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आज के अखबार : तिरुपति लड्डू विवाद ‘बैसाखी’ को मजबूत करने की मिली-जुली कोशिश?

संजय कुमार सिंह

मेरे सात अखबारों में आज दो बड़ी खबरें हैं। पहली बांबे हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार के संशोधित आईटी नियमों को खारिज कर दिया। अमर उजाला में यह खबर लीड है और इसका शीर्षक है, संशोधित आईटी नियम असांविधानिक और अस्पष्ट, हाईकोर्ट ने किये निरस्त। उपशीर्षक है, सोशल मीडिया सामग्री के तथ्यों की जांच के लिए इकाई नहीं बना सकेगी सरकार। दूसरी खबर आस्था पर आघात यानी तिरुपति के लड्डू विवाद पर है। अमर उजाला में आज यह दूसरे पहले पन्ने की लीड है। शीर्षक है, प्रसादम विवाद में केंद्र ने आंध्र सरकार से मांगी रिपोर्ट, मंदिर ने बनाई जांच समिति। आप जानते हैं कि तिरुपति मंदिर के लड्डू में चर्बी होने की खबर कल अखबारों में छपी थी। मामला यह है कि आंध्र प्रदेश में तेलुगू देशम पार्टी  की सरकार ने पहले की वाईएसआरसी के कार्यकाल के दौरान तिरुपति मंदिर में लडडू बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले घी में बाहरी चर्बी की मौजूदगी वाली प्रयोगशाला रिपोर्ट का खुलासा किया था।

आज इंडियन एक्सप्रेस में टॉप पर दो कॉलम में छपी खबर का शीर्षक है, तिरुपति लड्डू यूद्ध मंदिर बोर्ड ने नायडू का समर्थन किया, जगन ने पलटवार किया, केंद्र सरकार ने भी अपनी ताकत झोंकी। अमर उजाला में तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) का पक्ष सिंगल कॉलम में है। इसके अनुसार, कार्यकारी अधिकारी जे श्यामला राव ने कहा कि चार ट्रक घी की गुणवत्ता ठीक नहीं पाय़े जाने पर उनके नमूने जांच के लिए भेजे गये थे। घी में मिलावट की रिपोर्ट मिली और चारो नमूनों की रिपोर्ट में एक जैसे नतीजे आने के बाद तुरंत सप्लाई रोक दी गई। ठेकेदार को काली सूची में डालने के अलावा जुर्माना लगाने की प्रकिया भी शुरू कर दी गई है। अब कानूनी कार्रवाई की जायेगी। अखबारों की खबरों से मुझे घी की शुद्धता को लेकर यह विवाद प्रायोजित लग रहा है। घी की शुद्धता पर विवाद तो ठीक है लेकिन कुछ सवाल इसके औचित्य को संदिघ्ध बनाते हैं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि रिपोर्ट 16 जुलाई की है, नमूने 9 जुलाई को लिये गये थे।

सवाल यह है कि खबर कल दो महीने से ज्यादा बाद क्यों छपी और गुरुवार को सोशल मीडिया पर क्यों आई। इतने दिनों तक दबी-छिपी क्यों रही। जांच के समय, और प्रयोगशाला के चयन पर भी विवाद है। आप जानते हैं कि चार जून को लोकसभा चुनाव के नतीजे आये थे। केंद्र की भाजपा सरकार पूर्ण बहुमत वाली नहीं है और उसे अन्य के अलावा तेलुगू देशम पार्टी का भी समर्थन है। लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव की बात आई और भाजपा ने ओम बिड़ला को फिर से अध्यक्ष बनाने का फैसला किया तो शुरू में इसका विरोध हुआ और उम्मीद की जा रही थी कि सरकार के कुछ समर्थक इस मामले में विपक्ष का साथ देंगे और इस मामले में शायद मतदान हो जाये। पर ऐसा नहीं हुआ। यह तथ्य है कि मंदिर के लड्डू की जांच का कारण और जरूरत जो हो, खबरों के अनुसार इसके लिए नमूने 9 जुलाई को लिये गये हैं जब दुनिया को लगा कि भाजपा की सरकार की मजबूती तेलुगू देशम पर भी टिकी हुई है। इसलिए, सरकार की मजबूती के लिए तेलुगू देशम का भी मजबूत होना जरूरी है।

जो खबरें नजर नहीं आईं

1. माधवी पुरी बुच और सेबी के संसाधन – टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर के अनुसार सेबी प्रमुख माधवी पुरी बुच से संबंधित एक आरटीआई के जवाब में सेबी ने कहा है कि जिन मामलों में सेबी की चेयरपर्सन माधबी पुरी बुच ने संभावित हितों के टकराव के कारण खुद को अलग कर लिया था, उनका विवरण “तत्काल” उपलब्ध नहीं हैं और उन्हें एकत्रित करने में सेबी के संसाधनों का “गैरआनुपातिक विचलन” होगा। मतलब कि इसमें काफी पैसा खर्च होगा और इसकी जरूरत नहीं है या आपकी जानकारी के लिए हम इतना पैसा खर्च करने वाले नहीं हैं। 

आज द टेलीग्राफ में बिजनेस पेज पर लीड

2. सीबीआई की खिंचाईइंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक खबर के अनुसार सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की है कि बंगाल के सभी मामले दूसरे राज्य में ट्रांसफर कर दिये जायें। ये मामले 2021 के चुनाव के बाद की हिंसा से संबंधित हैं। सुप्रीम कोर्ट में दलील दी गई और यह गंभीर आरोप लगाया गया कि राज्य की अदालतें अवैध रूप से जमानत दे रही हैं। इसपर एतराज किया जाने पर सरकारी वकील ने कहा कि याचिका में कुछ ‘लूज ड्राफ्टिंग’ घुस आया होगा या रह गया होगा। अदालत ने कहा कि इस याचिका को वापस लिया जाना चाहिये।

3. जांच जल्द पूरी करने की मांग – कोलकाता के जूनियर डॉक्टर्स ने शुक्रवार को स्वास्थ्य भवन से साल्ट लेक में सीबीआई मुख्यालय तक मार्च करके आरजी कर बलात्कार हत्या मामले की जांच कर रही सीबीआई से मांग की है कि इसे जल्दी पूरा किया जाये ताकि दोषियों की गिरफ्तारी सुनिश्चित हो सके।  

4. काम के दबाव में मौतद टेलीग्राफ की एक खबर के अनुसार, कार्यस्थल से संबंधित मौतें अचानक भयावह सुर्खियों में हैं। खबर के अनुसार अर्न्स्ट एंड यंग के पुणे कार्यालय में एक युवा चार्टर्ड अकाउंटेंट की मृत्यु के बाद सोशल मीडिया गुस्से और अविश्वास से भरा हुआ है, क्योंकि एक राक्षस बॉस को कार्यस्थल की विषाक्त संस्कृति को “सामान्य” बनाने के लिए कभी नहीं कहा गया। केरल की 26 साल की चार्टर्ड अकाउंटेंट अन्ना सेबेस्टियन पेरायिल की कहानी कभी सामने नहीं आती अगर उसकी मां अनीता ऑगस्टीन ने हाल ही में ईवाई इंडिया के चेयरमैन राजीव मेमानी को एक मार्मिक नोट नहीं लिखा होता। इसमें, उन्होंने बताया कि कैसे उनकी बेटी की मृत्यु “काम के बोझ” के कारण हुई। इस बोझ ने उसे शारीरिक, भावनात्मक और मानसिक रूप से थका दिया था।

अंतिम संस्कार में दफ्तार से कोई नहीं – अन्ना की मृत्यु जुलाई में हुई, अपने सपनों की नौकरी मिलने के चार महीने बाद। सब कुछ खत्म हो जाने के बाद अनीता ने मेमानी को लिखा कि वह इस बात से दुखी हैं कि संस्थान से किसी ने भी उनकी बेटी अन्ना सेबेस्टियन पेरायिल के अंतिम संस्कार में शामिल होने की परवाह नहीं की। पुणे के एक अस्पताल में अत्यधिक थकावट से उत्पन्न जटिलताओं के कारण उसकी मृत्यु हो गई थी। बाद में अर्नस्ट एंड यंग इंडिया के चेयरपर्सन राजीव मेमानी ने कंपनी से किसी के भी अपने कर्मचारी के अंतिम संस्कार में शामिल न होने पर खेद व्यक्त किया है, और आज तक की एक खबर के अनुसार कहा है कि ऐसा दोबारा नहीं होगा …. मुझे नहीं पता काम के दबाव में मौत या अंतिम संस्कार में किसी का भाग नहीं लेना।

5. उड़ीशा के थाने में महिला वकील का उत्पीड़न – नवोदय टाइम्स में चार कॉलम में बॉटम है। मामला उड़ीशा के भरतपुर थाने का है। इसमें सेना के एक अधिकारी और उनकी मंगेतर के साथ पुलिस की कथित मारपीट और ज़्यादती के मामले में 20 सितंबर को मामला दर्ज किया गया है। घटना 14 सितंबर की है। पीड़ित महिला को एक महिला पुलिस अधिकारी से मारपीट के मामले में गिरफ्तार किया गया था। कल जेल से रिहा होने के बाद उसने आप बीती सुनाई जो सोशल मी़डिया पर चर्चित है। 32 वर्षीय महिला ने चार पुरुष पुलिसकर्मियों पर उसे निर्वस्त्र कर पीटने और यातना देने के आरोप लगाये हैं। हालांकि पुलिस ने सभी आरोपों से इनकार किया है। संबंधित पुलिस वालों को निलंबित कर दिया गया है। 

जहां तक लड्डू के घी में मिलावट और पशुओं की बाहरी चर्बी मिले होने का मामला है, जब घी में मिलावट की बात सामने आई जो सामान्य जरूरत थी कि इसकी जांच किसी और प्रयोगशाला से कराई जाती ताकि रिपोर्ट पर यकीन किया जा सकता और उसे देर से सार्वजनिक किये जाने का कारण समझ में आता। वह सब तो नहीं ही है आज इंडियन एक्सप्रेस ने हरीश दामोदरन का ‘एक्सप्लेन्ड’ छापा है। इसके अनुसार, इस समय घी की न्यूनतम लागत 485-495 रुपये प्रति किलो होनी चाहिये। ऐसे में यह समझना मुश्किल है कि डिन्डीगुल की एआर डेरी फूड प्राइवेट लिमिटेड मंदिर को 320 रुपये किलो घी कैसे दे रही थी? इसकी शीर्षक है, “लागत का अंकगणित : घी की कम कीमत से कान खड़े होने चाहिये थे”। कहने की जरूरत नहीं है कि यह सबके लिए है खासकर उनके लिये जो मंदिर समिति में हैं और अगर इनलोगों ने इस मामले पर उसी समय चर्चा नहीं की तो अब यह मुद्दा नहीं है और अगर की थी तो क्या हुआ?

जो भी हो, अगर गलती हुई है तो मंदिर समिति ने की है और मंदिर समिति अगर न्यूनतम कीमत पर खरीदने के लिए मजबूर थी तो खरीद का यह नियम दोषी है और शुद्धता के लिए इस नियम का क्या करना है यह भी मंदिर समित को ही तय करना था। इसमें सरकार का कोई महत्व नहीं है और अगर है तो घी का प्रमाणन, मानकीकरण करने वाली सरकार की संस्था का है। जो भी हो, मुझे लगता है कि मामला जितना गंभीर है उसमें आरोप प्रेस कांफ्रेंस करके लगाये जाने चाहिये थे उसमें सवाल-जवाब होते तो बहुत सारी बातें स्पष्ट हो गई होतीं और लगता कि मुद्दे को हल करने की कोशिश है। इसमें राजनीति नहीं है और बिल्कुल नहीं है। लेकिन आज अमर उजाला की खबर का उपशीर्षक है, स्वास्थ्य मंत्री नड्डा बोले – एफएसएसएआई की जांच के बाद सख्त कार्रवाई। मैं समझता हूं कि एफएसएसएआई का काम है कि वह बाजार में बिकने वाले खाद्य पदार्थों की जांच करती रहे और सुनिश्चित करे कि मानक उत्पाद ही बाजार में बिकें।

ऐसे में अगर मंदिर को बेचे गये घी में कुछ गड़बड़ी है तो उसके लिए खरीदने वाली समिति के अलावा, एफएसएसएआई ही जिम्मेदार है। अगर वह नहीं है तो जांच अब किसने किसलिये कराई और अगर अभी भी अंतिम जांच एफएसएसएआई को ही करनी है तो जो जांच हुई है उसका क्या मतलब और किसलिये हुई है। अब कम से कम यह कहने का कोई मतलब नहीं है कि एफएसएसएआई की रिपोर्ट के बाद मंदिर समिति पर मिलावटी घी खरीदने के लिए कार्रवाई की जाये। एफएसएसएआई के काम और अधिकार तथा सरकारी व्यवस्था के बावजूद अगर कोई आपूर्तिकर्ता मिलावट वाला उत्पाद बेच रहा है तो व्यवस्था जिम्मेदार है, एजेंसी जिम्मेदार है, सरकार जिम्मेदार है और जाहिर है कि इस मिलावटी खाद्य पदार्थ का उपयोग मंदिर में ही नहीं और भी जगह हुआ होगा और उनके भी विश्वास को आघात पहुंचा है। मुद्दा वह भी है। कहने की जरूरत नहीं है कि इस मामले से भाजपा को हिन्दुओं की भलाई करने और उनका हित चिन्तक होने का मौका मिल रहा है तो मीडिया की कोशिश भी ऐसी ही है।  

इसका पता टाइम्स ऑफ इंडिया के इस शीर्षक से लगता है, तिरुपति के लड्डुओं पर नायडू ने रिपोर्ट मांगी; जगन ने कहा :राजनीतिकरण न करें। दैनिक जागरण में लीड के ऊपर सात कॉलम का शीर्षक है, “तिरुपति लड्डू की जांच करेगा एफएसएसएआई, उचित कार्रवाई होगी नड्डा”। द हिन्दू में इस खबर का शीर्षक है, केंद्र ने जांच के आदेश दिये तो तिरुपति लड्डू विवाद गर्माया। खबर से पता चलता है कि जांच के आदेश केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने दिये हैं जो भाजपा के कार्यवाहक (एक्सटेंशन वाले अध्यक्ष) भी हैं। अगर प्रधानमंत्री को लिखी चिट्ठी का जवाब भाजपा अध्यक्ष लिखते हैं तो इस सरकारी मामले में भाजपा अध्यक्ष अपना काम स्वास्थ्य मंत्री की हैसियत से कर रहे हैं। हालांकि ऊपर खबर यही है कि एफएसएसएआई को जांच करनी है पर द हिन्दू में प्रकाशित एक खबर के अनुसार संबंधित डेरी ने कहा है कि उसके घी को एफएसएसएआई का क्लियरेंस है और उसने इन आरोपों का खंडन किया है कि उसने मंदिर को जिस घी की आपूर्ति की है वह अशुद्ध या स्तरहीन है।

भाजपा सरकार की चाल और उसका नाकाम होना

साफ दिखाई दे रहा है कि बहुत सारे मामले स्पष्ट नहीं हैं। प्रेस कांफ्रेंस होती तो हो सकते थे पर अब वह सब होता नहीं है और जो होता है उसे करते रहने के लिए कानून बनाने की कोशिश की जा रही थी, सरकारी व्यवस्था की गई थी और संयोग से उसे रद्द करने की बांबे हाईकोर्ट की खबर आज ही है। आप देख रहे हैं कि लड्डू का यह विवाद जो देश में हिन्दू-मुसलमान करने के लिए हो सकता है। अगर मकसद यह नहीं था तो जैसा मैंने पहले लिखा है, मिलावट की जानकारी मिलने पर दूसरी प्रयोगशाला से जांच कराई जाती वही रिपोर्ट आने पर प्रेस कांफ्रेंस कर मामले को सार्वजनिक किया जाता। इससे पहले आपूर्तिकर्ता बदले जा सकते थे या न्यूनतम कीमत पर खरीदने की शर्त हटाने का कारण बताने के लिए यह प्रेस कांफ्रेंस की जाती। पर मामला शुरू हुआ सोशल मीडिया के जरिये और भाजपा अध्यक्ष ने जांच का आदेश देकर मामले को गर्मा दिया है जैसा द हिन्दू का शीर्षक है। वैसे भी, सांप्रदायिकता, हिंसा, अविश्वास फैलाने वाली खबरों को रोकना ज्यादा जरूरी है। उसके लिए कानून भी हैं। कई मामलों में ऐसी खबरों को नहीं रोका जाता है और सरकार या भाजपा का हित न हो तो इसकी बात भी नहीं की जाती है जबकि सरकार खास तरह की सही खबरों को भी सामने आये बगैर रोकने के लिए कानून चाहती है।    

आज जिस आईटी नियम को रद्द किये जाने की खबर है उसके अनुसार, सरकार ने पीआईबी को खबरों की जांच करने के लिए अधिकृत किया था और नियम था कि अगर पीआईबी कह दे कि खबर फर्जी या भ्रामक है तो उसे सोशल मीडिया से हटाना होगा। कहने की जरूरत नहीं है कि जो खबर सरकार को अपने हित में लगेगी उसके मामले में ऐसा नहीं किया जायेगा। अगर सरकार नहीं चाहती कि जांच रिपोर्ट की यह खबर सोशल मीडिया और उसके बाद अखबारों में सार्वजनिक हो तो पहली रिपोर्ट को फेक यानी फर्जी और मिसली़डिंग यानी भ्रम फैलाने वाला कहकर सोशल मीडिया से हटवा दिया जाता। संबंधित डेरी ने कहा ही है कि उसका घी प्रमाणित है तो प्रयोगशाला जांच रिपोर्ट को भ्रम फैलाने वाला कहा जा सकता था। दूसरी ओर सरकार चाहती है तो इसे यूं ही चलते और बढ़ते रहने दे सकती है। इस खबर से सरकार को फायदा है कि भाजपा राज में मिलावट नहीं होगी।  

प्रधानमंत्री ने राहुल पर हमला किया

आज स्टेट्समैंन अखबार में एक खबर दिखी, शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने राहुल पर हमला किया, कहा समाज को बांटने वालों से सावधान रहें। आप जानते हैं कि खुले आम कई बार और कई साल हिन्दू मुसलमान कर चुके प्रधानमंत्री ने आग लगाने वालों को कपड़ों से पहचाने का दावा भी किया है लेकिन लोगों को राहुल गांधी से सतर्क कर रहे हैं। यह उनकी अपनी राजनीति है और अपने सबसे प्रमुख प्रतिद्वंद्वी को पहले ‘पप्पू’ साबित करने की कोशिश की और इसमें पूरी पोल खुल गई तो अब परेशानी साफ नजर आ रही है। उल्लेखनीय है कि नरेन्द्र मोदी जब कांग्रेस मुक्त राजनीति की बात करते थे तो राहुल गांधी विचारधारा की लड़ाई और इसमें हराने की बात करते थे। नरेन्द्र मोदी और उनके समर्थकों के पास कुछ नया नहीं है और अभी भी मंदिर के लड्डू में गाय की चर्बी, मछली का तेल और सुअर की चर्बी आदि होने की बाच चल रही है और इसके लिए जिम्मेदार का पता लगाने के लिए एफएसएसएआई से कहा गया है जबकि जिम्मेदारी उसी की है। आप जानते हैं कि भाजपा नेताओं ने राहुल गांधी के खिलाफ बयान दिये हैं, उनकी जीभ काटने वाले के लिए ईनाम घोषित किया है और उन्हें बदनाम करना जारी है। हिंसा फैलाने वाले बयानों के लिए कार्रवाई नहीं हुई तो कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा उसका राजनीतिक जवाब तो भाजपा अध्यक्ष ने दिया पर प्रशासनिक कार्रवाई नहीं हुई ना प्रधानमंत्री की ओर से कोई ऐसा जवाब आया है। ऐसे समय में लड्डू विवाद का मकसद हेडलाइन मैनेजमेंट भी हो सकता है। वरना, “ना खाउंगा ना खाने दूंगा” के बावजूद मंदिर में मिलावटी घी की आपूर्ति कैसे हो सकती है? और हुई भी हो तो खबर अभी क्यों और लोगों की भावना से खिलवाड़ करने वाले इस मामले में सभी पहलुओं की जानकारी क्यों नहीं दी जा रही है। 

टुकड़े-टुकड़े गिरोह और नकाबपोश कोमल शर्मा

नवोदय टाइम्स में ऐसी खबर का शीर्षक है, कांग्रेस में घुसा नफरत का भूत : मोदी”। इंट्रो है, टुकड़े-टुकड़े गिरोह चला रहा है इस पार्टी को। आप जानते हैं कि जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) में विरोध प्रदर्शन के दौरान 2016 में देश विरोधी नारेबाजी के वीडियो (इसकी सत्यता की पुष्टि और उस आधार पर कार्रवाई अभी तक नहीं हुई है) सामने आए थे। इसमें शामिल लोगों के लिए पहली बार टुकड़े-टुकड़े गैंग शब्द का इस्तेमाल हुआ था। जेएनयू के उस समय के छात्र नेता, कन्हैया कुमार को भाजपा ने टुकड़े टुकड़े गैंग कह कर दुष्प्रचारित किया था। इसकी वजह से उन्हें जेल जाना पड़ा था। अदालत में पेशी के दौरान उनकी पिटाई भी हुई थी (जो व्यवस्था की कमजोरी है)। कन्हैया कुमार कई  बार कह चुके हैं कि पूरा मामला फर्जी है और नहीं है तो सरकार कार्रवाई क्यों नहीं करती है। यही नहीं, एक आरटीआई के जवाब में गृह मंत्रालय ने 2020 में ही कहा था कि टुकड़े-टुकड़े गैंग के बारे में कोई जानकारी नहीं है। इस संबंध में भाजपा के लद्दाख से सांसद की पत्नी और जेएनयू की पूर्व छात्रा जो उस दिन वहाँ मौजूद थीं का एक वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चित हुआ था। इसमें वो राहुल कँवल को कन्हैया कुमार के बारे में बता रही थीं। राहुल कँवल शुरू में ख़ुद कहते सुने जा सकते हैं कि पैकेज की ऑडियो क्लिप अलग थी। लेकिन आज तक ये पता नहीं चल सका कि जो देश विरोधी नारे लगा रहे थे, वो लोग आखिर कौन थे और पकड़े क्यों नहीं गए। कहने की जरूरत नहीं है कि देश की इस लचर कानून व्यवस्था के लिए मोदी सरकार जिम्मेदार है। ऊपर से नरेन्द्र मोदी खुद ऐसे लचर आरोप लगाते हैं।

नरेन्द्र मोदी, अमित शाह समेत अन्य भाजपा नेता रैलियों में टुकड़े-टुकड़े गैंग को लेकर विरोधियों खासकर लेफ्ट समर्थकों पर निशाना साधते रहे हैं। वह भी तब जब 5 जनवरी 2020 को नकाबपोश हमलावरों ने जेएनयू में प्रदर्शनकारी छात्रों और शिक्षकों पर हमला कर दिया था। पुलिस बाहर खड़ी तमाशबीन थी और हिंसा में करीब 35 लोग जख्मी हो गए थे। इनमें एक शर्मा जी की बिटिया, कोमल शर्मा पहचान ली गई थी लेकिन उसकी गिरफ्तारी या उसके खिलाफ कार्रवाई का पता नहीं चला। दूसरी ओर, जेएनयू के पूर्व छात्र और नरेन्द्र मोदी के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने तब कहा था कि जब मैं यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करता था, तब वहां कोई टुकड़े-टुकड़े गैंग नहीं था। ऐसे में यह गैंग नरेन्द्र मोदी के दिमाग की उपज लगती है। जो भी हो, वामंपथियों से भाजपा का पुराना नाता है। आज भी, अमितशाह की एक घोषणा छपी है। स्टेट्समैंन में खबर है, केंद्र मार्च 2026 तक लेफ्ट विंग एक्सट्रीमिज्म (अतिवाद – एलडब्ल्यूई) को जड़ मूल से खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध है। इससे आप समझ सकते हैं कि हेडलाइन मैनेजमेंट के लिए क्या सब होता है। उसमें कोमल शर्मा जैसे समर्थकों और प्रचारकों को भूल जाना शामिल है।  

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