प्रवीण झा-
भाषाविद् पेगी मोहन अपनी पुस्तक में भारोपीय भाषाओं में retroflex ध्वनियों की अनुपस्थिति पर लिखती हैं। यानी वह ध्वनियाँ जिसमें जीभ को घुमा कर तालु या मूर्धा के निकट लाया जाए। जैसे टवर्ग के स्वर, तालव्य और मूर्धन्य स्वर। उनके अनुसार ये स्वर इन भाषाओं में द्रविड़ भाषाओं से आए। यह किंचित संभव है कि भाषाई आर्यावर्त या उत्तर भारत के दोआब में देश को देस ही कहा जाता रहा हो और आज भी कहा जाता है। अभिज्ञान शांकुतलम की शकुंतला भी स्वयं को सकुंतला कहती मिल सकती हैं।
बिहार की नेटिव भाषा खड़ी बोली (हिंदी) नहीं है। मैंने हिंदी छह वर्ष की उम्र के बाद स्कूल में ‘सीखनी’ शुरू की। मैं अक्सर कहता- ‘तुम यहाँ बैसो’ (बैठो नहीं)। मैथिली में बैस ही शब्द है, जो बैठ से मिलता-जुलता है, तो ‘ठ’ प्राकृतिक रूप से नहीं आया। फिर जैसे-जैसे घर और स्कूल के माहौल में संस्कृत और हिंदी से परिचय होता गया, श, ष, ड़, ण आदि के उच्चारण सीखने शुरू किए। सनद रहे कि यह बाल्य-काल बीतने के बाद का प्रशिक्षण है। यह सही है कि तमिलभाषी के हिंदी उच्चारण से तुलना नहीं की जा सकती, लेकिन नॉन-नेटिव स्पीकर कहा ही जा सकता है। ‘देख रहे हो, बिनोद!’ (विनोद नहीं)। हिंदी प्रशिक्षित होने के बाद भी मैं घर पर बिनोद, बिसाखा आदि ही बोलता हूँ, क्योंकि मैथिली में यह ऐसे ही उच्चारण किया जाना चाहिए।
जब एक पंजाबी भाषी भी आपस में बादशाह को ‘पादशाह, भाई को ‘पाई कहें, तो यह भी उचित है। उन्होंने भी हिंदी स्कूल में जाकर सीखी।
भाषा सीखने के क्रम में उच्चारण सीखते रहना चाहिए। मैंने बाद में ळ उच्चारण सीखा, ø, æ उच्चारण सीखा। लेकिन ये स्वाभाविक नहीं, अर्जित उच्चारण हैं जो प्रयास से सीखे गए।
मैं एनआरआई बच्चों को महाप्राण स्वरों जैसे छ और झ बोलने में दिक्कत देखता हूँ। वे छोटे को ‘चोटे’ कहते हैं। यही बात द्रविड़ भाषाओं में मिलती है, जहाँ ये स्वर नहीं होते। वे खाना को काना कहते हैं। स्पैनिश भाषी अंग्रेज़ी बोलते समय टेस्टी को ‘तेस्ती’ कहते हैं, क्योंकि अंग्रेज़ी का retroflex ‘ट’ भी मुख्य यूरोपीय भाषा में कम है।
खड़ी बोली भाषियों को भी अंचलों के दीर्घ स्वर बोलने में दिक्कत आ सकती है, जैसे ‘सुनs’ को वे ‘सुन’ कहेंगे। ‘बोलs’ को वे बोल कहेंगे। तेलुगु में भी ‘ए’ स्वर का भी दीर्घ स्वर होता है (ऐ से अलग)। बिहार में महाप्राण का भी प्रचुर प्रयोग है। ‘छ’ और ‘झ’ ध्वनियों में ह स्वर पारंपरिक हिंदी से दीर्घ मिल सकता है।
सारांश यह है कि तमिलों के ‘खाना’ को ‘काना’ कहना, बंगाल के लोगों का विश्वास को ‘बिस्वास’ कहना, पंजाब के लोगों का भाई को पाई कहना, या बिहार के लोगों का अशोक को असोक कहने के पीछे अ-हिंदी भाषाओं और संस्कृति का भाषा-विज्ञान है।
इसमें ख़ामख़ा नहीं पड़ना चाहिए कि फलाना भाषा की ध्वनियाँ अधिक समृद्ध है, फलाने अमुक स्वर नहीं कह पाते।
प्रवीण झा के पोस्ट पर आए कुछ कमेंट्स भी पढ़ें…
देवप्रिय अवस्थी-
उच्चारण पर आंचलिक प्रभाव सामान्य बात है. कई बार तो हमें व्यक्ति विशेष के उच्चारण से ही उसकी पृष्ठभूमि का पता चल जाता है. सही या गलत उच्चारण भाषाविदों का शगल है. भाषा का काम संप्रेषण है. अगर वह सध रहा है तो उच्चारण को लेकर नाहक नाक-भौं सिकोड़ना व्यर्थ है.
साकेत बिहारी पाण्डेय-
बिहार से मैं भी हूं। एकाध महीना लगा ठीक करने में मुझे। और कई लोग तो प्रोफेसर होने के बाद भी ठीक नहीं कर पाए। जहाँ तक लोकल एक्सेंट की बात है इसे इतने लंबे चौड़े तहरीर से डिफेंड करने की कोई आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता है सुधार करने की। ऐसा नहीं है कि ये केवल ड़ को र और ष को स बोलते हैं। बिहारी लोग ड़ को र और र को ड़ बोलते हैं। र को ल भी बोलते हैं। बोलते सभी ध्वनियाँ हैं लेकिन उलट पलट करके। तीनों स’कार के उच्चारण की समस्या केवल बिहार में नहीं है।
यह लगभग सभी लोकभाषाओं में है। जिन्हें सीखना होता है वो सीख लेते हैं।
Avaneesh Kumar Singh-
अपने पास ज्यादा ध्वनि उच्चारण क्षमता है इससे खुश होने में कोई हर्जा नहीं है, किसी को नीचा दिखाने में है।
किरन राजपुरोहित-
स्थानीयता हर भाषा व बोली की अपनी विशेषता है। होनी भी चाहिए। राजस्थानीयों के उच्चारण में यही सुगंध है। वैसे अमीर खुसरो ने कहा था कि मध्य भारत (तत्कालीन मारवाड़, आज राजस्थान) ऐसा प्रदेश है जो हर तरह की ध्वनि को शुद्ध उच्चारित कर सकता है। बाक़ी की सीमाएं हैं।
विश्वजीत पाण्डेय-
मुझे लगता है इस पर ज़्यादा जोर जबरदस्ती न हो और न हो किसी के अंदर इसे ग़लत बोलने वाले के प्रति हीन भावना। बाक़ी अगर व्यक्ति हिंदी भाषा को लेकर एक सॉफ्ट कॉर्नर रखता है तो उसे अपनी हिंदी को सुधारने के लिए कोई कोताही भी नहीं बरतनी चाहिए।
बिहार वालों को जिस प्रकार श ष स सीखने में संघर्ष करना पड़ता है उससे ज्यादा किसी वस्तु को लिंग निर्णय करने और बोलने में होता है। मेरा मानना है इसे सुधारा जा सकता है… इवेन मैं भी इसका भुगतभोगी हूँ।
Rajiv Kumar-
बंगाली लोग विश्वास को बिस्वास नहीं “बिस्सास” कहते है.. क्योंकि बंगला में “व” शब्द नहीं है.. इसी लिए पहला वि को बि और दूसरे वा को आ उच्चारित करते है..
अरविंद कुमार-
पोस्ट पढ़के यही समझ आया कि दुनिया में कोई कुछ भी लिख सकता है और कुछ भी साबित कर सकता है।



