ग्वालियर में मैंने तानसेन को देखा… वीडियो देखें

Yashwant Singh : ग्वालियर गया था. आलोक तोमर जी की स्मृति में आयोजित एक कार्यक्रम में. वहां तानसेन मिल गए. उनको देखा महसूसा तो लगा कि अब इस देश में कबीर होना, तानसेन होना असंभव-सा हो गया है. वैसे प्रकृति का नियम बहुत जब्बर होता है. बहुत उल्टे माहौल, खराब पर्यावरण, प्रतिकूल तापमान में भी कुछ जिद्दी पेड़ पौधे जानवर मनुष्य तन कर उग जाते हैं और डटे रहते हैं.

नाश्ता करके होटल से अपन लोग निकले, सुबह सबेरे, तो देखा कि सड़क किनारे बोर्ड पर एरो-तीर का निशान लगा है और लिखा है- ‘तानसेन का मकबरा’. हम लोग फौरन एक आटो रोक कर तीर की माफिक मकबरे की तरफ चल पड़े. आगे क्या हुआ, इस वीडियो में है. तानसेन की कब्र के पास एक इमली का पेड़ है जो उतना ही पुराना है जितनी वो कब्र पुरानी है. ऐसा माना जाता है कि जो भी उस इमली के पेड़ के पत्ते चबाता है उससे उसकी संगीत प्रतिभा निखर जाती है.

ग्वालियर से लौटते वक्त वहां के एक स्थानीय निवासी ने बताया कि यहां चार पीढियों के बाद भी बदला लेने का चलन है. उनने बताया कि तीसरी पीढ़ी के लड़कों ने एक बुजुर्ग प्रेमी युगल को हाल में ही मार डाला क्योंकि लड़कों के पिता की बुआ किसी जमाने में किसी धोबी संग भाग गईं थीं, प्रेम में पड़कर. समाज के ताने को सुन सुन कर पक चुके तीसरी पीढ़ी के लड़कों ने एक रोज दोनों बुजुर्गों को मार डाला.

तानसेन, कबीर जैसे लाख आएं और चले जाएं, पर धरती की बहुतायत जनता अपनी बेसिक इंस्टिक्ट्स से ही जीती चलती रहेगी. हिंसा, आक्रामकता, स्वार्थ, अवसरवाद, स्वकेंद्रित सोच.. यह सब मुझे लगता है कि बेसिक इंस्टिक्ट्स हैं. बाकी जो कुछ अच्छी बातें भावनाएं दर्शन हैं, वो सब इन बेसिक इंस्टिक्ट्स की प्रतिक्रिया में हैं. सभ्यता चाहें जितनी तरक्की कर जाए, धरती की बहुतायत जनता सामंती, जातिवादी, सांप्रदायिक बनी रहेगी. खैर, तानसेन का वीडियो देखिए, जो ग्वालियर से लेकर आया हूं. नीचे क्लिक करें :


भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.



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