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सियासत

हड़तालें असुविधा नहीं, सवाल हैं—जो मीडिया और सरकार को चुभते हैं!

मनोज अभिज्ञान-

ब कोई मज़दूर अपने औज़ार रख देता है, कोई शिक्षक अपनी कलम नीचे रखता है, कोई डॉक्टर अपना स्टेथोस्कोप टांग देता है और कोई किसान हल छोड़कर झंडा उठा लेता है—तो यह अव्यवस्था नहीं होती, बल्कि सामाजिक चेतना का उभार होता है। यह वह क्षण होता है जब उत्पादन की नींव हिलती है और व्यवस्था के चेहरे से पर्दा हटने लगता है। लेकिन मुख्यधारा का मीडिया इन क्षणों को कैसे देखता है? वह इन्हें अराजकता, राष्ट्रविरोध, असुविधा और राजनीतिक साज़िश के चश्मे से देखता है। सवाल उठता है—क्यों?

क्यों जब हज़ारों की संख्या में लोग सड़कों पर निकलते हैं, तब कैमरे सिर्फ ट्रैफिक जाम दिखाते हैं? क्यों जब शिक्षकों की आवाज़ बुलंद होती है, तो न्यूज़ एंकर कहते हैं— बच्चों की पढ़ाई बाधित हो रही है? क्यों जब कोई मज़दूर हक़ की बात करता है, तो मीडिया उसे राजनीतिक कठपुतली बताने लगता है? इसका कारण यह है कि मीडिया निष्पक्ष सूचना माध्यम नहीं, बल्कि पूंजी की विचारधारा का उपकरण होता है।

हड़ताल महज़ काम रोकना नहीं होती। यह इतिहास के उस मोड़ पर लिया गया निर्णय होता है जब मेहनतकश वर्ग यह ऐलान करता है कि उसका श्रम अब मूक नहीं रहेगा। यह घोषणा होती है कि उत्पादन की रीढ़ मजदूर है, और वह चाहे तो पूरी अर्थव्यवस्था को रोक सकता है। यह चेतावनी होती है कि व्यवस्था में शामिल नहीं किया गया हिस्सा अब मूकदर्शक नहीं रहेगा।

लेकिन मीडिया की निगाह में यह संघर्ष नहीं, व्यवधान होता है। उसका कैमरा प्रदर्शनकारियों के नारों को नहीं, सड़कों पर लगे जाम को दिखाता है। वह श्रमिकों की पीड़ा नहीं, यात्रियों की परेशानी दिखाता है। वह यह नहीं कहता कि कोई ठेके पर काम कर रहा शिक्षक वेतन के इंतज़ार में वर्षों से जूझ रहा है; वह यह नहीं कहता कि मजदूर मशीन से तेज़ दौड़ने को मजबूर है; वह यह नहीं दिखाता कि कोई किसान तीन फसलें उगाकर भी कर्ज़ में डूबा हुआ है।

इसके बजाय, वह हेडलाइन बनाता है—जनजीवन अस्त-व्यस्त, यात्री बेहाल, पढ़ाई पर असर, सरकार सख्ती से निपटेगी। ऐसी भाषा में हड़ताल को अपराध की तरह प्रस्तुत किया जाता है। मज़दूर का चेहरा ग़ायब रहता है, शिक्षक की थकी आँखें नहीं दिखाई जातीं, डॉक्टर की बेचैनी नहीं दिखती—दिखती है बस सत्ता की दृष्टि, पूंजी की चिंता।

मीडिया मालिकाना ढांचे से भी जुड़ा होता है। भारत में अधिकांश न्यूज़ चैनल और अख़बार उन पूंजीपतियों के पास हैं जिनका सीधा संबंध उद्योगों, कंपनियों और कॉरपोरेट पूंजी से है। जब एक ही व्यक्ति किसी चैनल का मालिक भी हो और सैकड़ों श्रमिकों का भी, तो उससे यह उम्मीद करना कि वह श्रमिकों की आवाज़ को मंच देगा, भ्रम है। वह तो हड़ताल से डरेगा ही, क्योंकि वह जानता है कि अगर मज़दूर जाग गया, तो उसका मुनाफ़ा घट जाएगा।

यही कारण है कि मीडिया हड़ताल को ‘राजनीतिक साज़िश’ कहता है, मानो कोई मज़दूर अपने बच्चों की फीस, दवाओं, मकान के किराए और राशन की महंगाई से नहीं, बल्कि किसी पार्टी के कहने पर काम छोड़ता हो। यह सीसोची-समझी रणनीति है—हड़ताल के नैतिक और आर्थिक पक्ष को मिटाकर उसे राजनीतिक रंग देना, ताकि आम जनता उसे संदेह की निगाह से देखने लगे।

मीडिया का एक और हथियार है ‘असुविधा’ का नैरेटिव। वह हर बार यह बताता है कि हड़ताल से जनता परेशान हो रही है। लेकिन यह कभी नहीं बताता कि वे कौन लोग हैं जो हड़ताल करने को मजबूर हुए; कभी यह नहीं बताता कि एक महिला सफाईकर्मी न्यूनतम वेतन में सुबह से शाम तक काम करके भी बच्चों की पढ़ाई नहीं चला पा रही है; कभी नहीं बताता कि एक अस्थाई शिक्षक को हर साल नौकरी के लिए संघर्ष करना पड़ता है। मीडिया को जनता की परेशानी तब दिखती है जब जनता प्रतिरोध करती है, लेकिन जब वह शोषित होती है, तब वह अदृश्य हो जाती है।

असल में, मीडिया हड़ताल से इसलिए डरता है क्योंकि वह व्यवस्था के उस झूठ को उजागर करती है जिसमें मालिक को उत्पादन का केंद्र बताया जाता है। हड़ताल इस भ्रम को तोड़ती है कि बिना मालिक के काम रुक जाएगा; वह दिखाती है कि असल में श्रमिक ही समाज को चलाता है। वह चेतना का विस्फोट होती है, जो कहती है कि कोई भी व्यवस्था अनंत काल तक शोषण के बल पर नहीं चल सकती।

मीडिया, जो अब सत्ता और पूंजी का वैचारिक अंग बन चुका है, उस चुनौती को बर्दाश्त नहीं कर पाता। वह इसीलिए हड़ताल को अराजक, ग़लत, बेकार घोषित करता है। वह इसे अपराध साबित करने में जुट जाता है।

इस हालत में ज़रूरत है वैकल्पिक जनमाध्यमों की—ऐसे मीडिया की जो श्रमिक की आँखों से दुनिया को देखे, जो डॉक्टर की हड़ताल को उसका नैतिक प्रतिरोध माने, जो किसान के झंडे को उसकी पीड़ा की आवाज़ समझे, जो शिक्षक की कलम को उसकी बेबसी नहीं, उसकी चेतना का प्रतीक माने। लेखक, छात्र, बेरोज़गार, कलाकार, किसान—सभी को मिलकर ऐसा प्लेटफ़ॉर्म तैयार करना होगा जो पूंजी की भाषा नहीं, मेहनतकश की जुबान बोले।

आज मीडिया का कैमरा सत्ता के आदेशों पर तैनात है। वह वही दिखाता है जो उसे दिखाने की अनुमति है। लेकिन वह दिन भी आना चाहिए जब यह कैमरा उन श्रमिकों की उंगलियों की थकान दिखाए, उन शिक्षकों की अधूरी पगार की कहानी कहे, उन किसानों की जलती पीठ को दर्ज करे, और उन बेरोज़गार युवाओं की अनिश्चितता को समाज के समक्ष प्रस्तुत करे।

हड़तालें व्यवस्था की परीक्षा होती हैं। वे चेतना की गूंज होती हैं। मीडिया बार-बार इस चेतना को दिखा पाने की परीक्षा में विफल होता रहा है। अब ज़िम्मेदारी समाज की है कि वह इस विफलता के विरुद्ध एक नई आवाज़ गढ़े—एक ऐसा माध्यम जो झूठ नहीं, सच बोले—even if that truth disturbs the peace of the privileged. यह समझना ज़रूरी है कि हड़तालें सिर्फ माँगों की सूची नहीं होतीं, वे भविष्य की झलक होती हैं—ऐसी सुबह की आहट, जहाँ श्रमिक की थकी उंगलियाँ समाज की धड़कन तय करेंगी, जहाँ कलम और हल, औज़ार और आवाज़—सब एक सुर में बोलेंगे। जब कैमरे का लेंस पूंजी की खिड़की से हटकर जनता की आँखों से देखना सीखेगा, तब खबरें नारे बनेंगी, और हेडलाइनों में आँकड़े नहीं, इंसानों की कराह सुनाई देगी।

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