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उत्तर प्रदेश

नोएडा हिंसा में सोशल मीडिया पोस्ट पर FIR; क्या पुलिस आलोचना को अपराध बनाया जा रहा है?

हिमांशु कुमार-

नोएडा में पुलिस की कार्रवाई को अवैध और दमनकारी दिखाने पर यूपी पुलिस ने सोशल मीडिया पेजों पर की एफ़आईआर। यह प्रेस की स्‍वतंत्रता पर सीधा हमला है!

टाइम्स ऑफ़ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स की न्‍यूज़ रिपोर्टों के अनुसार यूपी पुलिस ने नोएडा हिंसा मामले और उस संबंध में पुलिस की कार्रवाई संबंधित सोशल मीडिया पोस्‍ट के सिलसिले में बीएनएस की धारा 353 (लोक रिष्टिकारक वक्‍तव्‍य), 351(1)(b) (आपराधिक अभित्रास), तथा सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम की धारा 66C (पहचान बदलकर धोखाधड़ी) और 66D (पहचान की चोरी) के तहत दो एफ़आईआर दर्ज की गई हैं।

ये एफ़आईआर गौतम बुद्ध नगर के मीडिया सेल के सब-इंस्पेक्टर द्वारा दर्ज की गई हैं जिनमें यह दावा किया गया है कि सोशल मीड‍िया प्लेटफ़ॉर्मों का इस्तेमाल “पुलिस की कार्रवाई के संबंध में धमकी भरी, झूठी और आपत्तिजनक पोस्ट, लेख व संदेश फैलाने” के लिए किया जा रहा था। इन पोस्टों में पुलिस की कार्रवाई को “अवैध, दमनकारी और शोषणकारी” बताया गया है, जिससे जनता के मन में पुलिस और प्रशासन के प्रति अविश्वास पैदा करने की कोशिश की जा रही है।

आगे यह भी दावा किया गया कि इन पोस्टों का उद्देश्य “हिंसा व अशांति को भड़काना और बढ़ावा देना” था। रिपोर्टों के अनुसार, पहली एफ़आईआर में “मज़दूर बिगुल” के फ़ेसबुक पेज और ‘’उससे जुड़े लोगों के पेजों” का नाम लिया गया है, जबकि दूसरी एफ़आईआर एक ऐसे वीडियो के ख़‍िलाफ़ है जिसमें पुलिस का पुराना वीडियो एडिट करके हालिया प्रदर्शनों से जोड़ दिया गया था।

यूपी पुलिस का यह क़दम सीधे तौर पर प्रेस की स्वतंत्रता पर पाबन्दियाँ लगाने वाला है। आइए देखते हैं क्‍यों?

क्योंकि यदि यूपी पुलिस द्वारा इस कार्रवाई के लिए बस यही “आधार” हैं, तब तो इस मामले के तथ्यों को रिपोर्ट करने वाले किसी भी मीडिया संस्थान को “दोषी” ठहराया जा सकता है! इससे पहले ऐसी रिपोर्टें सामने आई थीं कि यूपी पुलिस ने एक्सप्रेस समूह से जुड़े जनसत्‍ता के यूट्यूब चैनल के ख़‍िलाफ़ केवल इस संभावना की रिपोर्टिंग करने पर एफ़आईआर दर्ज की थी कि हिंसा में पुलिस की भूमिका हो सकती है। फिर तो नोएडा मामले के आरोपियों पर हिरासत में हिंसा के बारे में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई की रिपोर्टिंग करना, पुलिस हिरासत में हिंसा के बारे में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को प्रकाशित करना, या अदालत के सामने आरोपियों द्वारा लगाए गए आरोपों को सामने लाना भी “लोक व्यवस्था के लिए खतरा” माना जा सकता है।

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