यशवंत सिंह-
जनसत्ता और आजतक जैसे प्रतिष्ठित मीडिया ब्रांड्स में वरिष्ठ पदों पर रहे संजय सिन्हा के फेसबुक परिवार का जब पहली बार मिलन समारोह हुआ तो मुझे लगा एक दो बार होगा फिर ये बंद हो जाएगा। लेकिन सिलसिला रुका नहीं। हर साल कारवां बढ़ता गया। नए-नए लोग जुड़ते गए। प्रेम और रिश्ते जैसे शब्द फोकस में रहते। क्रूर से क्रूरतम होती जाती दुनिया में बढ़ते अवसाद और अकेलेपन से मुक़ाबिल होने का एक अत्याधुनिक हथियार का ईजाद कर चुके थे संजय सिन्हा।
अपनी एक्सटेंडेड फ़ैमिली के माध्यम से उन्होंने दिखाया कि यूँ भी जिया जाता है। सामाजिक शोधकर्ताओं के लिए एक टॉपिक है ये संजय सिन्हा का एफबी परिवार। मैं भी एक लेंस लेकर गया था हरदोई। जांचने। कोई कमी और दुर्गुण ढूँढने। साथ में श्रीमती जो को भी ले लिया ताकि जासूस का बाना मुकम्मल हो, कोई तनिक भी शक न करे। पर ये क्या? मेरा तो हृदय परिवर्तन हो गया। संजय सिन्हा एफबी फैमिली के प्यार और सर्वोदय आश्रम के तप का कुछ ऐसा काकटेल बना कि उसका हैंगओवर अभी तक है।
विनोबा भावे और ओशो रजनीश को आपस में मिक्स कर दिया जाये तो जो प्रोडक्ट निर्मित होता है, उसी अवतार का विस्तार मैं सर्वोदय आश्रम में दो दिन तक जीता रहा।
मैं कहना चाहता हूँ, मुझे वो फार्मूला मिल गया जो एसएसएफबी फैमिली (संजय सिन्हा फेसबुक परिवार) को एक धागे में बांधे है। वो है- ट्रस्ट। भरोसा। संजय सिन्हा पर सबको भरोसा है। महिलायें जल्दी किसी पर विश्वास नहीं करतीं। उनके पास कई किस्म के सेंसर और सेंसेज होते हैं। लेकिन संजय सिन्हा पर सब आँख मूँदकर ट्रस्ट करती हैं। इसी भरोसे पर दूर देश से अकेले अकेले चली आई कई महिलायें। इनने गले मिल रोने और रैंप वॉक करने जैसे दो छोरों को एक साथ एक ही जगह जिया। चूड़ी पहनने, मेहंदी लगाने, ढोलक बजाकर गाने जैसे कार्यक्रम देखकर मैं सोचने लगा- क्या हम प्रगति और विकास की आंधी में उड़कर सांस्कृतिक रूप से ठूँठ हो चुके हैं जिसके पास हँसने गाने खिलखिलाने का कोई बहाना नहीं बचा है?
फिर कह रहा हूँ, समाज विज्ञानियों के लिए शोध का विषय है संजय सिन्हा फ़ेसबुक फ़ैमिली!
हम पर कोई क्यों भरोसा करे, ये बड़ा सवाल है। संजय सिन्हा ने वर्षों की तपस्या से विश्वास अर्जित किया है। उन्होंने स्त्रियों पुरुषों के दिल को छुआ है। उनके मन की गांठों को खोला है। जीवन में वैल्यूज को एड किया है। ये मुश्किल काम है। फटाफट वाले युग में अब कौन ये सब करता है। अपना वक्त, एनर्जी, पैसा सब कौन दूसरों पर बर्बाद करता है। पर संजय सिन्हा ऐसे ही हैं। उनका विस्तारित परिवार अब नए किस्म के विस्तार के मुहाने पर है। मैंने इसके बारे में मंच से थोड़ा बोला भी था। इसे अब शेप देना चाहिए। इसके स्टेट चैप्टर्स की शुरुआत करें, एफएमसीजी कंपनियों से स्पॉन्सरशिप लें। फण्ड इकट्ठा कर ssfb Family हेडक्वार्टर निर्मित करें जहाँ उत्सव 24×7 हो, साल के किसी एक दो दिन का मोहताज नहीं!


चित्र में अपनी और मेरी मेहरारू के साथ Sanjay Sinha जी!
शुक्रिया हरदोई!
मेरे लिए ssfb Family के दो दिनी मीट में शामिल होना रिश्तों की पाठशाला में एक शिशु छात्र के कौतुक मन के साथ हिस्सा लेने जैसा रहा। सीखने बदलने की कोई उम्र नहीं होती और यह स्वीकार करता हूँ कि मैं रिश्ता बनाने, उसे समझने पकड़ने जीने के मामले में बहुत कच्चा हूँ। अब जब सब कुछ ठहरकर देख सोच रहा हूँ तो लगता है जीवन में रिश्तों का होना, उसे जीना, एक वृहद परिवार का हिस्सा होना मनुष्य के लिए बहुत ज़रूरी है अन्यथा वो ग़ज़ल है न… तन्हा तन्हा मत सोचा कर, मर जाएगा, मत सोचा कर!
Sanjay Sinha को मैं अब तक एक संवेदनशील वरिष्ठ पत्रकार के रूप में जानता था लेकिन उनके विशाल परिवार में शामिल होकर उनके व्यक्तित्व के कई अद्भुत पहलुओं का पता चला। एक ऐसा व्यक्ति जो प्रेम स्नेह के एक धागे से पूरे जमाने को बाँध ले और उनकी नेगेटिविटी ख़त्म कर उन्हें सहज सरल होने के लिए प्रेरित करते करते गाने नाचने का रास्ता दिखा दे।
महिलाएँ सिक्स्थ सेंस रखती हैं। वे किसी नए माहौल में जल्दी सहज नहीं होतीं। पर संजय सिन्हा जी के इस आयोजन की जान और कमान ही महिलायें हैं।
अपने अनुभव को विस्तार से लिखूँगा। मुझे कुछ सेकंड ऐसा लगा जैसे विपश्यना के किसी एक्सटेंशन प्रोग्राम में शामिल हूँ और सिखाया जा रहा है – काहे दिल आत्मा हाथ पैर सब बाँधे सिकोड़े हो, खुलो और बहो! विपश्यना में साँसों पर ध्यान देते हैं, संजय सिन्हा फेसबुक फ़ैमिली मीट में प्रेम पर ध्यान दिया जाता है! मुक्ति तो प्रेम भरी साँसों का अनुसंधान माँगती है!

गुड मॉर्निंग हरदोई!
कल देश भर से आए Sanjay Sinha फेसबुक परिवार के लोग आपस में मिले। परिचय हुआ। खाना खाया। महिलाओं ने चूड़ियाँ पहनीं, मेहंदी लगाई, ढोलक पर गीत गाकर नृत्य किया। फिर मंच का कार्यक्रम शुरू हुआ तो फर्स्ट टाइम शिरकत करने वालों का परिचय हुआ। गाना और नृत्य हुआ। इस सबके बीच फोटोबाजी और हँसी-ख़ुशी का न रुकने वाला सिलसिला चलता रहा। तस्वीर में संजय सिन्हा जी के अलावा Manu Laxmi Mishra जी हैं जो अपने दौर की पीसीएस टॉपर हैं लेकिन इन्होंने एसडीएम डीएसपी चुनने की बजाय जीवन में शांति क़ायम रखने के लिए वित्त/ लेखा / ट्रेजरी का फील्ड चुना और अभी मेरठ में तैनात हैं।



आज 14 दिसम्बर को ssfb Family का मुख्य प्रोग्राम है। आज मुझे भी गाना सुनाना है। बहुत सारे मनोरंजक कंप्टीशन है। फुल डे मस्ती!
हरदोई पहुँच गया। Sanjay Sinha जी के फेसबुक परिवार का मिलन समारोह है। ये 13वाँ वार्षिक आयोजन है। मतलब पिछले बारह साल से हर साल किसी न किसी शहर में संजय सिन्हा फेसबुक फैमिली का जुटान हो रहा है। देश के कोने से लोग आते हैं। गाते हैं। नाचते हैं। अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करते हैं। अब तक मैं इस आयोजन के बारे में पढ़ता रहा हूँ। लेकिन इस बार हिस्सा बनने का फ़ैसला किया। मुझे जानना है कि आख़िर संजय सिन्हा जी के पास वो कौन सा केमिकल है जिसके चलते इतना बड़ा परिवार आपस में कनेक्ट है, ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों फॉर्म में!
हरदोई स्टेशन पर उतरते ही Rakesh Pandey जी पूरी टीम के साथ स्वागत के लिए मुस्तैद मिले। शुक्रिया भाई लोगों..

श्रीमती जी मुझसे पूछ रही हैं कि ये कैसा कार्यक्रम है, कौन कराता है, किसलिए होता है?
मैंने कहा- “यही सब जानने तो मैं भी आया हूँ!”
तो चलिए इस अनोखे परिवार का हिस्सा बनकर प्यार के किस्से को समझते-बूझते हैं!
नफ़रत घृणा लालच हिंसा असुरक्षा के इस दौर में प्यार भरे सहज सरल जीवन का मंत्रोच्चार करते हैं!



