका ने उसे मुख्य साजिशकर्ता बताया तो ‘सूत्रों’ ने मीडिया को अलर्ट भी किया होगा। नहीं किया तो काहे के सूत्र और कैसे पत्रकार? पर वह अलग मामला है। आप जानते हैं कि इस कारण विकास यादव को एफबीआई के वांछित लिस्ट में रखा गया है, उसकी फोटो है और ऐसा पहली बार हुआ है। फिर भी खबर में इसे शामिल नहीं किये जाने के और खबर पहले पन्ने पर नहीं होने के अपने-अपने मायने हैं और इसे समझना मुश्किल नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस ने एक्सप्लेन्ड में इसका खामियाजा और संभावित दबावों की भी चर्चा की है पर इस अतिरिक्त तथ्य का आज की खबर में उल्लेख नहीं होना ‘सूत्रों की पत्रकारिता’ की भी पोल खोलता है।
इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार रोहिणी के एक व्यक्ति ने कहा है कि यादव ने उसका अपहरण किया था और यह लॉरेंस बिश्नोई से जुड़ा था। खबर के अनुसार अमेरिका ने गये साल नवंबर में ही विकास यादव को सह साजिशकर्ता (सीसी-1) नामित किया था और इसके तीन हफ्ते से भी कम समय बाद विकास यादव को फिरौती वसूली के एक मामले में गिरफ्तार किया गया था। यह गिरफ्तारी दिल्ली पुलिस के विशेष सेल ने की थी। जाहिर है, विशेष सेल को तो पता ही है कि गिरफ्तारी हुई थी और वह संबंधित संवाददाताओं को भी जानता है आज के समय में यह सूचना देना बेहद आसान है और सूत्र यही काम करते रहे हैं। इस बार सूत्रों ने सूचना नहीं दी तो यह (सरकारी) व्यवस्था है और अखबारों ने नहीं छापा तो प्रेस की आजादी का मामला है जो अब प्रेस को ही नहीं पच रहा है या उपयोग नहीं किया जा रहा है।
हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों – अमर उजाला और नवोदय टाइम्स में आज अमेरिकी आरोप की यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है और उसकी जगह बाल विवाह कानून के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा वह लीड है। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, बाल विवाह कानून में बाधा नहीं बन सकते पर्सनल लॉ : सुप्रीम कोर्ट। उपशशीर्षक है : बचपन में कराये विवाह छीन लेते हैं पसंद का जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, बाल विवाह के कारण जीवनसाथी चुनने का अधिकार छिन जाता है : सुप्रीम कोर्ट। उपशीर्षक है, शीर्ष कोर्ट ने जारी किये दिशा-निर्देश…. केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर इस कुप्रथा को खत्म करें। कहने की जरूरत नहीं है कि बाल विवाह की प्रथा पहले ही गैर कानूनी घोषित है। बहुत कम लोग अब इसपर यकीन करते हैं और उन छोड़े से लोगों के लिए यह फैसला और खबर चाहे जितना महत्वपूर्ण हो, आम लोगों के लिये इसमें कुछ नया नहीं है और ना यह उनकी दिलचस्पी या उपयोग का मुद्दा है। जिस आबादी के बच्चे बड़े हो गये उनके लिए तो यह मुद्दा नहीं है और जिन बच्चों के लिए यह मुद्दा है वे अखबार नहीं पढ़ते होंगे। जो बच्चे अखबार पढ़ते हैं वो जानते हैं कि विवाह की उम्र क्या है और इस संबंध में उनके अधिकार क्या है।
ऐसे में अमेरिका ने जो कहा है वह बाल विवाह पर सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा है उससे ज्यादा मह्त्वपूर्ण, जानने लायक या उत्सुकता पैदा करने वाला है। किसी भी स्थिति में इसे पहले पन्ने पर प्रमुखता से होना चाहिये। यही नहीं, किसी भारतीय नागरिक को एफबीआई द्वारा वांछित बनाना या पहली बार ऐसा होना किसी भी रूप में बड़ी खबर है। और अंग्रेजी अखबारों ने इसे इतनी प्रमुखता दी भी है। नवभारत टाइम्स डॉट कॉम ने शीर्षक में जोड़ा है, जानें क्या कह रहा है अमेरिका। दि एशियन एज ने इस खबर को पहले पन्ने पर दो कॉलम में रखा है। मुख्य शीर्षक है, पन्नू की हत्या की साजिश के आरोप में रॉ एजेंट को दोषी बताया। उपशीर्षक में विदेश मंत्रालय के हवाले से कहा गया है कि वह अब सरकारी कर्मचारी नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है यह सब घिसी पिटी बातें हैं और पहले भी कही गई हैं। जो नई बात कई गई है वह त्रूदो के विपक्षियों की है और सिंगल कॉलम में छपी इस खबर का शीर्षक है, त्रूदो निज्जर का उपयोग ध्यान बांटने के लिए कर रहे हैं। भारत में मोदी और उनके प्रचारकों पर हेडलाइन मैनेजमेंट के आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं।
दि एशियन एज का शीर्षक मोदी के आगे के कार्यक्रम का प्रचार है, रूस के कजान में अगले हफ्ते होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन में मोदी चीनी प्रमुख शी से मिलेंगे। आज कर्मयोगी सप्ताह भी शुरू करने वाले हैं। द टेलीग्राफ में यह खबर सेकेंड लीड है। इसका शीर्षक है, “रॉ के पूर्व अधिकारी की एफबीआई तलाश : हम बर्दाश्त नहीं करेंगे”। खबर में कहा गया है, अमेरिका ने कहा है कि अमेरिका के लोगों को निशाना बनाने और चुप करने की कोशिश बर्दाश्त नहीं की जायेगी। मुझे लगता है कि यह बाद की बात होगी। अभी तो अमेरिका को जो कहना था कह दिया है। और वह खबर है। आप त्रूदो की आलोचना करते रहिये। कहिये कि वे चुनाव जीतने के लिए यह सब कर रहे हैं पर भारत में भी चुनाव चल रहे हैं और जो हालत हैं, जैसे भाजपा जीत रही है और ईवीएम की साख बचाने की जो जरूरत है और उसके लिए जो सब किया जा रहा है उससे संभव है भारत सरकार को भी वैसी ही जरूरत हो। पर मेरा मुद्दा वह नहीं है। अगर यह सब वहां या यहां चुनाव जीतने के लिए ही है तो भी खबर की निष्पक्षता का क्या होगा? जो भी हो, भारत के मेरे अखबारों में अमेरिका के आरोप ही छपे हैं। कनाडा के विपक्ष के तो छोड़िये भारतीय विपक्ष की भी पूछ नहीं है। भारत सरकार का बचाव दमदार नहीं है और इंडियन एक्सप्रेस का मौके पर चौका बता रहा है कि दाल में काला नहीं है, दाल ही काली है। अखबार सिर्फ कागज काला कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया औऱ दि हिन्दू में अमेरिका का आरोप लगभग एक शीर्षक से लीड की औपचारिकता भर है।


