यूपी के इस सीनियर IAS अफसर को संगीत से है बेहद प्रेम, सुनिए ये ताजी पेशकश

नाम है डा. हरिओम. यूपी कैडर के सीनियर आईएएस अधिकारी हैं. पैशन है गायकी, संगीत, सुर, लय और ताल. कई एलबम आ चुके हैं. इनकी लिखी एक ग़ज़ल अभी हाल में ही इन्हीं की आवाज़ में संगीत प्रेमियों के सामने आई है जिसे बेहद पसंद किया जा रहा है.

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ग्वालियर में मैंने तानसेन को देखा… वीडियो देखें

Yashwant Singh : ग्वालियर गया था. आलोक तोमर जी की स्मृति में आयोजित एक कार्यक्रम में. वहां तानसेन मिल गए. उनको देखा महसूसा तो लगा कि अब इस देश में कबीर होना, तानसेन होना असंभव-सा हो गया है. वैसे प्रकृति का नियम बहुत जब्बर होता है. बहुत उल्टे माहौल, खराब पर्यावरण, प्रतिकूल तापमान में भी कुछ जिद्दी पेड़ पौधे जानवर मनुष्य तन कर उग जाते हैं और डटे रहते हैं. Continue reading

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इन दो शानदार लोक गीतों और एक जानदार लोक कविता को अब तक नहीं सुना तो फिर क्या सुना… (देखें वीडियो)

जनता के बीच से जो गीत-संगीत निकल कर आता है, उसका आनंद ही कुछ और होता है. अवधी हो या भोजपुरी. इन देसज बोलियों की लोक रंग से डूबी रचनाओं में जो मस्ती-मजा है, वह अन्यत्र नहीं मिलता. नीचे तीन वीडियोज हैं. सबसे आखिर में जाने माने कवि स्व. कैलाश गौतम की रचना है, उन्हीं की जुबानी- ‘अमउवसा का मेला’. जो लोग इलाहाबाद में कुंभ-महाकुंभ के मेलों में जाते रहे हैं, उन्हें इस कविता में खूब आनंद आएगा.

शुरुआती वीडियो में जो लोक गीत है, उसे एक कस्बे की एक चाय की दुकान पर सुना रहा है एक नौजवान. क्या अंदाज है सुनाने का.. इसके आगे तो बड़े बड़े मंचीय कवि फेल दिख रहे हैं… इस गीत के बोल हैं- ”मेघवा कूदे कोनवा कोनवा, घर सिवनवा होई गई ना…”. बीच वाले वीडियो में एक अवधी है. अहा… इस अवधी को इतने इत्मीनान और प्यार से इस बंधु ने गाया है कि सुनकर दिल बाग बाग हो गया.. अवधी में गाई जा रही इस गारी और नकटा का आनंद लीजिए…

देखें वीडियोज…

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अजराड़ा घराने के उस्ताद को संतूर शिरोमणि भजन सोपोरी ने यूं दी श्रद्धांजलि (देखें वीडियोज)

Yashwant Singh : क्या ग़ज़ब बजाते हैं भजन सोपोरी. इस संतूर उस्ताद को पहली बार लाइव देखा सुना. मेरठ के आरजी कालेज आडिटोरियम में आयोजित एक श्रद्धांजलि कार्यक्रम में शिरकत करने आए पंडित भजन सोपोरी को देखकर लग नहीं रहा था कि यह शख्स सन 1948 की पैदाइश है. वही चेहरा मोहरा और अंदाज जो उन्हें हम लोग तस्वीरों-वीडियोज में देखते-सुनते आए हैं. इस आयोजन में मैं अपने सीनियर रहे आदरणीय Shrikant Asthana सर के साथ पहुंचा था.

जिस जाने-माने तबला वादक उस्ताद हशमत अली खान साहब (अजराड़ा घराना) के श्रद्धांजलि कार्यक्रम में शिरकत करने पंडित भजन सोपोरी मेरठ आए थे, उनके यशस्वी बेटे उस्ताद अकरम खान एक तरफ तबला संभाले थे तो दूसरी तरफ पखावज पर सोपोरी की टीम के ही ऋषि उपाध्याय थे. संतूर साधक ने दोनों को उड़ने का मौका दिया, दोनों के साथ एक-एक कर तो कभी साथ-साथ संगीत की साधना को दिल निकाल कर दिखाया. पिता स्वर्गीय हशमत अली खान को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए मशहूर ताबलिक उस्ताद अकरम खान ने राग किरमानी के साथ तबला प्रस्तुति दी. राग किरमानी के मध्यम ताल पर तबला, संतूर और पखावज की जुगलबंदी हुई.

अजराड़ा घराने के अंतरराष्ट्रीय तबला वादक स्वर्गीय उस्ताद हशमत अली खान की स्मृति में आयोजित संगीत संध्या का शुभारंभ तबला एकेडमी आफ अजराड़ा घराने के सप्तक शर्मा, आशुतोष, हफीज खान, रामान खान व अकरम खान ने किया. मंच से दूर बैठे होने के कारण रिकार्डिंग ज्यादा साफ भले न हो लेकिन आवाज चौचक है. आनंद लीजिए, धैर्य के साथ…. वीडियो लिंक ये हैं :

भजन सोपोरी के संतूर पर खूब भिड़े तबला और पखावज https://youtu.be/mUb20T1ViMw

संतूर वादक पंडित भजन सोपोरी Live Show https://youtu.be/p1Kos5ndB6E

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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योगी को जेल भेजने वाले आईएएस अधिकारी हरिओम पर आज उनका ही अपना एक गाना एकदम फिट बैठ रहा

म्यूज़िक कंपनी ‘मोक्ष म्यूज़िक’ और संगीतकार राज महाजन के करीबी माने जाने वाले आईएएस अधिकारी डॉ. हरीओम से ऐसी क्या गलती हुई जिसका हर्जाना उन्हें आज 10 साल बाद भरना पड़ रहा है? आज के हालातों में गाया हुआ उनका अपना ही गाना ‘सोचा न था, जाना न था, यूँ हीं ऐसे चलेगी ज़िन्दगी’ उन पर एक दम सूट कर रहा है. आज से दस साल पहले IAS अधिकारी डॉ. हरीओम ने सांसद ‘योगी आदित्यनाथ को भेजा था जेल.  बस… यही थी उनकी खता जिसे आज वह भुगत रहे हैं. Continue reading

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दुनियादारी की हाय हाय में कुछ पल संगीत, भजन, बुद्धत्व, मोक्ष, मुक्ति के नाम…

Yashwant Singh : आज मोबाइल से फोटो वीडियो डिलीट कर रहा था तो एक वीडियो बचा लिया. यह वीडियो मैंने अपने मोबाइल से इंदौर में बनाया था. मौका था वरिष्ठ पत्रकार रवींद्र शाह की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम का. इस वीडियो को यूट्यूब पर अपलोड किया.

आपके लिए पेश है… ”जरा हलके गाड़ी हांको, मेरे राम गाड़ी वाला…”. इस कबीर भजन को मालवा की मिठास में लपेट कर परोस रहे हैं भेरु सिंह चौहान… दुनियादारी की हाय हाय में कुछ पल संगीत, भजन, बुद्धत्व, मोक्ष, मुक्ति के नाम… सुनें यह प्यारा कबीर भजन… नीचे दिए वीडियो पर क्लिक करें…

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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First Online Singing Competition in the History of India

New Delhi : The First Free Online Singing Competition in the history of India has  been launched recently by Sakha Cultural Society. Singers from any city of the world and of any age group (from 3 years to 100 years) can participate in this totally free competition sitting at home by just uploading their voices on Sakha’s website www.sakha.co.in

Speaking on the occasion Mr Amarjit Singh Kohli, founder Chairman of Sakha Cultural Society, said that top singers will get chance to sing in TV Serial “Geet Jo Ban Gaye Meet” which is expected to begin on Sony TV in early 2017. He explained that he himself is the Chief Adviser of RK Telefilms who are producing this TV Serial for Sony TV, and has been asked by RK Telefilms to select singers on their behalf. Also many singers will get chance to sing in TV Serial “The Live Studio” beginning in February 2017 which is being produced by Yesudas BC, Managing Partner of Spectral Media and producer-director of forthcoming Hindi feature film “30 Minutes”.

Explaining the idea behind the launching of Online Singing Competition, Mr Amarjit Singh Kohli said “ I had seen that in the preliminary auditions held by various TV Channels like Sony, Zee in various towns for selecting singers, the singers have to stand in long queues waiting for their turn for as much as 6-8 hours”. Therefore, the idea struck me to start an online competition through which singers can record their voices sitting at home and upload without any hassels. Singers voices will be evaluated by top music personalities of India as judges and singers shortlisted for participating in  Musical Shows on TV Channels. He said that he was the first person in India to start the tradition of organizing All India Stage Singing Competitions in memories of great singers like Rafi, Mukesh and later Kishore about 35 years ago, which led to the discovery of many great singers including Sonu Nigam. “My idea is now to have a tie-up with various producers of Musical TV Shows, Telefilms etc wherein Sakha Cultural Society selects the singers through online competitions for their TV Shows.

The Singing Competition has already started and the last date for participating is Friday, the 16th December, 2016. Those desirous of participating may visit www.sakha.co.in. The final results of competition will be announced on 12th Feb 2017.

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बॉब डिलन का एक गीत “Masters of War” तो वाकई क़माल का है!

Om Thanvi : बीकानेर में छात्रजीवन में मेरे कमरे की दीवार पर बॉब डिलन का एक पोस्टर चिपका रहता था, लाल और काले महज़ दो रंगों में। JS (जूनियर स्टेटसमन) में कुछ अंकों में क़िस्तों में छपा था, जोड़कर टाँग दिया। मगर डिलन के बारे में जाना बाद में। उनका काव्य, उनके गीत और गान। फिर बरसों बाद कवि-मित्र लाल्टू ने डिलन के गीतों का एक कैसेट दिया। मैंने उसे आज तक नहीं लौटाया। अक्सर उसे सुना और अपनी सम्पत्ति बना लिया।

गीत हमारे यहाँ तो ज़्यादातर रूमानी होते हैं; डिलन ने उनमें विद्रोह का रंग भरा। उस रंग को जिया। नोबेल समिति ने डिलन का अभिनंदन कर अपनी जड़ता को ख़ूबसूरती से तोड़ा है। मित्र Tribhuvan ने बॉब डिलन को नोबेल घोषित होने पर सुंदर टिप्पणी लिखी है। साझा करता हूँ। प्रतिरोध का जज़्बा अमर रहे – इस जज़्बे के धारक जो भी हों, जहाँ भी हों! और हां, मेरे निजी संग्रह में बॉब डिलन पर बनी एक फ़िल्म है- ‘नो डायरेक्शन होम बॉब डिलन’। वृत्तचित्र (डॉक्युमेंटरी)। मार्टिन स्कोरसेज़ी ने ग्यारह साल पहले बनाई थी। अपने जलसाघर (होम थिएटर) के बड़े परदे पर फिर चलाने का मन है। इतवार को चार-छह मित्र बुलाता हूँ। गीत, संगीत, यायावरी और हादसों से भरी साढ़े तीन घंटे की फ़िल्म पता नहीं कितने लोग देखने को तैयार होंगे!

Tribhuvan : कितनी सुहानी घड़ी है कि बॉब डिलन को साहित्य का नोबेल मिला है। मैंने बॉब डिलन का नाम पहली बार अपने बच्चों से सुना और उन्होंने मुझे और मेरी पत्नी को उनके “Blowin’ in the Wind”, “The Times They Are a-Changin'”, “Subterranean Homesick Blues” and “Like a Rolling Stone” जैसे गीत सुनने बाध्य किया। यह मेरे लिए एक अलग अनुभव था और साहित्य के नभ का एक नया वातायन भी। मेरे बच्चों ने ये गीत गंगानगर, जयपुर, दिल्ली और जहां भी मैं रहा, हर जगह खूब गाए और सुनवाए।

बॉब डिलन के कितने ही तराने मैंने बाद में सुने और पढ़े। कई बार मैं महससू करता रहा हूं कि आख़िर ऐसी भाव-व्यंजनाएं हमारे यहां लोकगीतों में क्यों नहीं आती हैं? और क्यों हमारे यहां गीतकारों और ऐसे गैरफ़िल्मी गायकों को ज़्यादा लोकप्रियता नहीं है। बॉब डिलन का एक गीत “Masters of War” तो वाकई क़माल का है। युद्ध पिपासु लोगों के लिए लिखा गया यह गीत मनुष्यता को गहराई से देखता है और बताता है कि युद्ध और हिंसा के कारोबारी कितने विकराल दैत्य और मानव भक्षी राक्षस हैं।

बॉब डिलन के अलावा कई ऐसे गीतकार हैं, जो जादू सा जगाते हैं। मुझे बॉब डिलन की तरह ही बहुत ज्यादा झकझोरा जॉन लेनन ने। उनका गीत “इमेजिन” तो मेरे लिए त्रिकाल संध्या और पांच बार की नमाज़ जैसा है। ऐसे लगता है, जैसे गुरबाणी को जॉन लेनन ने किसी लिरिकल प्रार्थना में पिरो दिया है। यही क्यों, बच्चों ने जब पहली बार ऑजी ऑसबॉर्न का गीत “मा-मा आई ऐम कमिंग होम” सुनवाया या कभी घर में बजाया तो इस गीत ने चुपचाप राेने को विवश कर दिया।

सचमुच, मुझे लगता है, मेरे बच्चे किसी नोबेल पुरस्कार समिति से कम प्रतिभा नहीं रखते हैं। चलिए तो आप सुनिए “मास्टर्स ऑव वार”…बॉब डिलन की गीतिका, जो मनुष्य की संवेदनाओं और हिंसक इरादों वाले रक्तपिपासुओं को आत्मग्लानि में दबा देती है।

“Masters Of War”

Come you masters of war
You that build all the guns
You that build the death planes
You that build all the bombs
You that hide behind walls
You that hide behind desks
I just want you to know
I can see through your masks.

You that never done nothin’
But build to destroy
You play with my world
Like it’s your little toy
You put a gun in my hand
And you hide from my eyes
And you turn and run farther
When the fast bullets fly.

Like Judas of old
You lie and deceive
A world war can be won
You want me to believe
But I see through your eyes
And I see through your brain
Like I see through the water
That runs down my drain.

You fasten all the triggers
For the others to fire
Then you set back and watch
When the death count gets higher
You hide in your mansion’
As young people’s blood
Flows out of their bodies
And is buried in the mud.

You’ve thrown the worst fear
That can ever be hurled
Fear to bring children
Into the world
For threatening my baby
Unborn and unnamed
You ain’t worth the blood
That runs in your veins.

How much do I know
To talk out of turn
You might say that I’m young
You might say I’m unlearned
But there’s one thing I know
Though I’m younger than you
That even Jesus would never
Forgive what you do.

Let me ask you one question
Is your money that good
Will it buy you forgiveness
Do you think that it could
I think you will find
When your death takes its toll
All the money you made
Will never buy back your soul.

And I hope that you die
And your death’ll come soon
I will follow your casket
In the pale afternoon
And I’ll watch while you’re lowered
Down to your deathbed
And I’ll stand over your grave
‘Til I’m sure that you’re dead.

Som Prabh : बॉब डिलन का पुरस्कृत होना बराक ओबामा को शांति का नोबेल मिल जाना नहीं है। जो चौंक रहे हैं वे शायद छपी हुई किताबों को ही साहित्य समझते हैं। साहित्य सिर्फ छपी हुई किताबें नहीं है। 75 साल के बुजुर्ग गायक और गीतकार बॉब डिलेन के चुनाव का मजाक उड़ाने वाले दरअसल अपना ही उपहास कर रहे हैं। यह दूर की कौड़ी लग सकती है, लेकिन इससे सीख लेकर भारतीय साहित्य में आंदोलनों में सक्रिय या समाज को किसी तरह उद्वेलित करने वाले ऐसे गायकों, गीतकारों को पहचानने और पुरस्कृत करने की परंपरा की शुरुआत करनी चाहिए, जो समाज में मरियल हो चुके साहित्य से कहीं अधिक प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं और उनमें राजनैतिक प्रतिरोध और समकालीन सवालों से भिड़ंत की अद्भुत क्षमता है। इससे जनांदोलनों के तमाम अदृश्य चेहरे भारतीय समाज की पहचान बन सकेंगे। इससे वह खाई भी पाटी जा सकेगी जो लिखित और मौखिक परंपराओं में पैदा हुई है। जानता हूं कि यह होेगा नही? साहित्य का कारोबार जिनके हाथों में हैं उनके पास इतनी हिम्मत नहीं है कि वे ऐसा कर सकें। फिर भी सपने देखने से खुद को क्यों रोका जाए।

कल्बे कबीर : साहित्य के सद्य-नोबल-पुरस्कार से सम्मानित कवि-गायक बॉब डिलेन अमरीका-यूरोप में अपने देसी गीत-संगीत के लिये कितने लोकप्रिय हैं – मुझे कुछ ठीक-ठीक अंदाज़ा नहीं है, लेकिन यह तय है कि बॉब की ख्याति अपने ज़माने के हिंदुस्तानी शाइर जिगर मुरादाबादी से कम ही होगी । कहते हैं कि जिगर को देखने के लिये रेलवे-स्टेशनों पर भीड़ लग जाती थी। रेलें थम जाती थीं। जब जिगर अपनी लहकदार-खरज़दार आवाज़ में अपनी ग़ज़लों को गाते थे तो हज़ारों की भीड़ में सन्नाटा खिंच जाता था । समकालीन शाइर जिगर से इस बात पर रश्क़ रखते थे। उनमें जोश मलीहाबादी भी थे, जो गा नहीं सकते थे और अपनी बुलन्द आवाज़ में तरह में अपनी शाइरी पढ़ते थे। एक बार जोश ने तंज़ कसते हुये कहा – जिगर, तुम्हारा टेंटुआ तो किताबों में छप नहीं सकता! जोश अगर ज़िंदा होते तो देखते कि अब टेंटुआ भी किताबों में छपने लगा है! जो Bob Dylan की तुलना फ़िल्मी और मंचीय गीतकारों से कर रहे हैं वे मूर्ख हैं ग़रीबों-वंचितों के पक्ष में, कुलीनों के विरुद्ध और युद्ध के ख़िलाफ़ गीत लिखकर गाने वाले बॉब डिलेन की तुलना सिर्फ़ इकतारे पर गाने वाली मीरा, अभंग गाने वाले तुकाराम से की जा सकती है या किसी बाउल गायक से!

Nishant Jain : मुझे लगता है कि जाने-माने अमेरिकी गीतकार और गायक Bob Dylan को लिटरेचर का नोबेल मिलना साहित्य जगत में एक नए बदलाव की आहट है। उम्मीद है, इससे हिन्दी और भारतीय भाषाओं का अकादमिक साहित्य जगत थोड़ा उदार होगा और लोकप्रिय साहित्य-संगीत को ‘साहित्य’ के रूप में स्वीकारना शुरू करेगा। अकादमिक जगत के कुछ (सब नहीं, अतः कृपया दिल पर न लें) मठाधीश टाइप के लोग लोकप्रिय गीतकारों और लोक कवियों को ‘साहित्यकार’ की श्रेणी में नहीं गिनते। हिन्दी साहित्य जगत में तो स्थिति और भी ख़राब है।ऐसी कविता, जो एक सुशिक्षित व्यक्ति के भी पल्ले न पड़े, सिर्फ़ उसे ही साहित्य मानने की जिद और आम बोल-चाल की भाषा में रचे गए लयबद्ध गीतों और कविताओं को दोयम दर्जे का साहित्य मानना कहाँ तक तर्कसंगत है, उम्मीद है, कुछ विद्वान ही इस पर प्रकाश डालेंगे।

भूलना नहीं चाहिए कि साहित्य की तीन मूल विधाएँ -गीत, कहानी और नाटक, सभ्यता की शुरुआत से ही लोक-जीवन में रचे बसे हैं और अपनी लोक भाषा, लय और नाद सौंदर्य के बल पर आम जन की ज़ुबान पर चढ़ते रहे हैं। कबीर से लेकर निराला तक, कविता की तुकांतता ने निरंतर उसके नाद सौंदर्य के माध्यम से साहित्य को जन-जन तक पहुँचाया है। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि हिन्दी वाले अकादमिक लोग भी अब पुनर्विचार करते हुए गुलज़ार साहब, गोपालदास नीरज, दुष्यंत कुमार, अदम गोंडवी, प्रसून जोशी, इरशाद कामिल, स्वानन्द किरकिरे जैसे बेहतरीन गीतकारों के लोकप्रिय गीतों के लिटरेरी योगदान को कुछ तवज्जो देंगे।

Arun Maheshwari : बॉब डिलेन को नोबेल पुरस्कार… अभी-अभी हम बीकानेर से हरीश भादानी समग्र के लोकार्पण समारोह से कोलकाता लौटे हैं । हरीश जी के गीतों और धुनों से सरोबार इस समारोह की ख़ुमारी अभी दूर भी नहीं हुई कि आज यह सुखद समाचार मिला – अमेरिकी गीतकार और गायक बॉब डिलेन को इस साल का साहित्य का नोबेल पुरस्कार घोषित किया गया है । शायद रवीन्द्रनाथ के बाद यह दूसरा गीतकार है जिसे उसके गीतों के लिये नोबेल दिया जा रहा है। बॉब डिलेन अमेरिका के पॉप संगीत के एक ऐसे अमर गीतकार और गायक रहे हैं जिनके छ: सौ से अधिक गीतों ने अमेरिका की कई पीढ़ियों को मनुष्यता और प्रतिवाद की नई संवेदना से समृद्ध किया है। यहाँ हम उनके एक प्रसिद्ध गीत – Blowin’ In The Wind को मित्रों से साझा कर रहे हैं और साथ ही तुरत-फुरत किये गये उसके एक हिंदी अनुवाद को भी दे रहे हैं –

Blowin’ In The Wind Lyrics

How many roads must a man walk down
Before you call him a man ?
How many seas must a white dove sail
Before she sleeps in the sand ?
Yes, how many times must the cannon balls fly
Before they’re forever banned ?
The answer my friend is blowin’ in the wind
The answer is blowin’ in the wind.

Yes, how many years can a mountain exist
Before it’s washed to the sea ?
Yes, how many years can some people exist
Before they’re allowed to be free ?
Yes, how many times can a man turn his head
Pretending he just doesn’t see ?
The answer my friend is blowin’ in the wind
The answer is blowin’ in the wind.

Yes, how many times must a man look up
Before he can see the sky ?
Yes, how many ears must one man have
Before he can hear people cry ?
Yes, how many deaths will it take till he knows
That too many people have died ?
The answer my friend is blowin’ in the wind
The answer is blowin’ in the wind

कितने रास्ते तय करे आदमी
कि तुम उसे इंसान कह सको ?
कितने समंदर पार करे एक सफ़ेद कबूतर
कि वह रेत पर सो सके ?
हाँ, कितने गोले दागे तोप
कि उनपर हमेशा के लिए पाबंदी लग जाए?
मेरे दोस्त, इनका जवाब हवा में उड़ रहा है
जवाब हवा में उड़ रहा है ।

हाँ, कितने साल क़ायम रहे एक पहाड़
कि उसके पहले समंदर उसे डुबा न दे ?
हाँ, कितने साल ज़िंदा रह सकते हैं कुछ लोग
कि उसके पहले उन्हें आज़ाद किया जा सके?
हाँ, कितनी बार अपना सिर घुमा सकता है एक आदमी
यह दिखाने कि उसने कुछ देखा ही नहीं ?
मेरे दोस्त, इनका जवाब हवा में उड़ रहा है
जवाब हवा में उड़ रहा है ।

हाँ, कितनी बार एक आदमी ऊपर की ओर देखे
कि वह आसमान को देख सके?
हाँ, कितने कान हो एक आदमी के
कि वह लोगों की रुलाई को सुन सके?
हाँ, कितनी मौतें होनी होगी कि वह जान सके
कि काफी ज्यादा लोग मर चुके हैं ?
मेरे दोस्त, इनका जवाब हवा में उड़ रहा है
जवाब हवा में उड़ रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी, त्रिभुवन, सोम प्रभ, कल्बे कबीर, निशांत जैन, अरुण माहेश्वरी की एफबी वॉल से.

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आईएएस अधिकारी डॉ. हरिओम ने रिकॉर्ड किया नया गाना ‘मजबूरियां’

https://2.bp.blogspot.com/-nrOVkiFE7Xk/V150w0StUzI/AAAAAAAAFkc/8tnE9l2M9nYrrmL-YT8f4kNUmzM8rXFkACLcB/s1600/Raj%2BMahajan%2B%2526%2BDr%2BHari%2BOm%2B%25287%2529.jpg

आई.ए.एस डॉ. हरिओम एक बेहतरीन सिंगर होने के साथ-साथ कमाल के साहित्यकार भी हैं. कहा जाता है कि, कला की कोई सीमा नहीं होती और इसी सार्थक करते हुये डॉ हरिओम का एक छुपा रूप सबके सामने आ गया या यूँ कह लीजिये कि, अब पूरी दुनिया इनके साहित्यिक और गायक रूप को देख और सुन पायगी. हो सकता है निकट भविष्य में ये एक्टिंग में भी अपने हाथ अजमाते नजर आये. Continue reading

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जयपुर के पत्रकार दुष्यंत का लिखा गीत ‘बावलीबूच’ इन दिनों धूम मचा रहा है

रणदीप हुड्डा की 22 अप्रैल को रिलीज हो रही फिल्म ‘लाल रंग’ का गीत ‘बावलीबूच’ 2 अप्रैल को यूट्यूब पर आया, एक हफ्ते में ही 2 लाख से अधिक बार देखा गया. हरियाणा केंद्रित फिल्म का यह गीत भी हरियाणवी अंदाज का देसी रोमांटिक गीत है.

“बावलीबूच कह दिल की, दिलकी, हाथ थाम के सिल्की सिल्की” का संगीत पेरिस निवासी मतियास डुप्लेसी ने दिया है. वे इससे पहले पीपली लाइव औऱ फाइंडिंग फेनी का संगीत दे चुके हैं. इस गीत को गाया है “हट जा ताऊ पाछै नै” जैसा सुपरहिट गीत गाने वाले विकास कुमार ने.

‘लाल रंग’ के डायरेक्टर सैयद अहमद अफजाल हैं जो इससे पहले यंगिस्तान बना चुके हैं.

हिन्दी के चर्चित युवा लेखकों में गिने जाने वाले दुष्यंत की पांच किताबें राजकमल औऱ पेंगुइन जैसे पब्लिशर्स के यहां से छपी हैं और बेहद चर्चा में रही हैं. हंस, कथादेश, वागर्थ, पाखी जैसी हिंदी साहित्य की टॉप मैगजींस ने उनकी कहानियां-कविताएं छापी हैं. वे राजस्थान पत्रिका समूह के अखबार डेली न्यूज में कई साल संडे मैग्जीन के संपादक रह चुके हैं. गीत का यूट्यूब लिंक नीचे है…

https://youtu.be/f026HZbW7n0

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कहां तक ये मन को, अंधेरे छलेंगे, उदासी भरे दिन, कभी तो ढलेंगे… (सुनें)

कई फिल्मी गीत ऐसे हैं जो ढेर सारी आध्यात्मिक उपदेशात्मक बातों से बड़ी बातें कह समझा जाते हैं, वह भी बहुत थोड़े वक्त में और बहुत प्यार से. ऐसा ही एक गीत है किशोर कुमार की आवाज में. गीतकार योगेश हैं. संगीतकार राजेश रोशन. फिल्म है ‘बातों बातों में’ जो वर्ष 1979 में रिलीज हुई थी. इसका ये गाना आज भी बहुत पापुलर है: ”कहां तक ये मन को, अंधेरे छलेंगे…”. ये ऐसा गीत है जब कई किस्म के मन-मिजाज के वक्त सुना जा सकता है. जब ध्यान में जाने का दिल हो रहा हो तो इसे सुनें. जब अकेले चाय पीते हुए सिगरेट के छल्ले बनाने का मन कर रहा हो तो इसे सुनें.

जब तनाव अवसाद या अकेलापन महसूस हो रहा हो तो इसे सुनें. इस गीत में वो ताकत, कशिश, तड़प है कि आप अंदर से खुद को इनकी लाइनें गुनगुनाने से नहीं रोक पाएंगे और ये आपका गुनगुनाना दरअसल वही रास्ता है जिस पर चलना शुरू करने के बाद आप अकेलेपन, अवसाद, तनाव आदि से मुक्त हो जाते हैं. मैं खुद की बात करूं तो प्रोफेशनल लाइफ के इतर मेरा ज्यादातर वक्त भांति भांति के खान-पान बनाने पकाने, गीत-संगीत सुनने सुनाने में व्यतीत होता है. ये दोनों वो क्रिएटिव काम हैं जिसे अगर आप तसल्लीबख्श तरीके से करना सीख लें तो जीवन की आधी समस्याएं हल हो जाया करेंगी.

असल में समस्याएं बाहर कम, दिमाग में ज्यादा होती हैं. हम या तो अतीत को लेकर परेशान रहते हैं या फिर फ्यूचर को लेकर चिंतामग्न. कुछ दिन आप अतीत और भविष्य दोनों को गोली मार कर वर्तमान में जीना सीखिए. वर्तमान में जीना सिखाने के लिए ये गाने बजाने और खाने बनाने बड़े काम के चीज हैं. अपने को इसमें इंगेज रखिए. देखिए, कितना आनंद आता है. तो लीजिए, बहुत दिनों बाद मेरी पसंद का एक गाना सीखिए जो इस तनाव, उदासी, असहिष्णु कहे जाने वाले दौर में आपके दिल दिमाग को कुछ पल के लिए राहत दे सके.

जै जै.

-स्वामी भड़ासानंद


कहां तक ये मन को, अंधेरे छलेंगे
उदासी भरे दिन, कभी तो ढलेंगे

कभी सुख, कभी दुःख  यही जिन्दगी है
ये पतझड़ का मौसम घड़ी दो घड़ी है
नए फूल कल फिर डगर में खिलेंगे
उदासी भरे दिन, कभी तो ढलेंगे

भले तेज कितना हवा का हो झोंका
मगर अपने मन में तू रख ये भरोसा
जो बिछड़े सफ़र में तुझे फिर मिलेंगे
उदासी भरे दिन, कभी तो ढलेंगे..

कहे कोई कुछ भी, मगर सच यही है
लहर प्यार की जो, कहीं उठ रही है
उसे एक दिन तो, किनारे मिलेंगे
उदासी भरे दिन, कभी तो ढलेंगे…

कहां तक ये मन को, अंधेरे छलेंगे
उदासी भरे दिन, कभी तो ढलेंगे.

(Lyricist- Yogesh, Singer- Kishor Kumar, Music Director- Rajesh Roshan, Movie- Baton Baton Mein – 1979)

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मेहदी हसन की वापसी

गुरबत के दिनों में किसी घिसी हुई पतलून की जेब से कभी लापरवाही से रख छोड़े पैसे हाथ लग जायें तो कैसा महसूस होगा? मेहदी हसन की इन अनसुनी ग़ज़लों का खजाना हाथ लग जाने के बाद मुझे कुछ ऐसा ही लग रहा है। सदा-ए-इश्क मेरी जानकारी में मेहदी हसन साहब का अंतिम एल्बम था जो म्यूजिक टूडे वालों ने वर्ष 2000 के आस-पास निकाला था। इसके बाद केवल एक ग़ज़ल “तेरा मिलना बहुत अच्छा लगे है, मुझे तू मेरे दुःख जैसा लगे है” सुनने में आयी थी जो उन्होंने लता मंगेशकर के साथ गायी थी। इस ग़ज़ल में दोनों गायकों ने अपना-अपना हिस्सा भारत और पाकिस्तान में रेकार्ड किया था और बाद में इसकी मिक्सिंग भारत में हुई। एक साथ इन दो बड़े कलाकारों की यह संभवतः इकलौती और ऐतिहासिक प्रस्तुति थी। ग़ज़ल उन्हीं दिनों में सुनने में आयी जब मेहदी हसन साहब बीमार चल रहे थे और अपन ने भी मान लिया था कि इस खूबसूरत ग़ज़ल को खाँ साहब की अंतिम सौगात समझ लेना चाहिये।

इधर स्मार्ट फोन वगैरह से मैं काफी दिनों तक बचता रहा। एप का इस्तेमाल भी बहुत कम किया- खासतौर पर संगीत वाले। मुझे लगता रहा कि चूंकि ये नये जमाने की चीजें है इसलिये इनका संगीत भी वैसा ही होगा। पर कुछ दिनों पहले न जाने क्या सूझा कि “सावन” पर हाथ आजमाया और खाँ साहब को सर्च किया। जो नतीजा सामने आया वो चौंकाने वाला था। “दिल जो रोता है” नामक एक नया एल्बम सामने आया। इसकी पहली ही ग़ज़ल सुनकर “दी लिजेंड” नामक एल्बम की याद आयी जो खाँ साहब ने ललित सेन के साथ किया था और उसके आवरण में उनके हस्ताक्षरों के साथ यह बयान दर्ज था कि इतनी सादगी भरी पर खूबसूरत धुनों के साथ मैं पहली बार गा रहा हूँ। इस अल्बम की एक ग़ज़ल “मै होश में था तो फिर अपने ही घर गया कैसे” बेहद पापुलर ग़ज़ल थी। ललित सेन के साथ उनका एक और मशहूर एल्बम “तर्ज” था जिसमें उन्होंने शोभा गुर्टू के साथ ग़ज़लें गायी थीं। गणेश बिहारी तर्ज की एक मशहूर ग़ज़ल “इश्क की मार बडी दर्दीली” इसी एल्बम में थी। एक अपेक्षाकृत कम सुना गया एल्बम भी इसी दौर में उनका ललित सेन के साथ आया था, जिसका नाम तो मुझे याद नहीं है पर इसकी ग़ज़ल एक “दीवारो-दर पर नक्श बनाने से क्या मिला” मुझे बेहद पसंद थी। यह एल्बम मुझे भारत में अब दुर्लभ हो चली छोटी लाइन के एक स्टेशन नैनपुर की एक अनजानी सी दुकान में मिला था जो मूलतः लोहा-लंगड़ बेचने का काम करता था।

“दिल जो रोता है” सुनकर ललित सेन के साथ उनकी उसी जुगलबंदी की याद आती है पर ठीक-ठीक मालूम करना है कि इसका संगीत किसने तैयार किया है। पहली ग़ज़ल “दिल जो रोता है” मेहदी हसन साहब की ही आवाज में है और उनके खास अंदाज में। दूसरी ग़ज़ल चौंकाने वाली है। इस एल्बम की सबसे खूबसूरत ग़ज़ल -“‘दर्द के साज की लय और बढ़ा जायेगा, जो भी आयेगा कोई तार हिला जायेगा।” अगर आपको पहले से मालूम नहीं है तो यह जानकारी आपको बेहद सुकून देगी कि मेहदी हसन के साहबजादे आसिफ मेहदी को सुनकर आप मेहदी हसन साहब के चले जाने का ग़म गलत कर सकते हैं। तसल्ली दे सकते हैं कि खाँ साहब की आवाज और अंदाज जिंदा है और जो परंपरा उन्होंने कायम की वह आगे भी जारी रहने वाली है।

बस अब ओर ज्यादा नहीं। लिंक मैं नहीं दे रहा हूँ। थोड़ी सी मेहनत करें और मेहदी हसन साहब की उन अंतिम ग़ज़लों को सुनें जो किन्ही कारणों से सामने नहीं आ पायी थी। उन्हें भी जो मेहदी हसन साहब के काम और नाम को आगे बढ़ा रही हैं।

दिनेश चौधरी

iptadgg@gmail.com

भिलाई

Facebook.com/dinesh.choudhary.520


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पी7 के आंदोलनकारी पत्रकारों की इस छिपी प्रतिभा को देखिए

Yashwant Singh : आंदोलन अपने आप में एक बड़ा स्कूल होता है. इसमें शरीक होने वाले विभिन्न किस्म की ट्रेनिंग लर्निंग पाते हैं. सामूहिकता का एक महोत्सव-सा लगने लगता है आंदोलन. अलग-अलग घरों के लोग, अलग-अलग परिवेश के लोग कामन कॉज के तहत एकजुट एकसाथ होकर दिन-रात साथ-साथ गुजारते हैं और इस प्रक्रिया में बहुत कुछ नया सीखते सिखाते हैं. पी7 न्यूज चैनल के आफिस पर कब्जा जमाए युवा और प्रतिभावान मीडियाकर्मियों के धड़कते दिलों को देखना हो तो किसी दिन रात को बारह बजे के आसपास वहां पहुंच जाइए. संगीत का अखिल भारतीय कार्यक्रम शुरू मिलेगा.

सब अपने अपने अंदाज में सुर लहरी बिखेरते मिलेंगे. पत्रकार आनंद दुबे समेत कई साथियों ने जी खोलकर गाया बजाया. पूरा माहौल कभी बेहद संजीदा होता तो कभी खिलंदड़पना से भरपूर. पत्रकारों के भीतर कैसी-कैसी प्रतिभा छिपी है, ये सब इस आंदोलन के दौरान उदघाटित हो रहा है. कोई घर से तबला ले आया तो किसी ने नग्मा सुनाते हुए टेबल को ही तबला में तब्दील कर दिया.  

इस पूरे आंदोलन की खासबात ये है कि सब कुछ बेहद सहज भाव से घटित हो रहा है, बनावटी कुछ नहीं है, प्रायोजित कुछ नहीं है. ये पत्रकार जानते हैं कि उनकी लड़ाई लंबी हो सकती है इसलिए वे महीनों तक दो-दो हाथ करने के लिए तैयार बैठे हैं. इन पत्रकारों के गायन-वादन के कुछ अद्भुत वीडियो यहां दिया जा रहा है. देखिए और आनंदित होइए. वक्त लगे तो इनका समर्थन करने इन तक (C-55, Sector-57, Noida) पहुंच भी जाइए.

https://www.youtube.com/watch?v=RKF5r_M8pkU

https://www.youtube.com/watch?v=lH11jjT9-Vs

https://www.youtube.com/watch?v=Zl_DN-Sq_fg

https://www.youtube.com/watch?v=i170E_sH0C0

https://www.youtube.com/watch?v=19_OSS7xd5A

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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