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आज के अखबार : द हिन्दू ने अविश्वास प्रस्ताव से ज्यादा महत्व भाजपा शासित राज्यों के ‘कारनामों’ को दिया है

संजय कुमार सिंह

आज मेरे नौ अखबारों में से सिर्फ द हिन्दू ऐसा है जिसमें लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की खबर पहले पन्ने पर नहीं है। लेकिन इसकी लीड समेत पहले पन्ने की कई खबरें हैं जो दूसरे अखबारों में नहीं हैं। लेकिन पहले अविश्वास प्रस्ताव जो पास हो या नहीं, ओम बिरला और भाजपा सरकार की पक्षपाती भूमिका का ठोस और एक सामूहिक विरोध है। इसीलिए टाइम्स ऑफ इंडिया तथा नवोदय टाइम्स के शीर्षक में ही बताया गया है, टीएमसी को छोड़कर बाकी विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष को हटाने के लिए नोटिस दी है। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर का इंट्रो है, मामला निपटने तक ओम बिरला लोकसभा से दूर रहेंगे यानी नहीं आएंगे और कार्यवाही में शामिल नहीं होंगे। उल्लेखनीय है कि इसी तीन फरवरी को उन्होंने मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के सात सांसदों समेत आठ सदस्यों को निलंबित किया था। अब वे खुद ऐसी स्थिति में हैं जहां ना निलंबित हैं ना संसद की कार्यवाही में शामिल हो पाएंगे। विपक्षी सदस्य तो अपना काम या विरोध करने के लिए निलंबित किए गए थे। भाजपा विरोधियों या विपक्ष के साथ जो व्यवहार करती आई है उसका यह पहला ठोस विरोध कहा जा सकता है। हालांकि, तृणमूल का इससे अलग रहना भी महत्वपूर्ण है। इसलिए यह खबर महत्वपूर्ण है और लीड बनी है लेकिन द हिन्दू में जो दूसरी खबरें हैं वो कम महत्वपूर्ण नहीं हैं और एक साथ पहले पन्ने पर होतीं तो सरकार के रुख का प्रमाण होती।

आइए पहले द हिन्दू की खबरें देख लें। केंद्र सरकार ने फोटोरियलिस्टिक एआई कंटेंट के लिए लेबल ज़रूरी किया। खबर के अनुसार बदले हुए आईटी नियमों में एआई से बने कंटेंट का खुलासा होना चाहिए। खबर के अनुसार, केंद्र सरकार ने इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट, 2021 में बदलाव को अधिसूचित कर दिया है। इसके तहत फोटोरियलिस्टिक एआई से बने कंटेंट को खास तौर पर लेबल करना ज़रूरी होगा। ये बदलाव 20 फरवरी से लागू होंगे, गैर-कानूनी कंटेंट को हटाने की टाइमलाइन को भी काफी कम कर दी गई है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, कंटेंट को ब्लॉक करने का समय सिर्फ तीन घंटे है। यहां यह शीर्षक है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को चेतावनी दी गई है कि अगर नियमों का पालन नहीं किया गया तो उन्हें सेफ़ हार्बर से हाथ धोना पड़ेगा; सरकार द्वारा बताए गए बदलाव 20 फरवरी से लागू होंगे। आप जानते हैं कि सरकार पूर्व सेना प्रमुख की किताब की समीक्षा या उसके प्रकाशन की अनुमति देने या नहीं देने के मामले में दो साल से फैसला नहीं कर पाई है। यह सब तब जब सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की ओर से दलील दी गई थी कि राज्यपालों को यह अधिकार होना चाहिए कि वे विधानसभा में पास विधेयकों पर फैसला जब चाहें करें या उसे रोक कर रखें। गैर भाजपा शासित तमिलनाडु सरकार बनाम राज्यपाल में तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी क्योंकि राज्यपाल बहुत समय से सदन से पास कई विधेयकों पर सहमति नहीं दे रहे थे, न ही उन्हें वापस भेज रहे थे, न ही राष्ट्रपति के पास भेज रहे थे — यानी वे उन्हें अनिश्चितकाल के लिए रोककर रख रहे थे। 8 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट की दो न्यायाधीशों की पीठ ने फैसला दिया कि, राज्यपाल के पास विधेयक को अनिश्चितकाल तक रोककर रखने का अधिकार नहीं है। अगर विधानसभा एक विधेयक को पास कर चुकी है, तो राज्यपाल या तो उसे मंजूर करें, या उसे वापस भेजें, या राष्ट्रपति के पास भेजें — लेकिन उसे रोक कर नहीं रख सकते हैं। अदालत ने इस आधार पर कुछ बिलों को “माना हुआ असेंट” भी घोषित कर दिया, ताकि वे कानून की तरह लागू हो सकें।

इसके बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट से पूछा, राज्यपाल या राष्ट्रपति को बिलों पर फैसले के लिए कोई समय सीमा दी जा सकती है या वे उन्हें लंबित रख सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की  संविधान पीठ ने 20 नवंबर 2025 का फैसला सुनाया कि: 1) राज्यपाल और राष्ट्रपति को बिल मंजूर करने की कोई निश्चित समय सीमा नहीं दी जा सकती है। 2) अदालत यह तय नहीं कर सकती कि तय अवधि में उन्हें फैसला करना ही है। लेकिन यह भी साफ कहा कि राज्यपाल अनिश्चितकाल तक बिल को रोक नहीं सकते यानी बिल पर फैसला वाजिब समय में करना चाहिए। अगर ज़्यादा विलंब होगा तो कोर्ट सामान्य न्यायिक समीक्षा कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने तय किया कि राज्यपाल के पास बिना किसी निर्णय के विधेयक को रोककर रखने का अधिकार नहीं है। अदालत ने समय सीमा तो तय नहीं की, लेकिन यह कहा कि जल्दी और संविधान के अनुरूप निर्णय होना चाहिए। लेकिन इस मामले में फैसला करने के लिए सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म को तीन घंटे का समय ही दिया गया। व्यवहार में होगा यह कि आदेश मिलते कार्रवाई करनी पड़ेगी। स्थिति यह है कि जहां सरकार को कार्रवाई करनी है वहां कोई जल्दी नहीं होती और बुलडोजर हर जगह समान तेजी से नहीं पहुंचता है लेकिन जब सरकार आदेश दे तो उसका पालन तीन घंटे के अंदर हो जाए। यह स्थिति सरकार के लाभ में तो हो सकती है लेकिन जनहित की नहीं हो सकती है। 

द हिन्दू में आज ऐसा ही एक मामला सेकेंड लीड है। असम के मुख्यमंत्री के हेट स्पीट का मामला पुराना है। ऐसे और भी मामले हैं जिनमें सरकार ने कार्रवाई नहीं की। जज के तबादले का भी उदाहरण है। ऐसे में भाजपा के प्रभावशाली या आलाकमान के प्रिय मुख्यमंत्रियों में एक, असम के मुख्यमंत्री के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में मामला दायर किया गया है और अदालत  ने इसे स्वीकार कर लिया है। खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सिस्ट) [माकपा] की एक अर्ज़ी पर तुरंत सुनवाई करने पर सहमति जताई। इस अर्ज़ी में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पर “लगातार हेट स्पीच देने” का आरोप लगाया गया है और हेट स्पीच के कथित मामलों में एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई है। देखना है, अदालत क्या आदेश देती है और मुख्यमंत्री के खिलाफ राज्य पुलिस क्या कर पाती है। द हिन्दू में ही पहले पन्ने पर एक और खबर है, नेटिज़न्स ने ‘मोहम्मद’ दीपक के जिम का समर्थन किया। इसमें कहा गया है, उत्तराखंड के रहने वाले दीपक कुमार के लिए नेटिजन्स की मदद उपलब्ध है। खुद को ‘मोहम्मद’ दीपक बताकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुए दीपक की यह प्रसिद्धि भाजपा शासित राज्य में रहने और दक्षिणपंथी गुंडों को टक्कर देने के कारण है। जिम मालिक, ने कहा कि 26 जनवरी को हुई घटना के बाद उसपर एफआईआर हुई है। इसके बाद विश्व हिंदू परिषद तथा और बजरंग दल के सदस्यों के विरोध प्रदर्शनों ने उसके बिज़नेस पर असर डाला है। इससे राहत के लिए उसे अब पूरे देश से समर्थन मिल रहा है। द हिन्दू में आज भाजपा शासित उड़ीशा में दलित कर्मचारी की नियुक्ति के कारण आंगनवाड़ी के बॉयकॉट की खबर है। इसके अनुसार, उड़ीशा के केंद्रपाड़ा जिले में एक आंगनवाड़ी लगभग तीन महीने से बंद है, क्योंकि लोगों ने कथित तौर पर एक दलित महिला, शर्मिष्ठा सेठी को हेल्पर-कम-कुक के तौर पर नियुक्त करने के कारण बच्चों को भेजना बंद कर दिया है। 20 साल की ग्रेजुएट ने दावा किया कि 20 नवंबर 2025 को उसकी नियुक्ति के तुरंत बाद गांव वालों ने राजनगर ब्लॉक स्थित घड़ियामल ग्राम पंचायत के नुआगांव में सेंटर का बॉयकॉट शुरू कर दिया है। उसने कहा, “वे बच्चों के लिए सत्तू और अंडे जैसी खाने की चीजें भी मुफ्त नहीं ले रहे हैं। मेरा परिवार बहुत गरीब है। मुझे यह नौकरी बहुत मुश्किलों के बाद मिली है। मैं टीचर बनना चाहती हूं, लेकिन मेरी बार-बार की अपील  किसी ने नहीं सुनी।”

आज के अखबारों की दूसरी खबरों में एक का शीर्षक देशबन्धु में इस प्रकार है, अमेरिका के साथ डील नहीं ढील हुई। अमर उजाला में पहले पन्ने पर खबर है, बांग्लादेश में एक हिन्दू व्यापारी की हत्या, काटकर दुकान में फेंका। द टेलीग्राफ में पूर्व सेना प्रमुख एमएम नरवणे की किताब और उसपर चल रहे विवाद से संबंधित खबर है। दि एशियन एज ने विमान दुर्घटना में महाराष्ट्र के नेता अजीत पवार के निधन पर उनके भजीते रोहित की आशंका को चार कॉलम की खबर बनाया है। ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की आज की लीड खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में भी सेकेंड लीड है। शीर्षक आज भी दूसरे सभी अखबारों से अलग है। हिन्दी में यह कुछ इस प्रकार होगा, अविश्वास प्रस्ताव पर फैसला होने तक बिरला दूर रहेंगे। शीर्षक से पता नहीं चलता है कि वे किससे और कहां से कैसे दूर रहेंगे। विपक्ष से तो वे दूर लगते ही थे। यही मामला है। मुझे लगता है कि यह मुख्य खबर का हिस्सा है और मुख्य खबर तो नहीं ही है। लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव संसद से अलग रहने से ज्यादा महत्वपूर्ण है। यह संपादकीय आजादी और उसके उपयोग (या दुरुपयोग) के साथ संपादकीय विवेक का भी मामला है। लेकिन यह सब अलग मुद्दा है।    

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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