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इंटरव्यू

दृष्टांत मीडिया के वीकली कार्यक्रम ‘‘जवाब चाहिए’’ में अबकी सुलखान सिंह : आईएएस टॉप करने वाले जावेद उस्मानी की फोटो देख सिविल सर्विस का एग्जाम दिया!

बैठ गया है कानून-व्यवस्था का हाथी : सुलखान सिंह
बांदा जैसे पठारी जिले के अपेक्षाकृत काफी बड़े गांव जौहरपुर का एक दस साल का साधारण सा लड़का भौगोलिक व सामाजिक परिस्थितियों के मद्देनजर सपना देखता है शरीर पर वर्दी व कंधे पर स्टार का। यह वह दौर था, जब दुर्दांत दस्युओं के डर से सूर्य देव के अपने घर जाने के पहले ही अपने घर के अंदर दुबक जाते थे लाखों लोग। इतना ही नहीं, रात में घोड़े बेचकर सोने के बजाय ज्यादा ध्यान बाहर की आहट पर ही केंद्रित रहता था।

बात हो रही है उत्तर प्रदेश जैसे बड़े सूबे के पूर्व डीजीपी आईआईटी रुड़की व दिल्ली से बीटेक एवं एमटेक करने के बाद देश की सबसे बड़ी परीक्षा यूपीएससी पास कर महज 23 साल की उम्र में 1980 में आईपीएस बने सुलखान सिंह की। इनके हौसले के साथ पिता लाखन सिंह की स¨च को भी सैल्यूट बनता है, जिन्होंने कम आमदनी के बावजूद एक किसान होकर उस दौर में बीटेक व एमटेक कराया। बांदा की पठारी मिट्टी की बात है कि खेती चाहे जितनी हो, पर पैदा चना व सरसों के अलावा खास कुछ नहीं होता है। कभी-कभी तो साल में एक ही फसल ले पाते हैं यहां के किसान क्योंकि सिंचाई के साधन की बहुत कमी है। इससे पहले प्राथमिक शिक्षा गांव से हुई और हाईस्कूल ब्लॉक स्तर तिंदवारी व माध्यमिक तक जिला मुख्यालय में की। होनहार बिरवान के होत चीकने पात देखकर फिर आगे का रास्ता बनता चला गया। निवेश चाहे बाजार में हो या व्यापार में या फिर परिवार में, हमेशा नतीजे देखकर के ही करने की समाज में परंपरा सी रही है। फिर क्या था, पिता ने त्याग और तपस्या की अवधि बढ़ा दी। चार भाइयों में सबसे बड़े अपने लाडले बेटे के आगे बढ़ाने के लिए और बेटे ने भी न कभी निराश किया और न ही पीछे मुड़कर देखा?

दृष्टांत मीडिया के वीकली कार्यक्रम ‘‘जवाब चाहिए’’ में आईआईएम के निकट स्टूडियो आए पूर्व डीजीपी ने अपनी जिंदगी के कुछ अनछुए पहलुओं के भी छुआ और तकरीबन सभी मुद्दे पर बेबाक और बेखौफ बोले। लंबे अर्से से बेबाकी ही उनकी यूएसपी रही है। न कुछ पाने की ललक और न कुछ जाने का डर। इससे परे होकर बांदा का यह बेखौफ बंदा मुख्यमंत्री, नियुक्ति, एनकाउंटर, विभागीय भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था और बुंदेलखंड पर 67 साल की उम्र में भी शेर की तरह दहाड़ा। निम्न मध्यम वर्गीय परिवार से निकलकर एक शख्स डीजीपी तक का सफर तय करता है तो निश्चित तौर पर इसे अगन और लगन का नतीजा ही कहा जाएगा। ईमानदारी लाजवाब और कुछ कर गुजरने की तमन्ना भी लाजवाब। रिटायरमेंट के बाद राजनीति में कदम रख अपनी माटी के लिए कुछ करने के लिए सोचा और बुंदेलखंड लोकतांत्रिक पार्टी का भी गठन किया।

देखें सुलखान सिंह का पूरा इंटरव्यू :

सुलखान सिंह बोले कि दर्जा आठ तक पढ़ाई गांव के ही सरकारी जूनियर हाईस्कूल में की। स्कूल में बिल्डिंग भी नहीं थी। बाबा बजरंगबली के चबूतरे में बैठकर पढ़ाई की थी। शिक्षकों की मेहनत और फर्ज के प्रति ईमानदारी बेमिसाल थी। कई मायनों में वह पिता से बढ़कर थे। पिता खुद जाकर बोल आते थे कि ठोके-पीटे रहना और फिर खूब सुताई होती थी। इसी का नतीजा था कि सिर्फ वही पढ़ने आते थे, जो पढ़ना चाहते थे। गांव से ब्लाक, फिर बांदा होते हुए रुड़की पहुंचे, फिर आईआईटी दिल्ली।

पहले अटेम्ट में आईपीएस बनने का श्रेय वह बेसिक, जूनियर, हाईस्कूल और इंटर की पढ़ाई को देते रहे हैं, क्योंकि उन शिक्षकों ने गणित व विज्ञान आदि में जो कुछ सिखा दिया था, वह आज रिटायर होने के बाद भी ताजा है। उन शिक्षकों को आज भी याद करता हूं और पिटाई पर मुस्कुराता हूं। आईआईटी पहुंचे तब भी किसी तरह की कहीं कोई कमजोरी या कांप्लेक्स के चक्कर में नहीं पड़े। अपनी धुन में लगे रहे। टेक्नोक्रेसी के जरिये ब्यूरोक्रेसी के सफर पर निकलने के बारे में उन्होंने कहा कि बीई थर्ड ईयर तक तो बहुत कुछ जानते भी नहीं थे और न ही कोई रुचि थी। यह इमरजेंसी का दौर था। उसी दौरान 1978 में जावेद उस्मानी ने आईएएस में टॉप किया था तो उनकी तस्वीर अखबारों से लेकर कंपटीशन की पुस्तकों तक छाई हुई थी। कंपटीशन सक्सेस रिव्यू में तस्वीर देख दोस्तों में चर्चा हुई कि हम लोग को भी सिविल सर्विसेस में कंपीट करना चाहिए और पब्लिक सर्विस करनी चाहिए। उसी साल इंजीनियरिंग का एग्जाम दिया तो रेलवे मिला और फिर आईपीएस।

इंजीनियरिंग में एडमिशन के सवाल पर कहा कि हम बहुत पिछड़े इलाके से हैं। एक मित्र पुराना प्रोस्पेक्टस कहीं से उठा लाए थे, जिसे देख अप्लाई कर दिया था। हो गया तो फिर बात आगे बढ़ गई। न कोई बताने वाला था और न ही यूपीएससी के बारे में कोई गाइड करने वाला। सफलता का श्रेय वह माता-पिता व गुरुजनों की मेहनत के अलावा धर्मपत्नी को भी देते हैं, क्योंकि इंटर का एग्जाम देने के बाद ही शादी हो गई थी और फिर तुरंत बाद इंजीनियरिंग के लिए रुड़की चला गया था। इसलिए कहा जा सकता है कि कुछ उनके भी भाग्य का फायदा मिला। सियासी दल बनाने की बात पर कहते हैं कि गांव में तो कमोबेश सारे लोग हमारे जैसे ही दिखते थे, पर पढ़ाई के सिलसिले में जब बांदा की दुनिया से आगे निकल कर रुड़की, मेरठ, मुजफरनगर और दिल्ली पहुंचे व घूमे तो देखा कि विकास किसे कहते हैं? यहां का विकास बांदा के विकास से कहीं आगे था और कुछ-कुछ मेल खाता था पूर्व प्रधानमंत्रियों के भाषण से। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कृषि, बाजार व व्यापार देखा तब पता चला कि कहां प्रदेश का यह कोना और कहां हमारा बुंदेलखंड? 50 साल में बुंदेलखंड और पीछे चला गया है। देश आजाद होता है। बंटवारा होता है। देश में भीषण रक्तपात होता है।

पं. जवाहरलाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बनते हैं और लाल किला के प्राचीर से नारा देते हैं कि देश को विकास के रास्ते पर लेकर जाऊंगा। तरह-तरह की योजनाएं बनाई जाती हैं, पर उनका कोई खास सीधा लाभ बुंदेलखंड को नहीं मिला। वह पीछे कैसे छूट गया, इसके बारे में जवाबदेही किसकी है? इसके लिए शत-प्रतिशत दोनों राज्य के नेता ही जिम्मेदार हैं। 1956 तक सब ठीक था। बुंदेलखंड खुद एक राज्य था, पर जब से राज्य पुनर्गठन आयोग बना और राजा चरखारी व पं. नेहरू की किसी बात पर अनबन हुई, तब से ही बुरा दौर शुरू हो गया था। इसे मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश में आधा-आधा बांट दिया गया, तब से हालात ज्यादा खराब हो गए हैं। इसी बात का सर्वाधिक फायदा दस्युओं ने उठाया। बाद में जब एक होकर समन्वय के साथ कार्रवाई की गई, तब सफलता मिली। उसी समन्वय की नजर से काम किया जाएगा, तभी बुंदेलखंड के विकास में सफलता मिलेगी।

बुंदेलखंड की समस्या का हल पृथक बुंदेलखंड ही है। सबसे बड़ी गलती उस समय कुछ लोगों ने की थी, पर अब दिवंगत हैं क्यों नाम लेकर आक्षेप लगाया जाए? हैरत इस बात पर होती है कि इसके बाद 65 साल हो चुके हैं और अभी तक किसी ने समन्वित विकास की सुध ही नहीं ली। पं. नेहरू के अहम को ठेस न लगती तो बुंदेलखंड राज्य बना रहता और दो हिस्सों में न बांटा जाता। सीमांत समझ कर मध्य प्रदेश सरकार भी उपेक्षा करती है और उत्तर प्रदेश सरकार भी ध्यान नहीं देती रही हैं। सात जिले एमपी के व इतने ही यूपी के, जब इन्हें मिलाकर बुंदेलखंड गठित होगा, तभी समग्र विकास की कल्पना की जा सकती है। बालू व पत्थर खूब रेवेन्यू दे रहे हैं सरकार को। इच्छाशक्ति का अभाव है। ब्यूरोक्रेसी हावी है, उसका फ़ोकस हमेशा बड़ी योजनाओं पर ही रहेगा, जहां से एकमुश्त मोटा कमीशन आए। सात-आठ हजार करोड़ से डिफेंस कोरिडोर बनेगा, बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे बनेगा व बिना वजह के ही जालौन-झांसी लिंक एक्सप्रेस-वे बनने लगेगा, जबकि पहले से ही फोर लेन है। इसके विपरीत बुंदेलखंड की पहली जरूरत है पानी और कृषि। इन पर ध्यान देने से इंसान और पशु-पक्षी न कोई प्यास से और न ही पलायन करेगा। साथ ही किसानों की आमदनी भी डबल हो जाती। इंदिरा गांधी के जमाने में शुरू हुई पाठा परियोजना खत्म हो गई है। पानी की टंकियां हैं, पानी व नल गायब हैं। कुछ इस तरह पहुंच रहा है हर घर तक नल से जल। बुंदेलखंड में विकास के नाम पर केवल लूट हुई है। करोड़ों-अरबों का बजट ठिकाने लगाया जा रहा है। स्थानीय लूट की भेंट चढ़ जाता है बजट।

सांसदी के दौरान अभिताभ बच्चन द्वारा प्रधानमंत्री राजीव गांधी से शुरू कराए गए मैसिव इंडस्ट्रियल एरिया में बहुत से बड़े-बड़े कारखाने लगे थे, पर बंद हो गए हैं। वेल इंडस्ट्रियलाइज्ड नोएडा की हालत पतली है, वहां वसूली गैंग चल रहा है। कमाने के बाद प्रतिशत बंधा है। गुंडा टैक्स के नाम पर नेताओं के हिस्सा दिए बिना कोई काम नहीं हो रहा है। कुख्यात सरिया गैंग चल रहा है। चंद लोगों के मारकर दावा नहीं किया जा सकता है कि कानून व व्यवस्था की स्थिति प्रदेश में अच्छी है। कई मायनों में यह अखिलेश सरकार से भी खराब है। बड़ी कंपनियां आ ही नहीं रही हैं खराब लॉ एंड आर्डर के कारण। एक मंत्री सीजेएम के हाथ से फैसला लेकर भाग जाता है, दूसरे फैसले में भी उसे सजा हुई है, फिर भी मंत्रि परिषद में बना हुआ है। पीएफ घोटाला हुआ था, उसके जीएम व एमडी के खिलाफ जांच का आदेश आज तक नहीं दिया गया। एक एसडीएम ने बहुत सी जमीनें घर वालों के नाम कर दी, पर कुछ नहीं हुआ।

इसी प्रकार दर्जनों अधिकारियों के खिलाफ अनुमति न मिलने के कारण जांच ही नहीं शुरू हो सकी है। जीरो टोलरेंस किसे कहते हैं, यह शोध का विषय है? कथनी करनी में फर्क मिटाने से ही प्रदेश का भला हो सकता है और कानून व्यवस्था बेहतर हो सकती है, क्योंकि उद्योगों के फूलने-फलने के लिए यह बहुत जरूरी है। धरातल की स्थिति का आंकलन मुख्यमंत्री को धरातल के लोगों से मिलने के बाद ही होगा। उद्योगों व व्यापारियों का उत्पीड़न बढ़ गया है। कोई भी आदमी बिना इन लोगों को पैसा दिए काम नहीं कर सकता इसीलिए कोई इनवेस्टमेंट नहीं आ रहा है।

इनवेस्टर समिट के बारे में पूछने पर कहा कि जो किुछ लिखता हूं, मीडिया उसे छापता नहीं है। हजारों खंभों पर लाखों से बिजली की झालर लपेटी गई है। साथ ही लाखों की लागत से सैकड़ों खंभों पर ई-तितली लगाई गई हैं। अब यही ई-तितली लखनऊ से लेकरे प्रयागराज तक हजारों खंभों पर लगाने की तैयारी की गई है। लाखों-करोड़ों के होर्डिंग, टेंट, टैक्सी व विज्ञापन जारी किए जाते हैं हर बार। लाख टके का सवाल है कि लाखों करोड़ के एमओयू के बाद धरातल पर कितने उद्योग लग रहे हैं और कितनों को रोजगार मिल रहा है?

40-40 लाख रुपये में सीएमओ की कुर्सी बेचने व इनवेस्टर समिट के नाम पर हो रहे खेल के सवालों का वह जवाब दे रहे थे। वह बोले कि पुलिस के काम के लिए कुछ साल पहले ग्राम समाज की जमीन जिला प्रशासन की मंजूरी से ली थी। उसमें उसमें रेवेन्यू बोर्ड के आईएएस मेंबर ने भ्रष्टाचारियों के साथ मिलकर फर्जी मालिक खड़े करके एक माफिया के नाम पर कर दी। भला यह कैसे संभव है? हम हारते तो जमीन ग्राम समाज को जानी चाहिए थी। वह इसे दुस्साहसिक फैसला करार देते हैं। रिजीवन दाखिल हुआ काफी दिनों तक रिवीजन दबाए बैठे रहे दूसरे सदस्य। बाद में काफी थू-थू के बाद शायद पुराना आदेश खारिज हो गया था। सोलर पावर प्लांट हब के सवाल पर कहा कि जब कोई बड़ी कंपनी आने का साहस करेगी, तब ही सब कुछ संभव हो सकेगा। व्यापार व उद्योग अशांति के साथ पनप रही नहीं सकते। दो-दो मंत्री जहां आपस में गोली चलाएं और जहां मंत्री जाकर के ठेकेदार का काम रूकवा दे, वहां कौन आएगा पैसा लगाने? बाद में कमीशन मिलते ही सारी शिकायते काफूर हो जाती हैं। गए गन्ना मिल में काई मजदूर मर गया तो जनरल मैनेजर के खिलाफ मुकदमा कायम करा दिया। ऐसे कैसे चलेगा? एफआईआर तो भ्रष्टाचार का एक जरिया है।

एनकाउंटर के सवाल पर बोले कि हम हमेशा से फर्जी एनकाउंटर के खिलाफ रहे हैं। 250 के करीब पुलिसकर्मी जेलों में बंद हैं। कोई नहीं आता मदद करने और न ही कोई सरकार सजा माफ करेगी। सजा माफ भी होगी तो अमनमणि त्रिपाठी की व उदयभान करवरिया की। ऐसे उनकाउंटर से पुलिस को बचना चाहिए तो गैर कानूनी गिरफ्तारियों से भी। मुलजिम के परिवार वालों को उठा लाने के खिलाफ रहा हूं। यह सब अराजकता है। कानून का शासन नहीं। ऐसा तो अंग्रेजों ने नहीं किया। उन्होंने सैकड़ों लोगों को सुनवाई के बाद फांसी दी, भले ही सुनवाई एकपक्षीय रही हो, पर घरवालों को कुछ नहीं किया। हाथी पर सवार गवर्नर जनरल की बम मारकर यहां हत्या की कोशिश हो चुकी है 1912 में, पर घरवाले कभी नहीं पकड़े गए। मिदनापुर जिला है बंगाल में, वहीं के तीन डीमए को क्रांतिकारियों ने 1931 के आसपास एक के बाद एक मारा, पर उनके घरवालों को कभी टार्चर नहीं किया गया। कोई फर्जी मुठभेड़ नहीं है। आप तो उससे भी खराब जा रहे हैं। लोगों की जान लेना ठीक नहीं। हमारे भी दौर में 15-20 एनकाउंटर हुए थे, पर मेरठ के अलावा किसी भी मुठभेड़ पर कोई सवाल नहीं उठा इसलिए पुलिस को टोकता रहता हूं, क्योंकि 20-20 साल से लोग जेल में हैं।

माफिया ओम प्रकाश गुप्ता विधायक के एक आदमी को मारने में 14 लोगों को उम्रकैद की सजा हुई थी। आईजी जेल था तो बरेली जेल में जाकर देखा, सभी बुरे हाल में थे। पीलीभीत में भयंकर एनकाउंटर हुआ था 1991 में। उसमें 45 आदमी को सजा हुई थी। कुछ तो वहीं मर गए। बाकी वहीं से रिटायर हो गए और कहानी खत्म।

अखिलेश के टाइम पर चक गंजरिया फार्म की सैकड़ों एकड़ जमीन उद्योगों को दी गई थी। कुछ लोगों ने कंस्ट्रक्शन भी शुरू किया। अब 10 साल से अधिक हो गए हैं, कितने उद्योग लगे? पीलीभीत में मेनका गांधी को एक रुपए में जमीन दी गई थी, जिसकी सीबीआई जांच होती है। रिपोर्ट आज तक शासन में पेंडिंग है। देने वाला उत्तर प्रदेश का मुख्य सचिव बन गया। ये तो मुख्यमंत्री की जीरो टॉलरेंस को पलीता लगाने जैसा है। ऐसा आदमी कैसे उनकी नाक के नीचे बैठता होगा? इस पर कहते हैं कि उन लोगों से कोई संपर्क नहीं है तो कैसे कहूं कि कैसे एक-दूसरे को फेस करते होंगे?

मुख्य सचिव के कमरे के पहले वाले कमरे को एक आईएएस अफसर से खाली करवा कर 2002 के एक बीपीएल कार्ड धारक संदीप मांझी को बैठाया गया है, जो कि बाहरी आदमी है। दूसरी ओर शासनादेश कहता है कि किसी सरकारी कार्यालय में कोई भी बाहरी आदमी काम करते न मिले, पर वह तो अधिकारियों की मीटिंग लेते हुए पकड़ा गया था हिडेन कैमरे में। उस पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई और न ही किसी ने पूछा कि किस हैसियत से स्थानीय अधिकारियों की मीटिंग कर रहा था और फाइलों का आदान-प्रदान? उल्टे संपादक पर जरूर उसने सवाल दागे कि कैसे कैमरा लेकर हाई सिक्योरिटी जोन में पहुंचे? पुलिस पर रोज ही आरोप लगता है कि कोई कारवाई नहीं कर रही। दरअसल जब विधायक दूसरी ओर से लग जाता है तो मेरी भी नहीं सुनती। फोन तक नहीं उठा रहे हैं एसपी और डीएम और न ही मेसेज देखने के बाद जवाब दे रहे हैं।

इनवेस्टिगेशन जर्नलिज्म के मुताबिक मंत्री 15 से 25 परसेंट तक कमीशन ले रहे हैं। क्या इसकी जानकारी मुख्यमंत्री तक नहीं पहुंच रही है? इस पर कहते हैं कि कोई बहुत अच्छा फीडबैक तंत्र दिखाई नहीं पड़ता है। हो सकता है कि जानकारी न हो। कोई एजेंसी मुख्यमंत्री के पूछने पर ही बताएगी या वह इंटेलिजेंस को जिम्मेदारी सौंपें। पब्लिक से मिलना चाहिए। सूचना पब्लिक से मिलती है। इसे आजमा कर हमने देखा है। दो मिनट में पता चल जाता था कि कौन थाना या जिला कैसा चल रहा है? ब्यूरोक्रेसी की मनमानी की बात कई विधायक और जनप्रतिनिधि भी बताते हैं।

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