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आज के अखबार : टाइम्स ऑफ इंडिया ने कमाल की पत्रकारिता की है, द हिन्दू ने भी करतब दिखाए हैं

प्रचारकों की सरकार में खबर और प्रचार का अंतर मिट गया है। आठ चरणों में होने वाला चुनाव दो चरण में क्यों होगा समझ में नहीं आया। किसी ने पूछा या नहीं और चुनाव आयोग ने कुछ बताया या नहीं यह सब खबर में नहीं है। कम से कम हाईलाइट तो नहीं ही किया गया है। मुझे लगता है कि जितनी प्रमुखता से दो चरणों में चुनाव बताया गया है उतनी ही प्रमुखता से बताया जाना चाहिए था कि इस बार दो ही चरण में क्यों? पर विज्ञापन छपने की तेजी देखने लायक है। हालांकि यही तो विकास है।

संजय कुमार सिंह 

आज पांच राज्यों में चुनाव की घोषणा ही लीड होनी थी वही है। मेरे सभी अखबारों में यही है लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड सबसे अलग है। इतना कि मुझे यकीन नहीं हुआ और चेक करना पड़ा कि अखबार आज का ही है ना, नगर संस्करण है ना और दिल्ली का ही है या कोई अंतरराष्ट्रीय,  सरकारी या एलपीजी विक्रेताओं के लिए विशेष। टाइम्स ऑफ इंडिया खबरों, विज्ञापनों और प्रयोग के नाम पर जो सब करता रहा है उसमें कुछ भी संभव है। इसलिए चुनाव की घोषणा वाली खबर का क्या हुआ – इसे जानना समझना भी मेरे लिए जरूरी था। वरना टाइम्स ऑफ इंडिया ने दिल्ली में फूलन देवी की हत्या की खबर पहले पन्ने पर नहीं छापी थी और उस दिन किसी सौंदर्य प्रतियोगिता की खबर पहले पन्ने पर थी। उसके बाद मैंने टाइम्स ऑफ इंडिया देखना छोड़ दिया था। इसलिए आज यह समझना जरूरी लगा कि टाइम्स ऑफ इंडिया ने आखिर चुनाव की खबर का किया क्या? मैं खबर के साथ किसी विज्ञापन या किसी विज्ञापन के साथ इस खबर की उम्मीद कर रहा था। वैसे भी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रस्ताव के बाद घोषणा के अपने मायने हैं और प्रचारकों की ओर से सरकारी मुकाबले की संभावना या आशंका आप जो कहिए थी ही। सब जांचने-समझने के बाद पता चला कि जो खबर पहले पन्ने पर होनी चाहिए थी वह पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड है। यह अधपन्ना विज्ञापनों के लिए शुरू हुआ होगा। मैं अभी तक इस (हिन्दुस्तान टाइम्स के भी) आधे पन्ने को पहला पन्ना नहीं मान पाया हूं और अक्सर इसे देखना रह जाता है। आज भी यही हुआ।

अमूमन मैं अपने सभी अखबारों के पहले पन्ने देखने के बाद अंदर की खबरें देखता हूं लेकिन आज तो मुझे टाइम्स ऑफ इंडिया में खबर ढूंढ़नी थी और इस चक्कर में एक चुनावी विज्ञापन दिखा। खबरों के अनुसार चुनाव की घोषणा करने वाली प्रेस कांफ्रेंस 15 मार्च को शाम 4.00 बजे शुरू हुई। यू ट्यूब पर इसका लाइव वीडियो लगभग 43 मिनट का है। पश्चिम बंगाल में सरकारी कार्यालयों का कार्य समय सुबह 10:30 से शाम 5:30 बजे तक का है। इसके बावजूद यह विज्ञापन आज दिल्ली के टाइम्स ऑफ इंडिया में छपा है यह चुनाव आयोग की मुस्तैदी, सक्रियता के साथ तकनीक का कमाल है और विकास का नमूना तो है ही। निश्चित रूप से यह सरकारी काम है और सरकारी खर्च पर हुआ है। हालांकि, दिल्ली के अखबार में आज इसकी जरूरत और उपयोगिता दोनों संदिग्ध है। खासकर तब जब चुनाव आयोग पर पक्षपात का गंभीर और पुराना आरोप है। मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग का नोटिस दिया जा चुका है। फिर भी विज्ञापन छपवाने में यह जल्दबाजी और प्रेस कांफ्रेंस को मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा ही संबोधित किया जाना मायने रखता है। खासकर तब जब ओम बिरला के मामले में यह प्रचारित किया गया था कि वे इतने महान हैं कि अपने खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव को खुद स्वीकार किया और जब तक उस पर फैसला नहीं हो गया (फैसला सबको मालूम था) तब तक सदन में आए नहीं। इस बीच भारत का प्रतिनिधित्व करने बांग्लादेश गए यह मुद्दा ही नहीं रहा। जहां तक आज छपे इस विज्ञापन की बात है, इसमें जो कहा गया है उसका कंप्यूटर अनुवाद इस तरह है, 

भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 171(B) के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति चुनाव प्रक्रिया के दौरान किसी मतदाता को प्रभावित करने के लिए पैसे या किसी भी प्रकार का प्रलोभन देता है, या यदि कोई मतदाता ऐसे पैसे या प्रलोभन को स्वीकार करता है, तो इसे एक दंडनीय अपराध माना जाएगा। इस अपराध का दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति को एक वर्ष तक के कारावास, या जुर्माने, या दोनों से दंडित किया जा सकता है।

इसके अतिरिक्त, भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 171(C) के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति चुनाव लड़ रहे किसी उम्मीदवार या किसी मतदाता को डराता-धमकाता है, या किसी नुकसान की धमकी देकर अथवा भय पैदा करके मतदान प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास करता है, तो ऐसा व्यक्ति भी एक वर्ष तक के कारावास, या जुर्माने, या दोनों से दंडित किए जाने का भागी होगा।

मतदाताओं को रिश्वत देने, प्रलोभन देने और डराने-धमकाने जैसे अपराधों को रोकने के उद्देश्य से ‘फ्लाइंग स्क्वाड टीमें’ (FST) गठित की गई हैं। ये टीमें तत्काल कार्रवाई करेंगी और अपराधियों के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही शुरू करेंगी।

सभी नागरिकों से अनुरोध है कि वे किसी भी प्रकार की रिश्वत या प्रलोभन स्वीकार करने से बचें। यदि मतदाताओं को रिश्वत देने, प्रलोभन देने या डराने-धमकाने का कोई भी मामला आपके संज्ञान में आता है, तो आपसे अनुरोध है कि आप तत्काल ‘जिला शिकायत केंद्र’ से संपर्क करें अथवा टोल-फ्री हेल्पलाइन नंबर-1950 पर कॉल करें।

मुझे लगता है कि इस विज्ञापन का मकसद भारतीय न्याय संहिता 2023 का प्रचार ज्यादा है, चुनावी मकसद साधना कम। वरना एसआईआर में मतदाताओं के नाम काटने के थोक आवेदनों पर कार्रवाई की खबर (या प्रचार) नहीं है। तमाम मतदाताओं को साजिशन बाहर करने और परेशान करने, भ्रम में डाले रखने के बाद इस विज्ञापन की जरूरत समझी जा सकती है। तथ्य तो यह है कि राहुल गांधी ने कर्नाटक के मामले में पुलिस की जांच में सहयोग नहीं करने का आरोप लगाया था उसपर अभी तक स्पष्ट जानकारी नहीं है कि चुनाव आयोग ने पुलिस को जांच के लिए मांगी गई जानकारी दी या नहीं, नहीं दी तो क्यों और दी तो क्या हुआ? ऐसी स्थिति में इस विज्ञापन को प्रकाशित कराने की जल्दबाजी समझी जा सकती है जबकि भारतीय न्याय संहिता भले नया हो यह सूचना या नियम नए नहीं हैं। जहां तक मतदाताओं को धमकाने की बात है, पुराने मामलों में कार्रवाई की सूचना नहीं है और रिश्वत तो सरकारें दे रही हैं। कौन दे पा रहा है और किसका देना गैर कानूनी करार दिया गया सब सार्वजनिक है। चुनाव की घोषणा हो चुकी है, मतदाता सूची ही फाइनल नहीं है, लाखों लोगों के नामों पर फैसला होना है तब चुनाव लड़ने और लड़ने की इच्छा रखने वालों का हाल समझा जा सकता है। खासकर उनका जिनका मतदाता होना ही संदिग्ध बना दिया गया। लॉजिकल डिसक्रिपेंसी से अगर मतदाता होना संदिग्ध हो सकता है तो उम्र गलत होने से उम्मीदवारी भी रद्द हो सकती है और कर दी जा सकती है। इसमें मनमानी के उदाहरण कम नहीं हैं पर सरकार की बात ही नहीं होती है। मैं भी रहने देता हूं।

आज जब सरकार, प्रचार और विज्ञापन की बात हो ही रही है तो जाहिर है कि हेडलाइन मैनेजमेंट इन्हीं सब का कॉकटेल या पंजगव्य है। इसलिए टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड की भी बात की जानी चाहिए। टाइम्स ऑफ इंडिया की आज की लीड द हिन्दू में भी चार कॉलम में छपी है। खबर है कि एलपीजी की पैनिक बुकिंग बंद हुई, ऑनलाइन ऑर्डर बहुत कम हो जाने के बाद बढ़ गया है। मैं नहीं जानता कि टाइम्स ऑफ इंडिया के पाठकों में कितने एलपीजी का उपयोग करते होंगे और पैनिक बुकिंग कम होने तथा ऑनलाइन ऑर्डर बहुत कम होकर फिर बढ़ने की यह खबर कितने लोगों के मतलब की है या कितना जनहित करेगी। मैं यह देख और समझ रहा हूं कि एलपीजी का संकट सार्वजनिक होने से सरकार हिल सी गई है। प्रधानमंत्री ने संकट से निपटने की बजाय इसकी खबर से निपटने का बीड़ा उठाया और इस क्रम में स्वयं वह सब किया जो प्रधानमंत्री के स्तर का नहीं था। अगर नरेन्द्र मोदी के स्तर का था भी तो 12 साल प्रधानमंत्री रहने के बाद नहीं रहना चाहिए था। पर नरेन्द्र मोदी ऐसे ही हैं और यही उनकी विशेषता या महानता है। इसमें यह शामिल है कि वे जो चाहते हैं वही मीडिया करता है। आज टाइम्स ऑफ इंडिया इसमें पूरी तरह शामिल लग रहा है। वरना पैनिक बुकिंग जीवन भर तो चलनी नहीं थी। रेस्त्रां की बात नहीं हो तो घरेलू उपयोग में एक सिलेंडर औसतन 15 दिन तो चलता ही है। इंडियन एक्सप्रेस में आज खबर भी है – 34 करोड़ एलपीजी उपभोक्ता हैं : आम परिवार हर महीने आधे सिलेंडर का उपयोग करता है। पैनिक बुकिंग वही होगी कि नया सिलेंडर लगाने के बाद फिर तुरंत बुक करा दिया जाए। पहले इसकी कोई समय सीमा नहीं थी। संकट की खबरों के बाद इसे 21 दिन और फिर 25 दिन किया गया। खबर थी कि गांव-देहात में इसे 45 दिन कर दिया गया है। सच्चाई है कि एलपीजी का कोई भी सामान्य ग्राहक दो ही सिलेंडर रख सकता है और पैनिक में दो ही बुक करा सकता है। अगर किसी तरह तीसरा बुक करा दे तो वह खाली सिलेंडर कहां से लाएगा और भरा हुआ सिलेंडर ले नहीं पाएगा। पैनिक बुकिंग के सिलेंडर की गैस जब लिए नहीं जाएंगे तो बुकिंग का भी कोई मतलब नहीं रह जाएगा। पैनिक में ग्राहक दाल चावल की तरह गैस को मर्तबान या लोहे के बक्से में नहीं रख सकता है। छह महीने या साल भर  का स्टॉक नहीं रख सकता है। एक की जगह दो ही सिलेंडर रख पाएगा बाकी तो जो भी है, डीलर और बॉटलिंग करने वाले ही कर सकते हैं लेकिन जो हुआ वह हास्यास्पद ही था। टाइम्स ऑफ इंडिया ने आज इस खबर को लीड बनाकर इस मामले को शिखर पर पहुंचा दिया है।

पश्चिम बंगाल में चुनाव की घोषणा की खबर का शीर्षक यह है कि मोदी राज में बंगाल चुनाव पांच से सात हुए और फिर आठ। अब दो हो गए हैं तो खबर यह भी है। अखबार की लीड का शीर्षक चुनाव के चरणों की संख्या बताता है और फिर खबर है शीर्षक है कि इस बार दो चरणों में चुनाव 25 साल में सबसे कम है। जाहिर है, खबर यही थी और इसका कारण बताया जाना चाहिए था लेकिन नामुमकि मुमकिन है। हमने ‘चुना’ है। 

चुनाव की घोषणा की आज की मूल खबर की बात करूं तो द टेलीग्राफ ने लिखा है, चुनाव आयोग के सूत्रों ने कहा कि बंगाल में दो चरण में चुनाव कराने का निर्णय राज्य के विपक्षी दलों के आग्रह पर किया गया है। मेरे अन्य अखबारों से अलग, आज सिर्फ द टेलीग्राफ ने बताया है कि बंगाल के चुनाव 2006 और 2011 में पांच चरणों में हुए थे 2016 में इन्हें 7 चरणों में कराया गया जिसे बढ़ाकर 2021 में आठ कर दिया गया था। ऐसे में इस बार दो चरणों में कराने की घोषणा हुई है और यह पश्चिम बंगाल में विपक्षी पार्टियों की मांग पर है तो सबको पता है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा मुख्य विपक्षी दल है और अगर पहले पांच से सात और फिर सात से आठ चरण किए गए तो क्यों और किसके फायदे के लिए किए गए होंगे। इस बार दो चरण में कराने का निर्णय भी भाजपा के फायदे के लिए है तो चुनाव की निष्पक्षता के बारे में कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है और यह तब है जब पक्षपात के कारण केंद्र सरकार के विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ ही प्रस्ताव पेश किया है। इन दो उदाहरणों से पक्ष और विपक्ष का दशा-दिशा को भी समझा जा सकता है। इसे नहीं बताने वाले अखबारों के बारे में कहा जाता रहा है और आज भी सब का शीर्षक वैसे ही बिल्कुल सामान्य है। द टेलीग्राफ ही अपवाद है या फिर टाइम्स ऑफ इंडिया जिसने इस खबर को पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर छापा है। हिन्दी अखबारों में अमर उजाला ने इस चुनावी घोषणा को चुनावी रणभेरी कहा है तो नवोदय टाइम्स में चुनावी चौसर बिछने की सूचना है। देशबन्धु ने बंगाल में दो चरणों में मतदान कराए जाने की खबर को ही मुख्य शीर्षक बनाया है। द हिन्दू का शीर्षक है, “विधानसभा चुनाव 9 अप्रैल को शुरू होंगे; पश्चिम बंगाल दो चरणों में वोट देगा। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है, “चार राज्य, एक केंद्र शासित प्रदेश अप्रैल के चुनावी रण के लिए तैयार; नतीजे 4 मई को”। इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है, “मुकाबला शुरू : बंगाल दो चरणों में मतदान करेगा, अन्य एक में”। दि एशियन एज का शीर्षक है, “दो चरणों का बंगाल चुनाव 23 अप्रैल से; अन्य राज्यों में एक दिन; नतीजे 4 मई को”।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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